Ukraine 10 клас Economics (profile level)
अध्याय: 2
1. Fundamental concepts of economics
Economics as a science (5 h) · Main economic phenomena (8 h) · Consumer, needs and interests (7 h) · Scarcity and producer choice (8 h) · Property relations (3 h) · Economic systems and circular flow (4 h)
- अर्थशास्त्र की मूल बातें: लोग, फ़र्में और सरकार कैसे चुनते हैं – अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो देखता है कि लोग, फ़र्में और सरकारें सीमित संसाधनों से असीमित इच्छाएँ कैसे पूरी करते हैं। आवश्यकताएँ वस्तुओं और सेवाओं से पूरी होती हैं (मुफ़्त बनाम आर्थिक वस्तुएँ, उपभोक्ता बनाम पूँजीगत वस्तुएँ, निजी बनाम सार्वजनिक वस्तुएँ)। दुर्लभता के कारण हर समाज तय करता है: क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। तीन आर्थिक इकाइयाँ हैं: परिवार (काम, उपभोग, बचत), फ़र्में (उत्पादन और बिक्री; लाभ = आय − लागत) और सरकार (नियम, कर, सार्वजनिक सेवाएँ)। अर्थशास्त्र अवलोकन, मॉडल और सांख्यिकी का उपयोग करता है; यह व्यष्टि (एक परिवार, फ़र्म, बाज़ार) और समष्टि (पूरी अर्थव्यवस्था: GDP, बेरोज़गारी, महँगाई, चक्र) में बँटा है। सामाजिक लक्ष्य: विकास, पूर्ण रोज़गार, स्थिर कीमतें, न्यायपूर्ण बँटवारा और टिकाऊपन।
- उत्पादन के साधन: भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यम – उत्पादन के साधन वे संसाधन हैं जिनसे वस्तुएँ और सेवाएँ बनती हैं। ये चार हैं: भूमि (प्राकृतिक संसाधन, पुरस्कार किराया/लगान), श्रम (मानव मेहनत, पुरस्कार मज़दूरी), पूँजी (इंसान के बनाए औज़ार-मशीनें, पुरस्कार ब्याज) और उद्यम (बाक़ी को जोड़ना और जोखिम उठाना, पुरस्कार लाभ)। इच्छाएँ असीमित और संसाधन सीमित हैं, इसलिए हर समाज को चुनना पड़ता है कि क्या, कैसे और किसके लिए बनाए। आर्थिक गतिविधि का उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा इच्छाएँ पूरी करना है।
- व्यष्टि अर्थशास्त्र का परिचय और उत्पादन संभावना वक्र – व्यष्टि अर्थशास्त्र एक खरीदार या एक फ़र्म जैसी छोटी इकाइयों को पढ़ता है; समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को। संसाधन दुर्लभ हैं और उनके कई उपयोग हैं, इसलिए हर अर्थव्यवस्था को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। उत्पादन संभावना वक्र (PPC) दो वस्तुओं के वे सबसे अच्छे मेल दिखाता है जो सारे संसाधन पूरे लगाने पर बन सकते हैं। इस पर चलने की एक अवसर लागत होती है जो आम तौर पर बढ़ती है, इसलिए वक्र अवतल होता है।
- संपत्ति क़ानून: स्वामित्व और संपत्ति के अधिकार – स्वामित्व (ownership) किसी चीज़ पर सबसे मज़बूत अधिकार है। इसमें तीन शक्तियाँ होती हैं: चीज़ को अपने पास रखना (कब्ज़ा), उसका इस्तेमाल करना और उससे कमाना, और उसे बेचना, देना या बदलना (निपटान)। संपत्ति निजी, साझा, सहकारी या सार्वजनिक हो सकती है। क़ानून मालिक की रक्षा करता है, पर सीमाएँ भी हैं: दूसरों को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, और सार्वजनिक ज़रूरत के लिए राज्य उचित मुआवज़ा देकर संपत्ति ले सकता है।
- आर्थिक प्रणालियाँ: क्या, कैसे और किसके लिए, कौन तय करता है? – हर समाज के पास साधन सीमित हैं, इसलिए उसे तय करना पड़ता है कि क्या बनाए, कैसे बनाए और किसके लिए। पारंपरिक अर्थव्यवस्था में रीति-रिवाज, बाज़ार अर्थव्यवस्था में कीमतें और निजी फ़ैसले, और आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था में सरकार की योजना यह तय करती है। पूँजीवाद निजी संपत्ति और बाज़ार पर टिका है; समाजवाद साझा या सरकारी स्वामित्व और योजना पर। असली देश मिश्रित हैं: ज़्यादातर चीज़ें बाज़ार बनाता है, और सरकार जन-सेवाएँ, नियम और सहायता देती है।
2. Fundamental processes of the market economy
Market answers to what, how, for whom (7 h) · Money in the market economy (7 h) · Demand, supply and market price (8 h) · Elasticity of demand and supply (8 h) · Market structure: different markets (7 h) · Incomes in the market economy (8 h) · Market infrastructure (10 h)
- मुद्रा और साख – मुद्रा विनिमय का माध्यम है जो आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म करती है। बैंक जमा लेते और कर्ज़ देते हैं। साख (ऋण) शर्तों के हिसाब से आगे बढ़ा भी सकती है या कर्ज़ में फँसा भी सकती है। बैंक और सहकारी समितियों के औपचारिक ऋण सस्ते और नियंत्रित हैं; साहूकारों के अनौपचारिक ऋण महँगे हैं। स्वयं सहायता समूह गरीब महिलाओं तक सस्ता ऋण पहुँचाते हैं।
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
- माँग और माँग की कीमत लोच – माँग = किसी समय में हर कीमत पर खरीदार जितनी वस्तु खरीदना चाहते और खरीद सकते हैं। बाज़ार माँग हर कीमत पर सब खरीदारों की माँग का जोड़ है। माँग अपनी कीमत, आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि, उम्मीदों और खरीदारों की संख्या पर निर्भर है। अपनी कीमत बदलने पर वक्र पर संचलन होता है; किसी और कारक से वक्र खिसकता है। माँग की कीमत लोच (Ed) = मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन; इसे कुल व्यय से भी पहचान सकते हैं।
- साधन बाज़ार: फर्में भूमि, श्रम और पूंजी कैसे लेती हैं – साधन बाज़ार वह जगह है जहाँ फर्में उत्पादन के साधन खरीदती हैं: भूमि (लगान), श्रम (मज़दूरी), पूंजी (ब्याज) और उद्यम (लाभ)। किसी साधन की मांग उस वस्तु की मांग से निकलती है जिसे वह बनाता है – इसे व्युत्पन्न मांग कहते हैं। लाभ अधिकतम करने वाली फर्म साधन को तब तक रखती है जब तक सीमांत आय उत्पाद (MRP = MP × MR) सीमांत साधन लागत (MRC) के बराबर न हो जाए। प्रतियोगी बाज़ार में MRC = मज़दूरी; मोनोप्सनी (एक ही खरीदार) में MRC मज़दूरी से ऊपर होता है, इसलिए वह कम लोग रखती है और कम मज़दूरी देती है।
- आय असमानता – आय असमानता का मतलब है कि लोगों के बीच आय बराबर नहीं बँटी है। अर्थशास्त्री लोगों को सबसे ग़रीब से सबसे अमीर तक क्रम में रखकर 20-20% के पाँच समूहों (पंचमक, quintiles) में बाँटते हैं और उनके हिस्से की तुलना करते हैं। लॉरेंज़ वक्र लोगों के संचयी % के सामने आय का संचयी % दिखाता है; यह समानता की सीधी रेखा से जितना ज़्यादा झुके, असमानता उतनी ज़्यादा। गिनी गुणांक = A ÷ (A + B) इसे 0 (पूरी समानता) से 1 (सारी आय एक व्यक्ति के पास) के बीच एक संख्या बना देता है। संपत्ति (जो तुम्हारे पास है) आमतौर पर आय (जो तुम कमाते हो) से ज़्यादा असमान होती है। सरकार प्रगतिशील कर, सहायता, न्यूनतम मज़दूरी और मुफ़्त शिक्षा-स्वास्थ्य से असमानता घटाती है।
- वित्तीय क्षेत्र: बैंक, बीमा और बाज़ार – वित्तीय क्षेत्र में वे सारी संस्थाएँ हैं जो पैसे का काम करती हैं: बैंक और सहकारी समितियाँ, बीमा कंपनियाँ, और शेयर बाज़ार व बॉन्ड बाज़ार जैसे वित्तीय बाज़ार। इसका मुख्य काम है बचतकर्ताओं (जिनके पास बचा पैसा है) को उधारकर्ताओं (जिन्हें पैसा चाहिए) से जोड़ना। बैंक जमा लेते हैं, ब्याज देते हैं और ज़्यादा ब्याज पर उधार देते हैं। बीमा कंपनियाँ बहुत लोगों से छोटा प्रीमियम लेकर कुछ नुकसान वालों को भुगतान करती हैं, यानी जोखिम बँटता है। वित्तीय बाज़ार में कंपनियाँ और सरकारें शेयर और बॉन्ड बेचकर पैसा जुटाती हैं। यह क्षेत्र भुगतान (कार्ड, UPI) और मुद्रा बदलने का काम भी करता है। यह ज़रूरी है क्योंकि यह बचत को निवेश में बदलता है, जिससे फ़ैक्ट्रियाँ, घर और नौकरियाँ बनती हैं। 2008 जैसे संकट में यह डगमगाए तो पूरी अर्थव्यवस्था को चोट लगती है।