National Year 12 Economics
अध्याय: 10
1. 4.1.1 Economic methodology and the economic problem
4.1.1.1 Economic methodology · 4.1.1.2 Purpose of economic activity · 4.1.1.3 Economic resources · 4.1.1.4 Scarcity, choice and allocation · 4.1.1.5 Production possibility diagrams
- आर्थिक पद्धति: अर्थशास्त्री कैसे सोचते हैं – अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। यह पढ़ता है कि लोग, कंपनियाँ और सरकार कम संसाधनों में कैसे चुनाव करते हैं। अर्थशास्त्री वैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं: अनुमान लगाओ, आँकड़े जुटाओ, जाँचो, फिर सिद्धांत बनाओ। पर लोग प्रयोगशाला के रसायन नहीं हैं, इसलिए वे मॉडल और 'अन्य बातें समान' (ceteris paribus) का सहारा लेते हैं। कथन दो तरह के होते हैं। सकारात्मक कथन बताता है कि क्या है, और आँकड़े उसे जाँच सकते हैं। मानक कथन बताता है कि क्या होना चाहिए, उसमें राय होती है।
- उत्पादन के साधन: भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यम – उत्पादन के साधन वे संसाधन हैं जिनसे वस्तुएँ और सेवाएँ बनती हैं। ये चार हैं: भूमि (प्राकृतिक संसाधन, पुरस्कार किराया/लगान), श्रम (मानव मेहनत, पुरस्कार मज़दूरी), पूँजी (इंसान के बनाए औज़ार-मशीनें, पुरस्कार ब्याज) और उद्यम (बाक़ी को जोड़ना और जोखिम उठाना, पुरस्कार लाभ)। इच्छाएँ असीमित और संसाधन सीमित हैं, इसलिए हर समाज को चुनना पड़ता है कि क्या, कैसे और किसके लिए बनाए। आर्थिक गतिविधि का उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा इच्छाएँ पूरी करना है।
- व्यष्टि अर्थशास्त्र का परिचय और उत्पादन संभावना वक्र – व्यष्टि अर्थशास्त्र एक खरीदार या एक फ़र्म जैसी छोटी इकाइयों को पढ़ता है; समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को। संसाधन दुर्लभ हैं और उनके कई उपयोग हैं, इसलिए हर अर्थव्यवस्था को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। उत्पादन संभावना वक्र (PPC) दो वस्तुओं के वे सबसे अच्छे मेल दिखाता है जो सारे संसाधन पूरे लगाने पर बन सकते हैं। इस पर चलने की एक अवसर लागत होती है जो आम तौर पर बढ़ती है, इसलिए वक्र अवतल होता है।
2. 4.1.3 Price determination in a competitive market
4.1.3.1 Demand · 4.1.3.2 Elasticities of demand · 4.1.3.3 Supply · 4.1.3.4 Price elasticity of supply · 4.1.3.5 Equilibrium prices · 4.1.3.6 Interrelated markets
- माँग और माँग की कीमत लोच – माँग = किसी समय में हर कीमत पर खरीदार जितनी वस्तु खरीदना चाहते और खरीद सकते हैं। बाज़ार माँग हर कीमत पर सब खरीदारों की माँग का जोड़ है। माँग अपनी कीमत, आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि, उम्मीदों और खरीदारों की संख्या पर निर्भर है। अपनी कीमत बदलने पर वक्र पर संचलन होता है; किसी और कारक से वक्र खिसकता है। माँग की कीमत लोच (Ed) = मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन; इसे कुल व्यय से भी पहचान सकते हैं।
- उत्पादक संतुलन और पूर्ति – उत्पादक संतुलन में होता है जब लाभ सबसे ज़्यादा हो और उत्पादन बदलने का कोई कारण न हो। MR–MC विधि में दो शर्तें: MR = MC, और MC बढ़ती हुई हो (MC, MR को नीचे से काटे)। पूर्ति = हर कीमत पर फ़र्में जितना बेचना चाहती और बेच सकती हैं। बाज़ार पूर्ति सब फ़र्मों की पूर्ति का जोड़ है। पूर्ति अपनी कीमत, आगत कीमतों, तकनीक, कर, अन्य वस्तुओं की कीमत, फ़र्मों की संख्या और उम्मीदों पर निर्भर है। अपनी कीमत से वक्र पर संचलन; बाकी कारकों से खिसकाव। Es = पूर्ति की मात्रा में % परिवर्तन ÷ कीमत में % परिवर्तन।
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
- संबंधित बाज़ार: स्थानापन्न, पूरक और अन्य कड़ियाँ – बाज़ार आपस में जुड़े हैं, इसलिए एक बाज़ार का बदलाव दूसरों की माँग या पूर्ति बदल देता है। स्थानापन्न वस्तुएँ (प्रतियोगी माँग) एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल होती हैं: एक की कीमत बढ़े तो दूसरी की माँग बढ़ती है। पूरक वस्तुएँ (संयुक्त माँग) साथ इस्तेमाल होती हैं: एक की कीमत बढ़े तो दूसरी की माँग घटती है। व्युत्पन्न माँग किसी चीज़ की वह माँग है जो दूसरी चीज़ बनाने के लिए होती है (मकानों के लिए ईंटें, उत्पादन के लिए मज़दूर)। सम्मिश्र माँग में एक वस्तु के कई उपयोग होते हैं, एक उपयोग बढ़े तो बाकी के लिए कम बचता है। संयुक्त पूर्ति में एक चीज़ बनाने से दूसरी भी बनती है (मांस और चमड़ा)। ये कड़ियाँ असर को एक बाज़ार से दूसरे तक फैलाती हैं।
3. 4.1.4 Production, costs and revenue
4.1.4.1 Production and productivity · 4.1.4.2 Specialisation and exchange · 4.1.4.4 Costs of production · 4.1.4.5 Economies of scale
- उत्पादकता: हर आगत से ज़्यादा उत्पादन – उत्पादन (production) कुल बनी मात्रा है। उत्पादकता (productivity) हर इकाई आगत से मिलने वाला उत्पादन है, जैसे प्रति श्रमिक प्रति घंटा डिब्बे। श्रम उत्पादकता = उत्पादन ÷ श्रमिक (या श्रम-घंटे)। यह प्रशिक्षण, बेहतर मशीनें और तकनीक, प्रेरणा, अच्छी विधियाँ और विशिष्टीकरण से बढ़ती है। ज़्यादा उत्पादकता से प्रति इकाई लागत घटती है, मज़दूरी और लाभ बढ़ सकते हैं, और देश का विकास होता है। व्यवसाय क्षमता उपयोग (वास्तविक ÷ अधिकतम उत्पादन × 100) पर भी नज़र रखते हैं और श्रम-प्रधान या पूँजी-प्रधान तरीका चुनते हैं।
- श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण – विशिष्टीकरण का मतलब है कोई व्यक्ति, फ़र्म, क्षेत्र या देश एक (या कुछ) चीज़ें बनाने पर ध्यान दे। श्रम विभाजन कार्यस्थल के अंदर का विशिष्टीकरण है: बड़े काम को छोटे हिस्सों में बाँटा जाता है और हर मज़दूर एक हिस्सा करता है। मज़दूर कुशल और तेज़ होते हैं, काम बदलने में समय नहीं जाता, ख़ास मशीनें लगती हैं, इसलिए प्रति मज़दूर उत्पादन बढ़ता और प्रति इकाई लागत घटती है। हानियाँ: उबाऊ दोहराव वाला काम, एक के न आने से पूरी लाइन रुकना, संकरा कौशल और दूसरों पर निर्भरता। विशेषज्ञ एक चीज़ ज़रूरत से ज़्यादा बनाता है और बाकी नहीं बनाता, इसलिए विनिमय ज़रूरी है; मुद्रा 'आवश्यकताओं के दोहरे संयोग' की ज़रूरत हटाकर विनिमय आसान बनाती है।
- लागत और आगम: TC, AC, MC और TR, AR, MR – लागत वह खर्च है जो फ़र्म आगतों पर करती है। कुल लागत (TC) = कुल स्थिर लागत (TFC) + कुल परिवर्ती लागत (TVC)। उत्पादन से भाग देने पर AFC, AVC और AC मिलते हैं; सीमांत लागत (MC) एक और इकाई की अतिरिक्त लागत है। AFC लगातार घटती है; AVC, AC और MC U-आकार की हैं, और MC, AVC व AC को उनके न्यूनतम पर काटती है। आगम = बिक्री से मिला पैसा: TR = P × q, AR = TR/q = कीमत, MR = एक और इकाई से TR में वृद्धि। कीमत स्थिर हो तो AR = MR; कीमत घटे तो MR, AR से नीचे और MR = 0 पर TR अधिकतम।
- पैमाने की बचत: बड़ा होना सस्ता क्यों पड़ता है – औसत लागत = कुल लागत ÷ उत्पादन। पैमाने की बचत (मितव्ययिता) वह कमी है जो फर्म के बड़ा होने पर दीर्घकालीन औसत लागत में आती है। आंतरिक बचत एक फर्म के अंदर: क्रय, तकनीकी, वित्तीय, विपणन, प्रबंधकीय और जोखिम-वहन। बाहरी बचत पूरे उद्योग के एक इलाक़े में बढ़ने से: कुशल श्रमिक, आपूर्तिकर्ता, आधारभूत ढाँचा, साझा शोध। फर्म बहुत बड़ी हो जाए तो पैमाने की हानि (कमज़ोर संचार, तालमेल और प्रेरणा) से औसत लागत बढ़ती है। LRAC वक्र अक्सर U या L आकार का होता है; न्यूनतम कुशल पैमाना (MES) वह सबसे कम उत्पादन है जहाँ औसत लागत न्यूनतम होती है।
4. 4.1.5 Competitive and concentrated markets
4.1.5.1 Market structures · 4.1.5.2 Objectives of firms · 4.1.5.3 Competitive markets · 4.1.5.6 Monopoly and monopoly power · 4.1.5.8 The competitive market process
- बाज़ार संरचना: पूर्ण प्रतियोगिता से एकाधिकार तक – बाज़ार संरचना बताती है कि कितनी फ़र्में बेचती हैं, उनका माल कितना मिलता-जुलता है, और नई फ़र्म का आना कितना आसान है। पूर्ण प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, एक-जैसा माल, मुक्त प्रवेश, कीमत स्वीकारक, दीर्घकाल में सामान्य लाभ। एकाधिकारी प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, विभेदित माल, आसान प्रवेश, थोड़ी कीमत शक्ति। अल्पाधिकार: कुछ परस्पर निर्भर फ़र्में, ऊँची बाधाएँ, रणनीति (खेल सिद्धांत, गठजोड़, कीमत नेतृत्व)। एकाधिकार: एक फ़र्म, कोई निकट विकल्प नहीं, ऊँची बाधाएँ, कीमत निर्धारक, असामान्य लाभ और कीमत विभेद संभव। प्रतिस्पर्धा-योग्य बाज़ार दिखाते हैं कि नए आने का डर भी ताक़त को सीमित करता है।
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
5. 4.1.8 Market mechanism, market failure and government intervention
4.1.8.1 How markets allocate resources · 4.1.8.2 Market failure types · 4.1.8.3 Public goods · 4.1.8.4 Externalities · 4.1.8.5 Merit and demerit goods · 4.1.8.6 Market imperfections and inequality · 4.1.8.9 Government intervention in markets · 4.1.8.10 Government failure
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।
- सार्वजनिक वस्तुएँ और मुफ़्तखोर समस्या – ज़्यादातर वस्तुएँ निजी होती हैं: मैं इस्तेमाल करूँ तो तुम नहीं कर सकते (प्रतिद्वंद्वी), और विक्रेता बिना पैसे वाले को रोक सकता है (अपवर्जी)। शुद्ध सार्वजनिक वस्तु उल्टी होती है: गैर-प्रतिद्वंद्वी (एक और उपयोगकर्ता से कुछ कम नहीं होता) और गैर-अपवर्जी (न देने वालों को रोक नहीं सकते)। स्ट्रीट लाइट, बाढ़ की दीवार, प्रकाशस्तंभ इसके उदाहरण हैं। मुफ़्त मिलने के कारण लोग दूसरों के देने का इंतज़ार करते हैं: मुफ़्तखोर समस्या। कंपनी कमा नहीं पाती, इसलिए बाज़ार इसे बनाता ही नहीं। इसलिए सरकार कर से इन्हें देती है।
- गुण वस्तुएँ और अवगुण वस्तुएँ – गुण वस्तु (merit good), जैसे शिक्षा या टीका, तुम्हारे लिए तुम्हारी सोच से ज़्यादा अच्छी है, और दूसरों की भी मदद करती है। मुक्त बाज़ार में लोग इसे कम लेते हैं। अवगुण वस्तु (demerit good), जैसे सिगरेट या शराब, तुम्हारी सोच से ज़्यादा नुकसानदेह है, और अक्सर दूसरों को भी नुकसान पहुँचाती है। लोग इसे ज़्यादा लेते हैं। मुख्य कारण सूचना विफलता है: लोगों के पास लंबे समय के लाभ और नुकसान की पूरी जानकारी नहीं होती। सरकार गुण वस्तुओं के लिए सब्सिडी, मुफ़्त आपूर्ति और जानकारी देती है, और अवगुण वस्तुओं पर कर, नियम, रोक और चेतावनी लगाती है।
- उच्चतम कीमत सीमा और निम्नतम कीमत सीमा – उच्चतम कीमत सीमा क़ानूनी अधिकतम कीमत है, जो संतुलन से नीचे रखी जाती है; इससे कमी (अधिक माँग), कतारें, राशनिंग और काला बाज़ार बनते हैं। निम्नतम कीमत सीमा क़ानूनी न्यूनतम कीमत है, जो संतुलन से ऊपर रखी जाती है; इससे अधिशेष (अधिक पूर्ति) बनता है जिसे सरकार अक्सर खरीदकर रखती है, जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य। संतुलन से ऊपर उच्चतम सीमा या नीचे निम्नतम सीमा का कोई असर नहीं होता।
- बाज़ार में सरकारी हस्तक्षेप – बाज़ार अक्सर अच्छा काम करते हैं, पर विफल भी हो सकते हैं: हानिकारक चीज़ें ज़्यादा इस्तेमाल होती हैं, उपयोगी चीज़ें कम, सार्वजनिक वस्तुएँ बनती ही नहीं, फ़र्मों को एकाधिकार मिल जाता है और आय में बहुत असमानता आती है। सरकार दख़ल देती है: अप्रत्यक्ष कर (कीमत बढ़ाते, मात्रा घटाते हैं), सब्सिडी (कीमत घटाती, मात्रा बढ़ाती है), अधिकतम और न्यूनतम कीमत, नियमन, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं की व्यवस्था, सरकारी स्वामित्व या निजीकरण, प्रतिस्पर्धा नीति, और कर व लाभों से पुनर्वितरण। वह आर्थिक चक्र को संभालने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीति भी अपनाती है। हस्तक्षेप ख़ुद भी ग़लत हो सकता है – इसे सरकारी विफलता कहते हैं।
6. 4.2.1 Measurement of macroeconomic performance
4.2.1.1 Government policy objectives · 4.2.1.2 Macroeconomic indicators · 4.2.1.3 Index numbers
- समष्टि अर्थशास्त्र के उद्देश्य और नीतियों का टकराव – सरकार पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चार मुख्य चीज़ें चाहती है: वास्तविक GDP की लगातार वृद्धि, कम बेरोज़गारी, स्थिर क़ीमतें (कम मुद्रास्फीति, अक्सर लगभग 2%) और संतुलित व्यापार। कई सरकारें आय की समानता और पर्यावरण की रक्षा भी चाहती हैं। ये लक्ष्य अक्सर आपस में टकराते हैं, इसलिए सरकार को चुनाव (trade-off) करना पड़ता है।
- समष्टि आर्थिक सूचक: GDP, महँगाई और बेरोज़गारी – सरकारें कुछ मुख्य संख्याओं से देखती हैं कि अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है। इन्हें समष्टि आर्थिक सूचक (macroeconomic indicators) कहते हैं। मुख्य हैं: वास्तविक GDP वृद्धि (उत्पादन बढ़ा या नहीं), मुद्रास्फीति (दाम कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं), बेरोज़गारी (काम चाहने वालों को काम मिल रहा है या नहीं) और चालू खाता शेष (बाकी दुनिया से लेन-देन में देश की स्थिति)। हर सूचक का सूत्र भी है और सीमाएँ भी।
- सूचकांक: सरल समूही विधि, WPI, CPI, IIP, उपयोग और मुद्रास्फीति – सूचकांक एक संख्या है जो बताती है कि किसी चीज़ (दाम या उत्पादन) में आधार वर्ष की तुलना में कितना बदलाव हुआ; आधार वर्ष का सूचकांक 100 होता है। सरल समूही मूल्य सूचकांक = ΣP1 ÷ ΣP0 × 100। भारित सूचकांक ज़्यादा ख़रीदी जाने वाली चीज़ों को ज़्यादा महत्व देते हैं। भारत के मुख्य सूचकांक हैं: खुदरा दामों का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक दामों का थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और कारख़ाना उत्पादन का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP)। महँगाई दर एक साल में मूल्य सूचकांक की प्रतिशत बढ़त है।
7. 4.2.2 How the macroeconomy works
4.2.2.1 Circular flow of income · 4.2.2.2 AD/AS analysis
- आय का चक्रीय प्रवाह और राष्ट्रीय आय मापने की तीन विधियाँ – दो-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ देते हैं और साधन भुगतान (किराया, मज़दूरी, ब्याज, लाभ) पाते हैं; यह आय वे फर्मों की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। पैसा वस्तुओं के वास्तविक प्रवाह की उलटी दिशा में घूमता है। क्योंकि वही पैसा तीन जगहों से गुज़रता है, राष्ट्रीय आय तीन तरह से मापी जा सकती है: उत्पादकों का मूल्य वर्धन (उत्पाद विधि), साधनों को दी गई आय (आय विधि), और अंतिम वस्तुओं पर खर्च (व्यय विधि)। तीनों का जोड़ बराबर आता है।
- समग्र माँग, उपभोग और बचत प्रवृत्तियाँ, और निवेश गुणक – समग्र माँग (AD) = अंतिम वस्तुओं पर कुल नियोजित खर्च: C + I + G + (X − M); दो-क्षेत्रक मॉडल में AD = C + I। उपभोग आय पर निर्भर है: C = c̄ + bY, जहाँ b = MPC। APC = C/Y, MPC = ΔC/ΔY, APS = S/Y, MPS = ΔS/ΔY; APC + APS = 1 और MPC + MPS = 1। अल्पकालीन संतुलन उत्पादन वहाँ है जहाँ AD = AS (नियोजित खर्च = उत्पादन), या बचत = नियोजित निवेश। निवेश बढ़ने पर आय कई गुना बढ़ती है: k = ΔY/ΔI = 1/(1 − MPC) = 1/MPS।
8. 4.2.3 Economic performance
4.2.3.1 Growth and the economic cycle · 4.2.3.2 Unemployment · 4.2.3.3 Inflation and deflation · 4.2.3.4 Policy conflicts · 4.2.6.3 Balance of payments: current account
- आर्थिक संवृद्धि: देश हर साल ज़्यादा कैसे बनाता है – आर्थिक संवृद्धि यानी देश के वास्तविक GDP में बढ़त: एक साल में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य, कीमत-वृद्धि का असर हटाकर। संवृद्धि दर वास्तविक GDP का प्रतिशत बदलाव है। प्रति व्यक्ति GDP बताता है कि औसतन हर व्यक्ति के हिस्से कितना उत्पादन आया। व्यापार चक्र में संवृद्धि प्रवृत्ति के ऊपर-नीचे होती है, जिससे उत्पादन अंतर बनता है। संवृद्धि ज़्यादा और बेहतर साधनों (मज़दूर, कौशल, मशीनें, तकनीक) से आती है; इससे आय और नौकरियाँ बढ़ती हैं, पर प्रदूषण, असमानता और महँगाई भी आ सकती है।
- बेरोज़गारी: अर्थ, दर, प्रकार, नुकसान और उपाय – कोई व्यक्ति बेरोज़गार तब है जब उसके पास नौकरी नहीं, वह काम कर सकता है, और सक्रिय रूप से काम ढूँढ रहा है। श्रम बल यानी सभी रोज़गार वाले और सभी बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100। अर्थशास्त्री कारण के हिसाब से इसे बाँटते हैं: घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), संरचनात्मक (कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाती), चक्रीय (कुल माँग में मंदी) और मौसमी (कुछ ही महीने काम)। बेरोज़गारी से व्यक्ति की आय जाती है, देश का उत्पादन और कर घटता है, और सेहत व समाज को नुकसान होता है। चक्रीय के लिए सरकार ख़र्च और ब्याज दर का सहारा लेती है; बाक़ी के लिए प्रशिक्षण, जानकारी और आवागमन। कुछ बेरोज़गारी हमेशा रहती है; सबसे कम टिकाऊ स्तर को प्राकृतिक दर कहते हैं।
- मुद्रास्फीति: कीमतें क्यों बढ़ती रहती हैं – मुद्रास्फीति कीमतों के सामान्य स्तर में लगातार वृद्धि है, जिससे पैसे की क्रय शक्ति घटती है। इसे CPI जैसे मूल्य सूचकांक से मापते हैं: दर = (नया सूचकांक − पुराना) ÷ पुराना × 100। कारण: माँग-जनित, लागत-जनित और अपेक्षाएँ। इसका असर बचत करने वालों, स्थिर आय और निर्यात पर पड़ता है। अपस्फीति में कीमतें गिरती हैं। केंद्रीय बैंक ब्याज दर से कम, स्थिर मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखते हैं।
- समष्टि अर्थशास्त्र के उद्देश्य और नीतियों का टकराव – सरकार पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चार मुख्य चीज़ें चाहती है: वास्तविक GDP की लगातार वृद्धि, कम बेरोज़गारी, स्थिर क़ीमतें (कम मुद्रास्फीति, अक्सर लगभग 2%) और संतुलित व्यापार। कई सरकारें आय की समानता और पर्यावरण की रक्षा भी चाहती हैं। ये लक्ष्य अक्सर आपस में टकराते हैं, इसलिए सरकार को चुनाव (trade-off) करना पड़ता है।
- भुगतान संतुलन – भुगतान संतुलन एक साल में किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का रिकॉर्ड है। चालू खाते में वस्तुएँ, सेवाएँ, अंतरण और आय आते हैं; पूँजी खाते में निवेश, ऋण और जमा। स्वायत्त लेन-देन अपने कारण से होते हैं; समायोजक (भंडार में बदलाव) अंतर पाटते हैं। अधिशेष में भंडार बढ़ता है, घाटे में घटता है।
9. 4.2.4 Monetary policy
4.2.4.3 Monetary policy
- मौद्रिक नीति (Monetary Policy) – मौद्रिक नीति वह है जिसमें केंद्रीय बैंक ब्याज दरों और मुद्रा आपूर्ति से कीमतें स्थिर रखता है और वृद्धि व रोज़गार को सहारा देता है। नीतिगत दर बढ़ाने से उधार महँगा, खर्च और समग्र माँग कम, और महँगाई कम होती है (संकुचनकारी)। दर घटाने से उलटा होता है (विस्तारकारी)। दूसरे औज़ार: खुले बाज़ार की क्रियाएँ, मात्रात्मक सहजता (QE), आरक्षित अनुपात और भावी मार्गदर्शन। ज़्यादातर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति लक्ष्य रखते हैं और सरकार से स्वतंत्र होते हैं। इसका असर देर से आता है और दरें शून्य के पास हों तो कमज़ोर पड़ता है।
10. 4.2.5 Fiscal policy and supply-side policies
4.2.5.1 Fiscal policy · 4.2.5.2 Supply-side policies
- सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था – सरकारी बजट एक साल की योजना है जिसमें अनुमानित आय (प्राप्तियाँ) और योजनाबद्ध खर्च (व्यय) लिखे होते हैं। प्राप्तियाँ राजस्व (कर, गैर-कर) या पूँजीगत (उधार, कर्ज़ वसूली, विनिवेश) होती हैं। व्यय राजस्व (कोई संपत्ति नहीं) या पूँजीगत (संपत्ति बने या कर्ज़ घटे) होता है। बजट संतुलित, अधिशेष या घाटे का हो सकता है, और घाटा राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटे से नापा जाता है।
- आपूर्ति पक्ष नीतियाँ (Supply-Side Policies) – आपूर्ति पक्ष नीतियाँ यह बढ़ाने की कोशिश करती हैं कि अर्थव्यवस्था कितना बना सकती है (उत्पादन क्षमता), सिर्फ़ यह नहीं कि लोग कितना ख़रीदना चाहते हैं। लक्ष्य है: मज़दूर ज़्यादा हुनरमंद हों, बाज़ार बेहतर चलें और कंपनियाँ ज़्यादा निवेश करें। बाज़ार-आधारित नीतियाँ लोगों और कंपनियों को काम और प्रतिस्पर्धा का लालच देती हैं: आयकर और लाभ कर घटाना, बेकार नियम हटाना (डीरेगुलेशन), सरकारी कंपनियाँ बेचना (निजीकरण) और श्रमिक संघ सुधार। हस्तक्षेपवादी नीतियाँ सरकारी ख़र्च से चलती हैं: शिक्षा, प्रशिक्षण, सड़क, बंदरगाह, इंटरनेट और शोध। सफल हों तो LRAS वक्र दाईं ओर खिसकता है: उत्पादन और रोज़गार बढ़ते हैं, क़ीमतों पर दबाव नहीं बढ़ता। पर ये धीमी हैं, महँगी हो सकती हैं, और कुछ असमानता बढ़ा सकती हैं।