United Grade 12 AP Macroeconomics
अध्याय: 6
1. Basic Economic Concepts
Scarcity · Opportunity Cost and the Production Possibilities Curve (PPC) · Comparative Advantage and Gains from Trade · Demand · Supply · Market Equilibrium, Disequilibrium, and Changes in Equilibrium
- व्यष्टि अर्थशास्त्र का परिचय और उत्पादन संभावना वक्र – व्यष्टि अर्थशास्त्र एक खरीदार या एक फ़र्म जैसी छोटी इकाइयों को पढ़ता है; समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को। संसाधन दुर्लभ हैं और उनके कई उपयोग हैं, इसलिए हर अर्थव्यवस्था को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। उत्पादन संभावना वक्र (PPC) दो वस्तुओं के वे सबसे अच्छे मेल दिखाता है जो सारे संसाधन पूरे लगाने पर बन सकते हैं। इस पर चलने की एक अवसर लागत होती है जो आम तौर पर बढ़ती है, इसलिए वक्र अवतल होता है।
- चयन की समस्या: दुर्लभता और अवसर लागत – हमारी इच्छाएँ असीमित हैं, पर पैसा, समय, ज़मीन और मज़दूर जैसे संसाधन सीमित हैं। इसे दुर्लभता कहते हैं, और यह हमें चुनने पर मजबूर करती है। जो अगला सबसे अच्छा विकल्प छोड़ा, उसका मूल्य अवसर लागत है। अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं कि लोग और समाज ये चुनाव कैसे करते हैं। हर समाज को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। बाज़ार, नियोजित और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ इनका अलग-अलग जवाब देती हैं, और कल्याणकारी राज्य सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता है।
- माँग और माँग की कीमत लोच – माँग = किसी समय में हर कीमत पर खरीदार जितनी वस्तु खरीदना चाहते और खरीद सकते हैं। बाज़ार माँग हर कीमत पर सब खरीदारों की माँग का जोड़ है। माँग अपनी कीमत, आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि, उम्मीदों और खरीदारों की संख्या पर निर्भर है। अपनी कीमत बदलने पर वक्र पर संचलन होता है; किसी और कारक से वक्र खिसकता है। माँग की कीमत लोच (Ed) = मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन; इसे कुल व्यय से भी पहचान सकते हैं।
- उत्पादक संतुलन और पूर्ति – उत्पादक संतुलन में होता है जब लाभ सबसे ज़्यादा हो और उत्पादन बदलने का कोई कारण न हो। MR–MC विधि में दो शर्तें: MR = MC, और MC बढ़ती हुई हो (MC, MR को नीचे से काटे)। पूर्ति = हर कीमत पर फ़र्में जितना बेचना चाहती और बेच सकती हैं। बाज़ार पूर्ति सब फ़र्मों की पूर्ति का जोड़ है। पूर्ति अपनी कीमत, आगत कीमतों, तकनीक, कर, अन्य वस्तुओं की कीमत, फ़र्मों की संख्या और उम्मीदों पर निर्भर है। अपनी कीमत से वक्र पर संचलन; बाकी कारकों से खिसकाव। Es = पूर्ति की मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन।
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
2. Economic Indicators and the Business Cycle
The Circular Flow and GDP · Limitations of GDP · Unemployment · Price Indices and Inflation · Costs of Inflation · Real v. Nominal GDP · Business Cycles
- आय का चक्रीय प्रवाह और राष्ट्रीय आय मापने की तीन विधियाँ – दो-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ देते हैं और साधन भुगतान (किराया, मज़दूरी, ब्याज, लाभ) पाते हैं; यह आय वे फर्मों की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। पैसा वस्तुओं के वास्तविक प्रवाह की उलटी दिशा में घूमता है। क्योंकि वही पैसा तीन जगहों से गुज़रता है, राष्ट्रीय आय तीन तरह से मापी जा सकती है: उत्पादकों का मूल्य वर्धन (उत्पाद विधि), साधनों को दी गई आय (आय विधि), और अंतिम वस्तुओं पर खर्च (व्यय विधि)। तीनों का जोड़ बराबर आता है।
- समष्टि आर्थिक सूचक: GDP, महँगाई और बेरोज़गारी – सरकारें कुछ मुख्य संख्याओं से देखती हैं कि अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है। इन्हें समष्टि आर्थिक सूचक (macroeconomic indicators) कहते हैं। मुख्य हैं: वास्तविक GDP वृद्धि (उत्पादन बढ़ा या नहीं), मुद्रास्फीति (दाम कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं), बेरोज़गारी (काम चाहने वालों को काम मिल रहा है या नहीं) और चालू खाता शेष (बाकी दुनिया से लेन-देन में देश की स्थिति)। हर सूचक का सूत्र भी है और सीमाएँ भी।
- सूचकांक: सरल समूही विधि, WPI, CPI, IIP, उपयोग और मुद्रास्फीति – सूचकांक एक संख्या है जो बताती है कि किसी चीज़ (दाम या उत्पादन) में आधार वर्ष की तुलना में कितना बदलाव हुआ; आधार वर्ष का सूचकांक 100 होता है। सरल समूही मूल्य सूचकांक = ΣP1 ÷ ΣP0 × 100। भारित सूचकांक ज़्यादा ख़रीदी जाने वाली चीज़ों को ज़्यादा महत्व देते हैं। भारत के मुख्य सूचकांक हैं: खुदरा दामों का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक दामों का थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और कारख़ाना उत्पादन का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP)। महँगाई दर एक साल में मूल्य सूचकांक की प्रतिशत बढ़त है।
- राष्ट्रीय आय के समुच्चय: GDP, GNP, NDP, NNP, वास्तविक GDP और कल्याण – शुरुआत बाज़ार कीमत पर GDP से: एक साल में देश की सीमा में बनी सब अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य। मूल्यह्रास घटाओ तो सकल से शुद्ध। विदेश से शुद्ध साधन आय (NFIA) जोड़ो तो घरेलू से राष्ट्रीय। शुद्ध अप्रत्यक्ष कर (अप्रत्यक्ष कर − सब्सिडी) घटाओ तो बाज़ार कीमत से साधन लागत। साधन लागत पर NNP राष्ट्रीय आय है। मौद्रिक GDP चालू कीमतों पर, वास्तविक GDP आधार वर्ष की कीमतों पर; GDP अवस्फीतिक = मौद्रिक ÷ वास्तविक × 100। ज़्यादा GDP का मतलब ज़रूरी नहीं ज़्यादा कल्याण: असमान बँटवारा, गैर-मौद्रिक विनिमय और बाह्यताएँ।
3. National Income and Price Determination
Aggregate Demand (AD) · Multipliers · Short-Run Aggregate Supply (SRAS) · Long-Run Aggregate Supply (LRAS) · Equilibrium in the Aggregate Demand- Aggregate Supply (AD-AS) Model · Changes in the AD-AS Model in the Short Run · Long-Run Self-Adjustment · Fiscal Policy · Automatic Stabilizers
- समग्र माँग, उपभोग और बचत प्रवृत्तियाँ, और निवेश गुणक – समग्र माँग (AD) = अंतिम वस्तुओं पर कुल नियोजित खर्च: C + I + G + (X − M); दो-क्षेत्रक मॉडल में AD = C + I। उपभोग आय पर निर्भर है: C = c̄ + bY, जहाँ b = MPC। APC = C/Y, MPC = ΔC/ΔY, APS = S/Y, MPS = ΔS/ΔY; APC + APS = 1 और MPC + MPS = 1। अल्पकालीन संतुलन उत्पादन वहाँ है जहाँ AD = AS (नियोजित खर्च = उत्पादन), या बचत = नियोजित निवेश। निवेश बढ़ने पर आय कई गुना बढ़ती है: k = ΔY/ΔI = 1/(1 − MPC) = 1/MPS।
- समग्र माँग और समग्र पूर्ति: AD-AS मॉडल – AD-AS मॉडल पूरी अर्थव्यवस्था को एक ग्राफ़ पर दिखाता है: ऊपर कीमत स्तर, आड़े में वास्तविक GDP। AD = C + I + G + (X − M) नीचे झुकता है। SRAS ऊपर चढ़ती है क्योंकि छोटे समय में मज़दूरी चिपकी रहती है। LRAS पूर्ण-रोज़गार (संभावित) उत्पादन पर सीधी खड़ी है। AD और SRAS के मिलन से अल्पकालीन संतुलन बनता है। AD या SRAS के खिसकने से कीमत और उत्पादन बदलते हैं और स्फीतिक या अवस्फीतिक अंतराल बनता है। दीर्घकाल में मज़दूरी समायोजित होती है और अर्थव्यवस्था LRAS पर लौटती है; स्वचालित स्थिरीकारक उतार-चढ़ाव कम करते हैं।
- सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था – सरकारी बजट एक साल की योजना है जिसमें अनुमानित आय (प्राप्तियाँ) और योजनाबद्ध खर्च (व्यय) लिखे होते हैं। प्राप्तियाँ राजस्व (कर, गैर-कर) या पूँजीगत (उधार, कर्ज़ वसूली, विनिवेश) होती हैं। व्यय राजस्व (कोई संपत्ति नहीं) या पूँजीगत (संपत्ति बने या कर्ज़ घटे) होता है। बजट संतुलित, अधिशेष या घाटे का हो सकता है, और घाटा राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटे से नापा जाता है।
4. Financial Sector
Financial Assets · Nominal v. Real Interest Rates · Definition, Measurement, and Functions of Money · Banking and the Expansion of the Money Supply · The Money Market · Monetary Policy · The Loanable Funds Market
- मौद्रिक नीति (Monetary Policy) – मौद्रिक नीति वह है जिसमें केंद्रीय बैंक ब्याज दरों और मुद्रा आपूर्ति से कीमतें स्थिर रखता है और वृद्धि व रोज़गार को सहारा देता है। नीतिगत दर बढ़ाने से उधार महँगा, खर्च और समग्र माँग कम, और महँगाई कम होती है (संकुचनकारी)। दर घटाने से उलटा होता है (विस्तारकारी)। दूसरे औज़ार: खुले बाज़ार की क्रियाएँ, मात्रात्मक सहजता (QE), आरक्षित अनुपात और भावी मार्गदर्शन। ज़्यादातर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति लक्ष्य रखते हैं और सरकार से स्वतंत्र होते हैं। इसका असर देर से आता है और दरें शून्य के पास हों तो कमज़ोर पड़ता है।
- मुद्रा और उसकी पूर्ति: वस्तु-विनिमय, मुद्रा के कार्य और M1 – वस्तु-विनिमय (वस्तु के बदले वस्तु) के लिए आवश्यकताओं का दोहरा संयोग चाहिए और इसमें मूल्य का कोई साझा माप नहीं। मुद्रा यह हल करती है। इसके कार्य: विनिमय का माध्यम (मुख्य), लेखे की इकाई, मूल्य का संचय और स्थगित भुगतान का मानक। मुद्रा पूर्ति = किसी समय-बिंदु पर जनता (परिवार और फर्में) के पास मुद्रा का कुल स्टॉक। नोट RBI जारी करता है, सिक्के सरकार; माँग जमा व्यावसायिक बैंक बनाते हैं। संकुचित मुद्रा M1 = जनता के पास करेंसी (CU) + बैंकों में शुद्ध माँग जमा (DD) + RBI के पास अन्य जमा (OD)।
- बैंकों द्वारा मुद्रा सृजन और केंद्रीय बैंक (RBI) – बैंक जमा का केवल एक हिस्सा रिज़र्व (वैधानिक आरक्षित अनुपात, LRR) रखते हैं और बाकी उधार देते हैं। हर कर्ज़ खर्च होकर नई जमा बनकर बैंकों में लौटता है, तो कुल जमा पहली जमा का कई गुना हो जाती है: कुल जमा = प्रारंभिक जमा × 1/LRR। RBI भारत का केंद्रीय बैंक है: करेंसी जारी करता है, सरकार और बैंकों का बैंकर है, अंतिम ऋणदाता है, साख का नियंत्रण करता है और विदेशी मुद्रा भंडार रखता है। साख नियंत्रण के उपकरण: रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर, CRR, SLR, खुले बाज़ार की क्रियाएँ और सीमांत आवश्यकता।
5. Long-Run Consequences of Stabilization Policies
Fiscal and Monetary Policy Actions in the Short Run · The Phillips Curve · Money Growth and Inflation · Government Deficits and the National Debt · Crowding Out · Economic Growth · Public Policy and Economic Growth
- राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) – राजकोषीय नीति का मतलब है: सरकार अपने ख़र्च (G) और कर (T) से पूरी अर्थव्यवस्था को दिशा देती है। बजट दोनों की तुलना करता है: ख़र्च ज़्यादा हो तो बजट घाटा (deficit) होता है और सरकार उधार लेती है; कर ज़्यादा हो तो अधिशेष (surplus)। मंदी में सरकार विस्तारवादी नीति अपनाती है: ख़र्च बढ़ाओ या कर घटाओ, ताकि कुल माँग, उत्पादन और नौकरियाँ बढ़ें। जब माँग बहुत तेज़ हो और महँगाई ज़्यादा हो, तो संकुचनकारी नीति: ख़र्च घटाओ या कर बढ़ाओ। पैसा बार-बार ख़र्च होता है, इसलिए G में बदलाव का असर बड़ा होता है: इसे गुणक (multiplier) कहते हैं। कुछ बदलाव अपने-आप होते हैं (स्वचालित स्थिरक), कुछ सोच-समझकर (विवेकाधीन)। सीमाएँ भी हैं: समय की देरी, बढ़ता सरकारी कर्ज़, ब्याज दरें बढ़ना (crowding out) और राजनीति। यह नीति केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के साथ मिलकर चलती है।
- सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था – सरकारी बजट एक साल की योजना है जिसमें अनुमानित आय (प्राप्तियाँ) और योजनाबद्ध खर्च (व्यय) लिखे होते हैं। प्राप्तियाँ राजस्व (कर, गैर-कर) या पूँजीगत (उधार, कर्ज़ वसूली, विनिवेश) होती हैं। व्यय राजस्व (कोई संपत्ति नहीं) या पूँजीगत (संपत्ति बने या कर्ज़ घटे) होता है। बजट संतुलित, अधिशेष या घाटे का हो सकता है, और घाटा राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटे से नापा जाता है।
6. Open Economy: International Trade and Finance
Balance of Payments Accounts · Exchange Rates · The Foreign Exchange Market · Effect of Changes in Policies and Economic Conditions on the Foreign Exchange Market · Changes in the Foreign Exchange Market and Net Exports · Real Interest Rates and International Capital Flows
- भुगतान संतुलन – भुगतान संतुलन एक साल में किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का रिकॉर्ड है। चालू खाते में वस्तुएँ, सेवाएँ, अंतरण और आय आते हैं; पूँजी खाते में निवेश, ऋण और जमा। स्वायत्त लेन-देन अपने कारण से होते हैं; समायोजक (भंडार में बदलाव) अंतर पाटते हैं। अधिशेष में भंडार बढ़ता है, घाटे में घटता है।
- विदेशी विनिमय दर – विदेशी विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में कीमत है, जैसे ₹80 प्रति डॉलर। लचीली दर में विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति दर तय करते हैं; दर बढ़े तो रुपये का मूल्यह्रास। स्थिर दर में सरकार दर तय करती है और अवमूल्यन या पुनर्मूल्यन से बदलती है। प्रबंधित तिरती दर दोनों का मेल है: बाज़ार दर तय करता है और केंद्रीय बैंक बड़े उतार-चढ़ाव रोकता है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार: तुलनात्मक लाभ, संरक्षण और विदेशी मुद्रा बाज़ार – देश उन चीज़ों में विशेषज्ञता लेकर फ़ायदा पाते हैं जिनकी अवसर लागत उनके लिए सबसे कम हो (तुलनात्मक लाभ), और अपनी लागतों के बीच की दर पर व्यापार करते हैं। टैरिफ़, कोटा और सब्सिडी घरेलू कंपनियों को बचाते हैं पर कीमत बढ़ाते हैं और निरर्थक हानि करते हैं। व्यापार गुट और WTO नियम तय करते हैं। विदेशी मुद्रा बाज़ार में किसी देश की वास्तविक ब्याज दर बढ़े तो पूँजी अंदर आती है, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है और शुद्ध निर्यात घटता है।