मुद्रा, पूँजी और विदेशी मुद्रा बाज़ार
वित्तीय बाज़ार वह जगह है (असली या ऑनलाइन) जहाँ पैसे और वित्तीय संपत्तियों का लेन-देन होता है। इसका मुख्य काम है बचतकर्ताओं का पैसा उधार लेने वालों तक पहुँचाना।
- मुद्रा बाज़ार (money market): एक साल से कम का उधार। जैसे ट्रेज़री बिल, बैंकों के बीच रात भर का उधार, वाणिज्यिक पत्र। बैंक इससे रोज़ की नक़दी सँभालते हैं।
- पूँजी बाज़ार (capital market): एक साल से ज़्यादा का पैसा। कंपनियाँ शेयर (हिस्सेदारी) बेचती हैं, सरकार और कंपनियाँ बॉन्ड (उधार-पत्र) बेचती हैं। प्राथमिक बाज़ार में नए शेयर/बॉन्ड बिकते हैं, द्वितीयक बाज़ार (शेयर बाज़ार) में पुराने।
- विदेशी मुद्रा बाज़ार (forex): मुद्राएँ ख़रीदी-बेची जाती हैं: व्यापार, यात्रा, निवेश और सट्टे के लिए। रोज़ के लेन-देन में यह दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है।
अच्छे बाज़ार तरलता (जल्दी बेच पाना) देते हैं और जोखिम की क़ीमत तय करने में मदद करते हैं।
बॉन्ड और ब्याज दर: उल्टा संबंध
बॉन्ड एक उधार है जो तुम सरकार या कंपनी को देते हो। इसका अंकित मूल्य होता है (जो अंत में, परिपक्वता पर लौटता है) और हर साल एक तय ब्याज, जिसे कूपन कहते हैं।
प्रतिफल (yield) = कूपन ÷ बाज़ार क़ीमत × 100%
कूपन नहीं बदलता, पर द्वितीयक बाज़ार में क़ीमत बदलती है। इसलिए:
- क़ीमत बढ़ी → प्रतिफल घटा।
- क़ीमत घटी → प्रतिफल बढ़ा।
ब्याज दर बढ़ने पर बॉन्ड की क़ीमत क्यों गिरती है? अगर नए बॉन्ड 6% दे रहे हैं, तो 5% वाले पुराने बॉन्ड की पूरी क़ीमत कोई नहीं देगा। उसकी क़ीमत तब तक गिरेगी जब तक उसका प्रतिफल भी लगभग 6% न हो जाए। केंद्रीय बैंक इसी संबंध का इस्तेमाल करते हैं: बॉन्ड ख़रीदने से (जैसे मात्रात्मक सहजता, QE में) क़ीमत बढ़ती है और लंबी अवधि की ब्याज दर घटती है।
प्रणालीगत जोखिम और नैतिक संकट
प्रणालीगत जोखिम (systemic risk) का मतलब है कि एक बैंक या बाज़ार की परेशानी पूरी वित्तीय व्यवस्था और असली अर्थव्यवस्था तक फैल जाए। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बैंक एक-दूसरे को उधार देते हैं, मिलती-जुलती संपत्तियाँ रखते हैं और भरोसे पर चलते हैं। एक बैंक से पैसा निकालने की भगदड़ दूसरों में भी डर फैला देती है।
नैतिक संकट (moral hazard) तब होता है जब कोई ज़्यादा जोखिम लेता है क्योंकि नुक़सान कोई और उठाएगा। "इतना बड़ा कि डूब नहीं सकता" वाला बैंक सरकारी बचाव की उम्मीद में लापरवाही से उधार देता है।
वित्त में बाज़ार विफलता के और कारण: असमान जानकारी (उधार लेने वाला ज़्यादा जानता है), सट्टा और बुलबुले, और बाज़ार में हेराफेरी।
वित्तीय व्यवस्था का नियमन
ज़्यादातर देश यह काम दो तरह के नियामकों में बाँटते हैं:
- विवेकपूर्ण (prudential) नियामक, अक्सर केंद्रीय बैंक का हिस्सा: हर बैंक और बीमा कंपनी को सुरक्षित रखता है। पूँजी की शर्तें, तरलता के नियम और तनाव परीक्षण (stress test) तय करता है। ब्रिटेन में यह बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के अंदर PRA है; भारत में RBI यह काम करता है।
- आचरण (conduct) नियामक: ग्राहकों को ग़लत बिक्री, धोखाधड़ी और अंदरूनी व्यापार से बचाता है। ब्रिटेन में FCA; भारत में प्रतिभूति बाज़ार के लिए SEBI।
- एक वित्तीय नीति समिति पूरी व्यवस्था के जोखिम पर नज़र रखती है।
नियमन जोखिम घटाता है, पर ज़्यादा सख़्ती से लागत बढ़ती है और उधार घट सकता है। बेसल समझौते कई देशों में न्यूनतम पूँजी तय करते हैं।
करके देखो: क़ीमत, प्रतिफल और बफ़र
3D के आख़िरी चरण में बॉन्ड की क़ीमत 800, 1000 और 1250 रखो। हर बार प्रतिफल लिखो और कूपन ÷ क़ीमत से जाँचो। फिर पूँजी बफ़र 0%, 5% और 8% रखो। हर बार कितने बैंक गिरते हैं? इसी वजह से नियामक बड़ा बफ़र माँगते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्रतिफल (%) = सालाना कूपन ÷ बाज़ार क़ीमत × 100
- कूपन = कूपन दर × अंकित मूल्य
- बॉन्ड की क़ीमत ↑ ⇔ प्रतिफल ↓ (उल्टा संबंध)
- बाज़ार ब्याज दर ↑ ⇒ पुराने बॉन्ड की क़ीमत ↓
- मुद्रा बाज़ार: 1 साल से कम · पूँजी बाज़ार: 1 साल से ज़्यादा
हल किए गए उदाहरण
1. एक बॉन्ड का अंकित मूल्य 1000 है और कूपन 40 सालाना। बाज़ार में यह 800 पर बिक रहा है। प्रतिफल निकालो।
प्रतिफल = 40 ÷ 800 × 100 = 5%।
2. एक बॉन्ड हर साल 60 देता है। ब्याज दरें गिरीं, अब निवेशक 4% प्रतिफल पर राज़ी हैं। बॉन्ड किस क़ीमत पर बिकेगा?
क़ीमत = कूपन ÷ प्रतिफल = 60 ÷ 0.04 = 1500।
3. समझाओ कि केंद्रीय बैंक के ब्याज दर बढ़ाने के बाद सरकारी बॉन्ड की क़ीमत क्यों गिर सकती है।
नए बॉन्ड अब ज़्यादा ब्याज देते हैं। पुराने बॉन्ड का कूपन तय और कम है, इसलिए ख़रीदार उसे कम क़ीमत पर ही लेंगे। क़ीमत तब तक गिरेगी जब तक उसका प्रतिफल नई दर के बराबर न हो जाए।
4. एक कंपनी फ़ैक्ट्री बनाने के लिए नए शेयर बेचती है। यह कौन-सा बाज़ार है, प्राथमिक या द्वितीयक?
पूँजी बाज़ार (लंबी अवधि का पैसा), प्राथमिक बाज़ार (शेयर पहली बार बिक रहे हैं)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि बॉन्ड की क़ीमत बढ़ी तो प्रतिफल भी बढ़ा। कूपन तय है, इसलिए ज़्यादा क़ीमत पर प्रतिफल कम होता है।
- कूपन (तय भुगतान) और प्रतिफल (आज की क़ीमत पर कमाई) को एक समझना।
- शेयर बाज़ार को मुद्रा बाज़ार कहना। शेयर लंबी अवधि का पैसा हैं, इसलिए पूँजी बाज़ार में आते हैं।
- नैतिक संकट को "बेईमानी" समझना। इसका मतलब है ज़्यादा जोखिम लेना क्योंकि नुक़सान कोई और उठाएगा।