आर्थिक प्रणालियों के प्रकार
हर अर्थव्यवस्था तीन सवालों के जवाब देती है: क्या उत्पादन हो, कैसे हो, और किसके लिए।
- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था: बाज़ार तय करता है। वस्तुएँ उन्हें मिलती हैं जो कीमत चुका सकें। निजी लाभ प्रेरणा है।
- समाजवादी अर्थव्यवस्था: सरकार लोगों की ज़रूरत के हिसाब से तय करती है। निजी संपत्ति कम।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: दोनों साथ। ज़्यादातर वस्तुएँ बाज़ार देता है; मुख्य क्षेत्र और न्याय सरकार देखती है।
नेहरू के नेतृत्व में भारत ने मज़बूत सार्वजनिक क्षेत्र वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था, समाजवादी ढंग का समाज और योजना आयोग (1950) की योजनाएँ चुनीं। (2015 में इसकी जगह नीति आयोग बना।)
पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य
योजना बताती है कि तय समय में लक्ष्य पाने के लिए संसाधन कैसे लगें। पहली योजना 1951 में शुरू हुई। दीर्घकालीन लक्ष्य:
- संवृद्धि: ज़्यादा वस्तुएँ और सेवाएँ, बढ़ता GDP। इसके लिए ज़्यादा पूँजी, अच्छा परिवहन और बैंकिंग चाहिए।
- आधुनिकीकरण: उत्पादन में नई तकनीक और नई सोच, जैसे महिलाओं के बराबर अधिकार।
- आत्मनिर्भरता: विदेशों पर, ख़ासकर अनाज के लिए, निर्भरता न हो ताकि कोई शर्तें न थोपे।
- समानता: विकास का लाभ गरीबों तक पहुँचे: सबको भोजन, अच्छा घर, शिक्षा और स्वास्थ्य।
दूसरी योजना (पी.सी. महालनोबिस) ने भारी उद्योगों पर ज़ोर दिया।
कृषि: संस्थागत सुधार और नई रणनीति
संस्थागत सुधार (भूमि सुधार)
- बिचौलियों का उन्मूलन: ज़मींदार हटाए गए, लगभग 200 लाख काश्तकार सीधे सरकार से जुड़े।
- जोतने वाले को ज़मीन: जो खेती करे वही मालिक बने, ताकि वह निवेश करे।
- भूमि की उच्चतम सीमा: एक व्यक्ति कितनी ज़मीन रख सकता है उसकी सीमा; अतिरिक्त ज़मीन भूमिहीनों को। केरल और पश्चिम बंगाल में सफल, बाकी जगह कमियों से असफल।
नई कृषि रणनीति: हरित क्रांति
1960 के दशक के मध्य से गेहूँ और चावल के उच्च उपज वाले (HYV) बीज, पक्की सिंचाई, खाद और कीटनाशक के साथ।
- पहला चरण (1960 मध्य से 1970 मध्य): मुख्य रूप से पंजाब, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु।
- दूसरा चरण (1970 मध्य से 1980 मध्य): और राज्यों और फ़सलों तक।
- लाभ: भारत अनाज में आत्मनिर्भर बना; विपणित अधिशेष बाज़ार में आया; गरीबों के लिए कीमतें घटीं; सरकार ने बफ़र स्टॉक बनाया।
- चिंताएँ: शुरू में अमीर किसानों को ज़्यादा लाभ; कीटों का ख़तरा; रसायन और पानी का ज़्यादा उपयोग। सरकार ने सस्ते ऋण और खाद पर सब्सिडी दी ताकि छोटे किसान भी लाभ पाएँ।
सब्सिडी पर बहस
सब्सिडी ने छोटे किसानों को नई तकनीक अपनाने में मदद की, पर आलोचक कहते हैं कि बाद में इसका लाभ अमीर किसानों और खाद कंपनियों को ज़्यादा मिला और बजट पर बोझ बढ़ा।
उद्योग: IPR 1956 और लघु उद्योग
1950 में निजी उद्योगों के पास पूँजी और बाज़ार कम था, इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र को अगुवाई मिली।
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956
- अनुसूची A: 17 उद्योग केवल सरकार के (जैसे हथियार, परमाणु ऊर्जा, रेल)।
- अनुसूची B: नई इकाइयाँ सरकार लगाए; निजी क्षेत्र सहायक।
- अनुसूची C: बाकी निजी क्षेत्र के लिए, पर लाइसेंस से सरकारी नियंत्रण।
- लाइसेंस से उद्योग पिछड़े क्षेत्रों में लगवाए गए और उत्पादन की मात्रा नियंत्रित हुई।
लघु उद्योग
1955 में कर्वे समिति ने ग्रामीण विकास के लिए लघु उद्योगों का सुझाव दिया। लघु इकाई की पहचान मशीनरी में अधिकतम निवेश से होती है। उन्हें कम कर, सस्ते ऋण जैसी छूट मिली और कई वस्तुएँ उनके लिए आरक्षित रहीं। ये श्रम-प्रधान हैं, इसलिए कम पूँजी में ज़्यादा रोज़गार देते हैं।
घर पर करके देखें
घर की तीन चीज़ें लिखिए जो छोटी इकाइयाँ बनाती हैं (अचार, साबुन, चप्पल)। उन्हें बड़ी कंपनियों से संरक्षण क्यों चाहिए?
विदेशी व्यापार: आयात प्रतिस्थापन
भारत ने अंतर्मुखी व्यापार नीति अपनाई, जिसे आयात प्रतिस्थापन कहते हैं: जो आयात होता था उसे देश में बनाना।
- प्रशुल्क: आयात पर कर, विदेशी माल महँगा।
- कोटा: आयात की मात्रा की सीमा।
- उद्देश्य: नए भारतीय उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना और विदेशी मुद्रा बचाना।
उद्योग पर प्रभाव
1950–51 से 1990–91 के बीच GDP में उद्योग का हिस्सा लगभग 11.8% से 24.6% हुआ, और उद्योग लगभग 6% प्रति वर्ष बढ़े। भारत कई तरह की वस्तुएँ बनाने लगा। पर कई सरकारी कंपनियाँ घाटे में रहीं, लाइसेंस से देरी और भ्रष्टाचार ('लाइसेंस-परमिट राज') बढ़ा, संरक्षण से कंपनियाँ अकुशल और गुणवत्ता कम रही। निर्यात कमज़ोर रहा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: मिश्रित अर्थव्यवस्था: बाज़ार + सरकार साथ
- योजना के लक्ष्य: संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, समानता
- भूमि की उच्चतम सीमा: एक व्यक्ति की अधिकतम ज़मीन
- HYV बीज: हरित क्रांति के उच्च उपज वाले बीज
- विपणित अधिशेष: बाज़ार में बेची गई उपज
- IPR 1956: अनुसूची A (केवल सरकार), B (सरकार आगे), C (निजी, लाइसेंस से)
- आयात प्रतिस्थापन: शुल्क व कोटा से आयात की जगह देशी उत्पादन
हल किए गए उदाहरण
1. भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था क्यों चुनी?
केवल बाज़ार गरीबों और मुख्य क्षेत्रों की अनदेखी कर सकता है, केवल सरकारी नियंत्रण आज़ादी और कुशलता घटाता है। मिश्रण में निजी कंपनियाँ ज़्यादातर माल बनाती हैं और सरकार बुनियादी उद्योग और न्याय देखती है।
2. संवृद्धि के साथ समानता क्यों ज़रूरी है?
GDP बढ़े पर गरीब गरीब ही रहें, ऐसा हो सकता है। समानता से भोजन, घर, शिक्षा, स्वास्थ्य सब तक पहुँचते हैं।
3. 'जोतने वाले को ज़मीन' से उत्पादकता कैसे बढ़ी?
जब किसान ज़मीन का मालिक होता है तो सुधार का लाभ उसे मिलता है, इसलिए वह कुएँ, बीज और देखभाल में ज़्यादा लगाता है।
4. अनाज उत्पादन 1950 में लगभग 51 से 1990 में 176 मिलियन टन हुआ। कितने गुना?
176 ÷ 51 ≈ 3.5 गुना।
5. लघु उद्योगों को संरक्षण क्यों मिला?
वे श्रम-प्रधान हैं, कम पूँजी में ज़्यादा रोज़गार देते हैं और गाँवों तक उद्योग फैलाते हैं। वरना बड़ी कंपनियाँ उन्हें ख़त्म कर देतीं।
6. आयात प्रतिस्थापन का एक अच्छा और एक बुरा प्रभाव बताइए।
अच्छा: भारतीय उद्योग बढ़े और कई वस्तुएँ देश में बनीं। बुरा: प्रतिस्पर्धा न होने से कंपनियाँ अकुशल रहीं, गुणवत्ता कम।
आम गलतियाँ
- कहना कि भूमि सीमा हर जगह सफल रही। यह मुख्य रूप से केरल और पश्चिम बंगाल में सफल रही।
- मानना कि हरित क्रांति ने सभी फ़सलों को बराबर लाभ दिया। शुरू में मुख्य रूप से गेहूँ और चावल।
- लिखना कि IPR 1956 ने निजी उद्योग पर रोक लगाई। अनुसूची C निजी क्षेत्र के लिए खुली थी, लाइसेंस के साथ।
- आयात प्रतिस्थापन को निर्यात प्रोत्साहन समझना। इसने देशी उद्योग को आयात से बचाया।