मुद्रा: विनिमय का माध्यम
वस्तु-विनिमय में सामान के बदले सीधा सामान दिया जाता है। इसके लिए आवश्यकताओं का दोहरा संयोग चाहिए: एक जो बेचना चाहे, दूसरा ठीक वही ख़रीदना चाहे। ऐसा कम ही होता है।
मुद्रा इसका हल है। यह बीच की कड़ी, यानी विनिमय का माध्यम है: पहले पैसे के बदले बेचो, फिर पैसे से ख़रीदो।
मुद्रा के आधुनिक रूप
- करेंसी: कागज़ के नोट और सिक्के। भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) नोट जारी करता है। सरकार इसे वैध मुद्रा मानती है, इसलिए कोई इसे मना नहीं कर सकता।
- बैंक में जमा: लोग बची रकम बैंक में रखते हैं। इन्हें माँग जमा कहते हैं क्योंकि माँगने पर निकाली जा सकती हैं। चेक, डेबिट कार्ड और UPI से सीधे जमा से भुगतान होता है, इसलिए जमा भी मुद्रा का काम करती है।
बैंकों की ऋण गतिविधियाँ
बैंक जमा का छोटा हिस्सा (लगभग 15%) नकद रखते हैं ताकि लोग पैसा निकाल सकें। ज़्यादातर जमा से वे कर्ज़ देते हैं। कर्ज़ पर ब्याज दर जमा पर दिए ब्याज से ज़्यादा होती है। यही अंतर बैंक की आमदनी का मुख्य स्रोत है।
साख के दो पहलू
साख (ऋण) एक समझौता है जिसमें ऋणदाता कर्ज़दार को पैसा, सामान या सेवा देता है और कर्ज़दार बाद में चुकाने का वादा करता है।
- अच्छा पहलू: मोची त्योहार से पहले चमड़ा ख़रीदने को कर्ज़ लेता है, ऑर्डर पूरे करता है और मुनाफ़े से चुकाता है। कर्ज़ से आय बढ़ी।
- बुरा पहलू: छोटा किसान साहूकार से ऊँचे ब्याज पर कर्ज़ लेता है; फ़सल ख़राब होती है; वह चुका नहीं पाता और ज़मीन बेचता या नया कर्ज़ लेता है। यही ऋण-जाल है।
ऋण की शर्तें
हर कर्ज़ की शर्तें होती हैं: ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार (ज़मीन, मकान, गाड़ी, सोना जैसी संपत्ति जो गिरवी रखी जाती है; कर्ज़ न चुके तो ऋणदाता उसे बेच सकता है), कागज़ात और भुगतान का तरीका।
भारत में औपचारिक और अनौपचारिक ऋण
औपचारिक स्रोत: बैंक और सहकारी समितियाँ। RBI इनकी निगरानी करता है: देखता है कि बैंक नकद रखें और बड़े व्यापारियों के साथ छोटे किसानों व छोटे कारोबारों को भी कर्ज़ दें।
अनौपचारिक स्रोत: साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त। इन पर कोई निगरानी नहीं, इसलिए ये बहुत ऊँचा ब्याज लेते और वसूली में ग़लत तरीके अपनाते हैं।
औपचारिक ऋण क्यों ज़रूरी
- सस्ता कर्ज़ यानी कर्ज़दार के पास ज़्यादा आय बचती है; वह फ़सल या कारोबार बढ़ा सकता है।
- गरीब परिवारों में औपचारिक ऋण का हिस्सा कम है; वे अनौपचारिक पर ज़्यादा निर्भर हैं।
- बैंक गिरवी और कागज़ माँगते हैं जो गरीबों के पास अक्सर नहीं होते। इसलिए औपचारिक ऋण सब तक, ख़ासकर गरीबों तक, पहुँचना चाहिए।
गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूह
स्वयं सहायता समूह (SHG) में आम तौर पर 15–20 सदस्य होते हैं, अक्सर एक इलाके की महिलाएँ। वे नियमित बचत करती हैं, जैसे ₹50 से ₹200 महीना। सदस्य समूह से उचित ब्याज पर छोटे कर्ज़ ले सकती हैं।
- एक-दो साल अच्छे भुगतान के बाद बैंक समूह को बिना गिरवी के कर्ज़ देते हैं।
- बचत, कर्ज़, ब्याज और भुगतान का फ़ैसला समूह करता है। चुकाने की ज़िम्मेदारी पूरे समूह की।
- सदस्य सिलाई, पशुपालन, दुकान जैसे छोटे काम शुरू कर सकती हैं।
- महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों पर बात करती हैं।
ऐसा ही विचार बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक है, जिसे मुहम्मद यूनुस ने शुरू किया और जो लाखों गरीबों तक पहुँचा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आवश्यकताओं का दोहरा संयोग: दोनों पक्षों को एक-दूसरे का सामान चाहिए।
- मुद्रा = विनिमय का माध्यम।
- साधारण ब्याज = मूलधन × दर × समय ÷ 100
- चुकाने की रकम = मूलधन + ब्याज
- मासिक दर × 12 = सालाना दर (साधारण ब्याज)
- समर्थक ऋणाधार: कर्ज़ की सुरक्षा के लिए गिरवी रखी संपत्ति।
- औपचारिक ऋण: बैंक, सहकारी (RBI निगरानी); अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार।
हल किए गए उदाहरण
1. बैंक से ₹10,000 पर 12% सालाना ब्याज 1 साल का निकालिए।
ब्याज = 10,000 × 12 × 1 ÷ 100 = ₹1,200। रकम = ₹11,200।
2. साहूकार 3% मासिक ब्याज लेता है। सालाना दर कितनी?
3% × 12 = 36% सालाना (साधारण ब्याज)।
3. 3% मासिक पर ₹10,000 का कर्ज़ 1 साल बाद कितना चुकाना होगा?
ब्याज = 10,000 × 36 ÷ 100 = ₹3,600। रकम = ₹13,600।
4. ऊपर के दोनों कर्ज़ों की तुलना कीजिए।
13,600 − 11,200 = ₹2,400 ज़्यादा साहूकार को: बैंक से तीन गुना ब्याज।
5. चावल चाहने वाली कुम्हारिन के लिए वस्तु-विनिमय कठिन क्यों है?
उसे ऐसा चावल बेचने वाला ढूँढना होगा जिसे उसी समय बर्तन चाहिए: दोहरा संयोग, जो कम मिलता है।
6. 20 महिलाओं का SHG, हर एक ₹100 महीना बचाती है। 1 साल में कितना?
20 × 100 × 12 = ₹24,000।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि बैंक सारी जमा तिजोरी में रखते हैं। वे लगभग 15% नकद रखकर बाकी कर्ज़ देते हैं।
- मासिक और सालाना ब्याज को एक मानना। 3% मासिक = 36% सालाना।
- यह मानना कि कर्ज़ हमेशा अच्छा है। यह शर्तों और जोखिम पर निर्भर है; ऋण-जाल भी बना सकता है।
- यह सोचना कि SHG को कर्ज़ के लिए गिरवी चाहिए। बैंक SHG को बिना गिरवी कर्ज़ देते हैं।