मूल आर्थिक समस्या: क्या, कैसे और किसके लिए
ज़मीन, मज़दूर, मशीनें और पैसा दुर्लभ (सीमित) हैं। सबकी हर इच्छा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए चुनना पड़ता है।
- क्या बनाएँ? ज़्यादा अनाज या ज़्यादा फ़ोन?
- कैसे बनाएँ? ज़्यादा मज़दूरों से या मशीनों से?
- किसके लिए? जो ज़्यादा पैसा दे, जिसे ज़्यादा ज़रूरत हो, या सबको बराबर?
समाज इन तीन सवालों का जवाब जिस तरीके से देता है, उसे आर्थिक प्रणाली कहते हैं। असली अंतर यह है कि फ़ैसला कौन करता है।
पारंपरिक अर्थव्यवस्था
यहाँ रीति-रिवाज और आदत तय करते हैं। मछुआरे का बच्चा मछुआरा बनता है। चीज़ें पुराने नियमों से बँटती हैं, अक्सर अदला-बदली (वस्तु विनिमय) से। यह स्थिर है पर धीरे बदलती है। आज भी कुछ छोटे खेतिहर, पशुपालक या वन समुदायों में दिखती है।
बाज़ार अर्थव्यवस्था और पूँजीवाद
बाज़ार अर्थव्यवस्था (मुक्त बाज़ार) में ज़मीन, कारखाने और दुकानें निजी लोगों और कंपनियों की होती हैं। वही तय करते हैं क्या बनेगा। कीमतें संकेत हैं: किसी चीज़ की माँग बढ़े तो कीमत बढ़ती है, और कंपनियाँ मुनाफ़ा कमाने के लिए उसे ज़्यादा बनाती हैं।
इसी पर बनी व्यवस्था को पूँजीवाद कहते हैं: निजी संपत्ति, मुक्त बाज़ार, प्रतिस्पर्धा और मुनाफ़ा।
फ़ायदे
- बहुत विकल्प और नए आविष्कार, क्योंकि कंपनियाँ आपस में होड़ करती हैं।
- साधन जल्दी उन चीज़ों में लगते हैं जो लोग चाहते हैं।
आलोचना
- असमानता: जिनके पास पैसा कम, उनकी आवाज़ कम।
- कुछ कंपनियाँ मुनाफ़े के लिए प्रदूषण या मज़दूरों की सुरक्षा की अनदेखी करती हैं।
- सड़क की बत्ती या रक्षा जैसी सार्वजनिक वस्तुएँ नहीं बनतीं, क्योंकि इनके लिए हर उपयोगकर्ता से पैसा नहीं लिया जा सकता।
- तेज़ी और मंदी से लोगों की नौकरी जा सकती है।
कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों ने कहा कि मज़दूर को उसके बनाए मूल्य का पूरा हिस्सा नहीं मिलता। एडम स्मिथ जैसे विचारकों ने कहा कि मुक्त बाज़ार एक "अदृश्य हाथ" की तरह समाज का भला करता है।
आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था और समाजवाद
आदेश अर्थव्यवस्था (नियोजित अर्थव्यवस्था) में ज़्यादातर ज़मीन और कारखाने सरकार के होते हैं। योजना आयोग जैसा दफ़्तर तय करता है कि क्या, कितना बनेगा, कौन कहाँ काम करेगा और कीमत क्या होगी।
समाजवाद यह विचार है कि उत्पादन के मुख्य साधन समाज (अक्सर सरकार) के हों, ताकि धन का बँटवारा न्यायपूर्ण हो। कई समाजवादी कुछ बाज़ार भी मानते हैं; पूरी तरह नियोजित अर्थव्यवस्था इसका सख़्त रूप है।
फ़ायदे
- सबके लिए रोज़गार, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान।
- अमीर-गरीब का अंतर कम करने का लक्ष्य।
कमियाँ
- योजना बनाने वाले हर व्यक्ति की इच्छा नहीं जान सकते, इसलिए कुछ चीज़ों की कमी और कुछ की बर्बादी।
- नए विचार और मेहनत का इनाम कम, गुणवत्ता गिर सकती है।
- सरकार के हाथ में बहुत ज़्यादा ताकत।
सोवियत संघ (1917–1991) सबसे बड़ी नियोजित अर्थव्यवस्था था। बाद में ज़्यादातर नियोजित अर्थव्यवस्थाओं ने बाज़ार को जगह दी।
मिश्रित अर्थव्यवस्था: आज के ज़्यादातर देश
मिश्रित अर्थव्यवस्था में दोनों होते हैं। निजी क्षेत्र मुनाफ़े के लिए ज़्यादातर सामान बनाता है। सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार) जन-सेवाएँ देता है, कुछ ज़रूरी उद्योग चलाता है, और सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा व पर्यावरण के नियम बनाता है। वह कर लेता है और पेंशन जैसी मदद देता है।
- सामाजिक बाज़ार अर्थव्यवस्था (जैसे जर्मनी): मुक्त बाज़ार के साथ मज़बूत सामाजिक सुरक्षा और मज़दूरों की भागीदारी।
- नॉर्डिक मॉडल (स्वीडन, डेनमार्क): बाज़ार के साथ ऊँचे कर और मुफ़्त शिक्षा व इलाज।
- भारत: 1947 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं और बड़े सरकारी उद्योगों वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था; 1991 के सुधारों के बाद निजी कारोबार और व्यापार को ज़्यादा जगह।
- चीन: सरकार के नेतृत्व वाली "समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था", जिसमें बहुत सी निजी कंपनियाँ भी हैं।
आज की बहस संतुलन पर है: सरकार कितना कर ले, कितने नियम बनाए, जलवायु की रक्षा कैसे करे, और तकनीक से नौकरियाँ बदलें तो लोगों की मदद कैसे करे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आर्थिक प्रणाली = समाज का तरीका जिससे वह क्या, कैसे और किसके लिए का जवाब देता है
- पारंपरिक अर्थव्यवस्था = रीति-रिवाज और आदत से फ़ैसले
- बाज़ार अर्थव्यवस्था = निजी मालिक कीमत और मुनाफ़े से तय करते हैं
- आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था = सरकार की योजना से फ़ैसले
- मिश्रित अर्थव्यवस्था = निजी क्षेत्र + सार्वजनिक क्षेत्र
- पूँजीवाद = निजी संपत्ति + बाज़ार + मुनाफ़ा
- समाजवाद = सामाजिक या सरकारी स्वामित्व + न्यायपूर्ण बँटवारे का लक्ष्य
- सार्वजनिक वस्तु = जिसे सब इस्तेमाल करें और बाज़ार खुद न बनाए (सड़क की बत्ती, रक्षा)
हल किए गए उदाहरण
1. सरकार ब्रेड की अधिकतम कीमत तय करती है और हर शहर में कितनी बेकरी खुलेंगी यह भी तय करती है। यह किस प्रणाली का लक्षण है?
यहाँ कीमत नहीं, सरकार तय कर रही है कि कितना बनेगा और किस कीमत पर। यह आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था का लक्षण है।
2. हर साल फ़ोन सस्ते होते हैं और नए ब्रांड आते हैं। बाज़ार प्रणाली से समझाओ।
कंपनियाँ ग्राहकों के लिए होड़ करती हैं। बिक्री बढ़ाने के लिए कीमत घटाती हैं और नई सुविधाएँ जोड़ती हैं। प्रतिस्पर्धा और मुनाफ़े की चाह विकल्प और नवाचार लाती है।
3. शुद्ध बाज़ार अर्थव्यवस्था सड़क की बत्ती क्यों नहीं लगाती?
बत्ती जलने पर सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति उसका फ़ायदा लेता है, सिर्फ़ उपयोग करने वालों से पैसा नहीं लिया जा सकता। कोई कंपनी इससे मुनाफ़ा नहीं कमा सकती, इसलिए सरकार इसे लगाती है।
4. आज के भारत को वर्गीकृत करो और दो प्रमाण दो।
भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था है। प्रमाण 1: ज़्यादातर सामान और सेवाएँ निजी कंपनियाँ देती हैं (फ़ोन, कार, दुकानें)। प्रमाण 2: रेलवे, सरकारी स्कूल और अस्पताल सरकार चलाती है और कुछ ज़रूरी चीज़ों की कीमतें नियंत्रित करती है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि पूँजीवाद में सरकार होती ही नहीं। बाज़ार अर्थव्यवस्था में भी अदालत, पुलिस और संपत्ति की रक्षा के कानून होते हैं।
- समाजवाद और आदेश अर्थव्यवस्था को बिल्कुल एक मान लेना। समाजवाद साझा स्वामित्व का लक्ष्य है; पूरी योजना उसे पाने का एक सख़्त तरीका है।
- किसी देश को 'शुद्ध' बाज़ार या 'शुद्ध' आदेश अर्थव्यवस्था कहना। लगभग हर देश मिश्रित है, बस संतुलन अलग है।
- सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार का) और 'जनता' (आम लोग) को एक समझ लेना।