National Year 10 Economics
अध्याय: 6
1. 3.1.1 Economic foundations
3.1.1.1 Economic activity · 3.1.1.2 Factors of production · 3.1.1.3 Making choices
- चयन की समस्या: दुर्लभता और अवसर लागत – हमारी इच्छाएँ असीमित हैं, पर पैसा, समय, ज़मीन और मज़दूर जैसे संसाधन सीमित हैं। इसे दुर्लभता कहते हैं, और यह हमें चुनने पर मजबूर करती है। जो अगला सबसे अच्छा विकल्प छोड़ा, उसका मूल्य अवसर लागत है। अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं कि लोग और समाज ये चुनाव कैसे करते हैं। हर समाज को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। बाज़ार, नियोजित और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ इनका अलग-अलग जवाब देती हैं, और कल्याणकारी राज्य सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता है।
- उत्पादन के साधन: भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यम – उत्पादन के साधन वे संसाधन हैं जिनसे वस्तुएँ और सेवाएँ बनती हैं। ये चार हैं: भूमि (प्राकृतिक संसाधन, पुरस्कार किराया/लगान), श्रम (मानव मेहनत, पुरस्कार मज़दूरी), पूँजी (इंसान के बनाए औज़ार-मशीनें, पुरस्कार ब्याज) और उद्यम (बाक़ी को जोड़ना और जोखिम उठाना, पुरस्कार लाभ)। इच्छाएँ असीमित और संसाधन सीमित हैं, इसलिए हर समाज को चुनना पड़ता है कि क्या, कैसे और किसके लिए बनाए। आर्थिक गतिविधि का उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा इच्छाएँ पूरी करना है।
2. 3.1.2 Resource allocation
3.1.2.1 Markets and allocation · 3.1.2.2 Economic sectors · 3.1.2.3 Specialisation and exchange
- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक – आर्थिक गतिविधियाँ तीन क्षेत्रकों में बँटती हैं: प्राथमिक (प्रकृति का उपयोग), द्वितीयक (वस्तुएँ बनाना) और तृतीयक (सेवाएँ)। GDP अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य गिनता है। भारत में सबसे ज़्यादा उत्पादन तृतीयक क्षेत्रक का है, पर सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राथमिक में, जहाँ छिपी बेरोज़गारी बहुत है। गतिविधियाँ संगठित-असंगठित और सार्वजनिक-निजी में भी बँटती हैं।
- श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण – विशिष्टीकरण का मतलब है कोई व्यक्ति, फ़र्म, क्षेत्र या देश एक (या कुछ) चीज़ें बनाने पर ध्यान दे। श्रम विभाजन कार्यस्थल के अंदर का विशिष्टीकरण है: बड़े काम को छोटे हिस्सों में बाँटा जाता है और हर मज़दूर एक हिस्सा करता है। मज़दूर कुशल और तेज़ होते हैं, काम बदलने में समय नहीं जाता, ख़ास मशीनें लगती हैं, इसलिए प्रति मज़दूर उत्पादन बढ़ता और प्रति इकाई लागत घटती है। हानियाँ: उबाऊ दोहराव वाला काम, एक के न आने से पूरी लाइन रुकना, संकरा कौशल और दूसरों पर निर्भरता। विशेषज्ञ एक चीज़ ज़रूरत से ज़्यादा बनाता है और बाकी नहीं बनाता, इसलिए विनिमय ज़रूरी है; मुद्रा 'आवश्यकताओं के दोहरे संयोग' की ज़रूरत हटाकर विनिमय आसान बनाती है।
3. 3.1.3 How prices are determined
3.1.3.1 Demand · 3.1.3.2 Supply · 3.1.3.3 Equilibrium price · 3.1.3.4 Intermarket relationships · 3.1.3.5 Price elasticity of demand · 3.1.3.6 Price elasticity of supply
- माँग, पूर्ति और बाज़ार संतुलन – माँग का नियम कहता है कि कीमत बढ़ने पर खरीदार कम चाहते हैं; पूर्ति का नियम कहता है कि विक्रेता ज़्यादा लाते हैं। बाज़ार कीमत संतुलन पर टिकती है, जहाँ माँगी गई मात्रा = पूर्ति की गई मात्रा, और माँग या पूर्ति के खिसकने से यह बदलती है। कुछ वस्तुएँ सामान्य नियम तोड़ती हैं (गिफ़ेन, वेब्लेन, घबराहट में खरीद)। संतुलन से नीचे तय अधिकतम कीमत कमी पैदा करती है। बाज़ार विफल भी हो सकता है, जैसे प्रदूषण या स्ट्रीट लाइट जैसी सार्वजनिक वस्तुओं में, तब सरकार आगे आती है।
- संबंधित बाज़ार: स्थानापन्न, पूरक और अन्य कड़ियाँ – बाज़ार आपस में जुड़े हैं, इसलिए एक बाज़ार का बदलाव दूसरों की माँग या पूर्ति बदल देता है। स्थानापन्न वस्तुएँ (प्रतियोगी माँग) एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल होती हैं: एक की कीमत बढ़े तो दूसरी की माँग बढ़ती है। पूरक वस्तुएँ (संयुक्त माँग) साथ इस्तेमाल होती हैं: एक की कीमत बढ़े तो दूसरी की माँग घटती है। व्युत्पन्न माँग किसी चीज़ की वह माँग है जो दूसरी चीज़ बनाने के लिए होती है (मकानों के लिए ईंटें, उत्पादन के लिए मज़दूर)। सम्मिश्र माँग में एक वस्तु के कई उपयोग होते हैं, एक उपयोग बढ़े तो बाकी के लिए कम बचता है। संयुक्त पूर्ति में एक चीज़ बनाने से दूसरी भी बनती है (मांस और चमड़ा)। ये कड़ियाँ असर को एक बाज़ार से दूसरे तक फैलाती हैं।
- माँग और पूर्ति की कीमत लोच – लोच बताती है कि कीमत बदलने पर मात्रा कितनी ज़ोर से बदलती है। माँग की कीमत लोच (PED) = माँगी गई मात्रा में % बदलाव ÷ कीमत में % बदलाव; यह ऋणात्मक होती है पर आमतौर पर चिह्न के बिना लिखते हैं। PED > 1 लोचदार (ख़रीदार ज़्यादा प्रतिक्रिया करते), PED < 1 बेलोचदार (लगभग प्रतिक्रिया नहीं), PED = 1 इकाई लोच। नज़दीकी स्थानापन्न, विलासिता की वस्तु, आय का बड़ा हिस्सा या ज़्यादा समय हो तो माँग ज़्यादा लोचदार होती है। माँग लोचदार हो तो कीमत घटाने से कुल आगम बढ़ता है; बेलोचदार हो तो कीमत बढ़ाने से। पूर्ति की कीमत लोच (PES) = पूर्ति की मात्रा में % बदलाव ÷ कीमत में % बदलाव; ख़ाली क्षमता, भंडार, आसान कच्चा माल और ज़्यादा समय हो तो पूर्ति ज़्यादा लोचदार।
4. 3.1.4 Production, costs, revenue and profit
3.1.4.1 Costs, revenue and profit · 3.1.4.2 Production and productivity · 3.1.4.3 Economies of scale
- लागत और आगम: TC, AC, MC और TR, AR, MR – लागत वह खर्च है जो फ़र्म आगतों पर करती है। कुल लागत (TC) = कुल स्थिर लागत (TFC) + कुल परिवर्ती लागत (TVC)। उत्पादन से भाग देने पर AFC, AVC और AC मिलते हैं; सीमांत लागत (MC) एक और इकाई की अतिरिक्त लागत है। AFC लगातार घटती है; AVC, AC और MC U-आकार की हैं, और MC, AVC व AC को उनके न्यूनतम पर काटती है। आगम = बिक्री से मिला पैसा: TR = P × q, AR = TR/q = कीमत, MR = एक और इकाई से TR में वृद्धि। कीमत स्थिर हो तो AR = MR; कीमत घटे तो MR, AR से नीचे और MR = 0 पर TR अधिकतम।
- उत्पादकता: हर आगत से ज़्यादा उत्पादन – उत्पादन (production) कुल बनी मात्रा है। उत्पादकता (productivity) हर इकाई आगत से मिलने वाला उत्पादन है, जैसे प्रति श्रमिक प्रति घंटा डिब्बे। श्रम उत्पादकता = उत्पादन ÷ श्रमिक (या श्रम-घंटे)। यह प्रशिक्षण, बेहतर मशीनें और तकनीक, प्रेरणा, अच्छी विधियाँ और विशिष्टीकरण से बढ़ती है। ज़्यादा उत्पादकता से प्रति इकाई लागत घटती है, मज़दूरी और लाभ बढ़ सकते हैं, और देश का विकास होता है। व्यवसाय क्षमता उपयोग (वास्तविक ÷ अधिकतम उत्पादन × 100) पर भी नज़र रखते हैं और श्रम-प्रधान या पूँजी-प्रधान तरीका चुनते हैं।
- पैमाने की बचत: बड़ा होना सस्ता क्यों पड़ता है – औसत लागत = कुल लागत ÷ उत्पादन। पैमाने की बचत (मितव्ययिता) वह कमी है जो फर्म के बड़ा होने पर दीर्घकालीन औसत लागत में आती है। आंतरिक बचत एक फर्म के अंदर: क्रय, तकनीकी, वित्तीय, विपणन, प्रबंधकीय और जोखिम-वहन। बाहरी बचत पूरे उद्योग के एक इलाक़े में बढ़ने से: कुशल श्रमिक, आपूर्तिकर्ता, आधारभूत ढाँचा, साझा शोध। फर्म बहुत बड़ी हो जाए तो पैमाने की हानि (कमज़ोर संचार, तालमेल और प्रेरणा) से औसत लागत बढ़ती है। LRAC वक्र अक्सर U या L आकार का होता है; न्यूनतम कुशल पैमाना (MES) वह सबसे कम उत्पादन है जहाँ औसत लागत न्यूनतम होती है।
5. 3.1.5 Competitive and concentrated markets
3.1.5.1 Market structures · 3.1.5.2 Competitive markets · 3.1.5.3 Non-competitive markets · 3.1.5.4 The labour market
- बाज़ार संरचना: पूर्ण प्रतियोगिता से एकाधिकार तक – बाज़ार संरचना बताती है कि कितनी फ़र्में बेचती हैं, उनका माल कितना मिलता-जुलता है, और नई फ़र्म का आना कितना आसान है। पूर्ण प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, एक-जैसा माल, मुक्त प्रवेश, कीमत स्वीकारक, दीर्घकाल में सामान्य लाभ। एकाधिकारी प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, विभेदित माल, आसान प्रवेश, थोड़ी कीमत शक्ति। अल्पाधिकार: कुछ परस्पर निर्भर फ़र्में, ऊँची बाधाएँ, रणनीति (खेल सिद्धांत, गठजोड़, कीमत नेतृत्व)। एकाधिकार: एक फ़र्म, कोई निकट विकल्प नहीं, ऊँची बाधाएँ, कीमत निर्धारक, असामान्य लाभ और कीमत विभेद संभव। प्रतिस्पर्धा-योग्य बाज़ार दिखाते हैं कि नए आने का डर भी ताक़त को सीमित करता है।
- श्रम बाज़ार (Labour Market) – श्रम बाज़ार में मज़दूर अपना समय और हुनर बेचते हैं और नियोक्ता उसे खरीदते हैं। कंपनी को मज़दूर इसलिए चाहिए क्योंकि लोग उसका सामान खरीदते हैं (व्युत्पन्न माँग)। मज़दूरी बढ़े तो ज़्यादा लोग काम को तैयार होते हैं। मज़दूरी वहाँ तय होती है जहाँ माँग और पूर्ति मिलती हैं। न्यूनतम मज़दूरी वेतन बढ़ा सकती है पर नौकरियाँ घटा भी सकती है। यूनियन, एक बड़ा नियोक्ता (मोनोप्सनी), हुनर, भेदभाव और नई तकनीक भी मज़दूरी बदलते हैं।
6. 3.1.6 Market failure
3.1.6.1 Misallocation of resources · 3.1.6.2 Externalities
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।