क्या जीव अपनी हूबहू कॉपी बनाते हैं?
जनन वह प्रक्रिया है जिससे जीव अपने जैसे नए जीव बनाते हैं। शरीर की बनावट की जानकारी केंद्रक के DNA में होती है। इसलिए जनन की मूल घटना है DNA प्रतिकृति: कोशिका रासायनिक क्रियाओं से DNA की कॉपी बनाती है और फिर दोनों कॉपियाँ अलग-अलग कोशिकाओं में चली जाती हैं।
यह कॉपी बहुत सटीक होती है, पर पूरी तरह नहीं। छोटे-छोटे बदलाव आ जाते हैं। इन्हें विभिन्नता कहते हैं: संतति जनक जैसी तो होती है, पर बिलकुल वैसी नहीं।
विभिन्नता क्यों ज़रूरी है?
हर प्रजाति किसी खास जगह (निकेत) में रहने के लायक होती है। अगर वह जगह बदल जाए — पानी गरम हो जाए या नई बीमारी आ जाए — और सभी जीव बिलकुल एक जैसे हों, तो सब मर सकते हैं। पर अगर कुछ जीवों में काम की विभिन्नता है (जैसे गर्मी सहना), तो वे बच जाते हैं और प्रजाति चलती रहती है। यानी विभिन्नता प्रजाति के लंबे समय तक बने रहने और विकास का आधार है।
लेकिन बहुत ज़्यादा बदलाव नुकसानदेह हैं, इसलिए DNA कॉपी ज़्यादातर सटीक ही रहती है।
अलैंगिक जनन: एक ही जनक
अलैंगिक जनन में सिर्फ़ एक जनक होता है और युग्मक (लिंग कोशिकाएँ) नहीं बनते। संतति लगभग जनक की कॉपी (क्लोन) होती है। यह तेज़ है और साथी की ज़रूरत नहीं होती। लैंगिक जनन (दो जनक) अगले पाठों में है।
विखंडन: द्विखंडन और बहुखंडन
द्विखंडन: एक कोशिका दो बराबर भागों में बँटती है। अमीबा किसी भी तल में बँट सकता है, जबकि लीशमैनिया (जिसमें कोड़े जैसा कशाभ होता है) एक निश्चित तल में। बहुखंडन: कोशिका एक साथ कई संतति कोशिकाओं में बँटती है, जैसे मलेरिया परजीवी प्लैज़्मोडियम।
खंडन और पुनरुद्भवन
खंडन: सरल बहुकोशिकीय शरीर टुकड़ों में टूटता है और हर टुकड़ा नया जीव बनता है, जैसे स्पाइरोगायरा (हरा शैवाल)।
पुनरुद्भवन: पूरा बना जीव कटे हुए भाग से पूरा शरीर फिर बना लेता है। इसमें खास कोशिकाएँ बार-बार बँटकर अलग-अलग ऊतक बनाती हैं। प्लेनेरिया और हाइड्रा इसके उदाहरण हैं। ज़्यादातर जंतु ऐसा नहीं कर सकते।
मुकुलन
शरीर के एक स्थान पर कोशिकाएँ बार-बार बँटकर उभार (मुकुल) बनाती हैं। मुकुल छोटा जीव बनकर अलग हो जाता है। उदाहरण: हाइड्रा और यीस्ट।
कायिक प्रवर्धन
कई पौधे बीज के बजाय जड़, तना या पत्ती से नए पौधे बनाते हैं। प्राकृतिक: ब्रायोफिलम की पत्ती की कलिकाएँ, आलू की आँखें, अदरक। कृत्रिम: रोपण (कलम), दाब लगाना और ग्राफ़्टिंग — गन्ना, गुलाब, अंगूर, केला, संतरा।
लाभ: बीज न बनाने वाले पौधे (केला, संतरा, गुलाब, चमेली) उगाए जा सकते हैं; फूल-फल जल्दी आते हैं; नए पौधे जनक के सारे अच्छे गुण रखते हैं। ऊतक संवर्धन में प्रयोगशाला में कुछ कोशिकाओं से बहुत से पौधे बनाए जाते हैं।
बीजाणु समासंघ
ब्रेड की फफूँद (राइजोपस) के पतले धागों (कवकतंतु) के ऊपर गोल बीजाणुधानियाँ होती हैं। इनमें मोटी दीवार वाले बहुत से बीजाणु होते हैं। ये हवा से फैलते हैं और नम भोजन पर गिरकर नई फफूँद बनाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जनन का आधार: DNA प्रतिकृति → दो कॉपी → दो कोशिकाएँ
- विभिन्नता = DNA कॉपी की छोटी गलतियाँ; प्रजाति को बचाती हैं
- द्विखंडन: अमीबा (किसी भी तल), लीशमैनिया (निश्चित तल)
- बहुखंडन: प्लैज़्मोडियम
- खंडन: स्पाइरोगायरा · पुनरुद्भवन: प्लेनेरिया, हाइड्रा
- मुकुलन: हाइड्रा, यीस्ट · बीजाणु: राइजोपस
- कायिक प्रवर्धन: ब्रायोफिलम, आलू, गन्ना, गुलाब (कलम, दाब, ग्राफ़्टिंग)
हल किए गए उदाहरण
1. जनन के लिए DNA की कॉपी बनना क्यों ज़रूरी है?
DNA में शरीर का नक्शा है। नए जीव को वही नक्शा तभी मिलेगा जब उसे DNA की कॉपी मिले। इसलिए कोशिका पहले DNA कॉपी करती है और हर नई कोशिका को एक कॉपी देती है।
2. एक तालाब में सारे जीवाणु एक जैसे हैं। पानी अचानक गरम हो गया। कौन-से बचेंगे और क्यों?
सिर्फ़ वे जिनमें संयोग से गर्मी सहने वाली विभिन्नता है। अगर सब एक जैसे हों और कोई गर्मी न सह सके तो सब मर जाएँगे। यही विभिन्नता का महत्व है।
3. पुनरुद्भवन और खंडन में क्या अंतर है?
खंडन में जीव अपने आप टूटता है और हर टुकड़ा नया जीव बनता है (स्पाइरोगायरा)। पुनरुद्भवन में कटा भाग खास कोशिकाओं से खोए अंग फिर बनाता है (प्लेनेरिया)। खंडन सामान्य जनन है, पुनरुद्भवन मुख्य रूप से मरम्मत।
4. किसान केला और गन्ना कायिक प्रवर्धन से क्यों उगाते हैं?
केले में उगने लायक बीज नहीं बनते; गन्ना तने के टुकड़ों से जल्दी उगता है। नए पौधे जनक जैसे होते हैं, इसलिए मिठास और पैदावार वही रहती है और फसल जल्दी मिलती है।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि संतति हूबहू कॉपी है। DNA कॉपी में हमेशा छोटे बदलाव होते हैं।
- द्विखंडन और बहुखंडन में गड़बड़: अमीबा = द्वि (दो), प्लैज़्मोडियम = बहु (अनेक)।
- प्लेनेरिया के पुनरुद्भवन को मुकुलन कहना। मुकुलन पूरे जनक पर उभार है; पुनरुद्भवन कटे टुकड़े से बनना।
- राइजोपस के बीजाणुओं को बीज समझना। बीजाणु मोटी दीवार वाली एक कोशिका है।