China 高一 Biology
अध्याय: 12
1. Comp.1 Ch.1 Approaching cells
Cells as basic units; cell theory · Diversity and unity; prokaryotes vs eukaryotes
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
2. Comp.1 Ch.2 Molecules of cells
Elements and compounds; water and salts · Carbohydrates and lipids · Proteins · Nucleic acids
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
3. Comp.1 Ch.3 Cell structure
Cell membrane · Organelles and cooperation · Nucleus
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
4. Comp.1 Ch.4 Transport
Passive transport; osmosis · Active transport; endo/exocytosis
- झिल्ली परिवहन: कोशिका में चीज़ें अंदर-बाहर कैसे जाती हैं – कोशिका झिल्ली वसा जैसे अणुओं की पतली दोहरी परत है जिसमें प्रोटीन लगे होते हैं. यह कुछ पदार्थों को जाने देती है और कुछ को रोकती है (चयनात्मक पारगम्य). विसरण में कण ज़्यादा सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बिना ऊर्जा जाते हैं. सुसाध्य विसरण यही काम प्रोटीन चैनल से करता है. परासरण आंशिक पारगम्य झिल्ली से पानी का विसरण है. सक्रिय परिवहन ATP और प्रोटीन पंप से कणों को कम से ज़्यादा सांद्रता की ओर ले जाता है. बहुत बड़ी चीज़ें बुलबुलों में आती-जाती हैं (एंडोसाइटोसिस, एक्सोसाइटोसिस).
5. Comp.1 Ch.5 Energy
Enzymes · ATP · Cellular respiration · Photosynthesis
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
- ATP: कोशिका की ऊर्जा मुद्रा – ATP (एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट) एक न्यूक्लियोटाइड है जिसमें एडेनिन क्षार, राइबोज़ शर्करा और तीन फॉस्फेट समूह होते हैं। ATP हाइड्रोलेज़ एंज़ाइम पानी की मदद से आख़िरी फॉस्फेट अलग करता है (जल-अपघटन): ATP + H₂O → ADP + Pi, और लगभग 30 kJ प्रति मोल ऊर्जा छोटे, काम के हिस्सों में निकलती है। श्वसन और प्रकाश-संश्लेषण के समय ATP सिंथेज़ ADP और Pi को संघनन से फिर जोड़ता है। कोशिका ATP जमा नहीं करती, लगातार बनाती और खर्च करती है। एक ग्लूकोज से वायवीय श्वसन में लगभग 30–32 ATP, पर अवायवीय में सिर्फ़ 2 ATP मिलते हैं।
- पादप में श्वसन – श्वसन में ग्लूकोज़ जैसा भोजन टूटता है और ऊर्जा ATP के रूप में जमा होती है। पौधे रंध्रों और वातरंध्रों से O₂ लेते हैं। कोशिका-द्रव्य में ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज़ को दो पाइरुवेट में तोड़ता है। O₂ न हो तो पाइरुवेट का किण्वन होकर एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल बनता है। O₂ हो तो पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है, क्रेब्स चक्र चलता है और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र O₂ की मदद से सबसे ज़्यादा ATP बनाता है: एक ग्लूकोज़ से 38 तक। यही पथ अणु बनाता भी है (उभयचयी)। RQ = निकली CO₂ ÷ ली गई O₂।
- उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण – हरे पौधे प्रकाश की मदद से CO₂ और पानी से शर्करा बनाते हैं। यह क्लोरोप्लास्ट में होता है। थायलाकॉइड में प्रकाश अभिक्रिया पानी तोड़ती है, O₂ छोड़ती है और ATP व NADPH बनाती है। स्ट्रोमा में केल्विन चक्र इसी ATP और NADPH से CO₂ को शर्करा में बदलता है। C₄ पौधे CO₂ पंप करके प्रकाश-श्वसन की बर्बादी रोकते हैं। जो कारक सबसे कम हो, वही दर तय करता है।
6. Comp.1 Ch.6 Cell life cycle
Mitosis · Differentiation; stem cells · Ageing and death; apoptosis
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- कोशिका विभेदन और स्टेम कोशिका – आपके शरीर में 200 से ज़्यादा तरह की कोशिकाएँ हैं, पर सब एक ही कोशिका, युग्मनज, से बनी हैं। हर कोशिका में वही DNA है। विभेदन में कोशिका कुछ जीन चालू और कुछ बंद रखती है, इसलिए उसका आकार और काम अलग हो जाता है। जो कोशिकाएँ बँट सकती हैं और कई प्रकार की बन सकती हैं, उन्हें स्टेम कोशिका कहते हैं।
- कोशिका का बुढ़ापा और मृत्यु: एपोप्टोसिस – कोशिकाएँ हमेशा नहीं जीतीं। बूढ़ी होती कोशिका छोटी हो जाती है, धीमे काम करती है और कचरा जमा करती है। कोशिका दो तरह से मरती है। एपोप्टोसिस में कोशिका योजना के अनुसार मरती है: सिकुड़ती है, बंद पैकेटों में टूटती है और पड़ोसी उन्हें खा लेते हैं, इसलिए कुछ बाहर नहीं बहता। नेक्रोसिस में चोट से कोशिका फूलकर फट जाती है और अंदर का सामान बहने से सूजन आती है। एपोप्टोसिस शरीर को आकार देता है (जैसे उँगलियों के बीच की झिल्ली हटाना) और खराब कोशिकाओं को हटाकर कैंसर से बचाता है।
7. Comp.2 Ch.1 Mendel
Segregation · Independent assortment
- आनुवंशिकता और मेंडल के नियम – माता-पिता से बच्चों में लक्षणों का जाना आनुवंशिकता है। हर लक्षण के लिए माँ और पिता दोनों एक-एक जीन देते हैं। प्रभावी जीन अप्रभावी को छुपा देता है, इसलिए एकसंकर में 3:1 और द्विसंकर में 9:3:3:1 अनुपात आता है। जीन DNA का टुकड़ा है जो प्रोटीन बनवाता है, और प्रोटीन से लक्षण बनता है।
8. Comp.2 Ch.2 Genes and chromosomes
Meiosis and fertilisation · Genes on chromosomes · Sex-linked inheritance
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- गुणसूत्र: जहाँ हमारे जीन रहते हैं – गुणसूत्र (क्रोमोसोम) केंद्रक के अंदर डीएनए का धागे जैसा पैकेट है। जीन उसी डीएनए के छोटे टुकड़े हैं जो एक के बाद एक कतार में लगे होते हैं। इंसान की हर शरीर-कोशिका में 46 गुणसूत्र, यानी 23 जोड़े होते हैं: हर जोड़े में एक माँ से और एक पिता से। अंडाणु और शुक्राणु में सिर्फ़ 23-23 होते हैं, इसलिए बच्चे में फिर 46 हो जाते हैं। सटन ने देखा कि गुणसूत्र मेंडल के कारकों जैसा व्यवहार करते हैं और मॉर्गन ने दिखाया कि जीन उन पर कतार में होते हैं।
- लिंग सहलग्न वंशागति – कुछ जीन X गुणसूत्र पर होते हैं और छोटे Y गुणसूत्र पर उनकी कोई जोड़ी नहीं होती। ऐसे X-सहलग्न जीन माता-पिता से बच्चों में एक खास तरीके से जाते हैं। पुरुष (XY) के पास एक ही X होता है, इसलिए एक अप्रभावी खराब एलील भी उसमें दिख जाता है। स्त्री (XX) को दो खराब प्रतियाँ चाहिए; एक हो तो वह स्वस्थ वाहक रहती है। लाल-हरी वर्णांधता और हीमोफीलिया इसी तरह चलते हैं।
9. Comp.2 Ch.3 Nature of genes
DNA as genetic material · DNA structure · Semi-conservative replication · Genes as functional DNA segments
- DNA आनुवंशिक पदार्थ है: वे प्रयोग जिन्होंने यह सिद्ध किया – जीन जीवन के निर्देश हैं, पर वे किस चीज़ के बने हैं? 1928 में ग्रिफ़िथ ने देखा कि मरे हुए रोगकारक जीवाणु का कोई पदार्थ हानिरहित जीवाणुओं को हानिकारक बना देता है। 1944 में एवरी और साथियों ने दिखाया कि यह पदार्थ DNA है, क्योंकि केवल DNA-नाशक एंज़ाइम ने बदलाव रोका। 1952 में हर्शी और चेज़ ने विषाणु के DNA पर रेडियोधर्मी फ़ॉस्फ़ोरस और प्रोटीन पर रेडियोधर्मी सल्फ़र लगाया और पाया कि केवल DNA जीवाणु में घुसा। इसलिए अधिकतर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है। कुछ विषाणुओं में RNA होता है।
- DNA की संरचना: दोहरी कुंडली – DNA एक मुड़ी हुई सीढ़ी है जिसे दोहरी कुंडली (double helix) कहते हैं। हर किनारे की पटरी एक स्ट्रैंड है जो न्यूक्लियोटाइडों से बनी है; न्यूक्लियोटाइड में फ़ॉस्फ़ेट, शर्करा और एक क्षार (A, T, G या C) होता है। डंडियाँ क्षार-युग्म हैं: बड़ा क्षार हमेशा छोटे क्षार से जुड़ता है, A से T (2 हाइड्रोजन बंध) और G से C (3 हाइड्रोजन बंध)। दोनों स्ट्रैंड उलटी दिशाओं में चलते हैं। कुंडली हर 10 क्षार-युग्म (3.4 nm) पर एक घुमाव लेती है और 2 nm चौड़ी है। जोड़ी-नियम के कारण दोहरे स्ट्रैंड वाले DNA में A = T और G = C होता है (चारगाफ़ का नियम)।
- DNA प्रतिकृति: कोशिका अपने DNA की कॉपी कैसे बनाती है – कोशिका बँटने से पहले अपने DNA की हूबहू कॉपी बनाती है, ताकि हर नई कोशिका को पूरे निर्देश मिलें। हेलिकेज़ दोहरी कुंडली को खोलता है। हर पुराना स्ट्रैंड साँचा (टेम्पलेट) बनता है। DNA पॉलिमरेज़ जोड़ीदार क्षार लगाता है (A के साथ T, G के साथ C)। अंत में दो DNA बनते हैं, हर एक में एक पुराना और एक नया स्ट्रैंड (अर्ध-संरक्षी)। पॉलिमरेज़ अपना काम जाँचता है, इसलिए गलती बहुत कम होती है; जो गलती रह जाए वह उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) है।
- जीन की संरचना: एक जीन के अंदर क्या है? – जीन DNA का वह हिस्सा है जिसमें एक काम का उत्पाद, आमतौर पर प्रोटीन (कभी-कभी RNA), बनाने की सूचना होती है। एक सामान्य जीन में प्रमोटर (जहाँ RNA पॉलिमरेज़ जुड़कर अनुलेखन शुरू करता है), कोडिंग भाग (संदेश) और टर्मिनेटर (जहाँ अनुलेखन रुकता है) होते हैं। टेम्पलेट रज्जुक पढ़ा जाता है; कोडिंग रज्जुक का क्रम mRNA जैसा होता है (T की जगह U)। प्रोकैरियोट में जीन लगातार होते हैं (इंट्रॉन नहीं) और जुड़े जीन अक्सर एक प्रमोटर वाले ऑपेरॉन में होते हैं, जिससे एक बहुसिस्ट्रॉनी mRNA बनती है। यूकैरियोट में जीन विभक्त होते हैं: कोडिंग एक्सॉन के बीच अकोडिंग इंट्रॉन। पूरा जीन पहले प्री-mRNA में बदलता है; फिर इंट्रॉन हटते हैं, एक्सॉन जुड़ते हैं (स्प्लाइसिंग), कैप और पॉली-A पूँछ लगती है। वैकल्पिक स्प्लाइसिंग से एक जीन कई प्रोटीन बना सकता है। जीनोम किसी जीव का पूरा DNA है; मनुष्य में सिर्फ़ 1–2% प्रोटीन के लिए कोड करता है।
10. Comp.2 Ch.4 Gene expression
Transcription and translation · Gene expression and traits; epigenetics
- प्रोटीन संश्लेषण: जीन से प्रोटीन तक – जीन DNA का एक हिस्सा है जिसमें एक प्रोटीन बनाने की विधि लिखी होती है। अनुलेखन (transcription) में केंद्रक के अंदर जीन की नकल mRNA में बनती है; T की जगह U आता है। mRNA कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम तक जाता है। स्थानांतरण (translation) में राइबोसोम mRNA को 3-3 क्षार (कोडॉन) करके पढ़ता है। हर कोडॉन एक अमीनो अम्ल से मेल खाता है जिसे tRNA लाता है। अमीनो अम्ल जुड़कर श्रृंखला बनाते हैं, जो मुड़कर प्रोटीन बनती है। DNA में बदलाव (उत्परिवर्तन) से प्रोटीन बदल सकता है।
- वंशागति का आणविक आधार – ज़्यादातर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है (कुछ वायरस में RNA)। यह द्विकुंडली है: न्यूक्लियोटाइड के दो प्रतिसमांतर सूत्र; A–T दो हाइड्रोजन बंध से, G–C तीन से। लंबा DNA हिस्टोन पर लिपटकर न्यूक्लियोसोम और फिर क्रोमैटिन बनाता है। DNA अर्धसंरक्षी ढंग से प्रतिकृति बनाता है (मेसेल्सन–स्टाल)। केंद्रीय सिद्धांत: DNA → RNA → प्रोटीन। अनुलेखन एक सूत्र से RNA बनाता है; यूकैरियोट में hnRNA पर कैप, पूँछ और स्प्लाइसिंग होती है। आनुवंशिक कूट त्रिक है, 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल, 3 समापन), AUG से शुरू, लगभग सार्वत्रिक और अपह्रासित। राइबोसोम tRNA की मदद से mRNA को प्रोटीन में बदलता है। जीन चालू-बंद होते हैं; लैक ओपेरॉन इसका उदाहरण है। मानव और चावल जीनोम परियोजनाओं ने पूरा जीनोम पढ़ा, और DNA फिंगरप्रिंटिंग दोहराव वाले DNA (VNTR) से व्यक्ति की पहचान करती है।
11. Comp.2 Ch.5 Mutation and variation
Gene mutation and recombination; cancer · Chromosome variation · Human genetic disease
- उत्परिवर्तन (Mutation) – उत्परिवर्तन DNA में अचानक होने वाला स्थायी बदलाव है। जीन (बिंदु) उत्परिवर्तन में एक या कुछ क्षार बदलते हैं: प्रतिस्थापन, जोड़ या विलोपन। जोड़ और विलोपन पढ़ने का ढाँचा खिसका देते हैं। गुणसूत्र उत्परिवर्तन में बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है। ये संयोग से या उत्परिवर्तजनों (UV, X-किरणें, कुछ रसायन) से होते हैं। ये हानिकारक, तटस्थ या लाभदायक हो सकते हैं और हर आनुवंशिक विविधता की पहली जड़ हैं।
- आनुवंशिक विकार – आनुवंशिक विकार (genetic disorder) वह बीमारी है जो किसी जीन में बदलाव या गुणसूत्रों की संख्या/बनावट में गड़बड़ी से होती है। एक-जीन विकार अप्रभावी (सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल सेल एनीमिया: दो ख़राब प्रतियाँ चाहिए), प्रभावी (हंटिंगटन रोग: एक ख़राब प्रति काफ़ी) या X-लिंक्ड (हीमोफीलिया, वर्णांधता: ज़्यादातर लड़कों में) होते हैं। डाउन सिंड्रोम जैसे गुणसूत्र विकार (21वें गुणसूत्र की एक अतिरिक्त प्रति) अंडाणु या शुक्राणु बनते समय की गलती से होते हैं। पनेट वर्ग हर संतान की संभावना बताता है; आनुवंशिक जाँच, परामर्श और जीन थेरेपी परिवारों की मदद करते हैं।
12. Comp.2 Ch.6 Evolution
Evidence for common ancestry · Natural selection and adaptation · Gene pools and speciation · Coevolution and biodiversity
- विकास: नए प्रकार के जीव कैसे बनते हैं – जनन के समय विविधताएँ आती हैं। प्रकृति उन विविधताओं को चुनती है जो जीवित रहने में मदद करें, और कई पीढ़ियों में आबादी बदल जाती है: यही विकास है। सिर्फ़ वंशागत (DNA वाले) बदलाव आगे जाते हैं, उपार्जित नहीं। अलग हुई आबादियाँ नई जातियाँ बन सकती हैं। समजात अंग, समरूप अंग और जीवाश्म बताते हैं कि कौन किससे संबंधित है, और जटिल अंग चरण-दर-चरण बने।
- समष्टि आनुवंशिकी: जीन पूल, हार्डी-वाइनबर्ग और नई जातियाँ – समष्टि आनुवंशिकी (population genetics) पढ़ती है कि किसी आबादी में एलील आवृत्तियाँ कैसे बदलती हैं। सभी जीवों के सारे एलील मिलकर जीन पूल बनाते हैं। A और a एलील के लिए p + q = 1। अगर आबादी बड़ी हो, संगम यादृच्छिक हो, और प्रवास, उत्परिवर्तन व चयन न हो, तो हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत कहता है कि आवृत्तियाँ नहीं बदलतीं और जीनोटाइप p² (AA) + 2pq (Aa) + q² (aa) = 1 होते हैं। इससे हटना यानी विकास हो रहा है, जिसके कारण हैं आनुवंशिक विचलन (बॉटलनेक, संस्थापक प्रभाव), जीन प्रवाह, उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन या चुनकर संगम। जैविक जाति अवधारणा में जाति वह समूह है जो आपस में प्रजनन कर सके, यानी एक जीन पूल। नई जातियाँ तब बनती हैं जब जीन पूल प्रजनन पृथक्करण से कट जाते हैं: एलोपैट्रिक (भौगोलिक बाधा) या सिम्पैट्रिक (एक ही जगह, जैसे बहुगुणिता)। एक पूर्वज कई रूपों में फैल सकता है (अनुकूली विकिरण, अपसरण), और असंबंधित जीव एक जैसे बन सकते हैं (अभिसरण)।
- सह-विकास और जैव विविधता का निर्माण – सह-विकास तब होता है जब दो या ज़्यादा तरह के जीव कई पीढ़ियों तक प्राकृतिक चयन से एक-दूसरे को बदलते हैं। गहरी नली वाला फूल और लंबी जीभ वाला पतंगा, तेज़ शिकारी और तेज़ शिकार, परजीवी और मेज़बान इसके जाने-माने जोड़े हैं। हर साथी दूसरे के वातावरण का हिस्सा है, इसलिए एक में बदलाव दूसरे में मेल खाने वाले बदलाव को बढ़ावा देता है। अलगाव, उत्परिवर्तन और अलग आवासों में प्राकृतिक चयन के साथ मिलकर सह-विकास नई प्रजातियाँ और पक्के साझेदारी रिश्ते बनाता है। इसी से जीवन की भारी विविधता यानी जैव विविधता (जीन, प्रजातियाँ, पारितंत्र) बनती है।