फूल: पौधे की जनन शाखा
फूल एक छोटी शाखा है जो जनन के लिए बदल गई है। बाहर के बाह्यदल और पंखुड़ियाँ रक्षा करते हैं और कीटों को बुलाते हैं। अंदर के भाग युग्मक (लैंगिक कोशिकाएँ) बनाते हैं।
- पुंकेसर (नर भाग) = पतला डंठल पुतंतु + सिरा परागकोश। सारे पुंकेसर मिलकर पुमंग कहलाते हैं।
- स्त्रीकेसर (मादा भाग) = वर्तिकाग्र (परागकण का उतरने का स्थान) + वर्तिका (लंबी गर्दन) + अंडाशय (फूला हुआ निचला भाग)। सब मिलकर जायांग।
- अंडाशय में बीजांड होते हैं। हर बीजांड आगे चलकर बीज बनता है।
परागकोश के अंदर
परागकोश में आमतौर पर दो पालियाँ और चार पराग-कोष (लघुबीजाणुधानी) होते हैं। दीवार की सबसे अंदर वाली परत टेपीटम है, जो नए परागकणों को पोषण देती है। बीच में पराग मातृ कोशिका अर्धसूत्री विभाजन करती है और चार कोशिकाओं का समूह (चतुष्क) बनता है। इसे लघुबीजाणुजनन कहते हैं।
बीजांड के अंदर
बीजांड एक डंठल (बीजांडवृंत) पर लगा होता है। इस पर एक या दो आवरण (अध्यावरण) होते हैं जिनमें छोटा छेद बीजांडद्वार होता है। अंदर का भाग बीजांडकाय है। उल्टी ओर का आधार निभाग कहलाता है।
नर और मादा युग्मकोद्भिद
युग्मकोद्भिद वह छोटा पौधा-शरीर है जो युग्मक बनाता है। पुष्पी पौधों में दोनों बहुत छोटे होते हैं और फूल के अंदर रहते हैं।
नर युग्मकोद्भिद: परागकण
- बाहरी सख़्त परत बाह्यचोल (exine) है, जो स्पोरोपोलेनिन की बनी है। यह गर्मी और अम्ल से नहीं टूटती, इसलिए परागकणों के जीवाश्म मिलते हैं। इसमें खाली जगहें जनन छिद्र हैं।
- अंदर की नरम परत अंतःचोल (intine) है।
- पका परागकण 2 कोशिकाओं वाला होता है: बड़ी कायिक कोशिका (भोजन रखती है, बाद में नली बनाती है) और छोटी जनन कोशिका। जनन कोशिका एक बार समसूत्री विभाजन से 2 नर युग्मक बनाती है।
मादा युग्मकोद्भिद: भ्रूणकोष
- बीजांडकाय में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका अर्धसूत्री विभाजन से 4 गुरुबीजाणु बनाती है। आमतौर पर 3 नष्ट हो जाते हैं और 1 बचता है (एकबीजाणुज विकास)। यह गुरुबीजाणुजनन है।
- बचे गुरुबीजाणु का केंद्रक बिना दीवार बनाए 3 बार बँटता है: 1 → 2 → 4 → 8 केंद्रक।
- फिर दीवारें बनती हैं। अंतिम रूप: 7 कोशिकाएँ, 8 केंद्रक। बीजांडद्वार की ओर अंड उपकरण (1 अंड + 2 सहायक कोशिकाएँ), निभाग की ओर 3 प्रतिमुखी कोशिकाएँ, बीच में एक बड़ी केंद्रीय कोशिका जिसमें 2 ध्रुवीय केंद्रक।
सहायक कोशिकाओं में उँगली जैसे उभार (तंतुरूप समुच्चय) पराग नली को अंदर का रास्ता दिखाते हैं।
परागण: प्रकार और वाहक
परागण का मतलब है परागकण का परागकोश से वर्तिकाग्र तक जाना।
तीन प्रकार
- स्वयुग्मन: उसी फूल में। जो फूल कभी खुलते ही नहीं (अननुन्मील्य), उनमें यही होता है, और बिना कीट के भी बीज बन जाते हैं।
- सजातपुष्पी परागण: उसी पौधे के दूसरे फूल पर। वाहक चाहिए, पर जीन वही हैं, इसलिए आनुवंशिक रूप से यह स्वपरागण जैसा ही है।
- परनिषेचन (xenogamy): दूसरे पौधे के फूल पर। इससे जीन का नया मेल बनता है।
वाहक
- हवा: हल्के, सूखे, बिना चिपचिपे परागकण, बहुत बड़ी संख्या में; लंबे पंखदार वर्तिकाग्र (घास, मक्का)।
- पानी: बहुत कम; कुछ जलीय पौधे जैसे वैलिसनेरिया। परागकणों पर भीगने से बचाने वाली परत होती है।
- जंतु (ज़्यादातर कीट, साथ में पक्षी और चमगादड़): चटक रंग, खुशबू, मकरंद और चिपचिपे परागकण। कुछ फूल बदले में कीट को अंडे देने की जगह देते हैं (युक्का पौधा और उसका पतंगा)।
बहिःप्रजनन युक्तियाँ: पौधे स्वपरागण से कैसे बचते हैं
बार-बार स्वपरागण से कमज़ोर संतान बनती है (अंतःप्रजनन अवसादन)। इसलिए कई पौधे परपरागण को बढ़ावा देते हैं:
- समय का अंतर: परागकण तब निकलते हैं जब वर्तिकाग्र तैयार नहीं होता, या उल्टा।
- दूरी: परागकोश और वर्तिकाग्र अलग-अलग जगह पर, ताकि पराग अपने ही वर्तिकाग्र पर न गिरे।
- स्व-असामंजस्य: स्त्रीकेसर उसी पौधे के परागकण को रसायनों से रोक देता है।
- अलग लिंग: एकलिंगी फूल। नर और मादा फूल एक ही पौधे पर हों (उभयलिंगाश्रयी, जैसे अरंडी, मक्का) तो केवल स्वयुग्मन रुकता है। अलग पौधों पर हों (एकलिंगाश्रयी, जैसे पपीता) तो स्वयुग्मन और सजातपुष्पी दोनों रुकते हैं।
पराग-स्त्रीकेसर संकर्षण
स्त्रीकेसर सही और गलत परागकण को पहचान लेता है। परागकण और वर्तिकाग्र के रसायन आपस में 'बात' करते हैं।
- सही (संगत) परागकण: यह अंकुरित होता है। जनन छिद्र से पराग नली निकलती है, वर्तिका से नीचे जाती है, अंडाशय में पहुँचकर ज़्यादातर बीजांडद्वार से बीजांड में घुसती है। फिर एक सहायक कोशिका में जाकर 2 नर युग्मक छोड़ देती है।
- गलत (असंगत) परागकण: स्त्रीकेसर उसका अंकुरण या नली की बढ़त रोक देता है।
पादप प्रजनक इसका उपयोग कृत्रिम संकरण में करते हैं: मादा पौधे के फूल से परागकोश जल्दी हटाना (विपुंसन), फूल पर थैली चढ़ाना (बैगिंग), चुने हुए परागकण वर्तिकाग्र पर डालना और फिर से थैली चढ़ाना।
दोहरा निषेचन
पुष्पी पौधों में एक ही भ्रूणकोष में दो संलयन होते हैं:
- युग्मक संलयन: नर युग्मक (n) + अंड (n) → युग्मनज (2n)। युग्मनज से भ्रूण बनता है।
- त्रिसंलयन: नर युग्मक (n) + 2 ध्रुवीय केंद्रक (n + n) → प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक, PEN (3n)। इससे भ्रूणपोष (भोजन का भंडार) बनता है।
दोनों मिलकर दोहरा निषेचन कहलाते हैं। यह केवल पुष्पी पौधों में होता है।
निषेचन के बाद: भ्रूणपोष, भ्रूण, बीज और फल
पहले भ्रूणपोष
PEN बार-बार बँटकर भ्रूण से पहले भ्रूणपोष बनाता है, क्योंकि भ्रूण को बढ़ने के लिए भोजन चाहिए। नारियल में पानी मुक्त-केंद्रकी भ्रूणपोष है और सफ़ेद गरी कोशिकीय भ्रूणपोष। मटर और मूँगफली में बीज पकने से पहले भ्रूणपोष खत्म हो जाता है (अभ्रूणपोषी बीज)। गेहूँ, मक्का और अरंडी में कुछ बचा रहता है (भ्रूणपोषी बीज)।
भ्रूण
युग्मनज बीजांडद्वार की ओर होता है और बँटता है। द्विबीजपत्री भ्रूण में एक अक्ष और दो बीजपत्र होते हैं; ऊपर प्रांकुर (भविष्य का तना) और नीचे मूलांकुर (भविष्य की जड़)। घास जैसे एकबीजपत्री में एक बीजपत्र होता है जिसे स्कुटेलम कहते हैं।
बीज
बीजांड बीज बनता है: अध्यावरण बीज-चोल बनते हैं, बीजांडद्वार एक छोटा छेद बना रहता है, पानी कम हो जाता है और बीज आराम की अवस्था (प्रसुप्ति) में चला जाता है। बीज कई साल जीवित रह सकता है।
फल
अंडाशय फल बनता है और उसकी दीवार फलभित्ति। केवल अंडाशय से बना फल सत्य फल है (आम)। पुष्पासन जैसे दूसरे भाग भी जुड़ें तो आभासी फल (सेब, स्ट्रॉबेरी)।
विशेष स्थितियाँ: असंगजनन, अनिषेकफलन और बहुभ्रूणता
- असंगजनन (apomixis): बीज बिना निषेचन के बनता है। भ्रूण बीजांड की द्विगुणित कोशिका से बनता है। संतान माँ की हूबहू नकल होती है। किसानों को फ़ायदा: संकर बीज अगर ऐसे बने तो अच्छे गुण हर साल बने रहें, नया बीज खरीदना न पड़े।
- अनिषेकफलन (parthenocarpy): फल बिना निषेचन के बनता है, इसलिए बीज नहीं होते (केला)। पादप हॉर्मोन छिड़ककर भी ऐसा कराया जा सकता है।
- बहुभ्रूणता (polyembryony): एक बीज में एक से ज़्यादा भ्रूण। अतिरिक्त भ्रूण बीजांडकाय की कोशिकाओं से बनते हैं (नींबू-संतरा, आम)। संतरे का एक बीज बोओ तो कई पौधे निकल सकते हैं।
करके देखो: फूल और बीज खोलो
- गुड़हल का फूल लो। पंखुड़ियाँ हटाओ। बीच के स्तंभ के चारों ओर पुंकेसर गिनो। वर्तिकाग्र छूकर देखो: वे चिपचिपे हैं, जैसे 3D के पहले चरण में पराग पकड़ने की जगह।
- 5 चने या मूँगफली के दाने रात भर भिगोओ। छिलका हटाकर दाना दो हिस्सों में खोलो: दो बड़े बीजपत्र और एक छोटा भ्रूण-अक्ष दिखेगा। यह अभ्रूणपोषी द्विबीजपत्री बीज है।
- मक्के का दाना लंबाई में काटो और आयोडीन की एक बूँद डालो: भ्रूणपोष नीला-काला हो जाता है (स्टार्च)।
पहले अनुमान लगाओ, फिर जाँचो: आयोडीन से बीज का कौन-सा भाग सबसे गहरा होगा?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- परागकण = नर युग्मकोद्भिद: कायिक कोशिका + जनन कोशिका → 2 नर युग्मक
- भ्रूणकोष = मादा युग्मकोद्भिद: 7 कोशिकाएँ, 8 केंद्रक (अंड + 2 सहायक, 2 ध्रुवीय केंद्रक वाली केंद्रीय कोशिका, 3 प्रतिमुखी)
- युग्मक संलयन: नर युग्मक (n) + अंड (n) → युग्मनज (2n) → भ्रूण
- त्रिसंलयन: नर युग्मक (n) + 2 ध्रुवीय केंद्रक (2n) → PEN (3n) → भ्रूणपोष
- बीजांड → बीज; अध्यावरण → बीज-चोल; अंडाशय → फल; अंडाशय भित्ति → फलभित्ति
- 1 पराग मातृ कोशिका (अर्धसूत्री) → 4 परागकण; 1 गुरुबीजाणु मातृ कोशिका → 4 गुरुबीजाणु, 1 बचता है
हल किए गए उदाहरण
1. एक पौधे में 2n = 24 है। (a) परागकण, (b) अंड, (c) युग्मनज, (d) भ्रूणपोष में गुणसूत्र कितने होंगे?
युग्मकोद्भिद की कोशिकाएँ अगुणित हैं: n = 12। (a) 12, (b) 12, (c) n + n = 24, (d) n + n + n = 36।
2. 100 परागकण बनाने के लिए कितने अर्धसूत्री विभाजन चाहिए?
एक पराग मातृ कोशिका के अर्धसूत्री विभाजन से 4 परागकण बनते हैं। 100 ÷ 4 = 25 विभाजन।
3. 100 बीज बनाने के लिए कुल कितने अर्धसूत्री विभाजन चाहिए?
हर बीज को एक बीजांड (1 विभाजन) और एक परागकण चाहिए। परागकण: 100 ÷ 4 = 25। बीजांड: 100 (4 में से 1 ही गुरुबीजाणु बचता है)। कुल = 125।
4. भ्रूणकोष में 8 केंद्रक हैं। गुरुबीजाणु का केंद्रक कितनी बार समसूत्री विभाजन से गुज़रा?
हर बार संख्या दोगुनी होती है: 1 → 2 → 4 → 8। 2³ = 8, यानी 3 बार।
5. पपीते में नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर होते हैं। कौन-से परागण असंभव हैं?
मादा पौधे पर अपना परागकण है ही नहीं, इसलिए स्वयुग्मन और सजातपुष्पी दोनों असंभव हैं। केवल परनिषेचन होता है।
6. एक बीज में भ्रूण बीजांडकाय की कोशिका से बिना निषेचन के बना, और उसी में ऐसे 3 भ्रूण हैं। इन घटनाओं के नाम बताओ।
बिना निषेचन के भ्रूण बनना = असंगजनन। एक बीज में कई भ्रूण = बहुभ्रूणता। (अनिषेकफलन में तो आमतौर पर बीज बनता ही नहीं।)
आम गलतियाँ
- भ्रूणकोष में 8 कोशिकाएँ कहना। केंद्रक 8 हैं पर कोशिकाएँ 7, क्योंकि 2 ध्रुवीय केंद्रक एक ही केंद्रीय कोशिका में हैं।
- सजातपुष्पी परागण को परपरागण मान लेना। वाहक चाहिए, पर पराग उसी पौधे का है, इसलिए जीन वही हैं।
- असंगजनन और अनिषेकफलन में उलझना। असंगजनन = बिना निषेचन बीज; अनिषेकफलन = बिना निषेचन फल (आमतौर पर बीजरहित)।
- भ्रूणपोष को द्विगुणित कहना। यह त्रिसंलयन से बनता है, इसलिए त्रिगुणित (3n) है।