प्रतिक्रिया क्यों? उत्तरजीविता और उत्तेजनशीलता
उद्दीपन कोई भी बदलाव है जिसे जीव पहचान सके — रोशनी, गर्मी, स्पर्श, कोई रसायन। उत्तेजनशीलता (irritability) का मतलब है उद्दीपन पहचानकर जवाब देना। यह हर जीव में, हर स्तर पर है:
- एककोशिकीय (जैसे जीवाणु, यूग्लीना) भोजन या रोशनी की ओर जाते हैं।
- पौधे धीरे जवाब देते हैं — किसी दिशा में बढ़कर।
- जंतु तंत्रिकाओं और पेशियों से जल्दी, और हॉर्मोन से भी जवाब देते हैं।
प्रतिक्रिया से जीव भोजन पाता है, सही तापमान में रहता है, ख़तरे से बचता है। प्राकृतिक वरण ऐसी प्रतिक्रियाओं को बनाए रखता है।
क्रम: उद्दीपन → ग्राही (पहचानता है) → समन्वयक (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) → प्रभावक (पेशी या ग्रंथि) → अनुक्रिया।
अनुचलन और गतिकी
अनुचलन (taxis)
पूरा जीव उद्दीपन के हिसाब से एक तय दिशा में चलता है। उसकी ओर = धनात्मक, दूर = ऋणात्मक।
- यूग्लीना रोशनी की ओर तैरता है (धनात्मक प्रकाशानुचलन) ताकि प्रकाश-संश्लेषण कर सके।
- केंचुआ रोशनी से दूर जाता है, जिससे वह नम मिट्टी में रहता है।
गतिकी (kinesis)
जीव किसी दिशा में नहीं जाता, बल्कि उसकी चाल और मुड़ने की दर उद्दीपन की तीव्रता से बदलती है।
- सूखी हवा में वुडलाउस (एक छोटा कीड़ा-जैसा जीव) तेज़ चलता है और बहुत मुड़ता है — नम जगह मिलने की संभावना बढ़ती है।
- नम हवा में धीमा हो जाता है, इसलिए वहीं रहता है।
पौधों में अनुवर्तन और IAA
अनुवर्तन (tropism) एक दिशा से आने वाले उद्दीपन की ओर या दूर पौधे के भाग की वृद्धि है।
- तना: धनात्मक प्रकाशानुवर्तन, ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन (ऊपर)।
- जड़: धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (नीचे)।
नियंत्रक रसायन IAA (इंडोल एसिटिक अम्ल) है, एक ऑक्सिन। यह तने और जड़ के सिरे पर बनता है और विसरण से फैलता है।
तने में
एक तरफ़ से रोशनी → IAA छाया वाली तरफ़ → वहाँ कोशिकाएँ लंबी (दीर्घन) → छाया वाला भाग ज़्यादा बढ़ता है → तना रोशनी की ओर मुड़ता है।
जड़ में
गुरुत्व → IAA निचली तरफ़ → जड़ में IAA दीर्घन को धीमा करता है → ऊपरी भाग ज़्यादा बढ़ता है → जड़ नीचे मुड़ती है।
प्रतिवर्त: तेज़, अपने-आप बचाव
प्रतिवर्ती क्रिया एक तेज़ प्रतिक्रिया है जिसके बारे में सोचना नहीं पड़ता। सरल प्रतिवर्ती चाप में तीन न्यूरॉन:
- संवेदी न्यूरॉन — ग्राही से मेरुरज्जु तक।
- रिले (अंतर) न्यूरॉन — मेरुरज्जु के अंदर।
- प्रेरक न्यूरॉन — प्रभावक पेशी तक।
रास्ता छोटा है और मस्तिष्क को फ़ैसला नहीं करना पड़ता, इसलिए यह तेज़ है। उदाहरण: गर्मी से हाथ हटाना, पलक झपकना, घुटने का झटका।
ग्राही: पैकिनी कणिका और आँख
हर ग्राही सिर्फ़ एक तरह के उद्दीपन पर काम करता है। वह ट्रांसड्यूसर है: उद्दीपन की ऊर्जा को तंत्रिका आवेग में बदलता है।
पैकिनी कणिका (दबाव)
त्वचा में गहरे होती है। तंत्रिका सिरे के चारों ओर प्याज़ जैसी कई परतें। दबाव से परतें दबती हैं, झिल्ली खिंचती है, खिंचाव-संचालित सोडियम चैनल खुलते हैं, Na⁺ अंदर आते हैं। यह बदलाव जनक विभव (generator potential) है। यह देहली (threshold) तक पहुँचे तो क्रिया विभव (आवेग) जाता है — आवेग सब-या-कुछ-नहीं होता।
शलाका और शंकु (रोशनी)
| शलाका (rods) | शंकु (cones) | |
|---|---|---|
| वर्णक | रोडॉप्सिन, मंद रोशनी में टूटता है | आयोडॉप्सिन, तेज़ रोशनी चाहिए |
| रंग | नहीं | हाँ (तीन प्रकार) |
| जुड़ाव | कई शलाकाएँ एक न्यूरॉन पर | एक शंकु, एक न्यूरॉन |
| नतीजा | ज़्यादा संवेदनशीलता | ज़्यादा दृष्टि तीक्ष्णता (बारीकी) |
कई शलाकाओं के छोटे जनक विभव जुड़ जाते हैं (योग, summation) और मंद रोशनी में भी देहली पार हो जाती है — पर मस्तिष्क नहीं जान पाता कौन-सी शलाका पर रोशनी पड़ी, इसलिए चित्र कम साफ़।
हृदय गति का नियंत्रण
हृदय पेशी पेशीजनक (myogenic) है: धड़कन खुद शुरू करती है। धड़कन दाएँ आलिंद के SAN (शिरा-आलिंद पर्व, पेसमेकर) से शुरू होती है, आलिंदों पर फैलती है, AVN पर थोड़ा रुकती है, फिर हिस के बंडल और पर्किन्जे तंतुओं से निलयों में नीचे से ऊपर संकुचन कराती है।
मस्तिष्क का मेड्यूला गति बदलता है:
- महाधमनी और कैरोटिड धमनी के रसायन-ग्राही pH पहचानते हैं। व्यायाम → CO₂ ज़्यादा → pH कम → अनुकंपी तंत्रिका से ज़्यादा आवेग → SAN तेज़।
- दाब-ग्राही रक्तचाप पहचानते हैं। दबाव ज़्यादा → परानुकंपी (वेगस) तंत्रिका से आवेग → SAN धीमा।
यह ऋणात्मक पुनर्भरण (negative feedback) है।
करके देखो
घर पर चुनाव-कक्ष: एक डिब्बे के आधे में गीला कागज़, आधे में सूखा रखो। बीच में 10 चींटियाँ या छोटे कीड़े धीरे से रखो, ऊपर गहरा कपड़ा ढको, हर 2 मिनट पर दोनों तरफ़ गिनो। पहले अंदाज़ा लगाओ: कहाँ ज़्यादा होंगे? बाद में उन्हें बाहर छोड़ दो। 3D में: स्टेप 5 पर दबाव धीरे-धीरे बढ़ाओ। किस संख्या पर पहली बार आवेग जाता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- क्रम: उद्दीपन → ग्राही → समन्वयक → प्रभावक → अनुक्रिया
- अनुचलन = पूरे जीव की दिशा वाली गति; गतिकी = चाल/मुड़ना बदलना, दिशा नहीं
- अनुवर्तन = दिशा वाली वृद्धि; IAA: तने में दीर्घन ज़्यादा, जड़ में कम
- जनक विभव ≥ देहली → क्रिया विभव (सब-या-कुछ-नहीं)
- शलाका: संवेदनशीलता (योग); शंकु: दृष्टि तीक्ष्णता
- हृदय: SAN → आलिंद → AVN → हिस का बंडल → पर्किन्जे तंतु; मेड्यूला: अनुकंपी ↑, वेगस ↓
हल किए गए उदाहरण
1. चुनाव-कक्ष में 20 वुडलाउस रखे गए। 10 मिनट बाद 16 नम तरफ़ थे। समझाओ।
यह गतिकी है। सूखी हवा में वे तेज़ चले और ज़्यादा मुड़े, इसलिए सूखी जगह जल्दी छोड़ दी। नम हवा में धीमे हुए और वहीं रहे। इससे वे सूखने से बचते हैं।
2. तने के सिरे पर बाईं ओर से रोशनी है। क्या होगा?
IAA छाया वाली (दाईं) तरफ़ जाएगा, वहाँ कोशिकाएँ ज़्यादा लंबी होंगी, दायाँ भाग ज़्यादा बढ़ेगा, और तना बाईं ओर, रोशनी की तरफ़ मुड़ेगा।
3. मंद रोशनी में शलाका से दिखता है, पर बारीक अक्षर क्यों नहीं पढ़ पाते?
कई शलाकाएँ एक द्विध्रुवी न्यूरॉन से जुड़ी हैं। उनके छोटे जनक विभव जुड़कर देहली पार कर लेते हैं, इसलिए संवेदनशीलता ज़्यादा। पर मस्तिष्क नहीं जान पाता कौन-सी शलाका उत्तेजित हुई, इसलिए बारीकी कम।
4. दौड़ते समय खून में CO₂ बढ़ती है। हृदय गति कैसे बदलती है?
CO₂ से pH घटता है → रसायन-ग्राही मेड्यूला को ज़्यादा आवेग भेजते हैं → मेड्यूला अनुकंपी तंत्रिका से SAN को आवेग भेजता है → SAN तेज़ → हृदय गति बढ़ती है और CO₂ जल्दी हटती है।
आम गलतियाँ
- अनुचलन और गतिकी को मिला देना। अनुचलन में दिशा है; गतिकी में सिर्फ़ चाल और मुड़ना बदलता है।
- कहना कि IAA रोशनी की ओर जाता है। वह छाया वाली तरफ़ जाता है।
- कहना कि IAA हमेशा वृद्धि बढ़ाता है। जड़ में ज़्यादा IAA दीर्घन धीमा करता है।
- सोचना कि ज़्यादा दबाव से आवेग बड़ा होता है। जनक विभव बड़ा होता है, पर आवेग सब-या-कुछ-नहीं है; ज़्यादा दबाव से आवेग ज़्यादा बार आते हैं।