संक्रमण धातुएँ कहाँ हैं?
आवर्त सारणी में समूह 2 और समूह 13 के बीच एक चौड़ा भाग है। यह d-ब्लॉक है। यहाँ के तत्वों को संक्रमण धातुएँ (कुछ सारणियों में B-समूह की धातुएँ) कहते हैं। पहली पंक्ति स्कैंडियम (Sc) से जस्ता (Zn) तक है: Sc, Ti, V, Cr, Mn, Fe, Co, Ni, Cu, Zn। इनके नीचे चाँदी, सोना, प्लैटिनम आदि हैं।
इन परमाणुओं में नए इलेक्ट्रॉन बाहरी कोश में नहीं, बल्कि अंदर के 3d (या 4d, 5d) उपकोश में जाते हैं। बाहरी कोश (4s) में आमतौर पर 2 इलेक्ट्रॉन रहते हैं। इसीलिए एक पंक्ति की संक्रमण धातुएँ एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती हैं।
सख्ती से देखें तो संक्रमण तत्व वह है जिसके परमाणु या किसी आम आयन में d उपकोश अधूरा हो। जस्ता (परमाणु और Zn²⁺ दोनों में 3d¹⁰) इस नियम में पूरा नहीं बैठता, इसलिए उसके यौगिक सफ़ेद होते हैं; फिर भी वह d-ब्लॉक में रखा जाता है।
संक्रमण धातुएँ बनाम समूह 1
| गुण | समूह 1 (Li, Na, K) | संक्रमण धातुएँ (Fe, Cu, Ni, Cr) |
|---|---|---|
| गलनांक | कम (Na 98 °C, K 63 °C) | ऊँचा (Fe 1538 °C, Cr 1907 °C) – पारा अपवाद, वह द्रव है |
| घनत्व | कम (Na, K पानी पर तैरते हैं) | ज़्यादा (Fe 7.9, Cu 9.0 g/cm³) |
| कठोरता और मज़बूती | नरम: चाकू से कटते हैं | कठोर और मज़बूत |
| पानी और ऑक्सीजन से क्रिया | बहुत तेज़; तेल में रखे जाते हैं | धीमी या नहीं (लोहे पर धीरे जंग; ताँबा, सोना लगभग नहीं) |
| आयन | सिर्फ़ +1 | अक्सर एक से ज़्यादा आवेश (Fe²⁺/Fe³⁺) |
| यौगिकों का रंग | सफ़ेद; घोल रंगहीन | आमतौर पर रंगीन |
| उत्प्रेरक | नहीं | अक्सर हाँ |
यह फ़र्क क्यों? संक्रमण धातुओं के परमाणु छोटे होते हैं और धात्विक बंधन में ज़्यादा इलेक्ट्रॉन (d इलेक्ट्रॉन भी) देते हैं। बंधन मज़बूत होता है, इसलिए पिघलाने में ज़्यादा ऊर्जा लगती है, और परमाणु पास-पास जमते हैं, इसलिए घनत्व ज़्यादा होता है।
रंगीन आयन और एक से ज़्यादा आवेश
ज़्यादातर संक्रमण धातु यौगिक रंगीन होते हैं, ठोस में भी और घोल में भी। अधूरे d उपकोश दृश्य प्रकाश के कुछ रंग सोख लेते हैं; बचे हुए रंग हमें दिखते हैं।
- Cu²⁺: नीला (कॉपर(II) सल्फ़ेट, नीला थोथा)
- Fe²⁺: हल्का हरा; Fe³⁺: नारंगी-भूरा (जंग जैसा)
- Ni²⁺: हरा; Co²⁺: गुलाबी; Cr³⁺: हरा; MnO₄⁻: बैंगनी
संक्रमण धातुएँ अलग-अलग आवेश वाले आयन बना सकती हैं। लोहा Fe²⁺ (आयरन(II) ऑक्साइड, FeO) और Fe³⁺ (आयरन(III) ऑक्साइड, Fe₂O₃) बनाता है। ताँबा Cu⁺ और Cu²⁺ बनाता है। नाम में रोमन अंक आवेश बताता है। समूह 1 की धातुएँ सिर्फ़ +1 आयन बनाती हैं।
सोडियम हाइड्रॉक्साइड से जाँच
सोडियम हाइड्रॉक्साइड घोल डालने पर रंगीन हाइड्रॉक्साइड अवक्षेप बनते हैं: Cu²⁺ → नीला, Fe²⁺ → हरा, Fe³⁺ → नारंगी-भूरा। इससे आयन पहचाना जाता है।
उत्प्रेरक के रूप में संक्रमण धातुएँ
उत्प्रेरक अभिक्रिया को तेज़ करता है और खुद खर्च नहीं होता। संक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक बहुत अच्छे उत्प्रेरक हैं, क्योंकि इनके आयन आसानी से आवेश बदलते हैं और इनकी सतह दूसरे अणुओं को पकड़ लेती है।
- लोहा: हेबर प्रक्रम, नाइट्रोजन + हाइड्रोजन → अमोनिया (उर्वरक के लिए)।
- निकेल: वनस्पति तेल में हाइड्रोजन जोड़कर वनस्पति घी/मार्जरीन बनाना।
- मैंगनीज़(IV) ऑक्साइड: हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को पानी और ऑक्सीजन में तोड़ना।
- वैनेडियम(V) ऑक्साइड: सल्फ़्यूरिक अम्ल बनाना (संपर्क प्रक्रम)।
- प्लैटिनम, पैलेडियम, रोडियम: गाड़ियों के कैटेलिटिक कन्वर्टर।
क्रोमियम और ताँबे में इलेक्ट्रॉन का 'खिसकना'; संकुल आयन
आमतौर पर 4s पहले भरता है, फिर 3d। पहली पंक्ति की दो धातुएँ यह नियम तोड़ती हैं, क्योंकि आधा भरा (d⁵) या पूरा भरा (d¹⁰) d उपकोश ज़्यादा स्थायी होता है:
- क्रोमियम: अपेक्षित 3d⁴4s², असल में 3d⁵4s¹।
- ताँबा: अपेक्षित 3d⁹4s², असल में 3d¹⁰4s¹। ताँबे के नीचे चाँदी भी ऐसा ही करती है: 4d¹⁰5s¹।
4s का एक इलेक्ट्रॉन 3d में 'खिसक' जाता है। जब ये परमाणु आयन बनाते हैं, तो पहले 4s इलेक्ट्रॉन निकलते हैं: Fe (3d⁶4s²) → Fe²⁺ (3d⁶) → Fe³⁺ (3d⁵)।
संकुल आयन (परिचय)
संक्रमण धातु का आयन अपने चारों ओर कई छोटे अणु या आयन पकड़ सकता है, जो अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म से बंधन बनाते हैं। इसे संकुल आयन (complex ion) कहते हैं। पानी में कॉपर(II) असल में [Cu(H₂O)₆]²⁺ (हल्का नीला) है। अमोनिया डालने पर यह [Cu(NH₃)₄(H₂O)₂]²⁺ बन जाता है, जो गहरा नीला है। चाँदी [Ag(NH₃)₂]⁺ बनाती है। आयन के चारों ओर के अणुओं को लिगैंड कहते हैं।
चार रोज़ की संक्रमण धातुएँ: ताँबा, चाँदी, जस्ता, लोहा
- लोहा (Fe): धूसर, मज़बूत, चुंबकीय। वात्या भट्टी में बनता है; ज़्यादातर स्टील बनाया जाता है। पानी और हवा में जंग लगती है (जलयोजित आयरन(III) ऑक्साइड)। आयन Fe²⁺ और Fe³⁺।
- ताँबा (Cu): लाल-भूरा, बिजली और ऊष्मा का बहुत अच्छा चालक, आसानी से तार बनता है। पानी या तनु अम्ल से क्रिया नहीं करता; बाहर धीरे-धीरे हरा हो जाता है। आयन Cu⁺ और Cu²⁺।
- चाँदी (Ag): बिजली का सबसे अच्छा चालक; चमकदार; गहनों, सिक्कों और दर्पण में। हवा के सल्फ़र यौगिकों से काली पड़ जाती है। आयन Ag⁺।
- जस्ता (Zn): नीला-धूसर; तनु अम्ल से क्रिया करके हाइड्रोजन देता है। लोहे पर परत चढ़ाने (गैल्वनीकरण), पीतल (ताँबा + जस्ता) और बैटरी में। सिर्फ़ Zn²⁺; इसके यौगिक सफ़ेद।
करके देखो: पहले अनुमान, फिर जाँच
3D पिकर इस्तेमाल करने से पहले अनुमान लगाओ: टाइटेनियम और पोटैशियम में किसका गलनांक ज़्यादा है? चाँदी और जस्ते में कौन ज़्यादा घना है? फिर दबाकर जाँचो। घर पर (किसी बड़े के साथ): नीले थोथे (कॉपर सल्फ़ेट) के घोल में नई लोहे की कील डालो। कील पर भूरा ताँबा जमता है और नीला रंग फीका पड़कर हल्का हरा (Fe²⁺) होता है। रसोई में ताँबे का बर्तन, स्टील का चम्मच और जस्ता चढ़ी बाल्टी के रंग देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संक्रमण धातुएँ: समूह 2 और समूह 13 के बीच d-ब्लॉक के तत्व (पंक्ति 4 में Sc → Zn)
- विशिष्ट गुण: ऊँचा गलनांक, ज़्यादा घनत्व, कठोर, मज़बूत, रंगीन यौगिक, कई आवेश वाले आयन, उत्प्रेरक
- Fe → Fe²⁺ + 2e⁻; Fe → Fe³⁺ + 3e⁻ (आयरन(II) और आयरन(III))
- Cr = [Ar] 3d⁵4s¹; Cu = [Ar] 3d¹⁰4s¹ (आधा भरा / पूरा भरा d ज़्यादा स्थायी)
- आयन बनते समय पहले 4s इलेक्ट्रॉन निकलते हैं: Fe²⁺ = [Ar] 3d⁶
- संकुल आयन: धातु आयन + लिगैंड, जैसे [Cu(H₂O)₆]²⁺, [Cu(NH₃)₄(H₂O)₂]²⁺, [Ag(NH₃)₂]⁺
हल किए गए उदाहरण
1. एक धातु 1455 °C पर पिघलती है, घनत्व 8.9 g/cm³ है और हरा क्लोराइड बनाती है। यह समूह 1 की धातु है या संक्रमण धातु?
संक्रमण धातु (यह निकेल है): ऊँचा गलनांक, ज़्यादा घनत्व और रंगीन यौगिक।
2. आयरन(II) क्लोराइड और आयरन(III) क्लोराइड के सूत्र लिखो।
Fe²⁺ के साथ दो Cl⁻: FeCl₂। Fe³⁺ के साथ तीन Cl⁻: FeCl₃।
3. Cu और Cu²⁺ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखो।
Cu = [Ar] 3d¹⁰4s¹। Cu²⁺ में 4s का इलेक्ट्रॉन और एक 3d इलेक्ट्रॉन निकलता है: [Ar] 3d⁹।
4. हल्के हरे घोल में सोडियम हाइड्रॉक्साइड डालने पर हरा अवक्षेप बनता है, जो हवा में धीरे-धीरे नारंगी-भूरा हो जाता है। कौन सा आयन था?
Fe²⁺। हरा Fe(OH)₂ बनता है; हवा उसे नारंगी-भूरे Fe(OH)₃ (आयरन(III)) में ऑक्सीकृत कर देती है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि सारी संक्रमण धातुएँ खुद रंगीन होती हैं। आमतौर पर उनके यौगिक और आयन रंगीन होते हैं; ज़्यादातर धातुएँ धूसर या चाँदी जैसी होती हैं।
- Fe₂O₃ को आयरन(II) ऑक्साइड लिखना। Fe₂O₃ में लोहा +3 है, इसलिए यह आयरन(III) ऑक्साइड है।
- आयन बनाते समय पहले 3d इलेक्ट्रॉन हटाना। पहले 4s इलेक्ट्रॉन जाते हैं।
- यह कहना कि उत्प्रेरक खर्च हो जाता है। वह अभिक्रिया तेज़ करता है और अंत में वैसा ही बचता है।