निरपेक्ष लाभ और तुलनात्मक लाभ
निरपेक्ष लाभ (absolute advantage) यानी उतने ही साधनों से ज़्यादा उत्पादन। तुलनात्मक लाभ (comparative advantage) यानी किसी चीज़ को कम अवसर लागत पर बनाना। अवसर लागत वह है जो एक और इकाई बनाने के लिए छोड़ना पड़ता है।
उदाहरण: A का एक मज़दूर 6 गेहूँ या 3 कपड़ा बनाता है, B का 2 गेहूँ या 2 कपड़ा। A दोनों में आगे है। पर A में 1 कपड़ा = 2 गेहूँ का त्याग, B में 1 कपड़ा = 1 गेहूँ का त्याग। तो B कपड़ा बनाए, A गेहूँ।
यह विचार डेविड रिकार्डो (1817) का है। इससे पता चलता है कि जो देश हर चीज़ में पीछे हो, वह भी व्यापार से फ़ायदा पा सकता है।
सिद्धांत की सीमाएँ
- यह मानता है कि परिवहन लागत नहीं और सबको रोज़गार है।
- मज़दूर एक उद्योग से दूसरे में जल्दी नहीं जा पाते।
- बहुत ज़्यादा विशेषज्ञता से देश एक ही उत्पाद पर निर्भर हो सकता है।
व्यापार की शर्तें और व्यापार से लाभ
व्यापार की शर्तें (terms of trade) वह दर है जिस पर देशों के बीच चीज़ें बदली जाती हैं। दोनों को लाभ तभी होता है जब दर दोनों अवसर लागतों के बीच हो। हमारे उदाहरण में कपड़ा B के लिए 1 गेहूँ और A के लिए 2 गेहूँ का है, तो 1 से 2 गेहूँ प्रति कपड़ा की कोई भी दर दोनों के लिए अच्छी है।
व्यापार की शर्तों का सूचकांक = (निर्यात कीमत सूचकांक ÷ आयात कीमत सूचकांक) × 100। यह बढ़े तो हर निर्यात से ज़्यादा आयात खरीदे जा सकते हैं।
और फ़ायदे: कम कीमतें, ज़्यादा विकल्प, बड़े पैमाने की बचत, प्रतियोगिता, नई तकनीक।
संरक्षणवाद, व्यापार गुट और WTO
संरक्षणवाद यानी घरेलू उत्पादकों की मदद के लिए आयात रोकना।
- टैरिफ़ (प्रशुल्क): आयात पर कर। घरेलू कीमत बढ़ती, घरेलू उत्पादन बढ़ता, आयात घटता, सरकार को आय, उपभोक्ता को नुकसान और निरर्थक हानि (deadweight loss)।
- कोटा: आयात की मात्रा पर सीमा।
- सब्सिडी: घरेलू कंपनियों को पैसा ताकि वे सस्ता बेच सकें।
- गैर-टैरिफ़ बाधाएँ: कड़े मानक, कागज़ी काम, लाइसेंस।
कारण बताए जाते हैं: नए (शिशु) उद्योग की रक्षा, नौकरियाँ, राष्ट्रीय सुरक्षा, डंपिंग (लागत से कम पर विदेश में बेचना) रोकना। जोखिम: ऊँची कीमतें, कम कुशलता, जवाबी कार्रवाई।
व्यापार गुट
कमज़ोर से मज़बूत जुड़ाव तक: मुक्त व्यापार क्षेत्र (सदस्यों में टैरिफ़ नहीं), सीमा शुल्क संघ (साथ में बाहर के लिए एक साझा टैरिफ़), साझा बाज़ार (साथ में श्रम और पूँजी की मुक्त आवाजाही), मौद्रिक संघ (साथ में एक मुद्रा)। गुट व्यापार बनाते भी हैं, पर बाहर के सस्ते उत्पादकों से व्यापार हटा भी सकते हैं (व्यापार विचलन)।
WTO
विश्व व्यापार संगठन (1995) व्यापार के नियम बनाता है, बाधाएँ घटाने की बातचीत कराता है और सदस्य देशों के विवाद सुलझाता है।
विदेशी मुद्रा बाज़ार, शुद्ध निर्यात और पूँजी प्रवाह
मुद्रा की भी कीमत होती है: विनिमय दर। यह माँग (विदेशी हमारे निर्यात और संपत्तियाँ खरीदें) और पूर्ति (हम विदेशी चीज़ें और संपत्तियाँ खरीदें) से तय होती है।
इसे क्या बदलता है
- देश में ऊँची वास्तविक ब्याज दर (≈ नाममात्र दर − महँगाई) → विदेशी हमारे बॉन्ड खरीदते → पूँजी अंतर्वाह → हमारी मुद्रा की माँग बढ़ी → मुद्रा का अधिमूल्यन (मज़बूत)।
- देश में ज़्यादा महँगाई → हमारी चीज़ें महँगी → मुद्रा की माँग घटी → अवमूल्यन (कमज़ोर)।
- विदेश में आय बढ़ी → हमारे निर्यात की माँग बढ़ी → हमारी मुद्रा मज़बूत।
- पसंद, उम्मीदें और सट्टा भी माँग-पूर्ति बदलते हैं।
- विस्तारवादी मौद्रिक नीति (कम ब्याज) → पूँजी बहिर्वाह → मुद्रा कमज़ोर।
शुद्ध निर्यात पर असर
शुद्ध निर्यात = निर्यात − आयात। मुद्रा मज़बूत हो तो हमारे निर्यात विदेश में महँगे और आयात देश में सस्ते, इसलिए शुद्ध निर्यात घटता है। मुद्रा कमज़ोर हो तो उल्टा।
पूँजी प्रवाह
पैसा वहाँ जाता है जहाँ वास्तविक रिटर्न सबसे ज़्यादा हो। ऊँची वास्तविक ब्याज दर वाले देश में पूँजी अंतर्वाह होता है; कम दर वाले देश से पूँजी बहिर्वाह।
करके देखें
दो दोस्तों से 2 मिनट में सैंडविच और कागज़ की नाव बनवाइए। गिनिए कौन कितनी बनाता है। हर एक के लिए एक नाव की अवसर लागत निकालिए। नाव कौन बनाए? फिर आख़िरी 3D चरण में स्लाइडर खिसकाने से पहले शुद्ध निर्यात वाले खंभे का अनुमान लगाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- X की अवसर लागत = छोड़ा गया Y ÷ बनाया गया X
- तुलनात्मक लाभ: कम अवसर लागत
- लाभदायक व्यापार शर्तें दोनों देशों की अवसर लागतों के बीच होती हैं
- व्यापार शर्त सूचकांक = (निर्यात कीमत सूचकांक ÷ आयात कीमत सूचकांक) × 100
- शुद्ध निर्यात NX = X − M
- वास्तविक ब्याज दर ≈ नाममात्र ब्याज दर − महँगाई दर
- ऊँची वास्तविक दर → पूँजी अंतर्वाह → मुद्रा मज़बूत → NX घटता
हल किए गए उदाहरण
1. देश P में एक मज़दूर रोज़ 10 फ़ोन या 5 कमीज़ बनाता है। देश Q में 4 फ़ोन या 4 कमीज़। कमीज़ में तुलनात्मक लाभ किसका है?
1 कमीज़ की अवसर लागत: P में 10 ÷ 5 = 2 फ़ोन; Q में 4 ÷ 4 = 1 फ़ोन। Q कम छोड़ता है, तो कमीज़ में Q को तुलनात्मक लाभ। फ़ोन में P को (P के लिए 1 फ़ोन = 0.5 कमीज़, Q के लिए 1 कमीज़)।
2. ऊपर वाले उदाहरण में क्या 1 कमीज़ = 1.5 फ़ोन की दर दोनों के लिए अच्छी है?
हाँ। P को घर पर कमीज़ बनाने में 2 फ़ोन छोड़ने पड़ते, व्यापार में सिर्फ़ 1.5 देने हैं। Q को एक कमीज़ पर 1.5 फ़ोन मिलते हैं, घर पर सिर्फ़ 1। दर 1 और 2 के बीच है, तो दोनों को लाभ।
3. क्या 1 कमीज़ = 2.5 फ़ोन की दर चलेगी?
नहीं। 2.5 सीमा 1–2 से बाहर है। P घर पर 2 फ़ोन में कमीज़ बना सकता है, वह 2.5 क्यों देगा? इस दर पर व्यापार नहीं होगा।
4. निर्यात कीमत सूचकांक 120 और आयात कीमत सूचकांक 100 है। व्यापार शर्त सूचकांक निकालिए।
(120 ÷ 100) × 100 = 120। व्यापार की शर्तें सुधरीं: हर निर्यात से आधार वर्ष से 20% ज़्यादा आयात।
5. नाममात्र ब्याज दर 7% और महँगाई 4% है। वास्तविक ब्याज दर?
7% − 4% = 3%।
6. प्रति इकाई 10 का टैरिफ़ स्टील की घरेलू कीमत 50 से 60 कर देता है। आयात 40 000 से घटकर 25 000 इकाई। सरकार को कितना टैरिफ़ मिलेगा?
आय = टैरिफ़ × टैरिफ़ के बाद आयात = 10 × 25 000 = 2 50 000 (मुद्रा इकाई)।
7. देश A का केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाता है, महँगाई वही रहती है। A की मुद्रा और शुद्ध निर्यात पर असर बताइए।
वास्तविक ब्याज दर बढ़ी → विदेशी निवेशक A की संपत्तियाँ खरीदते → पूँजी अंतर्वाह → A की मुद्रा की माँग बढ़ी → मुद्रा मज़बूत → A के निर्यात महँगे, आयात सस्ते → शुद्ध निर्यात घटा।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि जो देश हर चीज़ में बेहतर है उसे व्यापार से कुछ नहीं मिलता। उसे भी अपने सबसे बड़े लाभ वाली चीज़ पर ध्यान देकर फ़ायदा होता है।
- तुलनात्मक लाभ ढूँढते समय अवसर लागत की जगह सिर्फ़ उत्पादन की तुलना करना।
- यह कहना कि मुद्रा मज़बूत होने से शुद्ध निर्यात बढ़ता है। मज़बूत मुद्रा से निर्यात महँगा होता है, शुद्ध निर्यात घटता है।
- नाममात्र और वास्तविक ब्याज दर में गड़बड़। पूँजी वास्तविक दर (नाममात्र − महँगाई) के पीछे जाती है।