श्रम बाज़ार क्या है?
श्रम बाज़ार में मज़दूर अपना समय और हुनर देते हैं और नियोक्ता बदले में मज़दूरी देते हैं। मज़दूरी श्रम की कीमत है। एक नहीं, कई श्रम बाज़ार हैं: नर्स, ड्राइवर, कोडर, शिक्षक के अलग-अलग।
मुख्य शब्द: श्रम बल (काम करने वाले या काम ढूँढने वाले), रोज़गार, बेरोज़गारी (काम चाहते हैं पर नहीं है), रिक्त पद (खाली नौकरी)।
श्रम की माँग
कंपनी मज़दूर इसलिए चाहती है ताकि वह सामान बनाए जो लोग खरीदें। इसलिए श्रम की माँग व्युत्पन्न माँग (derived demand) है।
मज़दूरी कम हो तो कंपनी ज़्यादा लोग रखती है, इसलिए माँग वक्र नीचे झुकता है। कंपनी तब तक रखती है जब तक एक और मज़दूर से होने वाली अतिरिक्त आय मज़दूरी से ज़्यादा हो। इसे सीमांत आय उत्पाद (MRP) कहते हैं = अतिरिक्त उत्पादन × कीमत।
माँग खिसकती है जब: सामान की माँग बदले, मज़दूर ज़्यादा उत्पादक बनें, या मशीनें मज़दूरों की जगह लें।
श्रम की पूर्ति
ज़्यादा मज़दूरी पर ज़्यादा लोग काम पर आते हैं और ज़्यादा घंटे देते हैं, इसलिए पूर्ति वक्र ऊपर चढ़ता है।
पूर्ति इन पर निर्भर है: जनसंख्या और उम्र, ज़रूरी हुनर और प्रशिक्षण, काम की स्थितियाँ, मज़दूरी के अलावा सुविधाएँ, प्रवास, और काम कितना सुखद या जोखिम भरा है। डॉक्टर जैसी लंबी पढ़ाई वाली नौकरियों में पूर्ति कम है, इसलिए वेतन ऊँचा है।
मज़दूरी कैसे तय होती है
प्रतियोगी श्रम बाज़ार में मज़दूरी वहाँ टिकती है जहाँ माँग = पूर्ति: संतुलन मज़दूरी। उससे ऊपर हो तो मज़दूर ज़्यादा, नौकरियाँ कम (बेरोज़गारी)। नीचे हो तो पद खाली (कमी)।
हल किया विचार
माँग Ld = 120 − 4W, पूर्ति Ls = 6W। बराबर रखो: 120 − 4W = 6W, W = 12, और 72 लोगों को काम।
मज़दूरी में अंतर: हुनर, प्रशिक्षण, जोखिम, सामान की माँग, यूनियन और भेदभाव से।
न्यूनतम मज़दूरी, ट्रेड यूनियन, मोनोप्सनी और भेदभाव
न्यूनतम मज़दूरी कानूनन सबसे कम वेतन है। संतुलन से ऊपर हो तो जिनकी नौकरी बची उन्हें ज़्यादा मिलता है, पर कंपनियाँ कम लोग रख सकती हैं। असल अध्ययनों में मामूली न्यूनतम मज़दूरी से नौकरियाँ अक्सर बहुत कम घटती हैं।
ट्रेड यूनियन सब मज़दूरों की ओर से मिलकर मोलभाव (सामूहिक सौदेबाज़ी) करती है।
मोनोप्सनी यानी श्रम का अकेला बड़ा खरीदार (जैसे कस्बे की एक खदान)। यह प्रतियोगी से कम मज़दूरी देकर कम लोग रखता है। यहाँ यूनियन या न्यूनतम मज़दूरी वेतन और नौकरियाँ दोनों बढ़ा सकती है।
भेदभाव: काम नहीं, बल्कि लिंग, जाति, धर्म, नस्ल या उम्र के कारण कम वेतन या नौकरी न देना। यह अन्याय है और हुनर बर्बाद करता है। समान वेतन के कानून इसे रोकने की कोशिश करते हैं।
काम की बदलती दुनिया
तकनीक और स्वचालन कुछ नौकरियाँ हटाते हैं और नई बनाते हैं। अब ज़्यादा लोग सेवाओं में, छोटे अनुबंधों पर, गिग इकॉनमी (ऐप डिलीवरी, कैब) में या घर से काम करते हैं। जीवन भर सीखते रहना नई नौकरी में मदद करता है। काम से आय, पहचान और लोगों से जुड़ाव मिलता है, इसलिए समाज बेरोज़गारों को भत्ते और प्रशिक्षण से सहारा देता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संतुलन मज़दूरी: श्रम की माँग = श्रम की पूर्ति
- MRP = सीमांत उत्पाद × सामान की कीमत
- कंपनी तब तक रखती है जब तक MRP ≥ मज़दूरी
- न्यूनतम मज़दूरी पर बेरोज़गारी = Ls − Ld
हल किए गए उदाहरण
1. Ld = 120 − 4W, Ls = 6W। संतुलन मज़दूरी और रोज़गार निकालो।
120 − 4W = 6W, 10W = 120, W = 12। रोज़गार = 6 × 12 = 72।
2. न्यूनतम मज़दूरी 15 तय हुई। नौकरियाँ, काम चाहने वाले और बेरोज़गारी?
Ld = 120 − 60 = 60, Ls = 90। बेरोज़गारी = 30।
3. एक मज़दूर हर घंटे 5 कमीज़ ज़्यादा बनाता है, कमीज़ 3 में बिकती है, मज़दूरी 12 है। रखें?
MRP = 5 × 3 = 15, जो 12 से ज़्यादा है। हाँ, हर घंटे 3 का लाभ बढ़ेगा।
4. सर्जन दुकान के सहायक से ज़्यादा क्यों कमाते हैं?
लंबी पढ़ाई के कारण पूर्ति कम है और उनका काम बहुत मूल्यवान है (माँग ज़्यादा)। दोनों वेतन ऊपर ले जाते हैं।
आम गलतियाँ
- सोचना कि कंपनी मज़दूर अपने लिए चाहती है। माँग सामान की माँग से आती है।
- श्रम पूर्ति वक्र नीचे झुकता बनाना। ज़्यादा मज़दूरी पर ज़्यादा लोग आते हैं।
- कहना कि न्यूनतम मज़दूरी से हमेशा बहुत नौकरियाँ जाती हैं। यह उसकी ऊँचाई और बाज़ार पर निर्भर है।
- एकाधिकार (monopoly, एक विक्रेता) और मोनोप्सनी (एक खरीदार) को मिला देना।