राजकोषीय नीति क्या है?
राजकोषीय नीति (fiscal policy) यानी सरकार के ख़र्च और कर से जुड़े फ़ैसले, जिनसे पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डाला जाता है।
- सरकारी ख़र्च (G): स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रक्षा, पेंशन, सहायता।
- कर (T): प्रत्यक्ष कर (आयकर, निगम कर) और अप्रत्यक्ष कर (GST/VAT, उत्पाद शुल्क)।
- उधार: ख़र्च आमदनी से ज़्यादा हो तो सरकार बॉन्ड बेचकर उधार लेती है।
साल भर की योजना को सरकारी बजट कहते हैं, जिसे वित्त मंत्री पेश करते हैं। राजकोषीय नीति सरकार चलाती है; मौद्रिक नीति (ब्याज दर, मुद्रा आपूर्ति) केंद्रीय बैंक चलाता है, जैसे RBI, बैंक ऑफ़ इंग्लैंड या यूरोपीय केंद्रीय बैंक।
बजट घाटा, अधिशेष और सरकारी कर्ज़
- बजट घाटा: एक साल में G > T। घाटा = G − T।
- बजट अधिशेष: T > G। अधिशेष = T − G।
- संतुलित बजट: G = T।
घाटा एक साल का अंतर है। सरकारी (सार्वजनिक) कर्ज़ कई सालों का कुल उधार है। हर घाटा कर्ज़ बढ़ाता है; अधिशेष से कुछ कर्ज़ चुकाया जा सकता है।
अर्थशास्त्री घाटे और कर्ज़ को GDP के प्रतिशत में देखते हैं, जैसे "घाटा = GDP का 4%", क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था ज़्यादा कर्ज़ संभाल सकती है।
विस्तारवादी और संकुचनकारी राजकोषीय नीति
अर्थव्यवस्था एक व्यापार चक्र (business cycle) में चलती है: तेज़ी, धीमापन, मंदी, सुधार। राजकोषीय नीति इसे समतल करने की कोशिश करती है।
विस्तारवादी नीति
मंदी में: G बढ़ाओ और/या T घटाओ। लोगों के पास ख़र्च करने को ज़्यादा पैसा, तो कुल माँग (aggregate demand) बढ़ती है, कंपनियाँ ज़्यादा बनाती और ज़्यादा लोगों को काम देती हैं। आमतौर पर घाटा बढ़ता है।
संकुचनकारी नीति
जब माँग बहुत ज़्यादा हो और महँगाई (inflation) तेज़ हो: G घटाओ और/या T बढ़ाओ। माँग ठंडी होती है, पर विकास और नौकरियों पर असर पड़ सकता है।
आपूर्ति पक्ष (supply-side) नीति
शिक्षा, प्रशिक्षण और बुनियादी ढाँचे पर ख़र्च, या निवेश को बढ़ावा देने वाले कर नियम लंबे समय में विकास बढ़ाते हैं।
गुणक, स्वचालित स्थिरक और सीमाएँ
गुणक (multiplier): ख़र्च किसी की आय बनता है और उसका हिस्सा फिर ख़र्च होता है। अगर लोग अतिरिक्त आय का आधा ख़र्च करें (MPC = 0.5), तो k = 1 ÷ (1 − MPC) = 2। यानी 100 का नया G कुल माँग लगभग 200 बढ़ाता है।
स्वचालित स्थिरक (automatic stabilisers) बिना नए फ़ैसले के काम करते हैं: मंदी में आय घटती है, तो कर कम आता है और बेरोज़गारी सहायता बढ़ती है, जिससे माँग को सहारा मिलता है। विवेकाधीन नीति सोच-समझकर लिया गया नया फ़ैसला है, जैसे राहत पैकेज।
सीमाएँ:
- समय की देरी: समस्या पहचानने, बजट पास करने और परियोजना बनाने में महीनों-सालों लगते हैं।
- कर्ज़: बड़ा घाटा कर्ज़ और ब्याज बढ़ाता है।
- बाहर धकेलना (crowding out): सरकार बहुत उधार ले तो ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और निजी निवेश घटता है।
- राजनीति: कर घटाना लोकप्रिय है, बढ़ाना नहीं, इसलिए अच्छे समय में नीति पलटी नहीं जाती।
करके देखो: नीति पहचानो
हर विचार के लिए बताओ: विस्तारवादी या संकुचनकारी? (1) कारों पर GST घटाना। (2) सरकारी वेतन रोकना। (3) नई रेल परियोजना। (4) ऊँची आय पर आयकर बढ़ाना। जाँचो: 1 और 3 माँग बढ़ाते हैं; 2 और 4 घटाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
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हल किए गए उदाहरण
1. सरकार 480 अरब ख़र्च करती है और 450 अरब कर लेती है। बजट संतुलन बताओ।
संतुलन = T − G = 450 − 480 = −30 अरब। यानी 30 अरब का घाटा, जो उधार लेना होगा।
2. MPC = 0.8। सरकार सड़कों पर 50 अरब अतिरिक्त ख़र्च करती है। गुणक और माँग में कुल बढ़त बताओ।
k = 1 ÷ (1 − 0.8) = 1 ÷ 0.2 = 5। बढ़त = 5 × 50 = 250 अरब।
3. शुरू में कर्ज़ 1,000 है। तीन साल के घाटे 60, 40 और −20 (20 का अधिशेष) हैं। अंत में कर्ज़?
1,000 + 60 = 1,060; + 40 = 1,100; − 20 = 1,080।
4. महँगाई 9% है और बेरोज़गारी कम है। कौन-सी नीति और एक जोखिम बताओ।
संकुचनकारी नीति: ख़र्च घटाओ या कर बढ़ाओ ताकि माँग ठंडी हो। जोखिम: विकास ज़्यादा धीमा हो सकता है और कुछ नौकरियाँ जा सकती हैं।
आम गलतियाँ
- घाटे और कर्ज़ को एक समझना: घाटा एक साल का अंतर है; कर्ज़ सालों का कुल जोड़।
- यह सोचना कि राजकोषीय नीति ब्याज दर तय करती है। वह मौद्रिक नीति है, जो केंद्रीय बैंक चलाता है।
- गुणक भूल जाना: माँग में अंतिम बदलाव आमतौर पर ख़र्च के पहले बदलाव से बड़ा होता है।
- सोचना कि घाटा हमेशा बुरा है। मंदी में घाटा नौकरियाँ बचा सकता है; समस्या कई सालों तक बहुत बड़ा घाटा है।