जंतु कोशिका संवर्धन क्या है?
जंतु कोशिका संवर्धन का अर्थ है किसी जंतु या मनुष्य से ली गई कोशिकाओं को शरीर के बाहर, एक बंद और साफ़ बर्तन में उगाना। इसे इन विट्रो (in vitro) संवर्धन भी कहते हैं, यानी "काँच में"।
जंतु कोशिकाएँ बैक्टीरिया या पादप कोशिकाओं से ज़्यादा नाज़ुक हैं। इन्हें चाहिए:
- कीटाणु-रहित जगह: काम लैमिनार एयर-फ़्लो हुड (साफ़ हवा वाली अलमारी) में, जीवाणु-रहित औज़ारों से होता है।
- माध्यम (मीडियम): तरल भोजन जिसमें ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण, विटामिन और अक्सर सीरम (रक्त का तरल भाग, जैसे भ्रूण गोजातीय सीरम) होता है, जो वृद्धि कारक देता है। कीटाणु रोकने के लिए प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) भी मिलाए जा सकते हैं।
- सही परिस्थितियाँ: 37 °C (शरीर का ताप), pH लगभग 7.2–7.4 और इनक्यूबेटर में 5% कार्बन डाइऑक्साइड। CO2 माध्यम के बाइकार्बोनेट के साथ मिलकर pH स्थिर रखती है।
ऊतकों की ज़्यादातर कोशिकाएँ आसंजक (एडहेरेंट) होती हैं: बढ़ने के लिए उन्हें किसी सतह से चिपकना पड़ता है। रक्त कोशिकाएँ तरल में तैरते हुए बढ़ती हैं; इसे निलंबन संवर्धन (सस्पेंशन कल्चर) कहते हैं।
संवर्धन की विधियाँ: प्राथमिक संवर्धन, उप-संवर्धन और कोशिका वंशक्रम
प्राथमिक संवर्धन
ऊतक के छोटे टुकड़े को काटकर ट्रिप्सिन या कोलेजिनेज़ जैसे एंज़ाइम से उपचारित करते हैं। इससे कोशिकाएँ अलग हो जाती हैं। उन्हें माध्यम वाली फ्लास्क में डालते हैं। सीधे ऊतक से बनी यह पहली संवर्धन प्राथमिक संवर्धन है।
वृद्धि और कॉन्फ़्लुएंस
कोशिकाएँ चिपकती, फैलती और विभाजित होती हैं। जब वे पूरे तल को एक परत (मोनोलेयर) में ढक लेती हैं, तो वे कॉन्फ़्लुएंट कहलाती हैं। सामान्य कोशिकाएँ एक-दूसरे को छूने पर विभाजन रोक देती हैं। इसे संपर्क संदमन कहते हैं।
उप-संवर्धन (पैसेज)
कोशिकाओं को बढ़ाते रहने के लिए उन्हें ट्रिप्सिन से ढीला करके ताज़े माध्यम वाली नई फ्लास्कों में बाँटते हैं। हर बार बाँटना एक पैसेज है।
कोशिका वंशक्रम (सेल लाइन)
- सीमित सेल लाइन: सामान्य कोशिकाएँ लगभग 40–60 बार ही विभाजित होकर रुक जाती हैं। इस सीमा को हेफ़्लिक सीमा कहते हैं।
- सतत (अमर) सेल लाइन: ऐसी कोशिकाएँ जो बिना रुके विभाजित होती रहती हैं, अक्सर कैंसर या बदली हुई कोशिकाएँ। प्रसिद्ध HeLa लाइन 1951 में गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर से मिली थी और आज भी दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में काम आती है।
कोशिकाओं को द्रव नाइट्रोजन (−196 °C) में जमाकर बरसों बाद फिर जगाया जा सकता है। इसे क्रायोप्रिज़र्वेशन (हिम-परिरक्षण) कहते हैं।
जंतु कोशिका संवर्धन के उपयोग
- टीके: वायरस केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर बढ़ते हैं, इसलिए पोलियो, रेबीज़, खसरा आदि के टीके संवर्धित कोशिकाओं में बनते हैं।
- दवाएँ (पुनर्योगज प्रोटीन): CHO जैसी कोशिकाओं में मानव जीन डाला जाता है, फिर वे थक्का बनाने वाले कारक, एरिथ्रोपोइटिन या इंटरफ़ेरॉन जैसे प्रोटीन बनाती हैं।
- मोनोक्लोनल एंटीबॉडी: हाइब्रिडोमा (एंटीबॉडी बनाने वाली कोशिका + कैंसर कोशिका का मेल) हमेशा बढ़ती है और एक शुद्ध एंटीबॉडी बनाती है, जो जाँच और कैंसर के इलाज में काम आती है।
- दवा और रसायनों की जाँच: नई दवा या सौंदर्य-उत्पाद कोशिकाओं को नुकसान तो नहीं करता, यह देखा जाता है, जिससे कम जानवरों पर प्रयोग होता है।
- ऊतक अभियांत्रिकी: गंभीर रूप से जले लोगों के लिए त्वचा कोशिकाओं की परतें उगाई जाती हैं; उपास्थि (कार्टिलेज) आदि भी उगाए जा रहे हैं।
- शोध और निदान: कैंसर, बुढ़ापे और वायरस का अध्ययन; गर्भस्थ शिशु के गुणसूत्रों की जाँच (एम्नियोसेंटेसिस की कोशिकाओं का संवर्धन)।
- IVF: अंडाणु और शुक्राणु डिश में मिलते हैं और शुरुआती भ्रूण कुछ दिन संवर्धन माध्यम में बढ़ता है।
स्टेम कोशिका तकनीक
स्टेम कोशिका एक अविशेषित कोशिका है। इसमें दो शक्तियाँ हैं: यह स्व-नवीकरण (अपनी नकल बनाना) कर सकती है और विभेदन (तंत्रिका, पेशी या रक्त जैसी विशेष कोशिका बनना) कर सकती है।
- भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएँ बहुत शुरुआती भ्रूण (लगभग 5 दिन) से मिलती हैं। ये बहुशक्त (प्लुरिपोटेंट) हैं: शरीर की लगभग कोई भी कोशिका बन सकती हैं।
- वयस्क स्टेम कोशिकाएँ अस्थि मज्जा, त्वचा, वसा आदि में मिलती हैं। ये बहुक्षम (मल्टीपोटेंट) हैं: कुछ संबंधित कोशिकाएँ ही बनाती हैं। अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाएँ सारी रक्त कोशिकाएँ बनाती हैं।
- गर्भनाल रक्त में रक्त की स्टेम कोशिकाएँ भरपूर होती हैं। कुछ परिवार इसे कॉर्ड ब्लड बैंक में रखवाते हैं।
- प्रेरित बहुशक्त स्टेम (iPS) कोशिकाएँ: 2006 में वैज्ञानिकों ने साधारण त्वचा कोशिकाओं में कुछ जीन डालकर उन्हें फिर से बहुशक्त बना दिया। इससे भ्रूण की ज़रूरत नहीं पड़ती।
उपयोग: ल्यूकीमिया और थैलेसीमिया में अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण, कॉर्निया की मरम्मत, पार्किंसन और मधुमेह जैसे रोगों पर शोध, और मानव कोशिकाओं पर दवा की जाँच। चिंताएँ: भ्रूण के उपयोग पर नैतिक प्रश्न उठते हैं, और उगाई गई स्टेम कोशिकाएँ कभी-कभी गाँठ (ट्यूमर) बना सकती हैं, इसलिए इलाज की सावधानी से जाँच ज़रूरी है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- n दोगुना होने के बाद कोशिकाएँ = शुरुआती कोशिकाएँ × 2ⁿ
- दोगुना होने की संख्या n = समय ÷ दोगुना होने का समय
- परिस्थितियाँ: 37 °C, pH ≈ 7.4, 5% CO2, कीटाणु-रहित माध्यम
- प्राथमिक संवर्धन → उप-संवर्धन (पैसेज) → सीमित या सतत सेल लाइन
हल किए गए उदाहरण
1. एक फ्लास्क में 50 000 कोशिकाएँ हैं। दोगुना होने का समय 24 घंटे है। 3 दिन बाद कितनी कोशिकाएँ होंगी?
3 दिन = 72 घंटे = 3 बार दोगुना। 50 000 × 2³ = 50 000 × 8 = 400 000 कोशिकाएँ।
2. कोशिकाएँ हर 20 घंटे में दोगुनी होती हैं। 1 × 10⁵ से 1.6 × 10⁶ होने में कितना समय लगेगा?
1.6 × 10⁶ ÷ 1 × 10⁵ = 16 = 2⁴, यानी 4 बार दोगुना। 4 × 20 = 80 घंटे।
3. एक कॉन्फ़्लुएंट फ्लास्क में 2 × 10⁶ कोशिकाएँ हैं। इसे 1:4 में बाँटा। हर नई फ्लास्क में कितनी कोशिकाएँ जाएँगी?
2 × 10⁶ ÷ 4 = 5 × 10⁵ कोशिकाएँ प्रति फ्लास्क।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि जंतु कोशिकाएँ सादे चीनी-पानी में उग जाएँगी। उन्हें अमीनो अम्ल, विटामिन, लवण, वृद्धि कारक (सीरम) और स्थिर pH चाहिए।
- प्राथमिक संवर्धन और सेल लाइन को एक समझना। प्राथमिक संवर्धन सीधे ऊतक से बनता है; सेल लाइन वह है जो उप-संवर्धन के बाद भी बढ़ती रहती है।
- यह सोचना कि CO2 जंतु कोशिकाओं का भोजन है। 5% CO2 सिर्फ़ माध्यम का pH स्थिर रखती है।
- यह सोचना कि हर स्टेम कोशिका कोई भी कोशिका बना सकती है। केवल बहुशक्त (भ्रूणीय, iPS) ऐसा कर सकती हैं; वयस्क स्टेम कोशिकाएँ कुछ ही प्रकार बनाती हैं।