ग्रामीण विकास क्या है?
लगभग दो-तिहाई भारतीय गाँवों में रहते हैं और बहुत से खेती पर निर्भर हैं। ग्रामीण विकास यानी गाँव के लोगों का जीवन बेहतर करने के काम:
- मानव संसाधन: साक्षरता (ख़ासकर महिलाएँ), शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता;
- भूमि सुधार और स्थानीय संसाधनों का उपयोग;
- आधारिक संरचना: सड़क, बिजली, सिंचाई, साख, बाज़ार, शोध;
- गरीबी घटाना और तरह-तरह के काम देना।
1991 के बाद कृषि संवृद्धि धीमी हुई और गाँवों पर सरकारी ख़र्च घटा, इसलिए ग्रामीण विकास और ज़रूरी हो गया।
ग्रामीण साख
किसान को बीज, खाद और औज़ार पर फ़सल से बहुत पहले ख़र्च करना पड़ता है, इसलिए साख (कर्ज़) चाहिए। पहले साहूकार और व्यापारी बहुत ऊँचा ब्याज लेकर उसे कर्ज़ के जाल में फँसाते थे।
औपचारिक स्रोत
- व्यापारिक बैंक (1969 के राष्ट्रीयकरण के बाद गाँवों में शाखाएँ)।
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (1975 से)।
- सहकारी साख समितियाँ।
- नाबार्ड (1982): ग्रामीण साख की शीर्ष संस्था।
- स्वयं सहायता समूह (SHG): 10–20 सदस्य, ज़्यादातर महिलाएँ, थोड़ी बचत करके आपस में कर्ज़ देती हैं। यह सूक्ष्म साख है।
- किसान क्रेडिट कार्ड से जल्दी अल्पकालीन कर्ज़।
समस्याएँ
छोटे-सीमांत किसानों तक बैंक कम पहुँचते हैं; कर्ज़ वसूली कमज़ोर; कुछ कर्ज़ गैर-कृषि ख़र्च में जाता है; साहूकार अब भी आम हैं।
कृषि विपणन
कृषि विपणन यानी फ़सल इकट्ठा करने से लेकर भंडारण, श्रेणीकरण, पैकिंग, ढुलाई और बिक्री तक सब। अच्छे विपणन के बिना किसान को व्यापारी कम दाम देते हैं और तौल में धोखा करते हैं।
सरकार के कदम
- सही तौल और खुली बोली वाली नियंत्रित मंडियाँ।
- सड़क, गोदाम, शीत भंडार।
- सहकारी विपणन।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), FCI का बफ़र स्टॉक और सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
नए विपणन माध्यम
किसान सीधे ख़रीदार को बेचें: अपनी मंडी (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान), हडपसर मंडी (पुणे), रायतू बाज़ार (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना), उझावर संधाई (तमिलनाडु) और ऑनलाइन e-NAM। कंपनियों के साथ अनुबंध खेती भी।
सहकारिता
सहकारी समिति ऐसे लोगों का समूह है जो बराबरी से मिलकर साझा ज़रूरत पूरी करते हैं, लाभ बाँटते हैं और "एक सदस्य, एक वोट" मानते हैं। अकेला छोटा किसान कमज़ोर है; साथ मिलकर वह कर्ज़ ले सकता, सस्ता सामान ख़रीद सकता, भंडार और बिक्री कर सकता है।
- साख सहकारी समितियाँ सस्ता कर्ज़ देती हैं।
- विपणन सहकारी समितियाँ उपज सही दाम पर बेचती हैं।
- दूध सहकारिता (ऑपरेशन फ़्लड, गुजरात का मॉडल) से भारत दूध उत्पादन में आगे है।
कमज़ोरियाँ: ख़राब प्रबंधन, राजनीतिक दख़ल, बड़े किसानों का ज़्यादा लाभ लेना।
उत्पादक गतिविधियों का विविधीकरण
विविधीकरण के दो अर्थ: (1) फ़सलों का मेल बदलना और (2) मज़दूरों को खेती से दूसरे कामों में ले जाना। खेती अकेले जोखिम भरी है (मानसून) और रबी मौसम में कई लोगों को काम नहीं मिलता।
- पशुपालन: गाय-भैंस, बकरी, मुर्गी; डेयरी से रोज़ नकद।
- मत्स्य पालन: नदी-तालाब और समुद्र; बिक्री में महिलाएँ आगे।
- बागवानी: फल, सब्ज़ी, फूल, मसाले; प्रति एकड़ ज़्यादा कमाई।
- गैर-कृषि काम: खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, IT केंद्र, दुकान, पर्यटन।
धारणीय विकास और जैविक खेती
हरित क्रांति में रासायनिक खाद और कीटनाशक बहुत इस्तेमाल हुए। समय के साथ मिट्टी कमज़ोर हुई, पानी दूषित हुआ, लागत बढ़ी। जैविक खेती रासायनिक खाद-कीटनाशक के बिना, कंपोस्ट, हरी खाद, फ़सल चक्र और प्राकृतिक कीट नियंत्रण से होती है।
लाभ
- मिट्टी स्वस्थ, पानी साफ़।
- खेत पर बने सस्ते साधन; ज़्यादा श्रम, ज़्यादा रोज़गार।
- सुरक्षित भोजन; निर्यात माँग।
सीमाएँ
- शुरू के सालों में उपज घट सकती है।
- जागरूकता, प्रमाणन और बाज़ार चाहिए।
- जल्दी ख़राब होना और दुकान में ज़्यादा दाम।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ग्रामीण साख: गाँव के लोगों, मुख्यतः किसानों को कर्ज़।
- सूक्ष्म साख: स्वयं सहायता समूहों से छोटे कर्ज़।
- नाबार्ड: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (1982)।
- कृषि विपणन: उपज का संग्रह, भंडारण, श्रेणीकरण, ढुलाई और बिक्री।
- विविधीकरण: नई फ़सलें और गैर-कृषि काम।
- जैविक खेती: रासायनिक खाद-कीटनाशक के बिना खेती।
हल किए गए उदाहरण
1. किसान ₹10,000 एक साल के लिए लेता है। साहूकार 5% प्रति माह, बैंक 7% प्रति वर्ष लेता है। ब्याज कितना?
साहूकार: 5% × 12 = 60% → ₹6,000। बैंक: ₹700। औपचारिक साख से ₹5,300 बचे।
2. शहर में टमाटर ₹40/किलो। तीन बिचौलियों से किसान को ₹10/किलो; रायतू बाज़ार में ₹30/किलो। 200 किलो पर लाभ?
(30 − 10) × 200 = ₹4,000 ज़्यादा।
3. 15 महिलाओं का SHG, हर एक ₹100 महीना बचाती है। एक साल में कोष?
15 × 100 × 12 = ₹18,000।
4. परिवार की गेहूँ से आय अच्छे साल ₹60,000, सूखे में ₹20,000। डेयरी से हर साल ₹30,000 जोड़े। अब सूखे वाले साल की आय?
20,000 + 30,000 = ₹50,000। विविधीकरण ख़राब मानसून से बचाता है।
आम गलतियाँ
- ग्रामीण विकास को सिर्फ़ खेती समझना।
- साहूकार को औपचारिक साख मानना।
- मान लेना कि जैविक खेती तुरंत ज़्यादा उपज देती है।
- विविधीकरण को सिर्फ़ फ़सल बदलना समझना; गैर-कृषि काम भी शामिल है।