लैंगिक जनन क्यों?
लैंगिक जनन में दोनों जनक एक खास कोशिका देते हैं जिसे युग्मक कहते हैं। हर युग्मक में सामान्य का आधा DNA होता है, इसलिए मिलने पर संतति को पूरा DNA मिलता है। दो अलग जीवों का DNA मिलने से संतति में अलैंगिक जनन से ज़्यादा विभिन्नता आती है, जो प्रजाति को बचाती है।
युग्मक एक खास विभाजन से बनते हैं जो DNA आधा कर देता है; इससे हर पीढ़ी में DNA की मात्रा बराबर रहती है।
फूल के भाग
फूल पौधे का जनन अंग है। बाह्यदल (हरे) कली की रक्षा करते हैं; दल (पंखुड़ियाँ) रंगीन होकर कीटों को बुलाती हैं। पुंकेसर नर भाग है: तंतु और परागकोश, जो परागकण बनाता है। स्त्रीकेसर मादा भाग है: चिपचिपा वर्तिकाग्र, लंबी वर्तिका और फूला हुआ अंडाशय, जिसमें बीजांड होते हैं; हर बीजांड में अंडकोशिका होती है।
जिन फूलों में केवल पुंकेसर या केवल स्त्रीकेसर हो, वे एकलिंगी (पपीता, तरबूज़) हैं। दोनों वाले उभयलिंगी (गुड़हल, सरसों)।
परागण: स्व और पर
परागकोश से वर्तिकाग्र तक पराग पहुँचना परागण है। उसी फूल (या उसी पौधे) के वर्तिकाग्र पर पहुँचे तो स्व-परागण; दूसरे पौधे के फूल पर पहुँचे तो पर-परागण, जो हवा, पानी, कीट या पक्षी करते हैं। पर-परागण में दो पौधों का DNA मिलता है, इसलिए विभिन्नता ज़्यादा।
निषेचन: परागनलिका
सही वर्तिकाग्र पर गिरकर परागकण अंकुरित होता है और वर्तिका से होकर बीजांड तक परागनलिका बनाता है। नर युग्मक नलिका से नीचे जाकर बीजांड की अंडकोशिका से मिलता है। इस मिलन को निषेचन और बनी कोशिका को युग्मनज कहते हैं।
निषेचन के बाद: बीज और फल
युग्मनज बार-बार बँटकर बीजांड में भ्रूण बनाता है। बीजांड पर सख़्त आवरण बनता है और वह बीज बन जाता है। अंडाशय तेज़ी से बढ़कर पकता है और फल बनता है। पंखुड़ियाँ, पुंकेसर, वर्तिका और वर्तिकाग्र सूखकर झड़ जाते हैं।
बीज में भावी पौधा (भ्रूण) और भोजन होता है। पानी, हवा और गर्मी मिलने पर यह अंकुरित होता है। भ्रूण में प्रांकुर (भावी तना), मूलांकुर (भावी जड़) और बीजपत्र (भोजन वाले पत्ते) होते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पुंकेसर (नर) = तंतु + परागकोश (पराग बनाता है)
- स्त्रीकेसर (मादा) = वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय (बीजांड)
- परागण: परागकोश → वर्तिकाग्र (स्व या पर)
- निषेचन: नर युग्मक + अंडकोशिका → युग्मनज
- युग्मनज → भ्रूण · बीजांड → बीज · अंडाशय → फल
- भ्रूण: प्रांकुर (तना), मूलांकुर (जड़), बीजपत्र (भोजन)
हल किए गए उदाहरण
1. परागण और निषेचन में क्या अंतर है?
परागण में पराग सिर्फ़ परागकोश से वर्तिकाग्र पर जाता है। निषेचन बाद में बीजांड के अंदर होता है जब नर युग्मक अंडकोशिका से मिलता है। पहले परागण, फिर परागनलिका से निषेचन।
2. एक पपीते के पौधे पर सिर्फ़ नर फूल हैं। क्या वह अकेले फल दे सकता है?
नहीं। उसके फूल एकलिंगी हैं, उनमें अंडाशय ही नहीं है। पराग को मादा पपीते के फूलों तक जाना होगा; उन्हीं के अंडाशय फल बनेंगे।
3. युग्मक में आधा DNA क्यों होता है?
अगर हर युग्मक में पूरा DNA हो तो युग्मनज में दोगुना होगा और हर पीढ़ी दोगुना होता जाएगा। आधा होने से हर पीढ़ी में DNA बराबर रहता है।
4. आम के फूल के हर भाग का निषेचन के बाद क्या होता है?
युग्मनज → भ्रूण; बीजांड → गुठली (बीज); अंडाशय की दीवार → गूदेदार फल; पंखुड़ियाँ, पुंकेसर, वर्तिका, वर्तिकाग्र झड़ जाते हैं।
आम गलतियाँ
- परागण और निषेचन को एक ही बताना।
- यह लिखना कि अंडाशय बीज बनता है। अंडाशय → फल; बीजांड → बीज।
- पूरे पुंकेसर को परागकोश कहना। परागकोश सिर्फ़ ऊपर का पराग बनाने वाला भाग है।
- मानना कि परागकण खुद बीजांड में घुसता है। सिर्फ़ परागनलिका बढ़ती है और नर युग्मक ले जाती है।