National Year 10 Chemistry
अध्याय: 5
1. 4.1 Atomic structure and the periodic table
4.1.1 A simple model of the atom, symbols, relative atomic mass, electronic charge and isotopes · 4.1.2 The periodic table · 4.1.3 Properties of transition metals (Chemistry only)
- परमाणु की संरचना – परमाणु के बीच में एक बहुत छोटा, भारी और धनावेशित नाभिक होता है, जिसमें प्रोटॉन और न्यूट्रॉन रहते हैं। इलेक्ट्रॉन इसके चारों ओर तय कोशों K, L, M, N में घूमते हैं। प्रोटॉन की संख्या (Z) से तत्व तय होता है; प्रोटॉन + न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या (A)। बाहरी इलेक्ट्रॉन संयोजकता तय करते हैं।
- आवर्त सारणी: वर्ग, आवर्त और प्रवृत्तियाँ – आवर्त सारणी में तत्व परमाणु क्रमांक (प्रोटॉन की संख्या) के क्रम में रखे जाते हैं। पंक्तियाँ आवर्त हैं; स्तंभ वर्ग (समूह) हैं। एक वर्ग के तत्वों में बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन बराबर होते हैं, इसलिए वे मिलती-जुलती अभिक्रिया करते हैं। मेंडलीफ़ ने शुरुआती सारणी बनाई, अज्ञात तत्वों के लिए खाली जगह छोड़ी और उनके गुण बताए। धातुएँ बाईं ओर और नीचे, अधातुएँ दाईं ओर और ऊपर। वर्ग 0 की उत्कृष्ट गैसों का बाहरी कोश भरा होता है, इसलिए वे अक्रियाशील हैं। वर्ग 1 की क्षार धातुएँ नीचे जाने पर ज़्यादा क्रियाशील होती हैं। वर्ग 7 (कई देशों में वर्ग 17) के हैलोजन नीचे जाने पर कम क्रियाशील होते हैं।
- संक्रमण धातुएँ: मूल गुण – संक्रमण धातुएँ आवर्त सारणी के बीच वाले भाग (d-ब्लॉक) के तत्व हैं, जैसे लोहा, ताँबा, निकेल, क्रोमियम, मैंगनीज़, कोबाल्ट, टाइटेनियम, चाँदी और सोना। सोडियम जैसी समूह 1 की धातुओं की तुलना में इनका गलनांक बहुत ऊँचा, घनत्व ज़्यादा होता है, और ये कठोर व मज़बूत होती हैं; पानी और ऑक्सीजन से बहुत धीरे क्रिया करती हैं। ये अलग-अलग आवेश वाले आयन बनाती हैं (Fe²⁺ और Fe³⁺, Cu⁺ और Cu²⁺), रंगीन यौगिक बनाती हैं और अच्छे उत्प्रेरक हैं। इनके परमाणु अंदर का d उपकोश भरते हैं; क्रोमियम और ताँबा 4s से एक इलेक्ट्रॉन 3d में ले लेते हैं ताकि 3d आधा भरा या पूरा भरा हो। इनके कई आयन पानी या अमोनिया के साथ संकुल आयन भी बनाते हैं।
2. 4.2 Bonding, structure, and the properties of matter
4.2.1 Chemical bonds, ionic, covalent and metallic · 4.2.2 How bonding and structure are related to the properties of substances · 4.2.3 Structure and bonding of carbon · 4.2.4 Bulk and surface properties of matter including nanoparticles (Chemistry only)
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- संरचना से पदार्थ के गुण कैसे तय होते हैं – कण आपस में कैसे जुड़े हैं, यही तय करता है कि पदार्थ कैसा व्यवहार करेगा। आयनिक और विशाल सहसंयोजी पदार्थों में पूरे ढाँचे में मज़बूत बंध होते हैं, इसलिए वे बहुत ऊँचे ताप पर पिघलते हैं। छोटे अणुओं के बीच बल कमज़ोर होता है, इसलिए वे जल्दी पिघलते और उबलते हैं। धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे बिजली चलाती हैं।
- कार्बन के अपररूप: हीरा, ग्रेफ़ाइट, ग्रेफ़ीन और फ़ुलरीन – अपररूप (allotropes) एक ही तत्व के अलग-अलग रूप हैं, एक ही अवस्था में। कार्बन के कई अपररूप हैं। हीरे में हर परमाणु 4 मज़बूत सहसंयोजक बंध बनाता है, एक विशाल 3D जाल में; इसलिए यह बहुत कठोर है, गलनांक बहुत ऊँचा है और बिजली नहीं चलाता। ग्रेफ़ाइट में हर परमाणु 3 से जुड़ता है, षट्भुजों की चपटी परतों में; परतें फिसलती हैं (नरम) और हर परमाणु का एक बचा इलेक्ट्रॉन घूम सकता है, इसलिए यह बिजली चलाता है। ग्रेफ़ीन ग्रेफ़ाइट की एक परत है। फ़ुलरीन जैसे C₆₀ खोखली गेंदें हैं; नैनोट्यूब लिपटी नलियाँ हैं। सभी ऑक्सीजन में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं।
- नैनो कण: बहुत छोटे कण अलग व्यवहार क्यों करते हैं – नैनो कण 1 से 100 नैनोमीटर (nm) चौड़े होते हैं; 1 nm = 1 × 10⁻⁹ m। ये बस कुछ सौ परमाणु चौड़े होते हैं, इसलिए इनके बहुत सारे परमाणु सतह पर होते हैं। बहुत ऊँचे पृष्ठ क्षेत्रफल : आयतन अनुपात के कारण ये उसी पदार्थ के बड़े टुकड़े से अलग तरह से अभिक्रिया करते हैं, प्रकाश रोकते हैं और कीटाणु मारते हैं।
3. 4.3 Quantitative chemistry
4.3.1 Chemical measurements, conservation of mass and quantitative interpretation of equations · 4.3.2 Use of amount of substance in relation to masses of pure substances · 4.3.3 Yield and atom economy of chemical reactions (Chemistry only) · 4.3.4 Concentrations of solutions in mol/dm3 (Chemistry only) (HT) · 4.3.5 Amount of substance and volumes of gases (Chemistry only) (HT)
- परमाणु और अणु – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है (द्रव्यमान संरक्षण), और यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमान के एक ही अनुपात में होते हैं (स्थिर अनुपात)। डाल्टन ने दोनों को समझाया: पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है जो पूरी संख्याओं में जुड़ते हैं। परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं; आवेश वाले परमाणु या समूह आयन हैं। सूत्र संयोजकता को क्रॉस करके लिखते हैं। आण्विक द्रव्यमान (आयनिक यौगिक के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान) सूत्र के सभी परमाणु द्रव्यमानों का योग है, u में।
- मोल: तौलकर कणों की गिनती – मोल कणों की एक तय संख्या है: 6.02 × 10²³ (आवोगाद्रो स्थिरांक)। किसी पदार्थ के एक मोल का द्रव्यमान ग्राम में उसके सापेक्ष सूत्र द्रव्यमान (Mr) के बराबर होता है। इसलिए मोल = द्रव्यमान ÷ Mr। संतुलित समीकरण बताता है कि मोल किस अनुपात में अभिक्रिया करते हैं, और जो अभिकारक पहले ख़त्म हो, वह सीमांत अभिकर्मक है।
- प्रतिशत लब्धि और परमाणु अर्थव्यवस्था – प्रतिशत लब्धि बताती है कि जितना उत्पाद मिल सकता था, उसमें से असल में कितना मिला: वास्तविक ÷ सैद्धांतिक × 100। परमाणु अर्थव्यवस्था बताती है कि अभिकारकों के कितने परमाणु चाहे गए उत्पाद में पहुँचे: चाहे गए उत्पाद का Mr ÷ अभिकारकों का कुल Mr × 100। दोनों से रसायन सस्ता और कम बर्बादी वाला बनता है।
- अनुमापन (Titration): अनजान सांद्रता कैसे पता करें – अनुमापन से किसी विलयन की अनजान सांद्रता निकाली जाती है। ज्ञात सांद्रता वाला विलयन (अनुमापक, titrant) ब्यूरेट से धीरे-धीरे अनजान विलयन (analyte) में डाला जाता है, जब तक अभिक्रिया ठीक पूरी न हो जाए। सूचक या मीटर यह पल दिखाता है। तुल्यता बिंदु पर मोल समीकरण के अनुपात में होते हैं; 1 : 1 अभिक्रिया के लिए C₁V₁ = C₂V₂।
- आवोगाद्रो का नियम: बराबर आयतन, बराबर अणु – आवोगाद्रो का नियम: एक ही ताप और दाब पर, सभी गैसों के बराबर आयतन में अणुओं की संख्या बराबर होती है। इसलिए आयतन मोलों की संख्या के समानुपाती है: V ∝ n, यानी V₁/n₁ = V₂/n₂। STP (0 °C, 101.3 kPa) पर किसी भी गैस का 1 मोल 22.4 L लेता है (मोलर आयतन Vm)। काम के सूत्र: n = V ÷ Vm, N = n × 6.02 × 10²³, m = n × M। बराबर आयतन का द्रव्यमान अलग होता है, इसलिए सापेक्ष घनत्व D = M₁ ÷ M₂ (हाइड्रोजन के सापेक्ष M ÷ 2, हवा के सापेक्ष M ÷ 29)। गैस अभिक्रियाओं में आयतन समीकरण के गुणांकों के अनुपात में होते हैं (2H₂ + O₂ → 2H₂O: 2 : 1 : 2)।
4. 4.4 Chemical changes
4.4.1 Reactivity of metals · 4.4.2 Reactions of acids · 4.4.3 Electrolysis
- संक्षारण, उसका बचाव और मिश्रातु – संक्षारण धातु का हवा, नमी या रसायनों से धीरे-धीरे खराब होना है। लोहे पर जंग तभी लगती है जब हवा (ऑक्सीजन) और पानी दोनों हों; जंग जलयुक्त आयरन ऑक्साइड है। इसे पेंट, तेल, यशदलेपन, क्रोमियम लेपन, ऐनोडीकरण या मिश्रातु बनाकर रोका जाता है। मिश्रातु किसी धातु का दूसरी धातुओं या अधातु के साथ समांगी मिश्रण है; यह शुद्ध धातु से प्रायः अधिक कठोर, मज़बूत और संक्षारण-रोधी होता है।
- धातुओं की प्राप्ति और निष्कर्षण – धातुएँ ज़्यादातर भू-पर्पटी में यौगिकों (खनिजों) के रूप में मिलती हैं; जिस खनिज से धातु लाभ के साथ निकाली जा सके वह अयस्क है। निष्कर्षण के तीन चरण: सांद्रण (गैंग हटाना), कच्ची धातु पाना (भर्जन या निस्तापन, फिर अपचयन या विद्युत अपघटन, जो सक्रियता श्रेणी से तय होता है), और परिष्करण (आम तौर पर विद्युत अपघटनी)।
- आयनिक यौगिक: धातु और अधातु कैसे अभिक्रिया करते हैं – धातु का परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन अधातु के परमाणु को दे देता है ताकि दोनों का बाहरी कोश पूरा (अष्टक) हो जाए। धातु धनायन बनती है, अधातु ऋणायन, और दोनों के बीच का प्रबल आकर्षण आयनिक (वैद्युत संयोजी) बंध है। आयनिक यौगिक कठोर क्रिस्टलीय ठोस होते हैं, उच्च गलनांक वाले, पानी में घुलनशील, और केवल पिघली या घुली अवस्था में विद्युत चालक।
- धातु और अधातु: गुण और सक्रियता श्रेणी – धातुएँ आम तौर पर चमकदार, कठोर, आघातवर्ध्य, तन्य और ऊष्मा-विद्युत की सुचालक होती हैं; अधातुएँ मंद, भंगुर और कुचालक। धातुएँ क्षारकीय ऑक्साइड बनाती हैं, जल और तनु अम्ल से हाइड्रोजन देती हैं, और अधिक सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु को उसके लवण के विलयन से बाहर निकाल देती है। सक्रियता के क्रम में लिखी सूची सक्रियता श्रेणी कहलाती है।
- अम्ल और क्षारक: गुण, सूचक और अभिक्रियाएँ – अम्ल पानी में H⁺ आयन देता है और क्षारक OH⁻ आयन। सूचक रंग या गंध बदलकर बताता है कि कौन मौजूद है। H⁺ और OH⁻ मिलकर पानी बनाते हैं और पीछे लवण बच जाता है।
- विद्युत-अपघटन: बिजली से यौगिक को तोड़ना – विद्युत-अपघटन में दिष्ट धारा (DC) से किसी पिघले या घुले आयनिक यौगिक (विद्युत-अपघट्य) को तोड़ा जाता है। धनायन कैथोड (−) पर जाकर इलेक्ट्रॉन लेते हैं (अपचयन)। ऋणायन ऐनोड (+) पर जाकर इलेक्ट्रॉन देते हैं (ऑक्सीकरण)। पिघले यौगिक से धातु और अधातु मिलती है। विलयन में पानी के H⁺ और OH⁻ भी होते हैं: कैथोड पर हाइड्रोजन बनती है जब तक धातु हाइड्रोजन से कम क्रियाशील न हो, और ऐनोड पर ऑक्सीजन बनती है जब तक हैलाइड न हो। ऐलुमिनियम जैसी क्रियाशील धातुएँ विद्युत-अपघटन से निकाली जाती हैं।
5. 4.5 Energy changes
4.5.1 Exothermic and endothermic reactions · 4.5.2 Chemical cells and fuel cells (Chemistry only)
- ऊष्माक्षेपी और ऊष्माशोषी अभिक्रियाएँ – हर अभिक्रिया में ऊर्जा संरक्षित रहती है; वह सिर्फ़ रसायनों और परिवेश के बीच आती-जाती है। ऊष्माक्षेपी (exothermic) अभिक्रिया परिवेश को ऊर्जा देती है, तापमान बढ़ता है (जलना, उदासीनीकरण, श्वसन, हैंड वॉर्मर)। ऊष्माशोषी (endothermic) अभिक्रिया ऊर्जा लेती है, तापमान गिरता है (ऊष्मीय वियोजन, सिट्रिक अम्ल + सोडियम हाइड्रोजनकार्बोनेट, प्रकाश-संश्लेषण, कोल्ड पैक)। अभिक्रिया प्रोफ़ाइल अभिकारक, उत्पाद और सक्रियण ऊर्जा दिखाती है। बंध तोड़ने में ऊर्जा लगती है, बनाने में निकलती है। ΔH = तोड़ने की ऊर्जा − बनाने में निकली ऊर्जा; ऋणात्मक हो तो ऊष्माक्षेपी।
- रासायनिक सेल और ईंधन सेल – रासायनिक सेल रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। इसमें विद्युत-अपघट्य में दो अलग धातुएँ (इलेक्ट्रोड) होती हैं। ज़्यादा क्रियाशील धातु इलेक्ट्रॉन छोड़ती है, जो तार से कम क्रियाशील धातु तक जाते हैं। क्रियाशीलता का अंतर जितना बड़ा, वोल्टेज उतना ज़्यादा; विद्युत-अपघट्य भी असर डालता है। बैटरी = श्रेणी में जुड़े दो या अधिक सेल, जिनके वोल्टेज जुड़ते हैं। साधारण सेल अभिकारक ख़त्म होने पर रुक जाते हैं; रिचार्जेबल सेल बाहरी धारा से पलटे जा सकते हैं। हाइड्रोजन ईंधन सेल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से पानी और बिजली बनाता है, जब तक ईंधन मिलता रहे।