पर्यावरण और उसके कार्य
पर्यावरण यानी हमारे आसपास के सभी जीवित (पेड़-पौधे, जानवर, लोग) और निर्जीव (हवा, पानी, मिट्टी, धूप) तत्व और उनका आपसी संबंध।
चार कार्य
- संसाधन देना: नवीकरणीय (पेड़, मछली) और अनवीकरणीय (कोयला, तेल)।
- कचरा सोखना।
- जीवन चलाना: जैव-विविधता, साफ़ हवा-पानी।
- सुंदरता देना: प्राकृतिक दृश्य।
धारण क्षमता
पर्यावरण ये काम तभी कर सकता है जब (1) संसाधनों का दोहन उनके नवीकरण से धीमा हो और (2) कचरा उसकी अवशोषी क्षमता के भीतर हो। कोई नियम टूटे तो पर्यावरण संकट आता है।
धारणीय विकास क्या है?
संयुक्त राष्ट्र के ब्रुंटलैंड आयोग (1987) के अनुसार धारणीय विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की ज़रूरतें पूरी करे बिना भावी पीढ़ियों की अपनी ज़रूरतें पूरी करने की क्षमता घटाए।
हर्मन डेली के नियम (सरल शब्दों में)
- जनसंख्या उतनी रखें जितनी पर्यावरण सँभाल सके।
- संसाधन बचाने वाली तकनीक अपनाएँ।
- नवीकरणीय संसाधन उतनी ही तेज़ी से लें जितनी तेज़ी से वे फिर बनें।
- अनवीकरणीय संसाधन उतनी तेज़ी से लें जितनी तेज़ी से नवीकरणीय विकल्प बनें।
- प्रदूषण से हुए नुकसान को ठीक करें।
भारत में संसाधनों और पर्यावरण पर प्रभाव
भारत के पास उपजाऊ मिट्टी, नदियाँ, जंगल, खनिज और धूप है। पर तेज़ जनसंख्या वृद्धि, उद्योग और खेती ने इन पर भारी दबाव डाला है। शहरों में वायु प्रदूषण और सीवेज-कारख़ाना कचरे से जल प्रदूषण दो बड़ी समस्याएँ हैं।
- भूमि अपक्षय: वन कटना, झूम खेती, ज़्यादा चराई, ज़्यादा खाद, ख़राब सिंचाई (जलभराव, लवणता)।
- वन कटाई और जैव-विविधता हानि।
- वायु प्रदूषण: गाड़ियाँ, बिजलीघर, कारख़ाने, पराली जलाना।
- जल प्रदूषण और कमी: बिना साफ़ किया सीवेज; ज़्यादा पंपिंग से भूजल नीचे।
- ठोस कचरा: प्लास्टिक और ई-कचरा।
इस नुकसान की अवसर लागत ऊँची है: स्वास्थ्य और सफ़ाई पर ख़र्च विकास में लग सकता था।
वैश्विक उष्णता और ओज़ोन क्षय
वैश्विक उष्णता यानी धरती के निचले वायुमंडल के औसत तापमान का धीरे-धीरे बढ़ना। कोयला, तेल, गैस जलाने और जंगल काटने से ग्रीनहाउस गैसें (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि) बढ़ती हैं, जो कंबल की तरह गर्मी फँसाती हैं।
प्रभाव
- हिमनद और ध्रुवीय बर्फ़ पिघलना, समुद्र स्तर बढ़ना, तटों पर बाढ़।
- ज़्यादा लू, बाढ़ और सूखा।
- फ़सल उपज में बदलाव और रोगों का फैलना।
देशों ने उत्सर्जन घटाने पर समझौते किए: क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौता (2015)।
ओज़ोन क्षय
ऊपर की ओज़ोन परत हानिकारक पराबैंगनी किरणें रोकती है। CFC जैसे रसायन (पहले फ़्रिज-AC में) इसे पतला करते हैं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) ने CFC हटाए।
धारणीय विकास की रणनीतियाँ
- गैर-पारंपरिक ऊर्जा: कोयले की जगह सौर, पवन, लघु जल-विद्युत।
- स्वच्छ ईंधन: गाँवों में लकड़ी-उपले की जगह LPG और गोबर गैस; शहर की बसों में CNG।
- जैविक कंपोस्ट: केंचुओं से कचरे को खाद बनाना।
- जैविक कीट नियंत्रण: नीम, पक्षी, मित्र कीट।
- पारंपरिक ज्ञान: खेती, आयुर्वेद और जल-संचयन के भारतीय तरीके।
- कम करो, दोबारा उपयोग करो, पुनर्चक्रण करो; सार्वजनिक परिवहन; पानी बचाना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- धारणीय विकास: वर्तमान ज़रूरतें पूरी करना बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए (ब्रुंटलैंड, 1987)।
- धारण क्षमता: दोहन ≤ नवीकरण और कचरा ≤ अवशोषी क्षमता।
- अवशोषी क्षमता: पर्यावरण की कचरा/नुकसान सोखने की योग्यता।
- वैश्विक उष्णता: ग्रीनहाउस गैसों से धरती का औसत तापमान बढ़ना।
- पर्यावरण संकट: जब पर्यावरण पर माँग उसकी क्षमता से ज़्यादा हो।
हल किए गए उदाहरण
1. जंगल में 10,000 पेड़, हर साल 500 नए उगते, 800 कटते। 5 साल बाद कितने?
शुद्ध हानि 300/साल। 10,000 − 1,500 = 8,500। दोहन नवीकरण से ज़्यादा, धारणीय नहीं।
2. उसी जंगल में सालाना अधिकतम धारणीय कटाई?
500 पेड़ (नई वृद्धि के बराबर)।
3. नदी रोज़ 200 टन कचरा साफ़ कर सकती है। शहर 260 टन डालता है। क्या होगा?
60 टन रोज़ ज़्यादा, प्रदूषण जमा होगा। कम से कम 60 टन पहले साफ़ करना होगा।
4. एक परिवार रोज़ 10 किलो लकड़ी की जगह गोबर गैस अपनाता है। साल में कितनी लकड़ी बची?
10 × 365 = 3,650 किलो, और घर में धुआँ कम।
आम गलतियाँ
- धारणीय विकास को "विकास बंद" समझना।
- वैश्विक उष्णता और ओज़ोन क्षय को एक मानना।
- मान लेना कि नवीकरणीय संसाधन कभी ख़त्म नहीं होते।
- कचरा सोखने वाले कार्य को भूल जाना।