Spain 1º Bachillerato Economics
अध्याय: 5
1. Economic decisions
Economics, needs, goods and scarcity · Economic decision-making · Economic systems compared · Personal financial decisions and money · Behavioural economics and ethics · Methods of economic analysis
- चयन की समस्या: दुर्लभता और अवसर लागत – हमारी इच्छाएँ असीमित हैं, पर पैसा, समय, ज़मीन और मज़दूर जैसे संसाधन सीमित हैं। इसे दुर्लभता कहते हैं, और यह हमें चुनने पर मजबूर करती है। जो अगला सबसे अच्छा विकल्प छोड़ा, उसका मूल्य अवसर लागत है। अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं कि लोग और समाज ये चुनाव कैसे करते हैं। हर समाज को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। बाज़ार, नियोजित और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ इनका अलग-अलग जवाब देती हैं, और कल्याणकारी राज्य सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता है।
- आर्थिक प्रणालियाँ: क्या, कैसे और किसके लिए, कौन तय करता है? – हर समाज के पास साधन सीमित हैं, इसलिए उसे तय करना पड़ता है कि क्या बनाए, कैसे बनाए और किसके लिए। पारंपरिक अर्थव्यवस्था में रीति-रिवाज, बाज़ार अर्थव्यवस्था में कीमतें और निजी फ़ैसले, और आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था में सरकार की योजना यह तय करती है। पूँजीवाद निजी संपत्ति और बाज़ार पर टिका है; समाजवाद साझा या सरकारी स्वामित्व और योजना पर। असली देश मिश्रित हैं: ज़्यादातर चीज़ें बाज़ार बनाता है, और सरकार जन-सेवाएँ, नियम और सहायता देती है।
- वित्त प्रबंधन के स्मार्ट तरीके – मुद्रास्फीति से कीमतें बढ़ती हैं, इसलिए उतना ही पैसा कम खरीदता है। बैंक में रखे पैसे पर ब्याज मिलता है: साधारण ब्याज सिर्फ़ मूलधन पर मिलता है, जबकि चक्रवृद्धि ब्याज पहले के ब्याज पर भी मिलता है, इसलिए समय के साथ तेज़ी से बढ़ता है। बजट आय को ज़रूरतों, चाहतों और बचत में बाँटता है। बचत सुरक्षित रखी जाती है; निवेश बढ़ सकता है पर उसमें जोखिम है, और ज़्यादा संभावित लाभ का मतलब ज़्यादा जोखिम। बीमा जोखिम को बहुत लोगों में बाँटता है। एक सीमा से ऊपर की आय पर आयकर लगता है, जिसकी दरें आय के साथ बढ़ती हैं।
- व्यवहारिक अर्थशास्त्र: असली लोग कैसे निर्णय लेते हैं – पारंपरिक अर्थशास्त्र मानता है कि लोग पूरी तरह तर्कसंगत हैं: सब विकल्प जानते हैं, लागत और लाभ तौलते हैं और हमेशा सबसे अच्छा चुनते हैं। व्यवहारिक अर्थशास्त्र मनोविज्ञान और प्रयोगों से दिखाता है कि असल में लोग कैसे चुनते हैं। हमारी तर्कसंगतता समय, जानकारी और दिमाग़ी क्षमता से सीमित है, इसलिए हम शॉर्टकट (अनुमानी नियम) अपनाते हैं, जिनसे एंकरिंग, उपलब्धता, भेड़चाल, हानि से बचाव, वर्तमान पूर्वाग्रह और फ़्रेमिंग जैसे पूर्वाग्रह आते हैं। लोग निष्पक्षता और सामाजिक मानदंडों की भी परवाह करते हैं। सरकारें और कंपनियाँ इन विचारों से 'नज' और 'चयन संरचना' बनाती हैं, जैसे डिफ़ॉल्ट विकल्प। नज चुनने की आज़ादी रखते हैं पर नैतिक सवाल भी उठाते हैं।
2. Economic reality: microeconomic tools
Exchange and markets · Elasticity · Cost-benefit analysis · Market failures
- माँग, पूर्ति और बाज़ार संतुलन – माँग का नियम कहता है कि कीमत बढ़ने पर खरीदार कम चाहते हैं; पूर्ति का नियम कहता है कि विक्रेता ज़्यादा लाते हैं। बाज़ार कीमत संतुलन पर टिकती है, जहाँ माँगी गई मात्रा = पूर्ति की गई मात्रा, और माँग या पूर्ति के खिसकने से यह बदलती है। कुछ वस्तुएँ सामान्य नियम तोड़ती हैं (गिफ़ेन, वेब्लेन, घबराहट में खरीद)। संतुलन से नीचे तय अधिकतम कीमत कमी पैदा करती है। बाज़ार विफल भी हो सकता है, जैसे प्रदूषण या स्ट्रीट लाइट जैसी सार्वजनिक वस्तुओं में, तब सरकार आगे आती है।
- माँग और माँग की कीमत लोच – माँग = किसी समय में हर कीमत पर खरीदार जितनी वस्तु खरीदना चाहते और खरीद सकते हैं। बाज़ार माँग हर कीमत पर सब खरीदारों की माँग का जोड़ है। माँग अपनी कीमत, आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि, उम्मीदों और खरीदारों की संख्या पर निर्भर है। अपनी कीमत बदलने पर वक्र पर संचलन होता है; किसी और कारक से वक्र खिसकता है। माँग की कीमत लोच (Ed) = मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन; इसे कुल व्यय से भी पहचान सकते हैं।
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।
3. Economic reality: macroeconomic tools
Macroeconomics and the circular flow · Economic growth and development · Labour economics and unemployment · International trade and integration · The financial system and money creation
- आय का चक्रीय प्रवाह और राष्ट्रीय आय मापने की तीन विधियाँ – दो-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ देते हैं और साधन भुगतान (किराया, मज़दूरी, ब्याज, लाभ) पाते हैं; यह आय वे फर्मों की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। पैसा वस्तुओं के वास्तविक प्रवाह की उलटी दिशा में घूमता है। क्योंकि वही पैसा तीन जगहों से गुज़रता है, राष्ट्रीय आय तीन तरह से मापी जा सकती है: उत्पादकों का मूल्य वर्धन (उत्पाद विधि), साधनों को दी गई आय (आय विधि), और अंतिम वस्तुओं पर खर्च (व्यय विधि)। तीनों का जोड़ बराबर आता है।
- विकास – विकास का मतलब हर किसी के लिए अलग है: ज़्यादा आय, पर बराबरी, आज़ादी, सुरक्षा और सम्मान भी। देशों की तुलना प्रति व्यक्ति आय से होती है, पर औसत असमानता छिपा लेता है, इसलिए स्वास्थ्य और शिक्षा भी देखते हैं। मानव विकास सूचकांक इन्हें जोड़ता है। विकास धारणीय भी होना चाहिए ताकि संसाधन आने वाली पीढ़ियों तक बचें।
- बेरोज़गारी: अर्थ, दर, प्रकार, नुकसान और उपाय – कोई व्यक्ति बेरोज़गार तब है जब उसके पास नौकरी नहीं, वह काम कर सकता है, और सक्रिय रूप से काम ढूँढ रहा है। श्रम बल यानी सभी रोज़गार वाले और सभी बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100। अर्थशास्त्री कारण के हिसाब से इसे बाँटते हैं: घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), संरचनात्मक (कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाती), चक्रीय (कुल माँग में मंदी) और मौसमी (कुछ ही महीने काम)। बेरोज़गारी से व्यक्ति की आय जाती है, देश का उत्पादन और कर घटता है, और सेहत व समाज को नुकसान होता है। चक्रीय के लिए सरकार ख़र्च और ब्याज दर का सहारा लेती है; बाक़ी के लिए प्रशिक्षण, जानकारी और आवागमन। कुछ बेरोज़गारी हमेशा रहती है; सबसे कम टिकाऊ स्तर को प्राकृतिक दर कहते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार – देशों की सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं का ख़रीदना-बेचना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार है। बाहर बेचना निर्यात और बाहर से ख़रीदना आयात है। इससे देश को विदेशी मुद्रा, विकास और रोज़गार मिलते हैं, और कंपनियों को लाभ और नए बाज़ार। निर्यात और आयात तय चरणों से होते हैं और इनमें साख पत्र, बिल ऑफ़ लेडिंग जैसे कई प्रलेख लगते हैं। WTO (1995) व्यापार के नियम बनाता है और बाधाएँ घटाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार: आधार, संतुलन, WTO और पत्तन – अंतर्राष्ट्रीय व्यापार देशों के बीच सामान और सेवाओं का आदान-प्रदान है। यह वस्तु-विनिमय से शुरू हुआ, रेशम मार्ग जैसे रास्तों पर बढ़ा, क्रूर दास व्यापार और औपनिवेशिक व्यापार से गुज़रा, और उद्योगों के साथ फैला। देश इसलिए व्यापार करते हैं क्योंकि वे संसाधन, जनसंख्या, विकास, विदेशी निवेश और परिवहन में अलग हैं। व्यापार संतुलन निर्यात और आयात की तुलना है। व्यापार द्विपक्षीय या बहुपक्षीय हो सकता है; मुक्त व्यापार रुकावटें घटाता है, जबकि राशिपातन विदेश में लागत से कम पर माल बेचता है। WTO विश्व नियम बनाता है, प्रादेशिक समूह पड़ोसियों को जोड़ते हैं, और कई तरह के पत्तन व्यापार के द्वार हैं।
- मुद्रा और साख – मुद्रा विनिमय का माध्यम है जो आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म करती है। बैंक जमा लेते और कर्ज़ देते हैं। साख (ऋण) शर्तों के हिसाब से आगे बढ़ा भी सकती है या कर्ज़ में फँसा भी सकती है। बैंक और सहकारी समितियों के औपचारिक ऋण सस्ते और नियंत्रित हैं; साहूकारों के अनौपचारिक ऋण महँगे हैं। स्वयं सहायता समूह गरीब महिलाओं तक सस्ता ऋण पहुँचाते हैं।
4. Economic policies
Positive and normative economics; state intervention · Fiscal and monetary policy
- राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) – राजकोषीय नीति का मतलब है: सरकार अपने ख़र्च (G) और कर (T) से पूरी अर्थव्यवस्था को दिशा देती है। बजट दोनों की तुलना करता है: ख़र्च ज़्यादा हो तो बजट घाटा (deficit) होता है और सरकार उधार लेती है; कर ज़्यादा हो तो अधिशेष (surplus)। मंदी में सरकार विस्तारवादी नीति अपनाती है: ख़र्च बढ़ाओ या कर घटाओ, ताकि कुल माँग, उत्पादन और नौकरियाँ बढ़ें। जब माँग बहुत तेज़ हो और महँगाई ज़्यादा हो, तो संकुचनकारी नीति: ख़र्च घटाओ या कर बढ़ाओ। पैसा बार-बार ख़र्च होता है, इसलिए G में बदलाव का असर बड़ा होता है: इसे गुणक (multiplier) कहते हैं। कुछ बदलाव अपने-आप होते हैं (स्वचालित स्थिरक), कुछ सोच-समझकर (विवेकाधीन)। सीमाएँ भी हैं: समय की देरी, बढ़ता सरकारी कर्ज़, ब्याज दरें बढ़ना (crowding out) और राजनीति। यह नीति केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के साथ मिलकर चलती है।
5. Challenges for the Spanish economy in a global context
Globalisation: causes, opportunities and risks · The new economy and digital revolution · Democracy and the welfare state · Degrowth theories · The SDGs and current economic challenges
- वैश्विक दुनिया का बनना – लोग, सामान, विचार और बीमारियाँ हज़ारों साल से दुनिया में घूम रहे हैं: रेशम मार्ग पर, आलू-मक्का जैसी फ़सलों के साथ और चेचक जैसी बीमारियों के साथ। 1815 से 1914 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था तीन धाराओं से बढ़ी: माल, मज़दूर और पूँजी; रेल, भाप के जहाज़ और ठंडे जहाज़ों ने मदद की। उपनिवेशों ने क़ीमत चुकाई: अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट और भारत से गिरमिटिया मज़दूर। पहले विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन और फिर 1929 की महामंदी आई, जिसने भारत के किसानों को बहुत चोट पहुँचाई। 1945 के बाद ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, IMF और विश्व बैंक ने दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से खड़ी की।
- कल्याणकारी राज्य और सामाजिक सुरक्षा – कल्याणकारी राज्य वह राज्य है जो लोगों को जीवन के बड़े जोखिमों से बचाता है: बीमारी, नौकरी छूटना, बुढ़ापा, विकलांगता और ग़रीबी। इसके लिए एक सुरक्षा-जाल होता है जिसके तीन हिस्से हैं। सामाजिक बीमा वेतन से लिए गए अंशदान से चलता है। सामाजिक सहायता करों से ज़रूरतमंदों को मिलती है। स्कूल और अस्पताल जैसी सार्वजनिक सेवाएँ सबके लिए खुली हैं। देश इन्हें अलग-अलग ढंग से मिलाते हैं: उदार (कम कर, थोड़ी मदद), रूढ़िवादी (मदद नौकरी से जुड़ी) और सामाजिक-लोकतांत्रिक (ऊँचा कर, सबके लिए मदद)। आज बढ़ती उम्र, बढ़ता ख़र्च, वैश्वीकरण और अनौपचारिक काम इसकी चुनौतियाँ हैं।
- पर्यावरण और धारणीय विकास – पर्यावरण हमें संसाधन देता है, हमारा कचरा सोखता है, जीवन चलाता है और सुंदरता देता है। जब हम संसाधन प्रकृति के नवीकरण से तेज़ लेते हैं, या कचरा उसकी सोखने की क्षमता से ज़्यादा फेंकते हैं, तो धारण क्षमता पार होती है और पर्यावरण संकट आता है। भारत में भूमि अपक्षय, वायु-जल प्रदूषण, वन और जैव-विविधता की हानि है। जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्मी फँसती है और वैश्विक उष्णता होती है; CFC ओज़ोन परत पतली करते हैं। धारणीय विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए।