Ukraine 10 клас Biology and Ecology
अध्याय: 5
1. Introduction
Biology, ecology and life
- तंत्र चिंतन: सिर्फ़ हिस्से नहीं, पूरा चित्र देखना – तंत्र (system) ऐसे हिस्सों का समूह है जो आपस में जुड़े हैं और किसी उद्देश्य के लिए मिलकर काम करते हैं। इसकी एक सीमा होती है, यह पर्यावरण से इनपुट लेता है और आउटपुट देता है। पूरा तंत्र वह कर सकता है जो कोई अकेला हिस्सा नहीं कर सकता। एक हिस्सा बदले तो बाकी भी बदलते हैं, अक्सर फ़ीडबैक लूप से। जीवन तंत्रों के अंदर तंत्रों की तरह संगठित है, कोशिका से जीवमंडल तक। तंत्र चिंतन से हम तंत्रों का विश्लेषण, डिज़ाइन और इष्टतमीकरण करते हैं और सतत विकास की योजना बनाते हैं।
2. Biodiversity
Systematics · Viruses, viroids, prions · Prokaryotes and eukaryotes
- जीव जगत – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं; इसी विविधता को जैव विविधता कहते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए हम इन्हें समूहों में बाँटते हैं। वर्गिकी (टैक्सोनॉमी) में पहचान, नामकरण, वर्णन और वर्गीकरण आता है; सिस्टेमैटिक्स इसके साथ यह भी देखती है कि समूह आपस में कैसे जुड़े हैं। सारा जीवन तीन डोमेन में है: बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया। जीवों को जगत से जाति तक 7 मुख्य स्तरों में रखते हैं और हर जाति को दो शब्दों का लैटिन नाम मिलता है, जैसे Mangifera indica।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
3. Metabolism and energy
Biomolecules and metabolism · Metabolism and health
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
- पोषण (Nutrition) – पोषण वह तरीक़ा है जिससे हम भोजन के पदार्थ पाते और इस्तेमाल करते हैं। शरीर को छह तरह के पोषक तत्व चाहिए: कार्बोहाइड्रेट और वसा (मुख्य रूप से ऊर्जा), प्रोटीन (वृद्धि और मरम्मत), विटामिन और खनिज (थोड़ी मात्रा, शरीर को सही चलाने के लिए), और पानी; साथ में पाचन के लिए रेशा। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन लगभग 17 kJ प्रति ग्राम, वसा लगभग 37 kJ प्रति ग्राम देते हैं। संतुलित आहार सब पोषक तत्व सही मात्रा में देता है, और अंदर आई ऊर्जा लगभग ख़र्च ऊर्जा के बराबर होनी चाहिए।
4. Heredity and variation
Laws of heredity · Genome organisation · Variation and mutations · Medical genetics
- आनुवंशिकता और मेंडल के नियम – माता-पिता से बच्चों में लक्षणों का जाना आनुवंशिकता है। हर लक्षण के लिए माँ और पिता दोनों एक-एक जीन देते हैं। प्रभावी जीन अप्रभावी को छुपा देता है, इसलिए एकसंकर में 3:1 और द्विसंकर में 9:3:3:1 अनुपात आता है। जीन DNA का टुकड़ा है जो प्रोटीन बनवाता है, और प्रोटीन से लक्षण बनता है।
- जीन नियमन: कोशिका जीन को चालू और बंद कैसे करती है – हर कोशिका में एक जैसा DNA है, पर वह कुछ ही जीन इस्तेमाल करती है। नियंत्रण ज़्यादातर अनुलेखन (transcription) की शुरुआत पर होता है। बैक्टीरिया में लैक ऑपेरॉन कई जीनों का एक समूह है जिसका एक प्रमोटर और एक ऑपरेटर है: लैक्टोज़ न हो तो रिप्रेसर उसे बंद रखता है; लैक्टोज़ रिप्रेसर को हटा देता है और जीन पढ़े जाते हैं (प्रेरणीय ऑपेरॉन)। यूकैरियोट में ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर, एन्हांसर और साइलेंसर हर जीन को नियंत्रित करते हैं, और एपिजेनेटिक निशान (DNA मिथाइलेशन, हिस्टोन पैकिंग) DNA का क्रम बदले बिना जीन बंद रख सकते हैं। अलग-अलग चालू/बंद पैटर्न से अलग कोशिकाएँ बनती हैं (विभेदन)।
- उत्परिवर्तन (Mutation) – उत्परिवर्तन DNA में अचानक होने वाला स्थायी बदलाव है। जीन (बिंदु) उत्परिवर्तन में एक या कुछ क्षार बदलते हैं: प्रतिस्थापन, जोड़ या विलोपन। जोड़ और विलोपन पढ़ने का ढाँचा खिसका देते हैं। गुणसूत्र उत्परिवर्तन में बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है। ये संयोग से या उत्परिवर्तजनों (UV, X-किरणें, कुछ रसायन) से होते हैं। ये हानिकारक, तटस्थ या लाभदायक हो सकते हैं और हर आनुवंशिक विविधता की पहली जड़ हैं।
- आनुवंशिक विकार – आनुवंशिक विकार (genetic disorder) वह बीमारी है जो किसी जीन में बदलाव या गुणसूत्रों की संख्या/बनावट में गड़बड़ी से होती है। एक-जीन विकार अप्रभावी (सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल सेल एनीमिया: दो ख़राब प्रतियाँ चाहिए), प्रभावी (हंटिंगटन रोग: एक ख़राब प्रति काफ़ी) या X-लिंक्ड (हीमोफीलिया, वर्णांधता: ज़्यादातर लड़कों में) होते हैं। डाउन सिंड्रोम जैसे गुणसूत्र विकार (21वें गुणसूत्र की एक अतिरिक्त प्रति) अंडाणु या शुक्राणु बनते समय की गलती से होते हैं। पनेट वर्ग हर संतान की संभावना बताता है; आनुवंशिक जाँच, परामर्श और जीन थेरेपी परिवारों की मदद करते हैं।
5. Reproduction and development
Regeneration and cell life · Human reproduction
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- मानव में जनन और जनन स्वास्थ्य – यौवनारंभ पर मस्तिष्क के हॉर्मोन वृषण और अंडाशय को सक्रिय करते हैं। नर तंत्र शुक्राणु बनाता और ले जाता है; मादा तंत्र अंडाणु बनाता है और गर्भाशय में शिशु के बढ़ने की जगह देता है। निषेचन अंडवाहिनी में होता है और भ्रूण को प्लेसेंटा से पोषण मिलता है। जनन स्वास्थ्य में सुरक्षित निर्णय, गर्भनिरोध, भ्रूण हत्या पर रोक और HIV/AIDS जैसे रोगों से बचाव शामिल हैं।