पादप शारीर क्या है? पहले ऊतक
शारीर का मतलब है शरीर की अंदरूनी बनावट। पौधों में इसे बहुत पतली आड़ी काट बनाकर सूक्ष्मदर्शी में देखते हैं। ऊतक एक जैसी उत्पत्ति वाली कोशिकाओं का समूह है जो मिलकर एक काम करती हैं।
विभज्योतक ऊतक (बँटने वाले)
- शीर्षस्थ विभज्योतक: जड़ और प्ररोह के सिरों पर; पौधे को लंबा करता है (प्राथमिक वृद्धि)।
- अंतर्वेशी विभज्योतक: परिपक्व ऊतकों के बीच, घासों की पत्ती या पोरी के आधार पर; चरने के बाद फिर उगने में मदद।
- पार्श्व विभज्योतक: किनारों पर (संवहनी कैम्बियम, कॉर्क कैम्बियम); पौधे को मोटा करता है (द्वितीयक वृद्धि)।
स्थायी ऊतक (जो बँटना बंद कर चुके)
- सरल (एक ही तरह की कोशिका): मृदूतक (पतली दीवार वाली जीवित कोशिकाएँ; भोजन संग्रह, प्रकाश-संश्लेषण), स्थूलकोण ऊतक (कोनों पर पेक्टिन से मोटी जीवित कोशिकाएँ; नए तनों और डंठलों को लचीला सहारा), दृढ़ ऊतक (लिग्निन की मोटी दीवार वाली मृत कोशिकाएँ: लंबे रेशे और छोटी दृढ़ कोशिकाएँ, जैसे नाशपाती के किरकिरे कण, अखरोट का खोल)।
- जटिल (कई तरह की कोशिकाएँ): जाइलम (पानी-खनिज ले जाता है; वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, जाइलम रेशे, जाइलम मृदूतक) और फ्लोएम (भोजन ले जाता है; चालनी नलिका, सहकोशिका, फ्लोएम मृदूतक, फ्लोएम रेशे)। अनावृतबीजी में वाहिकाएँ नहीं होतीं और सहकोशिका की जगह एल्बुमिनी कोशिकाएँ।
पहले बना जाइलम आदिदारु, बाद वाला अनुदारु। तने में आदिदारु केंद्र की ओर (मध्यादिदारुक); जड़ में बाहर की ओर (बाह्यादिदारुक)।
तीन ऊतक तंत्र और उनके काम
1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र (त्वचा)
बाहरी आवरण। इसमें बाह्यत्वचा (कसी कोशिकाओं की एक परत, अक्सर मोम जैसी उपत्वचा से ढकी जो पानी बचाती है; जड़ में उपत्वचा नहीं), रंध्र और रोम। रंध्र एक छोटा छेद है जिसे दो द्वार कोशिकाएँ घेरती हैं: द्विबीजपत्री में सेम के आकार की, घासों में डंबल जैसी। पास की खास कोशिकाएँ सहायक कोशिकाएँ। रंध्र गैसों का आना-जाना और वाष्पोत्सर्जन नियंत्रित करते हैं। मूल रोम एककोशिकीय होते हैं और पानी सोखते हैं; तने के त्वचारोम अक्सर बहुकोशिकीय, पानी की हानि घटाते हैं।
2. भरण ऊतक तंत्र (भराव)
बाह्यत्वचा और संवहन बंडल को छोड़कर सब: वल्कुट, परिरंभ, मज्जा और मज्जा किरणों के मृदूतक, स्थूलकोण और दृढ़ ऊतक। पत्ती में भरण ऊतक पर्णमध्योतक है (हरितलवक वाली पतली दीवार की कोशिकाएँ)। काम: संग्रह, सहारा, प्रकाश-संश्लेषण।
3. संवहनी ऊतक तंत्र (नलियाँ)
जाइलम और फ्लोएम मिलकर संवहन बंडल बनाते हैं। जाइलम पानी-खनिज ऊपर ले जाता है; फ्लोएम भोजन हर भाग तक।
- खुला बंडल: जाइलम-फ्लोएम के बीच कैम्बियम, नया ऊतक बना सकता है (द्विबीजपत्री तना)।
- बंद बंडल: कैम्बियम नहीं (एकबीजपत्री)।
- अरीय: जाइलम और फ्लोएम अलग त्रिज्याओं पर बारी-बारी (जड़)।
- संयुक्त: एक ही त्रिज्या पर (तना, पत्ती); अक्सर संपार्श्विक, फ्लोएम बाहर और जाइलम अंदर।
द्विबीजपत्री जड़ और एकबीजपत्री जड़
द्विबीजपत्री जड़ (जैसे सूरजमुखी)
बाहर से अंदर: मूलीय त्वचा (मूल रोम वाली बाहरी परत) → वल्कुट (ढीले मृदूतक की कई परतें) → अंतस्त्वचा (ढोलक जैसी कोशिकाओं की एक परत; बगल की दीवारों पर सुबेरिन की जलरोधी कैस्पेरी पट्टियाँ) → परिरंभ (मोटी दीवार की कुछ परतें; पार्श्व जड़ें और बाद में कैम्बियम का भाग यहीं से) → 2 से 4 जाइलम वाले अरीय बंडल (द्वि- से चतुः-आदिदारुक) → छोटी या नहीं के बराबर मज्जा। जाइलम-फ्लोएम के बीच का मृदूतक संयोजी ऊतक। अंतस्त्वचा के अंदर का सब (परिरंभ, बंडल, मज्जा) मिलकर रंभ। बाद में द्वितीयक वृद्धि होती है।
एकबीजपत्री जड़ (जैसे मक्का)
मूल परतें वैसी ही, पर 6 से ज़्यादा जाइलम (बहुआदिदारुक), बड़ी विकसित मज्जा, और द्वितीयक वृद्धि नहीं।
द्विबीजपत्री तना और एकबीजपत्री तना
द्विबीजपत्री तना (जैसे सूरजमुखी)
उपत्वचा और रोम वाली बाह्यत्वचा, कुछ रंध्र → स्थूलकोण ऊतक की अधस्त्वचा (नए तने को मज़बूती) → मृदूतक का वल्कुट → वल्कुट की सबसे भीतरी, मंड से भरी परत = मंड आच्छद (अंतस्त्वचा) → हर बंडल के ऊपर दृढ़ ऊतक के आधे-चाँद जैसे टुकड़े (परिरंभ) → छल्ले में संवहन बंडल, हर एक संयुक्त, संपार्श्विक, खुला, मध्यादिदारुक → बंडलों के बीच मज्जा किरणें → बीच में बड़ी मज्जा।
एकबीजपत्री तना (जैसे मक्का)
दृढ़ ऊतकी अधस्त्वचा, फिर मृदूतक का भरण ऊतक जिसमें बहुत से बिखरे बंडल। हर बंडल संयुक्त, संपार्श्विक, बंद, दृढ़ ऊतक के बंडल आच्छद से घिरा। किनारे के बंडल बीच वालों से छोटे। फ्लोएम मृदूतक नहीं, बंडलों में जल-गुहिकाएँ। साफ़ वल्कुट, अंतस्त्वचा, परिरंभ या मज्जा नहीं।
पृष्ठाधारी (द्विबीजपत्री) और समद्विपार्श्विक (एकबीजपत्री) पत्ती
पृष्ठाधारी पत्ती
खड़ी काट में तीन भाग: ऊपरी (अभ्यक्ष) और निचली (अपाक्ष) बाह्यत्वचा, उपत्वचा के साथ; निचली सतह पर अक्सर ज़्यादा रंध्र (ऊपरी पर कभी-कभी नहीं)। बीच में पर्णमध्योतक: ऊपर खंभ मृदूतक (लंबी, सटी कोशिकाएँ) और नीचे स्पंजी मृदूतक (गोल-अंडाकार ढीली कोशिकाएँ, बड़े वायु-स्थान)। शिराओं और मध्यशिरा में संवहन बंडल, जिनके चारों ओर मोटी दीवार की बंडल आच्छद कोशिकाएँ। बंडल का आकार शिरा के आकार पर निर्भर।
समद्विपार्श्विक पत्ती
रंध्र दोनों सतहों पर, पर्णमध्योतक खंभ-स्पंजी में बँटा नहीं। घासों में शिराओं के पास ऊपरी बाह्यत्वचा की कुछ कोशिकाएँ बड़ी, खाली, रंगहीन आवर्ध त्वक्-कोशिकाएँ (बुलीफ़ॉर्म) बन जाती हैं। पानी भरा हो तो पत्ती चपटी; पानी घटे (सूखे में) तो पत्ती अंदर मुड़ जाती है और पानी कम उड़ता है। शिराएँ समानांतर, इसलिए बंडल लगभग एक आकार के (मुख्य शिराओं को छोड़कर)।
द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री: एक तालिका
| लक्षण | द्विबीजपत्री | एकबीजपत्री |
|---|---|---|
| जड़ में जाइलम समूह | 2–4 | 6 से ज़्यादा |
| जड़ की मज्जा | छोटी या नहीं | बड़ी |
| तने के बंडल | छल्ले में, खुले | बिखरे, बंद, आच्छद वाले |
| तने की अधस्त्वचा | स्थूलकोण ऊतक | दृढ़ ऊतक |
| पत्ती | पृष्ठाधारी; खंभ + स्पंजी | समद्विपार्श्विक; बँटवारा नहीं |
| रंध्र | नीचे ज़्यादा | दोनों ओर लगभग बराबर |
| द्वितीयक वृद्धि | हाँ (कैम्बियम) | आमतौर पर नहीं |
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ऊतक तंत्र: बाह्यत्वचीय (त्वचा) + भरण (भराव) + संवहनी (जाइलम + फ्लोएम)
- खुला बंडल = कैम्बियम है; बंद बंडल = कैम्बियम नहीं
- अरीय = जाइलम-फ्लोएम अलग त्रिज्याओं पर (जड़); संयुक्त = एक त्रिज्या पर (तना, पत्ती)
- तना: मध्यादिदारुक (आदिदारु अंदर); जड़: बाह्यादिदारुक (आदिदारु बाहर)
- द्विबीजपत्री जड़ 2–4 जाइलम; एकबीजपत्री जड़ 6 से ज़्यादा (बहुआदिदारुक)
- रंभ = परिरंभ + संवहन बंडल + मज्जा (अंतस्त्वचा के अंदर सब)
हल किए गए उदाहरण
1. एक काट में अरीय बंडल, 4 जाइलम समूह, पतली मज्जा और कैस्पेरी पट्टी वाली अंतस्त्वचा दिखती है। पहचानो।
अरीय बंडल → जड़। 4 जाइलम (चतुःआदिदारुक) और छोटी मज्जा → द्विबीजपत्री। उत्तर: द्विबीजपत्री जड़ (जैसे सूरजमुखी या चना)।
2. एक काट में बहुत से बिखरे बंडल हैं, हर एक पर दृढ़ ऊतक का आच्छद और जल-गुहिका, कैम्बियम नहीं। पहचानो और बंडल का प्रकार बताओ।
बिखरे, आच्छद वाले, जल-गुहिका, कैम्बियम नहीं → एकबीजपत्री तना (मक्का)। बंडल संयुक्त, संपार्श्विक और बंद।
3. पत्ती की काट में दोनों सतहों पर रंध्र और ऊपरी बाह्यत्वचा में बड़ी खाली कोशिकाएँ हैं। ये कोशिकाएँ क्या हैं और पत्ती कैसी है?
बड़ी खाली कोशिकाएँ आवर्ध त्वक्-कोशिकाएँ (बुलीफ़ॉर्म) हैं जो सूखे में पत्ती मोड़ती हैं। दोनों ओर रंध्र + बुलीफ़ॉर्म → समद्विपार्श्विक एकबीजपत्री (घास) पत्ती।
4. द्विबीजपत्री तना मोटा हो सकता है पर एकबीजपत्री आमतौर पर नहीं, क्यों?
द्विबीजपत्री बंडल खुले हैं: जाइलम-फ्लोएम के बीच कैम्बियम है जो बँटकर नया जाइलम-फ्लोएम बनाता है (द्वितीयक वृद्धि)। एकबीजपत्री बंडल बंद हैं (कैम्बियम नहीं), इसलिए नए ऊतक के छल्ले नहीं बनते।
5. जड़ में पानी वल्कुट से जाइलम में जाता है। उसे अंतस्त्वचा की जीवित कोशिकाओं के अंदर से ही क्यों जाना पड़ता है?
अंतस्त्वचा की बगल की दीवारों पर सुबेरिन की जलरोधी कैस्पेरी पट्टियाँ हैं। ये दीवारों वाला रास्ता बंद कर देती हैं, इसलिए पानी को कोशिका झिल्ली पार करनी पड़ती है। इससे जड़ तय करती है कि कौन से खनिज जाइलम में जाएँ।
6. गिनो और मिलाओ: 3D में द्विबीजपत्री जड़ में 4 लाल जाइलम और एकबीजपत्री जड़ में 8 हैं। दोनों को '-आदिदारुक' शब्दों से नाम दो।
4 जाइलम = चतुःआदिदारुक (द्विबीजपत्री जड़, सीमा 2–4)। 8 = बहुआदिदारुक (एकबीजपत्री जड़, 6 से ज़्यादा)।
आम गलतियाँ
- कहना कि एकबीजपत्री तने में बंडल छल्ले में होते हैं। छल्ला केवल द्विबीजपत्री तने में; एकबीजपत्री में बिखरे।
- मध्यादिदारुक और बाह्यादिदारुक उलटना। तना = मध्यादिदारुक (आदिदारु केंद्र की ओर); जड़ = बाह्यादिदारुक।
- जड़ के बंडलों को संयुक्त कहना। जड़ में अरीय बंडल; तने और पत्ती में संयुक्त।
- मानना कि द्विबीजपत्री पत्ती में दोनों ओर बराबर रंध्र हैं। आमतौर पर नीचे ज़्यादा; बराबर रंध्र समद्विपार्श्विक पत्ती में।