समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) क्या है?
समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को एक साथ देखता है। यह एक दुकान या एक परिवार को नहीं, बल्कि कुल योग को पढ़ता है: कुल उत्पादन (GDP), सामान्य क़ीमत स्तर, कुल रोज़गार और दूसरे देशों से व्यापार।
सरकार एक ड्राइवर जैसी है। वह कुछ बड़े आँकड़ों पर नज़र रखती है और सबको एक साथ अच्छे क्षेत्र में रखने की कोशिश करती है।
चार मुख्य समष्टि आर्थिक उद्देश्य
1. आर्थिक वृद्धि
वृद्धि का मतलब है वास्तविक GDP (क़ीमत बढ़ने का असर हटाकर उत्पादन) बढ़ना। अमीर देशों में लक्ष्य लगभग 2–3% सालाना स्थिर और टिकाऊ वृद्धि होता है; भारत जैसे तेज़ी से बढ़ते देशों में 6–8% भी।
2. कम बेरोज़गारी
बेरोज़गार वह है जो काम चाहता है, ढूँढ रहा है, पर पाता नहीं। पूर्ण रोज़गार का मतलब शून्य नहीं; लगभग 3–5% सामान्य है क्योंकि लोग नौकरी बदलते रहते हैं।
3. स्थिर क़ीमतें (कम मुद्रास्फीति)
मुद्रास्फीति यानी सामान्य क़ीमत स्तर का बढ़ना। कई केंद्रीय बैंक लगभग 2% सालाना का लक्ष्य रखते हैं (भारत में 4%, सीमा 2–6%)। बहुत ज़्यादा महँगाई बचत करने वालों और ग़रीबों को चोट पहुँचाती है; क़ीमतें गिरना (अपस्फीति) भी नुक़सानदेह है।
4. संतुलित व्यापार (चालू खाता)
देश लंबे समय तक बाहर से बहुत ज़्यादा ख़रीदे और कम बेचे, यह ठीक नहीं। बड़ा, लंबा घाटा उधार लेकर या संपत्ति बेचकर भरना पड़ता है।
अन्य उद्देश्य
- आय और संपत्ति का न्यायपूर्ण बँटवारा: अमीर और ग़रीब के बीच की खाई कम करना।
- पर्यावरण की रक्षा: ऐसी वृद्धि जो साफ़ हवा, पानी और जंगल ख़त्म न करे (धारणीय वृद्धि)।
- संतुलित सरकारी बजट: ऐसा क़र्ज़ न हो जो अर्थव्यवस्था से तेज़ बढ़ता जाए।
हर सरकार इन लक्ष्यों को अलग क्रम में रखती है। यह क्रम एक मूल्य-निर्णय (value judgement) है।
नीतियों का टकराव: उद्देश्यों के बीच समझौता
समझौता (trade-off) यानी एक चीज़ ज़्यादा पाने के लिए दूसरी कुछ छोड़नी पड़े। आम टकराव:
- बेरोज़गारी बनाम महँगाई: ज़्यादा ख़र्च से नौकरियाँ बनती हैं, पर अर्थव्यवस्था पूरी क्षमता के पास हो तो कंपनियाँ दाम बढ़ाती हैं (फ़िलिप्स वक्र यही अल्पकालीन संबंध दिखाता है)।
- वृद्धि बनाम संतुलित व्यापार: आय बढ़ने पर लोग ज़्यादा आयातित फ़ोन, तेल, गाड़ियाँ ख़रीदते हैं, तो व्यापार घाटा बढ़ता है।
- वृद्धि बनाम पर्यावरण: ज़्यादा कारख़ाने और गाड़ियाँ = ज़्यादा प्रदूषण।
- वृद्धि बनाम समानता: तेज़ वृद्धि का फ़ायदा पहले कुशल लोगों और मालिकों को मिल सकता है।
- कम महँगाई बनाम वृद्धि: ब्याज दर बढ़ाने से क़र्ज़ महँगा होता है, कंपनियाँ कम निवेश करती हैं।
टकराव हमेशा पक्का नहीं। बेहतर तकनीक और कौशल से आई वृद्धि (आपूर्ति पक्ष की वृद्धि) बिना ज़्यादा महँगाई के उत्पादन बढ़ा सकती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वास्तविक GDP वृद्धि दर = (इस साल − पिछले साल) ÷ पिछले साल × 100
- बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100
- मुद्रास्फीति दर = (अभी का क़ीमत सूचकांक − साल भर पहले का) ÷ साल भर पहले का × 100
- व्यापार संतुलन = निर्यात − आयात (ऋणात्मक = घाटा)
- मुख्य शब्द: trade-off = एक लक्ष्य ज़्यादा पाने के लिए दूसरे का कुछ हिस्सा छोड़ना
हल किए गए उदाहरण
1. पिछले साल वास्तविक GDP 200 अरब था, इस साल 206 अरब। वृद्धि दर कितनी? क्या यह सामान्य लक्ष्य के पास है?
वृद्धि = (206 − 200) ÷ 200 × 100 = 3%। हाँ, यह अमीर देश के 2–3% क्षेत्र में है।
2. 5 करोड़ के श्रम बल में 30 लाख बेरोज़गार हैं। बेरोज़गारी दर निकालो।
दर = 0.3 ÷ 5 × 100 = 6%। यह 3–5% के अच्छे क्षेत्र से थोड़ी ऊपर है।
3. 9% बेरोज़गारी से लड़ने के लिए सरकार आयकर घटाती है। कौन-से उद्देश्य बिगड़ सकते हैं?
लोग ज़्यादा ख़र्च करेंगे, कंपनियाँ लोगों को रखेंगी (बेरोज़गारी घटेगी)। पर महँगाई बढ़ सकती है, आयात बढ़ेगा (व्यापार घाटा) और टैक्स कम आने से बजट घाटा बढ़ेगा।
आम गलतियाँ
- पूर्ण रोज़गार को 0% बेरोज़गारी समझना। कुछ लोग हमेशा नौकरी बदलने के बीच होते हैं।
- शून्य महँगाई को लक्ष्य समझना। ज़्यादातर केंद्रीय बैंक लगभग 2% जैसी छोटी, स्थिर दर चाहते हैं।
- वृद्धि के लिए मौद्रिक (nominal) GDP लेना। वृद्धि हमेशा वास्तविक GDP से मापो।
- यह कहना कि उद्देश्य हमेशा टकराते हैं। आपूर्ति पक्ष की वृद्धि बिना ज़्यादा महँगाई के उत्पादन बढ़ा सकती है।