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वित्तीय बाज़ार: मुद्रा, पूँजी, विदेशी मुद्रा, बॉन्ड और नियमन

वित्तीय बाज़ार बचत करने वालों का पैसा उधार लेने वालों तक पहुँचाते हैं। मुद्रा बाज़ार में एक साल से कम का उधार, पूँजी बाज़ार में लंबे समय का पैसा (शेयर और बॉन्ड) और विदेशी मुद्रा बाज़ार में मुद्राओं का लेन-देन होता है। बॉन्ड पर तय ब्याज (कूपन) मिलता है, इसलिए प्रतिफल = कूपन ÷ क़ीमत। क़ीमत बढ़े तो प्रतिफल घटता है, और बाज़ार की ब्याज दर बढ़े तो पुराने बॉन्ड की क़ीमत गिरती है। बैंक आपस में जुड़े हैं, इसलिए एक का डूबना दूसरों तक फैल सकता है (प्रणालीगत जोखिम)। बचाव की उम्मीद में बैंक ज़्यादा जोखिम लेते हैं (नैतिक संकट)। नियामक पूँजी बफ़र जैसे नियम बनाकर व्यवस्था को सुरक्षित रखते हैं।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. तीन मुख्य बाज़ार हैं। मुद्रा बाज़ार: एक साल से कम का उधार। पूँजी बाज़ार: शेयर और बॉन्ड से लंबे समय का पैसा। विदेशी मुद्रा बाज़ार: एक मुद्रा देकर दूसरी लेना।
  2. बॉन्ड सरकार या कंपनी की उधार-पर्ची है। इसका अंकित मूल्य 1000 है और हर साल 50 ब्याज मिलता है। प्रतिफल = 50 ÷ 1000 = 5%।
  3. अब बॉन्ड की क़ीमत 1250 हो गई। ब्याज अब भी 50 ही है। प्रतिफल = 50 ÷ 1250 = 4%। क़ीमत ऊपर, प्रतिफल नीचे, बिल्कुल झूले की तरह।
  4. बैंक रोज़ एक-दूसरे को उधार देते हैं। देखो: एक बैंक डूबा, तो जिन बैंकों का पैसा उसमें फँसा था, वे भी गिरने लगे। इसे प्रणालीगत जोखिम कहते हैं।
  5. अगर बैंक को भरोसा हो कि सरकार हमेशा बचा लेगी, तो वह बड़े जोखिम लेता है। यह नैतिक संकट है। इसलिए नियामक हर बैंक से पूँजी बफ़र (हरा) रखवाते हैं, जो नुक़सान झेल लेता है।
  6. अब तुम्हारी बारी। बॉन्ड की क़ीमत बदलो और प्रतिफल पढ़ो। फिर पूँजी बफ़र बढ़ाओ और गिनो कि कितने बैंक अब भी गिरते हैं।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

बॉन्ड की क़ीमत बढ़ने पर प्रतिफल क्यों घटता है?

कूपन तय है। उसी 50 के लिए ज़्यादा पैसे देने पर तुम्हारी कमाई का प्रतिशत घट जाता है: 50 ÷ 1250, 50 ÷ 1000 से कम है।

मुद्रा बाज़ार और पूँजी बाज़ार में असली अंतर क्या है?

समय। मुद्रा बाज़ार का उधार एक साल से कम का होता है; पूँजी बाज़ार (शेयर, बॉन्ड) का पैसा कई साल का।

एक बैंक के डूबने से बेक़सूर बैंक क्यों गिरते हैं?

उन्होंने डूबे बैंक को उधार दिया था। वह पैसा अब डूब गया, इसलिए वे भी डोमिनो की तरह गिर सकते हैं।

क्या बचाव का वादा बैंकों को सुरक्षित बनाता है?

थोड़े समय के लिए घबराहट रुकती है, पर बैंक ज़्यादा जोखिम लेने लगते हैं (नैतिक संकट)। इसलिए असली बचाव बफ़र है, जाल नहीं।

पूँजी बफ़र कड़ी को कैसे रोकता है?

बफ़र बैंक का अपना पैसा है। नुक़सान पहले इसी से भरता है, इसलिए पड़ोसी बैंक गिरने पर भी यह बैंक खड़ा रहता है।

मुद्रा, पूँजी और विदेशी मुद्रा बाज़ार

वित्तीय बाज़ार वह जगह है (असली या ऑनलाइन) जहाँ पैसे और वित्तीय संपत्तियों का लेन-देन होता है। इसका मुख्य काम है बचतकर्ताओं का पैसा उधार लेने वालों तक पहुँचाना।

अच्छे बाज़ार तरलता (जल्दी बेच पाना) देते हैं और जोखिम की क़ीमत तय करने में मदद करते हैं।

बॉन्ड और ब्याज दर: उल्टा संबंध

बॉन्ड एक उधार है जो तुम सरकार या कंपनी को देते हो। इसका अंकित मूल्य होता है (जो अंत में, परिपक्वता पर लौटता है) और हर साल एक तय ब्याज, जिसे कूपन कहते हैं।

प्रतिफल (yield) = कूपन ÷ बाज़ार क़ीमत × 100%

कूपन नहीं बदलता, पर द्वितीयक बाज़ार में क़ीमत बदलती है। इसलिए:

ब्याज दर बढ़ने पर बॉन्ड की क़ीमत क्यों गिरती है? अगर नए बॉन्ड 6% दे रहे हैं, तो 5% वाले पुराने बॉन्ड की पूरी क़ीमत कोई नहीं देगा। उसकी क़ीमत तब तक गिरेगी जब तक उसका प्रतिफल भी लगभग 6% न हो जाए। केंद्रीय बैंक इसी संबंध का इस्तेमाल करते हैं: बॉन्ड ख़रीदने से (जैसे मात्रात्मक सहजता, QE में) क़ीमत बढ़ती है और लंबी अवधि की ब्याज दर घटती है।

प्रणालीगत जोखिम और नैतिक संकट

प्रणालीगत जोखिम (systemic risk) का मतलब है कि एक बैंक या बाज़ार की परेशानी पूरी वित्तीय व्यवस्था और असली अर्थव्यवस्था तक फैल जाए। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बैंक एक-दूसरे को उधार देते हैं, मिलती-जुलती संपत्तियाँ रखते हैं और भरोसे पर चलते हैं। एक बैंक से पैसा निकालने की भगदड़ दूसरों में भी डर फैला देती है।

नैतिक संकट (moral hazard) तब होता है जब कोई ज़्यादा जोखिम लेता है क्योंकि नुक़सान कोई और उठाएगा। "इतना बड़ा कि डूब नहीं सकता" वाला बैंक सरकारी बचाव की उम्मीद में लापरवाही से उधार देता है।

वित्त में बाज़ार विफलता के और कारण: असमान जानकारी (उधार लेने वाला ज़्यादा जानता है), सट्टा और बुलबुले, और बाज़ार में हेराफेरी।

वित्तीय व्यवस्था का नियमन

ज़्यादातर देश यह काम दो तरह के नियामकों में बाँटते हैं:

नियमन जोखिम घटाता है, पर ज़्यादा सख़्ती से लागत बढ़ती है और उधार घट सकता है। बेसल समझौते कई देशों में न्यूनतम पूँजी तय करते हैं।

करके देखो: क़ीमत, प्रतिफल और बफ़र

3D के आख़िरी चरण में बॉन्ड की क़ीमत 800, 1000 और 1250 रखो। हर बार प्रतिफल लिखो और कूपन ÷ क़ीमत से जाँचो। फिर पूँजी बफ़र 0%, 5% और 8% रखो। हर बार कितने बैंक गिरते हैं? इसी वजह से नियामक बड़ा बफ़र माँगते हैं।

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. एक बॉन्ड का अंकित मूल्य 1000 है और कूपन 40 सालाना। बाज़ार में यह 800 पर बिक रहा है। प्रतिफल निकालो।

प्रतिफल = 40 ÷ 800 × 100 = 5%।

2. एक बॉन्ड हर साल 60 देता है। ब्याज दरें गिरीं, अब निवेशक 4% प्रतिफल पर राज़ी हैं। बॉन्ड किस क़ीमत पर बिकेगा?

क़ीमत = कूपन ÷ प्रतिफल = 60 ÷ 0.04 = 1500।

3. समझाओ कि केंद्रीय बैंक के ब्याज दर बढ़ाने के बाद सरकारी बॉन्ड की क़ीमत क्यों गिर सकती है।

नए बॉन्ड अब ज़्यादा ब्याज देते हैं। पुराने बॉन्ड का कूपन तय और कम है, इसलिए ख़रीदार उसे कम क़ीमत पर ही लेंगे। क़ीमत तब तक गिरेगी जब तक उसका प्रतिफल नई दर के बराबर न हो जाए।

4. एक कंपनी फ़ैक्ट्री बनाने के लिए नए शेयर बेचती है। यह कौन-सा बाज़ार है, प्राथमिक या द्वितीयक?

पूँजी बाज़ार (लंबी अवधि का पैसा), प्राथमिक बाज़ार (शेयर पहली बार बिक रहे हैं)।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. एक साल से कम के उधार का बाज़ार कौन-सा है?
2. बॉन्ड हर साल 50 देता है और क़ीमत 1000 है। प्रतिफल है:
3. बाज़ार की ब्याज दर बढ़े तो पुराने बॉन्ड की क़ीमत आम तौर पर:
4. एक बैंक के डूबने का दूसरों तक फैलना कहलाता है:
5. सरकारी बचाव की उम्मीद में बैंक बड़ा जोखिम लेता है। यह है:

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बॉन्ड की क़ीमत और ब्याज दर का क्या संबंध है?

दोनों उल्टी दिशा में चलते हैं। ब्याज दर बढ़ने पर पुराने बॉन्ड की क़ीमत गिरती है, और दर घटने पर क़ीमत बढ़ती है।

प्रणालीगत जोखिम और नैतिक संकट में क्या अंतर है?

प्रणालीगत जोखिम पूरी वित्तीय व्यवस्था में परेशानी फैलने का ख़तरा है। नैतिक संकट वह है जब कोई ज़्यादा जोखिम लेता है क्योंकि नुक़सान कोई और उठाएगा।

वित्तीय बाज़ारों का नियमन कौन करता है?

आम तौर पर एक विवेकपूर्ण नियामक (बैंकों की सुरक्षा, अक्सर केंद्रीय बैंक) और एक आचरण नियामक (ग्राहकों से सही व्यवहार)। भारत में RBI और SEBI, ब्रिटेन में PRA और FCA।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

इंग्लैंडYear 134.2.4 Financial markets and monetary policy

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