मुद्रास्फीति क्या है?
मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के कीमत स्तर में सामान्य और लगातार वृद्धि है। बारिश के बाद सिर्फ़ प्याज़ महँगा होना अपने आप में मुद्रास्फीति नहीं है; ज़्यादातर चीज़ें महँगी हों, तब मुद्रास्फीति है।
कीमतें बढ़ने पर हर रुपया कम चीज़ें ख़रीदता है, यानी पैसे की क्रय शक्ति घटती है।
- अवस्फीति (disinflation): मुद्रास्फीति धनात्मक है पर धीमी हो रही है (8% → 4%)।
- अपस्फीति (deflation): कीमत स्तर गिरता है।
- अति-मुद्रास्फीति (hyperinflation): बहुत तेज़ वृद्धि, जैसे महीने में 50% से ज़्यादा।
मुद्रास्फीति कैसे मापते हैं: मूल्य सूचकांक
सांख्यिकीविद एक आम परिवार की ख़रीद की टोकरी (खाना, मकान, ईंधन, यातायात, शिक्षा) पर नज़र रखते हैं। हर चीज़ को ख़र्च के हिसाब से भार दिया जाता है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में आधार वर्ष की कीमत = 100।
सूचकांक = अभी की टोकरी कीमत ÷ आधार वर्ष की कीमत × 100
मुद्रास्फीति दर = (इस साल का सूचकांक − पिछले साल का) ÷ पिछले साल का × 100
सीमाएँ: टोकरी हर परिवार से मेल नहीं खाती, गुणवत्ता का बदलाव मापना कठिन है, नई चीज़ें आती रहती हैं। थोक मूल्य सूचकांक जैसे दूसरे सूचकांक भी होते हैं।
कारण: माँग-जनित, लागत-जनित और अपेक्षाएँ
माँग-जनित (demand-pull)
कुल माँग उत्पादन क्षमता से तेज़ बढ़ती है: ज़्यादा उपभोक्ता ख़र्च, कम ब्याज और आसान क़र्ज़, मुद्रा पूर्ति की तेज़ बढ़त, बड़ा सरकारी ख़र्च, बढ़ता निर्यात।
लागत-जनित (cost-push)
उत्पादन लागत बढ़ती है: मज़दूरी, तेल-ऊर्जा, आयातित कच्चा माल (कमज़ोर मुद्रा से महँगा), अप्रत्यक्ष कर। फ़र्में मुनाफ़ा बचाने को कीमत बढ़ाती हैं।
अपेक्षाएँ और मज़दूरी-कीमत चक्र
लोग कीमतें बढ़ने की उम्मीद करें तो मज़दूर ज़्यादा वेतन माँगते हैं और फ़र्में पहले ही दाम बढ़ा देती हैं।
अपस्फीति के कारण
कमज़ोर माँग (मंदी, घटता भरोसा) या घटती लागत और बेहतर तकनीक।
मुद्रास्फीति और अपस्फीति के प्रभाव
- ब्याज मुद्रास्फीति से कम हो तो बचत करने वाले हारते हैं; क़र्ज़ लेने वाले फ़ायदे में, क्योंकि कम क़ीमत वाले पैसे में चुकाते हैं।
- स्थिर आय (पेंशन, कुछ वेतन) का वास्तविक मूल्य घटता है।
- प्रतिस्पर्धा: कीमतें विदेश से तेज़ बढ़ें तो निर्यात महँगा, आयात सस्ता।
- मेन्यू लागत: दाम-सूचियाँ बदलने का ख़र्च।
- अनिश्चितता: फ़र्में कम निवेश करती हैं।
- हल्की मुद्रास्फीति मदद भी करती है: लोग अभी ख़र्च करते हैं।
अपस्फीति ख़तरनाक हो सकती है: लोग ख़रीद टालते हैं, फ़र्में उत्पादन और नौकरियाँ घटाती हैं, क़र्ज़ का वास्तविक बोझ बढ़ता है।
मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी और नीति
कम, स्थिर मुद्रास्फीति सरकार के मुख्य लक्ष्यों में है, साथ में विकास, कम बेरोज़गारी और संतुलित भुगतान शेष। कई केंद्रीय बैंक लगभग 2% का लक्ष्य रखते हैं; भारतीय रिज़र्व बैंक 4% (2–6% के बीच)।
फ़िलिप्स वक्र: अल्पकाल में कम बेरोज़गारी के साथ अक्सर ज़्यादा मुद्रास्फीति आती है, क्योंकि तेज़ माँग नौकरियाँ और कीमतें दोनों बढ़ाती है। दीर्घकाल में यह संबंध मिट सकता है। 1970 के तेल संकट में ऊँची मुद्रास्फीति और ऊँची बेरोज़गारी साथ आई (मुद्रास्फीतिजनित मंदी, stagflation)।
नियंत्रण
- मौद्रिक नीति: ब्याज दर बढ़ाना → क़र्ज़ और ख़र्च घटते हैं।
- राजकोषीय नीति: ज़्यादा कर या कम सरकारी ख़र्च।
- आपूर्ति पक्ष नीति: उत्पादकता बढ़ाना।
घर पर करके देखें
कोई पुराना बिल या 5–10 साल पुराना विज्ञापन खोजें और 3 चीज़ों की कीमत लिखें। आज की कीमत पता करें। हर चीज़ की प्रतिशत बढ़त निकालें। फिर चरण 6 का स्लाइडर चलाकर देखें कि कौन-सी सालाना दर इतनी बढ़त देती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मूल्य सूचकांक = अभी की टोकरी कीमत ÷ आधार वर्ष की कीमत × 100
- मुद्रास्फीति दर (%) = (P₂ − P₁) ÷ P₁ × 100
- वास्तविक मूल्य = मौद्रिक मूल्य ÷ (सूचकांक ÷ 100)
- वास्तविक ब्याज दर ≈ मौद्रिक ब्याज दर − मुद्रास्फीति दर
- n साल बाद कीमत = P × (1 + r)ⁿ
- 70 का नियम: कीमतें दोगुनी होने के साल ≈ 70 ÷ दर
हल किए गए उदाहरण
1. टोकरी पिछले साल 2000 की, इस साल 2100 की। मुद्रास्फीति दर?
(2100 − 2000) ÷ 2000 × 100 = 5%।
2. CPI 120 से 126 हुआ। दर?
6 ÷ 120 × 100 = 5%।
3. बैंक 6% ब्याज देता है, मुद्रास्फीति 8% है। वास्तविक ब्याज दर?
6 − 8 = −2%। साल भर बाद पैसा लगभग 2% कम ख़रीदता है।
4. वेतन 30,000 से 31,500 हुआ, CPI 100 से 107। क्या वास्तविक वेतन बढ़ा?
वेतन 5% बढ़ा, कीमतें 7%। वास्तविक वेतन = 31,500 ÷ 1.07 ≈ 29,439, यानी लगभग 2% घटा।
5. मुद्रास्फीति लगातार 7% है। कीमतें कितने साल में दोगुनी होंगी?
70 ÷ 7 = 10 साल। जाँच: 1.07¹⁰ ≈ 1.97।
6. दुनिया में तेल दोगुना महँगा हुआ और बेरोज़गारी भी बढ़ी। कौन-सी मुद्रास्फीति है, नीति क्यों कठिन है?
लागत-जनित। उत्पादन घटता है और कीमतें बढ़ती हैं (stagflation)। ब्याज बढ़ाने से मुद्रास्फीति घटेगी पर बेरोज़गारी बढ़ेगी; ब्याज घटाने से उल्टा।
आम गलतियाँ
- एक चीज़ (जैसे टमाटर) के महँगे होने को मुद्रास्फीति कहना।
- यह सोचना कि दर 6% से 3% होने पर कीमतें घटती हैं; वे अब भी बढ़ती हैं, बस धीरे।
- प्रतिशत बदलाव में पुरानी की जगह नई कीमत से भाग देना।
- हर मुद्रास्फीति को बुरा मानना; कम, स्थिर मुद्रास्फीति ही लक्ष्य है।