कोशिका को जीन नियंत्रित क्यों करने पड़ते हैं?
जीन DNA का वह टुकड़ा है जिसमें किसी प्रोटीन की विधि (recipe) लिखी है। जीन अभिव्यक्ति (gene expression) मतलब उस विधि का उपयोग: DNA → mRNA (अनुलेखन) → प्रोटीन (स्थानांतरण/translation)।
प्रोटीन बनाने में ऊर्जा लगती है। इसलिए कोशिका प्रोटीन तभी और वहीं बनाती है जहाँ ज़रूरत हो। जीन को चालू या बंद करना जीन नियमन (gene regulation) कहलाता है।
नियंत्रण कई जगह हो सकता है: DNA खुला है या नहीं, अनुलेखन शुरू होता है या नहीं, mRNA कैसे तैयार होता है, कितनी तेज़ी से प्रोटीन बनता है और प्रोटीन कितनी देर टिकता है। सबसे आम नियंत्रण अनुलेखन की शुरुआत पर होता है।
जो जीन हमेशा चालू रहते हैं (जैसे श्वसन के एंज़ाइम) उन्हें हाउसकीपिंग जीन कहते हैं। बाक़ी किसी संकेत पर ही चालू होते हैं।
लैक ऑपेरॉन: बैक्टीरिया का स्विच
बैक्टीरिया में साथ काम करने वाले जीन अक्सर पास-पास होते हैं और एक ही स्विच से चलते हैं। इस इकाई को ऑपेरॉन (operon) कहते हैं।
E. coli के लैक ऑपेरॉन में होते हैं:
- प्रमोटर – जहाँ RNA पॉलिमरेज़ बैठता है।
- ऑपरेटर – चालू/बंद स्विच, प्रमोटर के पास।
- संरचनात्मक जीन (lacZ, lacY, lacA) – लैक्टोज़ को अंदर लाने और तोड़ने वाले एंज़ाइमों की विधि (जैसे β-गैलेक्टोसिडेज़)।
एक अलग नियामक जीन (regulator gene, lacI) एक रिप्रेसर (दमनकारी) प्रोटीन बनाता है।
लैक्टोज़ नहीं → जीन बंद
रिप्रेसर ऑपरेटर से जुड़कर पॉलिमरेज़ को रोक देता है। न mRNA, न एंज़ाइम, न बर्बादी।
लैक्टोज़ है → जीन चालू
लैक्टोज़ (एलोलैक्टोज़ के रूप में) रिप्रेसर से जुड़कर उसका आकार बदल देता है। रिप्रेसर ऑपरेटर छोड़ देता है। पॉलिमरेज़ जीन पढ़ता है और एंज़ाइम बनते हैं। चूँकि एक पदार्थ इसे चालू करता है, इसे प्रेरणीय (inducible) ऑपेरॉन कहते हैं; लैक्टोज़ प्रेरक (inducer) है।
अगर ग्लूकोज़ भी हो, तो बैक्टीरिया ग्लूकोज़ पसंद करता है और लैक जीन धीमे रहते हैं, क्योंकि सक्रियक प्रोटीन CAP तभी काम करता है जब ग्लूकोज़ कम हो।
यूकैरियोट में जीन नियंत्रण
पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं में ऑपेरॉन कम होते हैं। हर जीन का अपना प्रमोटर होता है और उसे कई प्रोटीन नियंत्रित करते हैं, जिन्हें ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर (प्रतिलेखन कारक) कहते हैं।
- सक्रियक (activator) DNA के एन्हांसर हिस्से से जुड़ते हैं, जो जीन से दूर भी हो सकता है। DNA मुड़कर लूप बनाता है ताकि सक्रियक पॉलिमरेज़ को छूकर उसे शुरू करने में मदद करे।
- रिप्रेसर साइलेंसर से जुड़कर अनुलेखन रोकते हैं।
बाहर के संकेत (हार्मोन, वृद्धि कारक) ग्राही (receptor) से जुड़ते हैं। कोशिका के अंदर अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला (signal cascade) ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर को चालू करती है। उदाहरण: एस्ट्रोजन हार्मोन कोशिका में जाकर अपने ग्राही से जुड़ता है और यह जोड़ी ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर बन जाती है।
बाद के नियंत्रण: pre-mRNA से इंट्रॉन काटे जाते हैं (स्प्लाइसिंग, जिसमें एक्सॉन अलग-अलग तरह जुड़ सकते हैं), छोटे RNA mRNA को रोक सकते हैं, और प्रोटीन तोड़े जा सकते हैं।
एपिजेनेटिक्स और कोशिका विभेदन
यूकैरियोट में DNA हिस्टोन प्रोटीन पर लिपटा रहता है। कसकर लिपटा DNA पढ़ना मुश्किल है; ढीला DNA आसानी से पढ़ा जाता है।
एपिजेनेटिक निशान जीन के क्षार-क्रम को बदले बिना उसका उपयोग बदल देते हैं:
- DNA मिथाइलेशन – DNA पर छोटे मिथाइल (–CH₃) टैग आमतौर पर जीन बंद करते हैं।
- हिस्टोन बदलाव – एसिटाइल जैसे टैग पैकिंग ढीली करके जीन चालू करते हैं।
कुछ निशान कोशिका-विभाजन में नकल हो जाते हैं, इसलिए संतति कोशिकाओं में वही चालू/बंद पैटर्न रहता है। भोजन, तनाव, ताप और विषैले पदार्थ निशान बदल सकते हैं: ऐसे ही पर्यावरण जीन पर असर डालता है।
कोशिका विभेदन (cell differentiation): निषेचित अंडा बँटकर बहुत-सी कोशिकाएँ बनाता है। अलग संकेत अलग-अलग जीन चालू करते हैं, तो कोशिकाएँ पेशी, तंत्रिका या रक्त कोशिका बनती हैं। सबमें DNA वही है; सिर्फ़ जीन अभिव्यक्ति का पैटर्न अलग है। स्टेम कोशिकाओं में अभी बहुत-से जीन उपलब्ध हैं, इसलिए वे कई तरह की कोशिका बन सकती हैं।
करके देखो: 3D में और घर पर
3D में: आख़िरी चरण में पहले अंदाज़ा लगाओ, फिर जाँचो: (1) लैक्टोज़ चालू, मिथाइल बंद; (2) लैक्टोज़ चालू, मिथाइल चालू; (3) लैक्टोज़ और सक्रियक दोनों। किसमें सबसे ज़्यादा mRNA बना?
घर पर: "जीन स्विच" कार्ड खेल बनाओ। तीन कार्डों पर प्रमोटर, ऑपरेटर, जीन लिखकर लाइन में रखो। सिक्का = रिप्रेसर; टॉफ़ी = लैक्टोज़। सिक्का ऑपरेटर पर: जीन बंद। टॉफ़ी सिक्के पर रखकर दोनों उठा लो: जीन चालू।
परीक्षा पर ध्यान
आमतौर पर पूछा जाता है: लैक ऑपेरॉन का चित्र नामांकित करो; लैक्टोज़ होने और न होने पर क्या होता है; इसे प्रेरणीय क्यों कहते हैं; प्रोकैरियोट और यूकैरियोट नियंत्रण की तुलना; एक जैसे DNA वाली कोशिकाएँ अलग कैसे बनती हैं; एपिजेनेटिक्स की परिभाषा उदाहरण सहित।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ऑपेरॉन = प्रमोटर + ऑपरेटर + संरचनात्मक जीन (एक स्विच)
- रिप्रेसर ऑपरेटर पर → अनुलेखन रुका
- प्रेरक (लैक्टोज़) + रिप्रेसर → रिप्रेसर हटा → जीन चालू
- सक्रियक + एन्हांसर → ज़्यादा अनुलेखन
- मिथाइल DNA / कसे हिस्टोन → जीन बंद
- एक DNA + अलग जीन चालू = अलग कोशिकाएँ
हल किए गए उदाहरण
1. E. coli ऐसे माध्यम में है जिसमें लैक्टोज़ है पर ग्लूकोज़ नहीं। लैक ऑपेरॉन का क्या होगा?
लैक्टोज़ रिप्रेसर से जुड़ता है, रिप्रेसर ऑपरेटर छोड़ देता है। ग्लूकोज़ कम है, तो CAP सक्रिय है और पॉलिमरेज़ की मदद करता है। लैक जीन तेज़ी से पढ़े जाते हैं और एंज़ाइम बनते हैं।
2. रिप्रेसर में ऐसा उत्परिवर्तन है कि वह ऑपरेटर से नहीं जुड़ पाता। क्या होगा?
ऑपरेटर कभी बंद नहीं होता, तो लैक्टोज़ हो या न हो, लैक जीन हमेशा पढ़े जाते हैं। कोशिका ऊर्जा बर्बाद करती है।
3. रिप्रेसर लैक्टोज़ से नहीं जुड़ पाता। क्या होगा?
लैक्टोज़ उसे हटा नहीं सकता, तो रिप्रेसर ऑपरेटर पर बना रहता है। लैक्टोज़ होने पर भी जीन बंद रहते हैं और कोशिका लैक्टोज़ इस्तेमाल नहीं कर पाती।
4. एक ही व्यक्ति की यकृत कोशिका और तंत्रिका कोशिका का DNA एक जैसा है। फिर वे अलग क्यों हैं?
अलग ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर और एपिजेनेटिक निशान अलग-अलग जीन चालू करते हैं। यकृत कोशिका यकृत एंज़ाइम बनाती है; तंत्रिका कोशिका आयन चैनल और न्यूरोट्रांसमीटर वाले जीन चलाती है।
आम गलतियाँ
- कहना कि लैक्टोज़ ऑपरेटर से जुड़ता है। लैक्टोज़ रिप्रेसर से जुड़ता है, DNA से नहीं।
- सोचना कि अलग कोशिकाओं का DNA अलग है। DNA वही है; चालू जीन अलग हैं।
- सोचना कि एपिजेनेटिक निशान क्षार-क्रम बदलते हैं। नहीं; वे सिर्फ़ DNA को खुला या बंद करते हैं।
- प्रमोटर और ऑपरेटर में गड़बड़: प्रमोटर पर पॉलिमरेज़ बैठता है; ऑपरेटर पर रिप्रेसर।