South 고등학교 3학년 Economics
अध्याय: 5
1. Economic life and problems
Scarcity · Costs and benefits · Economic systems · Economic agents
- चयन की समस्या: दुर्लभता और अवसर लागत – हमारी इच्छाएँ असीमित हैं, पर पैसा, समय, ज़मीन और मज़दूर जैसे संसाधन सीमित हैं। इसे दुर्लभता कहते हैं, और यह हमें चुनने पर मजबूर करती है। जो अगला सबसे अच्छा विकल्प छोड़ा, उसका मूल्य अवसर लागत है। अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं कि लोग और समाज ये चुनाव कैसे करते हैं। हर समाज को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। बाज़ार, नियोजित और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ इनका अलग-अलग जवाब देती हैं, और कल्याणकारी राज्य सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता है।
- आर्थिक प्रणालियाँ: क्या, कैसे और किसके लिए, कौन तय करता है? – हर समाज के पास साधन सीमित हैं, इसलिए उसे तय करना पड़ता है कि क्या बनाए, कैसे बनाए और किसके लिए। पारंपरिक अर्थव्यवस्था में रीति-रिवाज, बाज़ार अर्थव्यवस्था में कीमतें और निजी फ़ैसले, और आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था में सरकार की योजना यह तय करती है। पूँजीवाद निजी संपत्ति और बाज़ार पर टिका है; समाजवाद साझा या सरकारी स्वामित्व और योजना पर। असली देश मिश्रित हैं: ज़्यादातर चीज़ें बाज़ार बनाता है, और सरकार जन-सेवाएँ, नियम और सहायता देती है।
- आय का चक्रीय प्रवाह और राष्ट्रीय आय मापने की तीन विधियाँ – दो-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ देते हैं और साधन भुगतान (किराया, मज़दूरी, ब्याज, लाभ) पाते हैं; यह आय वे फर्मों की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। पैसा वस्तुओं के वास्तविक प्रवाह की उलटी दिशा में घूमता है। क्योंकि वही पैसा तीन जगहों से गुज़रता है, राष्ट्रीय आय तीन तरह से मापी जा सकती है: उत्पादकों का मूल्य वर्धन (उत्पाद विधि), साधनों को दी गई आय (आय विधि), और अंतिम वस्तुओं पर खर्च (व्यय विधि)। तीनों का जोड़ बराबर आता है।
2. Markets
Price determination · Market equilibrium and efficiency · Market failure · Government responses
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।
3. The national economy
Economic growth · Circular flow and GDP · Unemployment and inflation · Aggregate demand and supply
- आर्थिक संवृद्धि: देश हर साल ज़्यादा कैसे बनाता है – आर्थिक संवृद्धि यानी देश के वास्तविक GDP में बढ़त: एक साल में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य, कीमत-वृद्धि का असर हटाकर। संवृद्धि दर वास्तविक GDP का प्रतिशत बदलाव है। प्रति व्यक्ति GDP बताता है कि औसतन हर व्यक्ति के हिस्से कितना उत्पादन आया। व्यापार चक्र में संवृद्धि प्रवृत्ति के ऊपर-नीचे होती है, जिससे उत्पादन अंतर बनता है। संवृद्धि ज़्यादा और बेहतर साधनों (मज़दूर, कौशल, मशीनें, तकनीक) से आती है; इससे आय और नौकरियाँ बढ़ती हैं, पर प्रदूषण, असमानता और महँगाई भी आ सकती है।
- राष्ट्रीय आय के समुच्चय: GDP, GNP, NDP, NNP, वास्तविक GDP और कल्याण – शुरुआत बाज़ार कीमत पर GDP से: एक साल में देश की सीमा में बनी सब अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य। मूल्यह्रास घटाओ तो सकल से शुद्ध। विदेश से शुद्ध साधन आय (NFIA) जोड़ो तो घरेलू से राष्ट्रीय। शुद्ध अप्रत्यक्ष कर (अप्रत्यक्ष कर − सब्सिडी) घटाओ तो बाज़ार कीमत से साधन लागत। साधन लागत पर NNP राष्ट्रीय आय है। मौद्रिक GDP चालू कीमतों पर, वास्तविक GDP आधार वर्ष की कीमतों पर; GDP अवस्फीतिक = मौद्रिक ÷ वास्तविक × 100। ज़्यादा GDP का मतलब ज़रूरी नहीं ज़्यादा कल्याण: असमान बँटवारा, गैर-मौद्रिक विनिमय और बाह्यताएँ।
- मुद्रास्फीति: कीमतें क्यों बढ़ती रहती हैं – मुद्रास्फीति कीमतों के सामान्य स्तर में लगातार वृद्धि है, जिससे पैसे की क्रय शक्ति घटती है। इसे CPI जैसे मूल्य सूचकांक से मापते हैं: दर = (नया सूचकांक − पुराना) ÷ पुराना × 100। कारण: माँग-जनित, लागत-जनित और अपेक्षाएँ। इसका असर बचत करने वालों, स्थिर आय और निर्यात पर पड़ता है। अपस्फीति में कीमतें गिरती हैं। केंद्रीय बैंक ब्याज दर से कम, स्थिर मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखते हैं।
- समग्र माँग, उपभोग और बचत प्रवृत्तियाँ, और निवेश गुणक – समग्र माँग (AD) = अंतिम वस्तुओं पर कुल नियोजित खर्च: C + I + G + (X − M); दो-क्षेत्रक मॉडल में AD = C + I। उपभोग आय पर निर्भर है: C = c̄ + bY, जहाँ b = MPC। APC = C/Y, MPC = ΔC/ΔY, APS = S/Y, MPS = ΔS/ΔY; APC + APS = 1 और MPC + MPS = 1। अल्पकालीन संतुलन उत्पादन वहाँ है जहाँ AD = AS (नियोजित खर्च = उत्पादन), या बचत = नियोजित निवेश। निवेश बढ़ने पर आय कई गुना बढ़ती है: k = ΔY/ΔI = 1/(1 − MPC) = 1/MPS।
4. World markets and trade
Comparative advantage · Exchange rates · Balance of payments
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार: तुलनात्मक लाभ, संरक्षण और विदेशी मुद्रा बाज़ार – देश उन चीज़ों में विशेषज्ञता लेकर फ़ायदा पाते हैं जिनकी अवसर लागत उनके लिए सबसे कम हो (तुलनात्मक लाभ), और अपनी लागतों के बीच की दर पर व्यापार करते हैं। टैरिफ़, कोटा और सब्सिडी घरेलू कंपनियों को बचाते हैं पर कीमत बढ़ाते हैं और निरर्थक हानि करते हैं। व्यापार गुट और WTO नियम तय करते हैं। विदेशी मुद्रा बाज़ार में किसी देश की वास्तविक ब्याज दर बढ़े तो पूँजी अंदर आती है, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है और शुद्ध निर्यात घटता है।
- विदेशी विनिमय दर – विदेशी विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में कीमत है, जैसे ₹80 प्रति डॉलर। लचीली दर में विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति दर तय करते हैं; दर बढ़े तो रुपये का मूल्यह्रास। स्थिर दर में सरकार दर तय करती है और अवमूल्यन या पुनर्मूल्यन से बदलती है। प्रबंधित तिरती दर दोनों का मेल है: बाज़ार दर तय करता है और केंद्रीय बैंक बड़े उतार-चढ़ाव रोकता है।
- भुगतान संतुलन – भुगतान संतुलन एक साल में किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का रिकॉर्ड है। चालू खाते में वस्तुएँ, सेवाएँ, अंतरण और आय आते हैं; पूँजी खाते में निवेश, ऋण और जमा। स्वायत्त लेन-देन अपने कारण से होते हैं; समायोजक (भंडार में बदलाव) अंतर पाटते हैं। अधिशेष में भंडार बढ़ता है, घाटे में घटता है।
5. Finance in life
Role of finance · Income and spending · Managing assets · Life-cycle financial planning
- वित्त प्रबंधन के स्मार्ट तरीके – मुद्रास्फीति से कीमतें बढ़ती हैं, इसलिए उतना ही पैसा कम खरीदता है। बैंक में रखे पैसे पर ब्याज मिलता है: साधारण ब्याज सिर्फ़ मूलधन पर मिलता है, जबकि चक्रवृद्धि ब्याज पहले के ब्याज पर भी मिलता है, इसलिए समय के साथ तेज़ी से बढ़ता है। बजट आय को ज़रूरतों, चाहतों और बचत में बाँटता है। बचत सुरक्षित रखी जाती है; निवेश बढ़ सकता है पर उसमें जोखिम है, और ज़्यादा संभावित लाभ का मतलब ज़्यादा जोखिम। बीमा जोखिम को बहुत लोगों में बाँटता है। एक सीमा से ऊपर की आय पर आयकर लगता है, जिसकी दरें आय के साथ बढ़ती हैं।
- निवेश की बुनियादी बातें: शेयर, बॉन्ड, फ़ंड और जोखिम – बचत पैसे को सुरक्षित रखती है; निवेश पैसे को काम पर लगाता है ताकि वह महँगाई से तेज़ बढ़ सके। शेयर से तुम कंपनी के छोटे हिस्सेदार बनते हो, बॉन्ड एक उधार है जिस पर तय ब्याज मिलता है, और फ़ंड बहुत सारे शेयरों या बॉन्डों की टोकरी है। ज़्यादा संभावित कमाई के साथ ज़्यादा जोखिम आता है। पैसे को कई जगह बाँटना (विविधीकरण) और लंबे समय तक टिके रहना (चक्रवृद्धि) दो सबसे सुरक्षित आदतें हैं।