अपररूप क्या हैं?
अपररूप (allotropes) एक ही तत्व के अलग-अलग रूप हैं, एक ही भौतिक अवस्था में। परमाणु वही हैं; बस उनके जुड़ने का तरीक़ा अलग है। इस गुण को अपररूपता कहते हैं।
कार्बन समूह 14 में है। इसके बाहरी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं, इसलिए हर परमाणु इलेक्ट्रॉन साझा करके 4 सहसंयोजक बंध तक बना सकता है। सहसंयोजक बंध = इलेक्ट्रॉनों का साझा जोड़ा, जो बहुत मज़बूत होता है।
कार्बन अलग-अलग पैटर्न में जुड़ सकता है, इसलिए हमें हीरा, ग्रेफ़ाइट, ग्रेफ़ीन और फ़ुलरीन मिलते हैं। सब शुद्ध कार्बन हैं, पर गुण बिल्कुल अलग।
हीरा: विशाल सहसंयोजक संरचना
हीरे में हर कार्बन परमाणु 4 दूसरे कार्बन परमाणुओं से मज़बूत सहसंयोजक बंधों से जुड़ा है। इससे एक बहुत बड़ा 3D जाल बनता है: विशाल सहसंयोजक संरचना।
- बहुत कठोर: खरोंचने के लिए बहुत से मज़बूत बंध तोड़ने पड़ते हैं। यह सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ है।
- बहुत ऊँचा गलनांक (3500 °C से ज़्यादा): इतने बंध तोड़ने में बहुत ऊर्जा लगती है।
- बिजली नहीं चलाता: चारों बाहरी इलेक्ट्रॉन बंधों में लगे हैं, कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन या आयन नहीं।
उपयोग: काटने के औज़ार, ड्रिल की नोक, काँच काटना और गहने (यह प्रकाश को बहुत मोड़ता है, इसलिए चमकता है)।
ग्रेफ़ाइट: फिसलने वाली परतें
ग्रेफ़ाइट में हर कार्बन परमाणु सिर्फ़ 3 दूसरों से जुड़ता है। परमाणु षट्भुजों (छह कोनों वाले छल्लों) की चपटी परतें बनाते हैं।
- परत के अंदर के बंध मज़बूत सहसंयोजक हैं, इसलिए ग्रेफ़ाइट का भी गलनांक बहुत ऊँचा है।
- परतों के बीच बल कमज़ोर हैं, इसलिए परतें एक-दूसरे पर फिसलती हैं। ग्रेफ़ाइट नरम और चिकना है।
- हर परमाणु का एक इलेक्ट्रॉन बचा रहता है। ये विस्थानित (delocalised) इलेक्ट्रॉन परतों में घूमते हैं, इसलिए ग्रेफ़ाइट बिजली और ऊष्मा चलाता है।
उपयोग: पेंसिल, विद्युत-अपघटन और बैटरी के इलेक्ट्रोड, मशीनों में सूखा स्नेहक।
ग्रेफ़ीन, फ़ुलरीन और नैनोट्यूब
ग्रेफ़ीन ग्रेफ़ाइट की एक अकेली परत है, सिर्फ़ एक परमाणु मोटी। अपने वज़न के हिसाब से बहुत मज़बूत, लगभग पारदर्शी और बढ़िया चालक। उपयोग: मुड़ने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, बेहतर बैटरी, हल्के-मज़बूत मिश्रित पदार्थ।
फ़ुलरीन कार्बन के ऐसे अणु हैं जो खोखली गेंद या नली जैसे हैं। इनमें ज़्यादातर षट्भुज होते हैं, साथ में कुछ पंचभुज (पाँच कोनों वाले छल्ले) जो सतह को मोड़ते हैं। पहला खोजा गया फ़ुलरीन बकमिन्स्टरफ़ुलरीन C₆₀ था, जो फ़ुटबॉल जैसा दिखता है।
कार्बन नैनोट्यूब लंबी पतली नलियों जैसे फ़ुलरीन हैं। इनकी लंबाई, चौड़ाई से बहुत ज़्यादा होती है, ये खींचने पर बहुत मज़बूत (उच्च तनन सामर्थ्य) और अच्छे चालक हैं। उपयोग: खेल-सामान को मज़बूत करना, इलेक्ट्रॉनिक्स, नैनो-तकनीक।
फ़ुलरीन अपने पिंजरे में दवा के अणु ले जा सकते हैं, स्नेहक और उत्प्रेरक की तरह भी काम आते हैं (बड़ा पृष्ठ क्षेत्रफल)।
कार्बन के रासायनिक गुण
सभी अपररूप कार्बन ही हैं, इसलिए रासायनिक अभिक्रियाएँ एक जैसी हैं। कमरे के ताप पर कार्बन काफ़ी अक्रिय है।
- भरपूर ऑक्सीजन में दहन: C + O₂ → CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड)। तेज़ गर्म करने पर हीरा भी जलता है!
- कम ऑक्सीजन में दहन: 2C + O₂ → 2CO (कार्बन मोनोऑक्साइड, ज़हरीली गैस)।
- अपचायक (reducing agent): गर्म कार्बन कुछ धातु ऑक्साइडों से ऑक्सीजन छीन लेता है, जैसे 2CuO + C → 2Cu + CO₂। वात्या भट्टी में लोहा ऐसे ही बनता है।
हीरा और ग्रेफ़ाइट दोनों जलाने पर एक ही गैस CO₂ देते हैं। इससे सिद्ध होता है कि दोनों सिर्फ़ कार्बन से बने हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अपररूप = एक ही तत्व के रूप, परमाणुओं की अलग व्यवस्था
- हीरा: हर परमाणु के 4 बंध, विशाल 3D जाल → कठोर, ऊँचा गलनांक, बिजली नहीं
- ग्रेफ़ाइट: हर परमाणु के 3 बंध, षट्भुज परतें + विस्थानित इलेक्ट्रॉन → नरम, सुचालक
- ग्रेफ़ीन: ग्रेफ़ाइट की एक परत; फ़ुलरीन: खोखले पिंजरे (C₆₀); नैनोट्यूब: लिपटी नलियाँ
- C + O₂ → CO₂ (भरपूर हवा); 2C + O₂ → 2CO (कम हवा)
- 2CuO + C → 2Cu + CO₂ (कार्बन अपचायक के रूप में)
हल किए गए उदाहरण
1. हीरा और ग्रेफ़ाइट दोनों का गलनांक बहुत ऊँचा है, पर सिर्फ़ ग्रेफ़ाइट बिजली चलाता है। समझाओ।
दोनों विशाल संरचनाएँ हैं जिनमें बहुत से मज़बूत सहसंयोजक बंध हैं; इन्हें तोड़ने में बहुत ऊर्जा लगती है, इसलिए दोनों बहुत ऊँचे ताप पर पिघलते हैं। हीरे में चारों बाहरी इलेक्ट्रॉन बंधों में हैं, कोई आवेश नहीं घूम सकता। ग्रेफ़ाइट में हर परमाणु 3 इलेक्ट्रॉन बंधों में लगाता है; चौथा विस्थानित होकर परतों में घूमता है और करंट ले जाता है।
2. ग्रेफ़ाइट स्नेहक क्यों बनता है, हीरा क्यों नहीं?
ग्रेफ़ाइट की परतें सिर्फ़ कमज़ोर बलों से जुड़ी हैं, इसलिए आसानी से फिसलती हैं और घर्षण घटाती हैं। हीरे के परमाणु हर दिशा में मज़बूत बंधों से बँधे हैं, कुछ नहीं फिसलता।
3. अगर हर परमाणु 3 से जुड़ा हो तो एक C₆₀ अणु में कितने बंध हैं?
60 परमाणु × 3 बंध = 180 बंध-सिरे। हर बंध 2 परमाणुओं को जोड़ता है, इसलिए दो बार गिना गया। बंध = 180 ÷ 2 = 90।
आम गलतियाँ
- कहना कि ग्रेफ़ाइट आयनों से बिजली चलाता है। इसमें आयन नहीं हैं; विस्थानित इलेक्ट्रॉन करंट चलाते हैं।
- कहना कि ग्रेफ़ाइट की परतें इसलिए फिसलती हैं क्योंकि सहसंयोजक बंध कमज़ोर हैं। परत के अंदर बंध मज़बूत हैं; सिर्फ़ परतों के बीच के बल कमज़ोर हैं।
- C₆₀ को विशाल संरचना कहना। फ़ुलरीन एक अणु है जिसमें तय संख्या में परमाणु हैं।
- अपररूपों को अलग तत्व या यौगिक समझना। सभी शुद्ध कार्बन हैं और जलकर सिर्फ़ CO₂ देते हैं।