मेंडल के नियम: प्रभाविता, पृथक्करण, स्वतंत्र अपव्यूहन
मेंडल ने लगभग 7 साल बगीचे की मटर पर प्रयोग किए। मटर अच्छा चुनाव था: जल्दी उगती है, साफ़ उल्टे लक्षण (लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार) हैं, और स्व-परागण या हाथ से क्रॉस दोनों हो सकते हैं।
पहले शब्द: जीन = लक्षण को चलाने वाली इकाई। उसके अलग रूप = अलील (T और t)। जीनोटाइप (जीन प्ररूप) = अक्षर (TT, Tt, tt)। फीनोटाइप (लक्षण प्ररूप) = जो दिखे (लंबा, बौना)। समयुग्मजी = एक जैसे अक्षर (TT); विषमयुग्मजी = अलग अक्षर (Tt)।
- प्रभाविता का नियम: Tt में केवल T दिखता है। T प्रभावी, t अप्रभावी।
- पृथक्करण का नियम: युग्मक बनते समय दोनों अलील अलग हो जाते हैं। हर युग्मक में एक ही जाता है। इसलिए Tt × Tt से 1 TT : 2 Tt : 1 tt और 3 लंबे : 1 बौना।
- स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम: दो अलग जीनों के अलील युग्मकों में अपने-आप बँटते हैं। RrYy चार तरह के युग्मक (RY, Ry, rY, ry) बराबर बनाता है, इसलिए F2 में 9 : 3 : 3 : 1।
परीक्षार्थ संकरण (टेस्ट क्रॉस)
लंबा पौधा TT है या Tt, यह जानने के लिए उसे बौने (tt) से क्रॉस करो। सब लंबे → TT। आधे लंबे, आधे बौने (1 : 1) → Tt।
अपूर्ण प्रभाविता और सहप्रभाविता
अपूर्ण प्रभाविता: विषमयुग्मजी बीच का दिखता है। स्नैपड्रैगन (कुत्ता फूल): RR लाल × rr सफ़ेद → Rr गुलाबी। F2: 1 लाल : 2 गुलाबी : 1 सफ़ेद। यहाँ लक्षण अनुपात = जीन अनुपात। अलील का विचार सही है; बस प्रभाविता अधूरी है।
सहप्रभाविता: विषमयुग्मजी में दोनों लक्षण पूरे दिखते हैं। Iᴬ और Iᴮ वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं पर A और B दोनों शर्करा होती हैं → AB समूह।
आसान जाँच: रंग मिल गया = अपूर्ण; दोनों दिखें = सहप्रभाविता।
बहुविकल्पी अलील और ABO रक्त समूह
जब किसी जीन के आबादी में दो से ज़्यादा अलील हों, उन्हें बहुविकल्पी अलील कहते हैं। एक व्यक्ति में फिर भी दो ही होते हैं।
ABO जीन (I) के तीन अलील: Iᴬ, Iᴮ, i। Iᴬ और Iᴮ आपस में सहप्रभावी; दोनों i पर प्रभावी।
| जीनोटाइप | रक्त समूह |
|---|---|
| IᴬIᴬ, Iᴬi | A |
| IᴮIᴮ, Iᴮi | B |
| IᴬIᴮ | AB |
| ii | O |
तीन अलील से 6 जीनोटाइप और 4 रक्त समूह। सूत्र: n अलील → n(n+1)/2 जीनोटाइप।
बहुप्रभाविता और बहुजीनी लक्षण
बहुप्रभाविता (प्लियोट्रॉपी): एक जीन, कई असर। फिनाइलकीटोनूरिया (PKU) में एक एंज़ाइम का ख़राब जीन मानसिक कमज़ोरी, हल्के बाल और हल्की त्वचा — तीनों करता है। मटर में स्टार्च वाला एक जीन बीज का आकार भी तय करता है और स्टार्च कणों का आकार भी।
बहुजीनी लक्षण: कई जीन, एक लक्षण। मनुष्य की त्वचा का रंग और लंबाई कई जीन मिलकर तय करते हैं, हर जीन थोड़ा जोड़ता है। इसलिए रंगों की पूरी रेंज दिखती है। वातावरण (धूप, भोजन) भी असर डालता है।
याद रखो: प्लियो = प्लेंटी असर; पॉली = प्लेंटी जीन।
वंशागति का गुणसूत्रीय सिद्धांत
1865 में मेंडल के "कारक" किसी ने देखे नहीं थे। 1900 तक सूक्ष्मदर्शी में अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्र दिखने लगे। सटन और बोवेरी ने मेल देखा:
- गुणसूत्र जोड़ों में होते हैं, अलील की तरह।
- अर्धसूत्रण में जोड़े अलग होते हैं, पृथक्करण की तरह।
- अलग जोड़े स्वतंत्र रूप से सजते हैं, स्वतंत्र अपव्यूहन की तरह।
इसलिए कहा: जीन गुणसूत्रों पर होते हैं। टी.एच. मॉर्गन ने फल मक्खी (ड्रोसोफिला) से साबित किया: जल्दी पैदा होती है, बहुत बच्चे, केवल 4 जोड़ी गुणसूत्र, और आसानी से दिखने वाले लक्षण।
सहलग्नता और जीन विनिमय
एक ही गुणसूत्र पर बैठे जीन अक्सर साथ-साथ युग्मक में जाते हैं। इसे सहलग्नता कहते हैं। मॉर्गन ने देखा कि ऐसे जीन 9 : 3 : 3 : 1 नहीं देते।
पर कभी-कभी अर्धसूत्रण में जोड़ीदार गुणसूत्र टुकड़े बदल लेते हैं (जीन विनिमय / क्रॉसिंग ओवर)। इससे नए मेल बनते हैं = पुनर्योगज।
- पास-पास जीन → कम अलग होते हैं → दृढ़ सहलग्न (कम पुनर्योगज, जैसे 1.3%)।
- दूर-दूर जीन → ज़्यादा अलग → ढीले सहलग्न (ज़्यादा पुनर्योगज, जैसे 37.2%)।
पुनर्योजन आवृत्ति (%) = पुनर्योगज संतान ÷ कुल × 100। स्टर्टेवेंट ने इसी % को दूरी मानकर पहला जीन मानचित्र बनाया (1% = 1 मानचित्र इकाई)।
लिंग निर्धारण: मनुष्य, पक्षी और मधुमक्खी
हेंकिंग ने कीट के शुक्राणु में एक ख़ास पिंड देखा और उसे X पिंड कहा। लिंग गुणसूत्र नर-मादा में अलग होते हैं; बाकी अलिंग गुणसूत्र (ऑटोसोम) हैं।
- मनुष्य (XX–XY): स्त्री 44 + XX केवल X अंडाणु बनाती है; पुरुष 44 + XY, X या Y शुक्राणु (50 : 50)। शुक्राणु बच्चे का लिंग तय करता है। नर विषमयुग्मकता।
- टिड्डा (XX–XO): नर में केवल एक X।
- पक्षी (ZW–ZZ): मादा ZW दो तरह के अंडे बनाती है; नर ZZ। मादा विषमयुग्मकता — माँ तय करती है।
- मधुमक्खी (अगुणित-द्विगुणित): निषेचित अंडा (2n = 32) मादा (रानी या श्रमिक) बनता है। अनिषेचित अंडा (n = 16) अनिषेकजनन से नर (ड्रोन) बनता है। ड्रोन समसूत्री विभाजन से शुक्राणु बनाता है; उसका पिता और बेटा नहीं होता, पर नाना होता है।
लिंग-सहलग्न लक्षण: हीमोफीलिया और वर्णांधता
कुछ जीन X गुणसूत्र पर होते हैं और Y पर उनकी जोड़ी नहीं होती। पुरुष में एक X है, तो एक ख़राब अलील ही काफ़ी है। स्त्री में दोनों चाहिए; एक हो तो वह वाहक है।
- वर्णांधता (लाल-हरा): लगभग 8% पुरुष, 0.4% स्त्रियाँ।
- हीमोफीलिया: ख़ून ठीक से नहीं जमता; छोटा कट भी देर तक बहता है। रानी विक्टोरिया के परिवार में प्रसिद्ध।
पैटर्न: वाहक माँ × सामान्य पिता → आधे बेटे प्रभावित, आधी बेटियाँ वाहक। प्रभावित पिता बेटे को कभी नहीं देता (बेटे को Y देता है)।
मेंडलीय विकार: थैलेसीमिया, सिकल-सेल आदि
एक जीन के बदलाव से ऐसा विकार हो सकता है जो मेंडल के नियम मानता है। वंशावली विश्लेषण (परिवार का पेड़: वर्ग = पुरुष, वृत्त = स्त्री, भरा = प्रभावित) से इसे खोजते हैं।
- थैलेसीमिया: अलिंग गुणसूत्री अप्रभावी। हीमोग्लोबिन की एक ग्लोबिन शृंखला बहुत कम बनती है, लाल कोशिकाएँ टूटती हैं, ख़ून की कमी। α-थैलेसीमिया: जीन HBA1, HBA2, गुणसूत्र 16। β-थैलेसीमिया: जीन HBB, गुणसूत्र 11। यह मात्रा की समस्या है।
- सिकल-सेल एनीमिया: अलिंग गुणसूत्री अप्रभावी। एक क्षार का बदलाव GAG → GUG, β-ग्लोबिन के 6वें स्थान पर ग्लूटामिक अम्ल की जगह वैलीन। कम ऑक्सीजन पर लाल कोशिकाएँ हँसिया जैसी। यह गुणवत्ता की समस्या है।
- हीमोफीलिया, वर्णांधता: X-सहलग्न अप्रभावी। फिनाइलकीटोनूरिया: अलिंग गुणसूत्री अप्रभावी।
गुणसूत्रीय विकार: डाउन, टर्नर, क्लाइनफेल्टर
अर्धसूत्रण में गुणसूत्र अलग न हों (अवियोजन), तो युग्मक में एक ज़्यादा या एक कम आ सकता है। असुगुणिता (एन्यूप्लॉइडी) = एक गुणसूत्र का घटना-बढ़ना। बहुगुणिता = पूरे सेट बढ़ना (पौधों में आम)।
| सिंड्रोम | गुणसूत्र | मुख्य लक्षण |
|---|---|---|
| डाउन | 47, 21वाँ गुणसूत्र एक ज़्यादा (ट्राइसोमी 21) | छोटा कद, छोटा गोल सिर, दरार वाली जीभ, खुला मुँह, चौड़ी हथेली पर एक रेखा, धीमा मानसिक-शारीरिक विकास |
| क्लाइनफेल्टर | 47, XXY (पुरुष) | लंबा, कुछ स्त्री लक्षण जैसे स्तन विकास, बंध्य |
| टर्नर | 45, XO (स्त्री) | छोटा कद, अंडाशय अविकसित, बंध्य, द्वितीयक लैंगिक लक्षण नहीं |
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- एकसंकर F2 (Tt × Tt): लक्षण 3 : 1, जीन 1 : 2 : 1
- टेस्ट क्रॉस (Tt × tt): 1 : 1
- द्विसंकर F2 (RrYy × RrYy): 9 : 3 : 3 : 1
- अपूर्ण प्रभाविता F2: 1 : 2 : 1 (लक्षण = जीन अनुपात)
- युग्मकों के प्रकार = 2ⁿ (n = विषमयुग्मजी जीन जोड़े)
- n अलील से जीनोटाइप = n(n + 1)/2
- पुनर्योजन आवृत्ति = पुनर्योगज ÷ कुल संतान × 100 (1% = 1 मानचित्र इकाई)
हल किए गए उदाहरण
1. Tt मटर का स्व-परागण हुआ। 400 पौधों में कितने बौने होंगे?
चरण 1: Tt × Tt → 1 TT : 2 Tt : 1 tt। चरण 2: बौना = tt = 1/4। चरण 3: 400 × 1/4 = 100 बौने।
2. एक लंबे पौधे को बौने से क्रॉस किया। 52 लंबे और 48 बौने मिले। लंबे जनक का जीनोटाइप?
चरण 1: यह टेस्ट क्रॉस है (tt से)। चरण 2: लगभग 1 : 1 मतलब लंबे जनक ने T और t बराबर दिए। उत्तर: Tt।
3. AaBbCC कितने प्रकार के युग्मक बनाता है?
चरण 1: विषमयुग्मजी जोड़े गिनो: Aa, Bb = 2 (CC समयुग्मजी)। चरण 2: 2² = 4 प्रकार: ABC, AbC, aBC, abC।
4. RrYy × RrYy से 1600 बीज बने। कितने गोल और हरे होंगे?
चरण 1: F2 अनुपात 9 : 3 : 3 : 1। चरण 2: गोल हरा = R_yy = 3/16। चरण 3: 1600 × 3/16 = 300 बीज।
5. माँ A (Iᴬi), पिता B (Iᴮi)। बच्चों में O समूह का भाग?
चरण 1: माँ के युग्मक Iᴬ या i; पिता के Iᴮ या i। चरण 2: खाने: IᴬIᴮ (AB), Iᴬi (A), Iᴮi (B), ii (O)। चरण 3: O = 1/4 = 25%।
6. गुलाबी स्नैपड्रैगन आपस में क्रॉस हुए, 240 पौधे बने। कितने गुलाबी?
चरण 1: Rr × Rr → 1 RR : 2 Rr : 1 rr। चरण 2: गुलाबी = 2/4। चरण 3: 240 × 1/2 = 120 गुलाबी।
7. द्विसंकर के टेस्ट क्रॉस में 420 जनक-प्रकार और 80 पुनर्योगज संतान मिलीं। पुनर्योजन आवृत्ति और मानचित्र दूरी निकालो।
चरण 1: कुल = 500। चरण 2: RF = 80/500 × 100 = 16%। चरण 3: दूरी = 16 मानचित्र इकाई। जीन सहलग्न हैं पर बहुत दृढ़ नहीं।
8. वर्णांध पुरुष की शादी सामान्य (अवाहक) स्त्री से हुई। बेटे के वर्णांध होने की संभावना? बेटी की?
चरण 1: पुरुष XᶜY, स्त्री XX। चरण 2: बेटे पिता से Y, माँ से X → सब सामान्य (0%)। चरण 3: बेटियाँ पिता से Xᶜ, माँ से X → सब वाहक, कोई प्रभावित नहीं।
आम गलतियाँ
- अपूर्ण प्रभाविता और सहप्रभाविता को मिलाना। गुलाबी (मिश्रण) = अपूर्ण; AB रक्त (दोनों दिखें) = सहप्रभाविता।
- यह सोचना कि एक व्यक्ति में तीनों रक्त अलील हो सकते हैं। आबादी में तीन हैं; एक व्यक्ति में केवल दो।
- कहना कि मनुष्य में बच्चे का लिंग माँ तय करती है। पिता का X या Y शुक्राणु तय करता है। (पक्षियों में माँ।)
- सहलग्न जीनों के लिए भी 9 : 3 : 3 : 1 लिखना। सहलग्न जीन ज़्यादातर जनक-प्रकार देते हैं, अनुपात बदल जाता है।