समष्टि आर्थिक सूचक क्या हैं?
समष्टि (macro) यानी बड़ा। समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को देखता है, एक दुकान या एक परिवार को नहीं। सूचक वह संख्या है जो हालत बताती है, जैसे थर्मामीटर।
ज़्यादातर सरकारों के चार मुख्य लक्ष्य हैं, और हर एक का सूचक है:
- आर्थिक वृद्धि → वास्तविक GDP वृद्धि दर
- स्थिर कीमतें → मुद्रास्फीति दर (अक्सर लक्ष्य 2–4% के आसपास)
- पूर्ण रोज़गार → बेरोज़गारी दर
- दूसरे देशों से संतुलित लेन-देन → भुगतान संतुलन का चालू खाता
GDP: उत्पादन का माप
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश के अंदर एक साल में बने सभी अंतिम सामान और सेवाओं का बाज़ार मूल्य है। सिर्फ़ अंतिम सामान गिनते हैं ताकि आटा दो बार न गिना जाए (एक बार आटे में, एक बार रोटी में)।
नाममात्र बनाम वास्तविक GDP
नाममात्र GDP आज के दामों पर है; यह सिर्फ़ दाम बढ़ने से भी बढ़ सकता है। वास्तविक GDP आधार वर्ष के स्थिर दामों पर है, इसलिए यह सिर्फ़ उत्पादन की मात्रा का बदलाव दिखाता है।
वास्तविक GDP = नाममात्र GDP ÷ (मूल्य सूचकांक ÷ 100)। आसान नियम: वास्तविक वृद्धि ≈ नाममात्र वृद्धि − महँगाई।
प्रति व्यक्ति GDP
GDP ÷ जनसंख्या = औसत प्रति व्यक्ति उत्पादन। देशों की सही तुलना के लिए अर्थशास्त्री क्रय शक्ति समता (PPP) लगाते हैं, जो अलग-अलग दाम स्तर को बराबर करती है।
GDP की सीमाएँ
GDP काम का है, पर बहुत कुछ छोड़ देता है:
- बिना वेतन का काम, जैसे घर में खाना बनाना या दादा-दादी की देखभाल, नहीं गिना जाता।
- अनौपचारिक (छिपी) अर्थव्यवस्था: नकद काम जो दर्ज नहीं होते।
- असमानता: औसत नहीं बताता कि आय कुछ ही लोगों के पास तो नहीं।
- जीवन की गुणवत्ता: फ़ुर्सत, सेहत, सुरक्षा, खुशी नहीं मापी जाती।
- पर्यावरण: प्रदूषण और जंगल कटना GDP बढ़ा सकते हैं, पर जीवन बिगाड़ते हैं।
- गुणवत्ता में बदलाव: आज का फ़ोन उसी दाम में पहले से कहीं ज़्यादा करता है।
इसलिए लोग मानव विकास सूचकांक (HDI), कल्याण के माप और हरित GDP भी देखते हैं।
मुद्रास्फीति: माप और नुकसान
मुद्रास्फीति (महँगाई) सामान्य कीमत स्तर का लगातार बढ़ना है। यानी हर रुपया पहले से कम खरीदता है।
माप: मूल्य सूचकांक
- एक आम परिवार की टोकरी चुनो (खाना, किराया, आना-जाना, फ़ीस...)।
- हर चीज़ को खर्च के हिसाब से भार (weight) दो।
- आधार वर्ष में टोकरी का दाम = 100, फिर आज का दाम निकालो।
- महँगाई दर = (नया सूचकांक − पुराना) ÷ पुराना × 100।
यह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) है। दाम घटें तो अपस्फीति (deflation); दाम बढ़ें पर धीरे तो अवस्फीति (disinflation)।
महँगाई की लागत
- स्थिर आय वाले और बचत करने वाले की खरीद शक्ति घटती है।
- अनिश्चितता: कंपनियाँ निवेश टालती हैं।
- मेन्यू लागत (दाम-सूची बदलना) और शू-लेदर लागत (बैंक के ज़्यादा चक्कर)।
- दाम विदेश से तेज़ बढ़ें तो निर्यात कम प्रतिस्पर्धी।
- अनुमान से ज़्यादा महँगाई में उधार लेने वाले को फ़ायदा, उधार देने वाले को नुकसान।
बेरोज़गारी: कौन गिना जाता है और क्यों ज़रूरी
बेरोज़गार वह है जिसके पास काम नहीं, जो काम कर सकता है और सक्रिय रूप से ढूँढ रहा है। जो छात्र और सेवानिवृत्त लोग काम नहीं ढूँढ रहे, वे श्रम बल से बाहर हैं।
श्रम बल = रोज़गार में + बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100।
बेरोज़गारी के प्रकार
- घर्षणात्मक (frictional): एक नौकरी से दूसरी के बीच का छोटा अंतर।
- संरचनात्मक (structural): कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाते।
- चक्रीय (cyclical): मंदी के कारण।
- मौसमी (seasonal): सिर्फ़ कुछ मौसम में काम, जैसे खेती या पर्यटन।
सिर्फ़ घर्षणात्मक और संरचनात्मक बचे तो इसे प्राकृतिक दर कहते हैं। लागत: उत्पादन और आय का नुकसान, कौशल घटना, सरकारी सहायता का खर्च और परिवारों पर तनाव। कुछ लोग अल्प-रोज़गार (underemployed) में होते हैं: कम घंटे या कम कौशल वाला काम।
चालू खाता और व्यापार चक्र
चालू खाता बाकी दुनिया के साथ सामान-सेवाओं के व्यापार, आय और हस्तांतरण का हिसाब है। निर्यात आयात से ज़्यादा → अधिशेष; कम → घाटा।
व्यापार चक्र
वास्तविक GDP सीधी रेखा में नहीं बढ़ता, यह लंबी अवधि की प्रवृत्ति के आसपास ऊपर-नीचे होता है:
- विस्तार (तेज़ी): उत्पादन बढ़ता, बेरोज़गारी घटती, महँगाई बढ़ सकती है।
- शिखर: सबसे ऊपर; अर्थव्यवस्था 'गरम' हो सकती है।
- मंदी: वास्तविक GDP घटता है (अक्सर लगातार दो तिमाही), बेरोज़गारी बढ़ती है।
- गर्त: सबसे नीचे, फिर सुधार।
असली और संभावित उत्पादन का अंतर उत्पादन अंतराल (output gap) है। सरकार राजकोषीय नीति (कर और खर्च) और केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति (ब्याज दर) से चक्र को शांत करते हैं।
करके देखो: अपना मूल्य सूचकांक बनाओ
घर में हर हफ़्ते खरीदी जाने वाली 5 चीज़ों के दाम लिखो (1 लीटर दूध, ब्रेड, 1 kg चावल, बस टिकट, कॉपी)। सूची सँभाल कर रखो। तीन महीने बाद फिर देखो। दोनों जोड़ निकालो और (नया − पुराना) ÷ पुराना × 100 करो। यही तुम्हारे घर की महँगाई दर है। फिर 3D के आखिरी कदम में नाममात्र वृद्धि 6% और महँगाई 6% करो। वास्तविक वृद्धि का क्या हुआ?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वास्तविक GDP = नाममात्र GDP ÷ (मूल्य सूचकांक ÷ 100)
- वास्तविक वृद्धि ≈ नाममात्र वृद्धि − महँगाई
- प्रति व्यक्ति GDP = GDP ÷ जनसंख्या
- महँगाई दर = (नया सूचकांक − पुराना) ÷ पुराना × 100
- बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100; श्रम बल = रोज़गार में + बेरोज़गार
- चालू खाता शेष = निर्यात − आयात (सामान व सेवाएँ) + शुद्ध आय + शुद्ध हस्तांतरण
हल किए गए उदाहरण
1. नाममात्र GDP 220 अरब, मूल्य सूचकांक 110। वास्तविक GDP?
220 ÷ 1.1 = 200 अरब।
2. नाममात्र GDP 9% बढ़ा, महँगाई 5%। वास्तविक वृद्धि लगभग?
≈ 9% − 5% = 4%। (ठीक-ठीक: 1.09 ÷ 1.05 − 1 ≈ 3.8%)
3. टोकरी आधार वर्ष में ₹2500, इस साल ₹2650। सूचकांक और महँगाई?
सूचकांक = 2650 ÷ 2500 × 100 = 106। महँगाई = 6%।
4. CPI पिछले साल 120, इस साल 126। महँगाई?
6 ÷ 120 × 100 = 5%।
5. एक कस्बे में 46 000 रोज़गार में, 4 000 बेरोज़गार, 10 000 छात्र या सेवानिवृत्त। बेरोज़गारी दर?
श्रम बल = 50 000 (10 000 बाहर)। दर = 4 000 ÷ 50 000 × 100 = 8%।
6. देश A: GDP 3000 अरब, जनसंख्या 150 करोड़। देश B: GDP 400 अरब, जनसंख्या 4 करोड़। प्रति व्यक्ति GDP किसका ज़्यादा?
A: 3000 अरब ÷ 150 करोड़ = 2000 प्रति व्यक्ति। B: 400 अरब ÷ 4 करोड़ = 10 000 प्रति व्यक्ति। B ज़्यादा, भले कुल GDP A का बड़ा है।
आम गलतियाँ
- अलग-अलग सालों का नाममात्र GDP मिलाना। हमेशा महँगाई हटाकर वास्तविक GDP लो।
- सोचना कि महँगाई में हर चीज़ का दाम बराबर बढ़ता है। यह भारित टोकरी का औसत बदलाव है।
- छात्र या सेवानिवृत्त को बेरोज़गार गिनना। सिर्फ़ सक्रिय रूप से काम ढूँढने वाले बेरोज़गार हैं।
- अपस्फीति को 'कम महँगाई' कहना। अपस्फीति में दाम सच में घटते हैं; कम महँगाई में धीरे बढ़ते हैं।