Ukraine 11 клас Biology and Ecology (profile level)
अध्याय: 8
1. Irritability
Irritability at all levels
- उद्दीपन और अनुक्रिया – उद्दीपन (stimulus) आसपास या शरीर के अंदर का कोई बदलाव है। जो जीव इसे पहचानकर प्रतिक्रिया देते हैं, वे ज़्यादा बचते हैं। रास्ता हमेशा एक ही: उद्दीपन → ग्राही → समन्वयक → प्रभावक → अनुक्रिया। छोटे जीव अनुचलन (दिशा में चलना) या गतिकी (चाल बदलना) से चलते हैं। पौधे IAA की मदद से अनुवर्तन द्वारा मुड़ते हैं। जंतुओं में पैकिनी कणिका और आँख के शलाका-शंकु जैसे ग्राही होते हैं, तेज़ बचाव के लिए प्रतिवर्ती चाप, और मस्तिष्क का मेड्यूला हृदय गति बदलता है।
2. Movement
Movement of organisms
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
3. Self-regulation
Homeostasis
- समस्थापन (Homeostasis) – समस्थापन वह तरीका है जिससे शरीर अपना आंतरिक वातावरण (रक्त और ऊतक द्रव) स्थिर रखता है, चाहे बाहर का मौसम बदले। यह शरीर का ताप (लगभग 37 °C), रक्त ग्लूकोज़ (लगभग 4–6 mmol/L), पानी-लवण और रक्त pH (लगभग 7.4) नियंत्रित करता है। ज़्यादातर यह ऋणात्मक पुनर्भरण से होता है: ग्राही बदलाव पहचानता है, नियंत्रण केंद्र तय करता है, और प्रभावक स्तर को निर्धारित बिंदु पर लौटाता है।
4. Adaptations
Adaptations of organisms
- रूपांतरण: कहानी किताब से फ़िल्म, नाटक या गेम तक कैसे पहुँचती है – रूपांतरण (adaptation) एक नई रचना है जो किसी पुरानी रचना (स्रोत) की कहानी को दूसरे माध्यम में फिर से कहती है, जैसे उपन्यास से फ़िल्म, नाटक, कॉमिक, धारावाहिक या गेम। हर माध्यम की अपनी ताक़त और सीमा है, इसलिए कुछ हटाना, मिलाना, बदलना और जोड़ना पड़ता है। रूपांतरण वफ़ादार, ढीला या खुला (नई जगह-समय में) हो सकता है। तुलना करते समय पूछो: क्या बदला, क्यों बदला, और इससे अर्थ कैसे बदला।
5. Biological basis of a healthy lifestyle
Health and prevention
- मानव स्वास्थ्य तथा रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों ठीक हों। रोग कई बार कीटाणुओं (रोगजनक) से होते हैं: जीवाणु, वायरस, प्रोटोज़ोआ, कृमि और कवक। शरीर दो तरह की प्रतिरक्षा से लड़ता है: सहज (जन्म से) और उपार्जित (सीखी हुई, याद रखने वाली)। टीके इसी याददाश्त का उपयोग करते हैं। HIV सहायक T कोशिकाओं को नष्ट करके एड्स करता है। कैंसर में कोशिकाएँ बिना रुके बँटती हैं। नशा और शराब किशोरों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाते हैं।
6. Breeding and biotechnology
Breeding and biotechnology
- जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग – आनुवंशिक इंजीनियरिंग के औज़ार दवा, खेती और शोध में काम आते हैं। जीवाणु मानव इंसुलिन बनाते हैं; यीस्ट सुरक्षित टीका-प्रोटीन बनाता है। स्टेम कोशिकाएँ कई प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती हैं। जीन थेरेपी रोगी की कोशिकाओं में सही जीन डालती है। Bt कपास जैसी GM फसलों में कीट मारने वाले प्रोटीन का जीन होता है। पारजीनी जंतु रोग समझने या दवा बनाने में मदद करते हैं। ये शक्तिशाली हैं, इसलिए भारत में GEAC इन पर नज़र रखती है और कानून बायोपायरेसी व अनुचित पेटेंट से बचाते हैं।
7. Ecology
Factorial ecology · Populations · Ecosystems · Biosphere
- पारिस्थितिकी की बुनियाद: पारिस्थितिक कारक – पारिस्थितिकी यह पढ़ती है कि जीव और उनका परिवेश एक-दूसरे पर कैसे असर डालते हैं। यह असर पारिस्थितिक कारकों से होता है: अजैविक (निर्जीव), जैविक (सजीव) और मानवजनित। हर जीव हर कारक की एक सीमा में ही जी पाता है (सहनशीलता का नियम), और वृद्धि सबसे कम मिलने वाले कारक से रुकती है (न्यूनतम का नियम)। संकरी सीमा वाले जीव स्टेनो, चौड़ी सीमा वाले यूरी कहलाते हैं।
- जीव और समष्टियाँ: वृद्धि और पारस्परिक क्रिया – समष्टि (population) यानी एक ही जाति के वे सब जीव जो एक समय पर एक जगह रहते हैं। समष्टि के ऐसे गुण होते हैं जो अकेले जीव में नहीं होते: घनत्व, जन्म दर, मृत्यु दर, लिंग अनुपात और आयु संरचना। जन्म और आप्रवासन से N बढ़ता है, मृत्यु और उत्प्रवासन से घटता है। भोजन असीमित हो तो तेज़ वृद्धि (J-वक्र, dN/dt = rN); सीमित हो तो वृद्धि धीमी होकर वहन क्षमता K पर रुकती है (S-वक्र, dN/dt = rN(1 − N/K))। जातियाँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं: सहोपकारिता (+/+), स्पर्धा (−/−), परभक्षण और परजीविता (+/−), सहभोजिता (+/0), असहभोजिता (−/0)।
- पारितंत्र: संरचना, उत्पादकता, ऊर्जा प्रवाह और पिरामिड – पारितंत्र प्रकृति की एक कार्यशील इकाई है जहाँ जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटक आपस में मिलकर काम करते हैं। पौधे जिस दर से भोजन बनाते हैं वह उत्पादकता है: सकल (GPP) में से श्वसन घटाओ तो शुद्ध (NPP = GPP − R)। मृत पदार्थ पाँच चरणों में टूटता है: खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीकरण और खनिजीकरण। ऊर्जा धूप से आती है, पोषी स्तरों में एक ही दिशा में बहती है और हर बार लगभग 10% ही आगे जाती है। संख्या और जीवभार के पिरामिड उल्टे हो सकते हैं, पर ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
- जैवमंडल (Biosphere) – जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जहाँ जीवन है। यह एक पतली परत है जहाँ स्थलमंडल (चट्टान और मिट्टी), जलमंडल (पानी) और वायुमंडल (हवा) मिलते हैं, समुद्र तल से लगभग 10 km ऊपर से लगभग 11 km नीचे तक। पृथ्वी के सभी पारितंत्र मिलकर जैवमंडल बनाते हैं। इसमें ऊर्जा एक ही दिशा में बहती है: सूर्य → पौधे → जंतु → ऊष्मा, जबकि कार्बन, पानी, नाइट्रोजन जैसे पदार्थ चक्र में घूमते हैं। जीव बाकी मंडलों को भी बदलते हैं: ऑक्सीजन बनाते हैं, मिट्टी बनाते हैं, कार्बन जमा करते हैं। आज मनुष्य इसे तेज़ी से बदल रहा है, इसलिए इसकी रक्षा ज़रूरी है।
8. Sustainable development and balanced nature use
Human impact · Nature management
- प्रदूषण: वायु, जल, भूमि और ध्वनि – प्रदूषण यानी हवा, पानी या ज़मीन में हानिकारक पदार्थ या ऊर्जा इतनी तेज़ी से डालना कि प्रकृति उसे हटा न सके। मुख्य वायु प्रदूषक हैं कण (PM), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फ़र डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और ओज़ोन; इनसे अम्लीय वर्षा और स्मॉग बनते हैं। पोषक तत्व, सीवेज और ज़हरीले रसायन पानी में सुपोषण और जैव आवर्धन करते हैं। स्रोत पर उत्सर्जन घटाकर, कचरा छोड़ने से पहले साफ़ करके और 3R से प्रदूषण घटता है।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- पर्यावरण और धारणीय विकास – पर्यावरण हमें संसाधन देता है, हमारा कचरा सोखता है, जीवन चलाता है और सुंदरता देता है। जब हम संसाधन प्रकृति के नवीकरण से तेज़ लेते हैं, या कचरा उसकी सोखने की क्षमता से ज़्यादा फेंकते हैं, तो धारण क्षमता पार होती है और पर्यावरण संकट आता है। भारत में भूमि अपक्षय, वायु-जल प्रदूषण, वन और जैव-विविधता की हानि है। जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्मी फँसती है और वैश्विक उष्णता होती है; CFC ओज़ोन परत पतली करते हैं। धारणीय विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए।