National Year 13 Economics
अध्याय: 10
1. 4.1.2 Individual economic decision making
4.1.2.1 Consumer behaviour · 4.1.2.2 Imperfect information · 4.1.2.3 Behavioural economic theory · 4.1.2.4 Behavioural economics and policy
- उपभोक्ता संतुलन: उपयोगिता, बजट रेखा और तटस्थता वक्र – उपभोक्ता संतुलन में होता है जब वह अपनी सीमित आय और दी गई कीमतों से सबसे ज़्यादा संतुष्टि पाता है और खरीद बदलना नहीं चाहता। उपयोगिता विश्लेषण में एक वस्तु के लिए शर्त MU (रुपयों में) = कीमत, दो वस्तुओं के लिए MUx/Px = MUy/Py। तटस्थता वक्र विश्लेषण में सबसे अच्छा बंडल वहाँ है जहाँ बजट रेखा सबसे ऊँचे तटस्थता वक्र को छूती है: MRS = P1/P2, और MRS घटता हुआ हो।
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।
- व्यवहारिक अर्थशास्त्र: असली लोग कैसे निर्णय लेते हैं – पारंपरिक अर्थशास्त्र मानता है कि लोग पूरी तरह तर्कसंगत हैं: सब विकल्प जानते हैं, लागत और लाभ तौलते हैं और हमेशा सबसे अच्छा चुनते हैं। व्यवहारिक अर्थशास्त्र मनोविज्ञान और प्रयोगों से दिखाता है कि असल में लोग कैसे चुनते हैं। हमारी तर्कसंगतता समय, जानकारी और दिमाग़ी क्षमता से सीमित है, इसलिए हम शॉर्टकट (अनुमानी नियम) अपनाते हैं, जिनसे एंकरिंग, उपलब्धता, भेड़चाल, हानि से बचाव, वर्तमान पूर्वाग्रह और फ़्रेमिंग जैसे पूर्वाग्रह आते हैं। लोग निष्पक्षता और सामाजिक मानदंडों की भी परवाह करते हैं। सरकारें और कंपनियाँ इन विचारों से 'नज' और 'चयन संरचना' बनाती हैं, जैसे डिफ़ॉल्ट विकल्प। नज चुनने की आज़ादी रखते हैं पर नैतिक सवाल भी उठाते हैं।
2. 4.1.4 Production, costs and revenue (A-level extension)
4.1.4.3 Diminishing returns and returns to scale · 4.1.4.6 Marginal, average and total revenue · 4.1.4.7 Profit
- उत्पादन फलन: TP, AP, MP और कारक के प्रतिफल – उत्पादन फलन बताता है कि दिए गए आगतों से फ़र्म अधिकतम कितना उत्पादन कर सकती है: q = f(L, K)। अल्पकाल में कुछ आगत स्थिर होते हैं, इसलिए उत्पादन सिर्फ़ परिवर्ती आगत बदलकर बदलता है। TP कुल उत्पादन है, MP एक और इकाई आगत से अतिरिक्त उत्पादन, और AP प्रति इकाई उत्पादन। स्थिर ज़मीन पर ज़्यादा मज़दूर लगाने पर MP पहले बढ़ता, फिर घटता और अंत में ऋणात्मक होता है: परिवर्ती अनुपात का नियम।
- लागत और आगम: TC, AC, MC और TR, AR, MR – लागत वह खर्च है जो फ़र्म आगतों पर करती है। कुल लागत (TC) = कुल स्थिर लागत (TFC) + कुल परिवर्ती लागत (TVC)। उत्पादन से भाग देने पर AFC, AVC और AC मिलते हैं; सीमांत लागत (MC) एक और इकाई की अतिरिक्त लागत है। AFC लगातार घटती है; AVC, AC और MC U-आकार की हैं, और MC, AVC व AC को उनके न्यूनतम पर काटती है। आगम = बिक्री से मिला पैसा: TR = P × q, AR = TR/q = कीमत, MR = एक और इकाई से TR में वृद्धि। कीमत स्थिर हो तो AR = MR; कीमत घटे तो MR, AR से नीचे और MR = 0 पर TR अधिकतम।
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
3. 4.1.5 Perfect competition, imperfect competition and monopoly
4.1.5.3 Perfect competition · 4.1.5.4 Monopolistic competition · 4.1.5.5 Oligopoly · 4.1.5.6 Monopoly · 4.1.5.7 Price discrimination · 4.1.5.8 Dynamics of competition · 4.1.5.9 Contestable markets · 4.1.5.10 Static and dynamic efficiency · 4.1.5.11 Consumer and producer surplus
- पूर्ण प्रतियोगिता और कीमत निर्धारण – पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत सारी फ़र्में एक जैसी वस्तु बहुत सारे खरीदारों को बेचती हैं, इसलिए हर फ़र्म कीमत स्वीकारक है। बाज़ार कीमत वहाँ तय होती है जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति (Qd = Qs)। माँग बढ़े तो कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं; पूर्ति बढ़े तो कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
- बाज़ार संरचना: पूर्ण प्रतियोगिता से एकाधिकार तक – बाज़ार संरचना बताती है कि कितनी फ़र्में बेचती हैं, उनका माल कितना मिलता-जुलता है, और नई फ़र्म का आना कितना आसान है। पूर्ण प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, एक-जैसा माल, मुक्त प्रवेश, कीमत स्वीकारक, दीर्घकाल में सामान्य लाभ। एकाधिकारी प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, विभेदित माल, आसान प्रवेश, थोड़ी कीमत शक्ति। अल्पाधिकार: कुछ परस्पर निर्भर फ़र्में, ऊँची बाधाएँ, रणनीति (खेल सिद्धांत, गठजोड़, कीमत नेतृत्व)। एकाधिकार: एक फ़र्म, कोई निकट विकल्प नहीं, ऊँची बाधाएँ, कीमत निर्धारक, असामान्य लाभ और कीमत विभेद संभव। प्रतिस्पर्धा-योग्य बाज़ार दिखाते हैं कि नए आने का डर भी ताक़त को सीमित करता है।
- आर्थिक कुशलता: उपभोक्ता अधिशेष, उत्पादक अधिशेष, स्थैतिक और गतिशील कुशलता – उपभोक्ता अधिशेष = ख़रीदार जितना देने को तैयार था, उसमें से जो सच में दिया, उसका अंतर (माँग वक्र के नीचे, कीमत के ऊपर का क्षेत्र)। उत्पादक अधिशेष = मिली कीमत घटा विक्रेता की न्यूनतम स्वीकार्य कीमत (पूर्ति वक्र के ऊपर, कीमत के नीचे)। आवंटन कुशलता वहाँ है जहाँ कीमत = सीमांत लागत; तब कुल अधिशेष अधिकतम होता है। उत्पादक कुशलता = औसत लागत वक्र के सबसे निचले बिंदु पर उत्पादन। दोनों मिलकर स्थैतिक कुशलता, एक समय-बिंदु पर। गतिशील कुशलता = समय के साथ निवेश, नवाचार और नए उत्पादों से सुधार, जिससे लागत घटती है। जब उत्पादन कुशल स्तर से कम हो, जैसे एकाधिकार या कर में, तो कुछ अधिशेष खो जाता है: कल्याण हानि (deadweight loss)।
4. 4.1.6 The labour market
4.1.6.1 Demand for labour · 4.1.6.2 Supply of labour · 4.1.6.3 Wages in perfectly competitive labour markets · 4.1.6.4 Wages in imperfect labour markets and trade unions · 4.1.6.6 National Minimum Wage · 4.1.6.7 Discrimination in the labour market
- श्रम बाज़ार (Labour Market) – श्रम बाज़ार में मज़दूर अपना समय और हुनर बेचते हैं और नियोक्ता उसे खरीदते हैं। कंपनी को मज़दूर इसलिए चाहिए क्योंकि लोग उसका सामान खरीदते हैं (व्युत्पन्न माँग)। मज़दूरी बढ़े तो ज़्यादा लोग काम को तैयार होते हैं। मज़दूरी वहाँ तय होती है जहाँ माँग और पूर्ति मिलती हैं। न्यूनतम मज़दूरी वेतन बढ़ा सकती है पर नौकरियाँ घटा भी सकती है। यूनियन, एक बड़ा नियोक्ता (मोनोप्सनी), हुनर, भेदभाव और नई तकनीक भी मज़दूरी बदलते हैं।
5. 4.1.7 Distribution of income and wealth: poverty and inequality
4.1.7.1 Income and wealth distribution · 4.1.7.2 Poverty · 4.1.7.3 Policies to reduce poverty and inequality
- आय असमानता – आय असमानता का मतलब है कि लोगों के बीच आय बराबर नहीं बँटी है। अर्थशास्त्री लोगों को सबसे ग़रीब से सबसे अमीर तक क्रम में रखकर 20-20% के पाँच समूहों (पंचमक, quintiles) में बाँटते हैं और उनके हिस्से की तुलना करते हैं। लॉरेंज़ वक्र लोगों के संचयी % के सामने आय का संचयी % दिखाता है; यह समानता की सीधी रेखा से जितना ज़्यादा झुके, असमानता उतनी ज़्यादा। गिनी गुणांक = A ÷ (A + B) इसे 0 (पूरी समानता) से 1 (सारी आय एक व्यक्ति के पास) के बीच एक संख्या बना देता है। संपत्ति (जो तुम्हारे पास है) आमतौर पर आय (जो तुम कमाते हो) से ज़्यादा असमान होती है। सरकार प्रगतिशील कर, सहायता, न्यूनतम मज़दूरी और मुफ़्त शिक्षा-स्वास्थ्य से असमानता घटाती है।
- ग़रीबी: अर्थ, माप, कारण और उपाय – निरपेक्ष ग़रीबी का मतलब जीने की बुनियादी चीज़ें (भोजन, पानी, घर, कपड़े) भी न होना। विश्व बैंक की अत्यधिक ग़रीबी रेखा लगभग 3 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (2021 की क़ीमतें) है। सापेक्ष ग़रीबी का मतलब अपने समाज के सामान्य स्तर से बहुत कम होना, अक्सर माध्यिका आय के 60% से नीचे, जिससे लोग सामान्य जीवन में शामिल नहीं हो पाते। ग़रीबी बराबर नहीं बँटी: बच्चे, अकेले अभिभावक, दिव्यांग, बेरोज़गार, कुछ अल्पसंख्यक और ग्रामीण परिवार ज़्यादा ख़तरे में हैं, और संपत्ति आय से भी ज़्यादा असमान है। सांस्कृतिक व्याख्याएँ परिवार में सीखे मूल्यों या मदद पर निर्भर "निम्नवर्ग" को दोष देती हैं; संरचनात्मक व्याख्याएँ कम वेतन, बेरोज़गारी, असुरक्षित और कौशल-रहित काम, वैश्वीकरण और कटौती को। उपायों में नक़द मदद, पेंशन, न्यूनतम वेतन और मुफ़्त सेवाएँ हैं, और निर्भरता पर बहस है।
6. 4.1.8 Market failure and government intervention (A-level extension)
4.1.8.7 Competition policy · 4.1.8.8 Public ownership, privatisation and regulation
- प्रतिस्पर्धा नीति: एकाधिकार, विलय और कार्टेल का नियमन – प्रतिस्पर्धा नीति वे क़ानून और संस्थाएँ हैं जो बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखती हैं, ताकि उपभोक्ताओं को कम कीमत, ज़्यादा विकल्प और बेहतर गुणवत्ता मिले। प्राधिकरण बाज़ार हिस्सा, संकेंद्रण अनुपात और HHI से बाज़ार शक्ति नापते हैं। वे विलय की जाँच करके अनुमति, शर्तों के साथ अनुमति या रोक लगाते हैं। कार्टेल (कीमत तय करना, बाज़ार बाँटना, बोली में धाँधली) पर भारी जुर्माना लगाते हैं, और प्रभुत्व वाली फ़र्मों को शिकारी कीमत, tying या माल देने से इनकार जैसे दुरुपयोग से रोकते हैं। प्राकृतिक एकाधिकार के लिए नियामक RPI − X जैसी कीमत सीमा, प्रतिफल-दर नियम और प्रदर्शन लक्ष्य लगाते हैं, या बाज़ार नई फ़र्मों के लिए खोलते हैं। नीति विफल भी हो सकती है: नियामक के पास जानकारी कम हो या वह नियंत्रित फ़र्मों के प्रभाव में आ जाए।
- बाज़ार में सरकारी हस्तक्षेप – बाज़ार अक्सर अच्छा काम करते हैं, पर विफल भी हो सकते हैं: हानिकारक चीज़ें ज़्यादा इस्तेमाल होती हैं, उपयोगी चीज़ें कम, सार्वजनिक वस्तुएँ बनती ही नहीं, फ़र्मों को एकाधिकार मिल जाता है और आय में बहुत असमानता आती है। सरकार दख़ल देती है: अप्रत्यक्ष कर (कीमत बढ़ाते, मात्रा घटाते हैं), सब्सिडी (कीमत घटाती, मात्रा बढ़ाती है), अधिकतम और न्यूनतम कीमत, नियमन, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं की व्यवस्था, सरकारी स्वामित्व या निजीकरण, प्रतिस्पर्धा नीति, और कर व लाभों से पुनर्वितरण। वह आर्थिक चक्र को संभालने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीति भी अपनाती है। हस्तक्षेप ख़ुद भी ग़लत हो सकता है – इसे सरकारी विफलता कहते हैं।
7. 4.2 National economy (A-level extension)
4.2.1.4 Uses of national income data · 4.2.2.4 Multiplier and accelerator · 4.2.2.6 Long-run aggregate supply views · 4.2.3.2 Unemployment: natural rate and Phillips curve · 4.2.3.3 Inflation: monetarist views
- राष्ट्रीय आय के समुच्चय: GDP, GNP, NDP, NNP, वास्तविक GDP और कल्याण – शुरुआत बाज़ार कीमत पर GDP से: एक साल में देश की सीमा में बनी सब अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य। मूल्यह्रास घटाओ तो सकल से शुद्ध। विदेश से शुद्ध साधन आय (NFIA) जोड़ो तो घरेलू से राष्ट्रीय। शुद्ध अप्रत्यक्ष कर (अप्रत्यक्ष कर − सब्सिडी) घटाओ तो बाज़ार कीमत से साधन लागत। साधन लागत पर NNP राष्ट्रीय आय है। मौद्रिक GDP चालू कीमतों पर, वास्तविक GDP आधार वर्ष की कीमतों पर; GDP अवस्फीतिक = मौद्रिक ÷ वास्तविक × 100। ज़्यादा GDP का मतलब ज़रूरी नहीं ज़्यादा कल्याण: असमान बँटवारा, गैर-मौद्रिक विनिमय और बाह्यताएँ।
- समग्र माँग, उपभोग और बचत प्रवृत्तियाँ, और निवेश गुणक – समग्र माँग (AD) = अंतिम वस्तुओं पर कुल नियोजित खर्च: C + I + G + (X − M); दो-क्षेत्रक मॉडल में AD = C + I। उपभोग आय पर निर्भर है: C = c̄ + bY, जहाँ b = MPC। APC = C/Y, MPC = ΔC/ΔY, APS = S/Y, MPS = ΔS/ΔY; APC + APS = 1 और MPC + MPS = 1। अल्पकालीन संतुलन उत्पादन वहाँ है जहाँ AD = AS (नियोजित खर्च = उत्पादन), या बचत = नियोजित निवेश। निवेश बढ़ने पर आय कई गुना बढ़ती है: k = ΔY/ΔI = 1/(1 − MPC) = 1/MPS।
- समग्र माँग और समग्र पूर्ति: AD-AS मॉडल – AD-AS मॉडल पूरी अर्थव्यवस्था को एक ग्राफ़ पर दिखाता है: ऊपर कीमत स्तर, आड़े में वास्तविक GDP। AD = C + I + G + (X − M) नीचे झुकता है। SRAS ऊपर चढ़ती है क्योंकि छोटे समय में मज़दूरी चिपकी रहती है। LRAS पूर्ण-रोज़गार (संभावित) उत्पादन पर सीधी खड़ी है। AD और SRAS के मिलन से अल्पकालीन संतुलन बनता है। AD या SRAS के खिसकने से कीमत और उत्पादन बदलते हैं और स्फीतिक या अवस्फीतिक अंतराल बनता है। दीर्घकाल में मज़दूरी समायोजित होती है और अर्थव्यवस्था LRAS पर लौटती है; स्वचालित स्थिरीकारक उतार-चढ़ाव कम करते हैं।
- बेरोज़गारी: अर्थ, दर, प्रकार, नुकसान और उपाय – कोई व्यक्ति बेरोज़गार तब है जब उसके पास नौकरी नहीं, वह काम कर सकता है, और सक्रिय रूप से काम ढूँढ रहा है। श्रम बल यानी सभी रोज़गार वाले और सभी बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100। अर्थशास्त्री कारण के हिसाब से इसे बाँटते हैं: घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), संरचनात्मक (कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाती), चक्रीय (कुल माँग में मंदी) और मौसमी (कुछ ही महीने काम)। बेरोज़गारी से व्यक्ति की आय जाती है, देश का उत्पादन और कर घटता है, और सेहत व समाज को नुकसान होता है। चक्रीय के लिए सरकार ख़र्च और ब्याज दर का सहारा लेती है; बाक़ी के लिए प्रशिक्षण, जानकारी और आवागमन। कुछ बेरोज़गारी हमेशा रहती है; सबसे कम टिकाऊ स्तर को प्राकृतिक दर कहते हैं।
8. 4.2.4 Financial markets and monetary policy
4.2.4.1 Financial markets and assets · 4.2.4.2 Commercial and investment banks · 4.2.4.3 Central banks and monetary policy · 4.2.4.4 Regulation of the financial system
- वित्तीय बाज़ार: मुद्रा, पूँजी, विदेशी मुद्रा, बॉन्ड और नियमन – वित्तीय बाज़ार बचत करने वालों का पैसा उधार लेने वालों तक पहुँचाते हैं। मुद्रा बाज़ार में एक साल से कम का उधार, पूँजी बाज़ार में लंबे समय का पैसा (शेयर और बॉन्ड) और विदेशी मुद्रा बाज़ार में मुद्राओं का लेन-देन होता है। बॉन्ड पर तय ब्याज (कूपन) मिलता है, इसलिए प्रतिफल = कूपन ÷ क़ीमत। क़ीमत बढ़े तो प्रतिफल घटता है, और बाज़ार की ब्याज दर बढ़े तो पुराने बॉन्ड की क़ीमत गिरती है। बैंक आपस में जुड़े हैं, इसलिए एक का डूबना दूसरों तक फैल सकता है (प्रणालीगत जोखिम)। बचाव की उम्मीद में बैंक ज़्यादा जोखिम लेते हैं (नैतिक संकट)। नियामक पूँजी बफ़र जैसे नियम बनाकर व्यवस्था को सुरक्षित रखते हैं।
- बैंकों द्वारा मुद्रा सृजन और केंद्रीय बैंक (RBI) – बैंक जमा का केवल एक हिस्सा रिज़र्व (वैधानिक आरक्षित अनुपात, LRR) रखते हैं और बाकी उधार देते हैं। हर कर्ज़ खर्च होकर नई जमा बनकर बैंकों में लौटता है, तो कुल जमा पहली जमा का कई गुना हो जाती है: कुल जमा = प्रारंभिक जमा × 1/LRR। RBI भारत का केंद्रीय बैंक है: करेंसी जारी करता है, सरकार और बैंकों का बैंकर है, अंतिम ऋणदाता है, साख का नियंत्रण करता है और विदेशी मुद्रा भंडार रखता है। साख नियंत्रण के उपकरण: रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर, CRR, SLR, खुले बाज़ार की क्रियाएँ और सीमांत आवश्यकता।
9. 4.2.5 Fiscal and supply-side policies
4.2.5.1 Fiscal policy · 4.2.5.2 Supply-side policies
- सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था – सरकारी बजट एक साल की योजना है जिसमें अनुमानित आय (प्राप्तियाँ) और योजनाबद्ध खर्च (व्यय) लिखे होते हैं। प्राप्तियाँ राजस्व (कर, गैर-कर) या पूँजीगत (उधार, कर्ज़ वसूली, विनिवेश) होती हैं। व्यय राजस्व (कोई संपत्ति नहीं) या पूँजीगत (संपत्ति बने या कर्ज़ घटे) होता है। बजट संतुलित, अधिशेष या घाटे का हो सकता है, और घाटा राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटे से नापा जाता है।
- आपूर्ति पक्ष नीतियाँ (Supply-Side Policies) – आपूर्ति पक्ष नीतियाँ यह बढ़ाने की कोशिश करती हैं कि अर्थव्यवस्था कितना बना सकती है (उत्पादन क्षमता), सिर्फ़ यह नहीं कि लोग कितना ख़रीदना चाहते हैं। लक्ष्य है: मज़दूर ज़्यादा हुनरमंद हों, बाज़ार बेहतर चलें और कंपनियाँ ज़्यादा निवेश करें। बाज़ार-आधारित नीतियाँ लोगों और कंपनियों को काम और प्रतिस्पर्धा का लालच देती हैं: आयकर और लाभ कर घटाना, बेकार नियम हटाना (डीरेगुलेशन), सरकारी कंपनियाँ बेचना (निजीकरण) और श्रमिक संघ सुधार। हस्तक्षेपवादी नीतियाँ सरकारी ख़र्च से चलती हैं: शिक्षा, प्रशिक्षण, सड़क, बंदरगाह, इंटरनेट और शोध। सफल हों तो LRAS वक्र दाईं ओर खिसकता है: उत्पादन और रोज़गार बढ़ते हैं, क़ीमतों पर दबाव नहीं बढ़ता। पर ये धीमी हैं, महँगी हो सकती हैं, और कुछ असमानता बढ़ा सकती हैं।
10. 4.2.6 The international economy
4.2.6.1 Globalisation · 4.2.6.2 Trade · 4.2.6.3 Balance of payments · 4.2.6.4 Exchange rate systems · 4.2.6.5 Growth and development
- वैश्वीकरण और वैश्विक शासन – वैश्वीकरण यानी सामान, पूँजी, सूचना और श्रम के प्रवाह का बढ़ना, जो जगहों को आपस में जोड़ता है। तकनीक, परिवहन और व्यापार समझौते इसे चलाते हैं। प्रवाह असमान हैं: अमीर देशों के पास ज़्यादा ताक़त है, ग़रीब देशों की बाज़ार तक पहुँच कमज़ोर है। TNC एक ही चीज़ को कई जगह बनवाती हैं। UN, WTO, IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ इन प्रवाहों को संभालने की कोशिश करती हैं, और संधियाँ अंटार्कटिका जैसे साझा क्षेत्रों को बचाती हैं। वैश्वीकरण विकास और सस्ता सामान लाता है, पर असमानता, टकराव और पर्यावरण का नुक़सान भी।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार: तुलनात्मक लाभ, संरक्षण और विदेशी मुद्रा बाज़ार – देश उन चीज़ों में विशेषज्ञता लेकर फ़ायदा पाते हैं जिनकी अवसर लागत उनके लिए सबसे कम हो (तुलनात्मक लाभ), और अपनी लागतों के बीच की दर पर व्यापार करते हैं। टैरिफ़, कोटा और सब्सिडी घरेलू कंपनियों को बचाते हैं पर कीमत बढ़ाते हैं और निरर्थक हानि करते हैं। व्यापार गुट और WTO नियम तय करते हैं। विदेशी मुद्रा बाज़ार में किसी देश की वास्तविक ब्याज दर बढ़े तो पूँजी अंदर आती है, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है और शुद्ध निर्यात घटता है।
- भुगतान संतुलन – भुगतान संतुलन एक साल में किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का रिकॉर्ड है। चालू खाते में वस्तुएँ, सेवाएँ, अंतरण और आय आते हैं; पूँजी खाते में निवेश, ऋण और जमा। स्वायत्त लेन-देन अपने कारण से होते हैं; समायोजक (भंडार में बदलाव) अंतर पाटते हैं। अधिशेष में भंडार बढ़ता है, घाटे में घटता है।
- विदेशी विनिमय दर – विदेशी विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में कीमत है, जैसे ₹80 प्रति डॉलर। लचीली दर में विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति दर तय करते हैं; दर बढ़े तो रुपये का मूल्यह्रास। स्थिर दर में सरकार दर तय करती है और अवमूल्यन या पुनर्मूल्यन से बदलती है। प्रबंधित तिरती दर दोनों का मेल है: बाज़ार दर तय करता है और केंद्रीय बैंक बड़े उतार-चढ़ाव रोकता है।
- आर्थिक वृद्धि और विकास: माप, बाधाएँ और रणनीतियाँ – आर्थिक वृद्धि का मतलब है वास्तविक GDP का बढ़ना। आर्थिक विकास का मतलब है लोगों के जीवन का बेहतर होना: लंबी उम्र, ज़्यादा पढ़ाई, ज़्यादा आय और ज़्यादा विकल्प। विकास को हम HDI और दूसरे सूचकों से मापते हैं। कम बचत, कमज़ोर बुनियादी ढाँचा, भ्रष्टाचार, कर्ज़ और एक ही निर्यात पर निर्भरता जैसी बाधाएँ देशों को रोकती हैं। बाज़ार-आधारित और राज्य-आधारित रणनीतियाँ इन्हें हटाने की कोशिश करती हैं, और व्यापार, तकनीक, संसाधन, जनसंख्या बदलाव व अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसी वैश्विक ताकतें बाहर से असर डालती हैं।