श्रमिक और कार्यबल सहभागिता
श्रमिक वह है जो देश के उत्पादन (GDP) में जुड़ने वाला आर्थिक काम करता है, वेतन पर या अपने खेत-दुकान पर। परिवार के खेत पर बिना वेतन मदद भी गिनी जाती है।
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात
= (श्रमिक ÷ कुल जनसंख्या) × 100। यह गाँवों में शहरों से ज़्यादा है (गरीब परिवारों में सबको काम करना पड़ता है, शहर के युवा ज़्यादा पढ़ते हैं)। महिलाओं का अनुपात कम है, क्योंकि उनका घरेलू काम आर्थिक गतिविधि में नहीं गिना जाता।
श्रम बल और कार्यबल
श्रम बल = काम करने वाले + काम ढूँढने वाले। कार्यबल = सिर्फ़ काम करने वाले। बेरोज़गार = श्रम बल − कार्यबल।
स्वनियोजित और भाड़े के श्रमिक
- स्वनियोजित: अपना खेत, दुकान या कारोबार (भारत में सबसे बड़ा समूह, लगभग आधे)।
- भाड़े के श्रमिक: दूसरों के लिए मज़दूरी पर काम।
- नियमित वेतनभोगी: हर महीने तय वेतन, अक्सर सुविधाएँ।
- अनियत दिहाड़ी: रोज़-रोज़ रखे जाते, कल काम की गारंटी नहीं।
गाँवों में स्वनियोजित और अनियत ज़्यादा; शहरों में नियमित वेतनभोगी ज़्यादा।
क्षेत्रों में श्रमिक
प्राथमिक क्षेत्र (खेती, मछली, खनन) में अब भी सबसे ज़्यादा लोग हैं, हालाँकि हिस्सा घटा है। उद्योग और सेवा में श्रमिक बढ़े, पर उत्पादन जितनी तेज़ी से नहीं।
औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र
औपचारिक (संगठित) क्षेत्र: सारे सार्वजनिक क्षेत्र के काम और 10 या ज़्यादा भाड़े के श्रमिकों वाली निजी फ़र्में। तय वेतन, भविष्य निधि, छुट्टी, ट्रेड यूनियन; श्रम क़ानून रक्षा करते हैं।
अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्र: खेत, छोटी दुकानें, 10 से कम श्रमिकों वाली फ़र्में, फेरीवाले, घर से काम, दिहाड़ी। नौकरी और सामाजिक सुरक्षा नहीं, अक्सर कम वेतन। लगभग दस में से नौ भारतीय श्रमिक अनौपचारिक हैं।
अनौपचारीकरण
1990 के दशक से बड़ी फ़र्में भी ठेके या दिहाड़ी पर रखती हैं। अनौपचारिक काम का यह बढ़ना अनौपचारीकरण (दिहाड़ी बढ़े तो अनियतीकरण) है।
सरकार ने असंगठित श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (जैसे ई-श्रम पंजीकरण, पेंशन योजनाएँ) बनाई हैं।
समस्याएँ: बेरोज़गारी और रोज़गारविहीन संवृद्धि
बेरोज़गारी: जो लोग मौजूदा मज़दूरी पर काम करना चाहते और कर सकते हैं, उन्हें काम न मिलना।
- खुली बेरोज़गारी: साफ़ तौर पर बिना काम (पढ़े-लिखे शहरी युवा)।
- प्रच्छन्न बेरोज़गारी: काम पर ज़रूरत से ज़्यादा लोग; कुछ हटें तो उत्पादन नहीं घटता।
- मौसमी बेरोज़गारी: कुछ महीनों में काम नहीं।
रोज़गारविहीन संवृद्धि: GDP बढ़े पर रोज़गार धीरे बढ़े, क्योंकि संवृद्धि मशीनों और कुशल सेवाओं से आती है। दूसरी समस्याएँ: अनियतीकरण, कम मज़दूरी, महिलाओं के लिए कम काम, कौशल और काम का मेल न होना।
रोज़गार के लिए सरकारी नीतियाँ
- सीधा रोज़गार सृजन: सरकार अपने दफ़्तरों और परियोजनाओं में लोगों को रखती है। मनरेगा (2005) हर माँगने वाले ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन का काम देता है, तालाब, सड़क जैसी संपत्तियाँ बनती हैं।
- अप्रत्यक्ष सृजन: सरकारी फ़र्म ज़्यादा बनाती है तो निजी आपूर्तिकर्ता भी ज़्यादा लोग रखते हैं।
- स्वरोज़गार और गरीबी कार्यक्रम: छोटे कारोबार के लिए कर्ज़ और प्रशिक्षण (PMEGP, मुद्रा), SHG के लिए आजीविका मिशन।
- कौशल विकास: स्किल इंडिया, प्रशिक्षुता योजनाएँ।
- आधारिक संरचना: सड़क, बिजली, आवास से काम बनता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- श्रमिक-जनसंख्या अनुपात = (श्रमिक ÷ कुल जनसंख्या) × 100
- श्रम बल = रोज़गार वाले + काम ढूँढने वाले
- बेरोज़गार = श्रम बल − कार्यबल
- बेरोज़गारी दर = (बेरोज़गार ÷ श्रम बल) × 100
- औपचारिक क्षेत्र: सार्वजनिक क्षेत्र + 10 या ज़्यादा भाड़े के श्रमिकों वाली निजी फ़र्में
हल किए गए उदाहरण
1. गाँव की जनसंख्या 2,000, श्रमिक 760। श्रमिक-जनसंख्या अनुपात?
760 ÷ 2,000 × 100 = 38%।
2. श्रम बल 500, कार्यबल 460। बेरोज़गार और बेरोज़गारी दर?
500 − 460 = 40; 40 ÷ 500 × 100 = 8%।
3. खेत पर 3 लोग चाहिए, 6 परिवारजन काम करते हैं। 3 हटें तो उत्पादन वही। कितने प्रच्छन्न बेरोज़गार?
6 − 3 = 3।
4. 200 श्रमिकों में 104 स्वनियोजित, 46 नियमित, बाकी अनियत। प्रतिशत?
अनियत = 50। स्व 52%, नियमित 23%, अनियत 25%।
5. दुकान में 7 भाड़े के श्रमिक, कारख़ाने में 25। औपचारिक कौन?
कारख़ाना (10 या ज़्यादा)। दुकान अनौपचारिक।
6. GDP 7% सालाना, रोज़गार 1%। इसे क्या कहते हैं?
रोज़गारविहीन संवृद्धि; उत्पादन मशीनों और कुशल सेवाओं से बढ़ा।
आम गलतियाँ
- सिर्फ़ वेतन वाले काम को काम मानना।
- श्रम बल और कार्यबल को एक समझना।
- बड़ी कंपनी के हर श्रमिक को औपचारिक मानना; ठेके वाले अक्सर अनौपचारिक।
- प्रच्छन्न और मौसमी बेरोज़गारी में भ्रम।