प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक
- प्राथमिक क्षेत्रक: प्राकृतिक संसाधनों का सीधा उपयोग, जैसे खेती, डेयरी, मछली पकड़ना, वानिकी, खनन। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहते हैं।
- द्वितीयक क्षेत्रक: प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण से दूसरे रूप में बदलना, जैसे कपास से कपड़ा, गन्ने से चीनी। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहते हैं।
- तृतीयक क्षेत्रक: बाकी दो की मदद करने वाली गतिविधियाँ, जैसे परिवहन, भंडारण, संचार, बैंकिंग, व्यापार। यह वस्तु नहीं, सेवा बनाता है। इसे सेवा क्षेत्रक कहते हैं। शिक्षक, डॉक्टर, वकील और IT कर्मी भी इसमें हैं।
क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं: कारख़ाने को खेत की कपास चाहिए, और खेत को परिवहन व बैंक।
क्षेत्रकों की तुलना: GDP
उत्पादन जोड़ने के लिए पैसे का मूल्य लेते हैं। पर सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ गिनते हैं, जो उपभोक्ता तक पहुँचती हैं। मध्यवर्ती वस्तुएँ, जैसे आटा बनाने वाला गेहूँ, अंतिम क़ीमत में पहले से शामिल हैं; उन्हें फिर गिनना दोहरी गिनती होगी।
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = एक साल में देश के अंदर बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य। भारत में केंद्र सरकार का एक मंत्रालय राज्यों की मदद से इसे मापता है।
इतिहास में बदलाव
ज़्यादातर विकसित देशों में पहले प्राथमिक क्षेत्रक सबसे अहम था, फिर द्वितीयक बढ़ा, और बाद में तृतीयक सबसे बड़ा बना।
भारत में तृतीयक क्षेत्रक क्यों बढ़ा
- बुनियादी सेवाएँ (अस्पताल, स्कूल, पुलिस, अदालत) हर देश में चाहिए।
- खेती और उद्योग बढ़ने से परिवहन, व्यापार, भंडारण की ज़रूरत।
- आय बढ़ने पर लोग बाहर खाना, पर्यटन, निजी स्कूल जैसी सेवाएँ चाहते हैं।
- सूचना और तकनीक पर आधारित नई सेवाएँ तेज़ी से बढ़ीं।
ज़्यादातर लोग कहाँ काम करते हैं? अल्प-बेरोज़गारी
आज GDP में सबसे बड़ा हिस्सा तृतीयक का है, पर सबसे ज़्यादा लोग (लगभग 45%) प्राथमिक क्षेत्रक में काम करते हैं। द्वितीयक और तृतीयक में पर्याप्त नई नौकरियाँ नहीं बनीं।
अल्प-बेरोज़गारी या प्रच्छन्न (छिपी) बेरोज़गारी: लोग काम करते दिखते हैं, पर सबकी ज़रूरत नहीं। उदाहरण: पाँच लोगों का परिवार छोटे खेत पर काम करता है जिसे सिर्फ़ दो चाहिए। तीन हट जाएँ तो उत्पादन नहीं घटता।
ज़्यादा रोज़गार कैसे बनें
- किसानों को कर्ज़, सिंचाई के लिए बाँध और नहरें।
- सड़कें और भंडार, ताकि फ़सल बाज़ार तक पहुँचे।
- अर्ध-ग्रामीण इलाकों में छोटे उद्योग और सेवाएँ, जैसे खाद्य प्रसंस्करण।
- ज़्यादा स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र, जो रोज़गार भी देते हैं।
- मनरेगा 2005 काम का अधिकार देता है: ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन का पक्का काम, या बेरोज़गारी भत्ता।
संगठित और असंगठित क्षेत्रक
संगठित क्षेत्रक: सरकार में पंजीकृत उद्यम जो उसके नियम-कानून (जैसे कारख़ाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम) मानते हैं। मज़दूरों को नौकरी की सुरक्षा, तय घंटे, सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, इलाज की सुविधा और ओवरटाइम मिलता है।
असंगठित क्षेत्रक: छोटी, बिखरी इकाइयाँ, ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर। नियम हैं पर माने नहीं जाते। कम और अनियमित वेतन; छुट्टी या सुरक्षा नहीं। कभी भी निकाला जा सकता है।
असंगठित मज़दूरों की सुरक्षा
भारत में ज़्यादातर मज़दूर असंगठित क्षेत्रक में हैं: भूमिहीन मज़दूर, छोटे किसान, रेहड़ी वाले, निर्माण मज़दूर, घर से काम करने वाले। इन्हें उचित मज़दूरी, छोटे किसानों-व्यापारियों को सस्ता कर्ज़ और दलित, आदिवासी, महिलाओं जैसे वंचित समूहों को मदद चाहिए।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक
मालिकाने के आधार पर:
- सार्वजनिक क्षेत्रक: ज़्यादातर संपत्ति सरकार की और वही सेवाएँ देती है, जैसे रेलवे, डाकघर। मुख्य लक्ष्य जन-कल्याण, मुनाफ़ा नहीं।
- निजी क्षेत्रक: मालिकाना और सेवाएँ व्यक्तियों या कंपनियों के हाथ में, जैसे बड़ी स्टील या IT कंपनियाँ। लक्ष्य मुनाफ़ा कमाना।
सरकार उन चीज़ों पर ख़र्च करती है जो निजी क्षेत्रक उचित दाम पर नहीं देगा, जैसे सड़क, पुल, सिंचाई, बिजली। वह किसानों से उचित दाम पर अनाज ख़रीदकर राशन की दुकानों से सस्ता बेचती है और स्कूल-अस्पताल चलाती है, जो मानव विकास के लिए ज़रूरी हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्राथमिक = प्रकृति का उपयोग; द्वितीयक = विनिर्माण; तृतीयक = सेवाएँ।
- GDP = एक साल में देश में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य।
- अंतिम वस्तु की क़ीमत में मध्यवर्ती वस्तुएँ शामिल → सिर्फ़ अंतिम वस्तु गिनें।
- छिपी बेरोज़गारी: ज़रूरत से ज़्यादा लोग काम पर; कुछ हटें तो उत्पादन नहीं घटता।
- मनरेगा 2005: ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन काम का अधिकार।
- संगठित = पंजीकृत, नियम, नौकरी की सुरक्षा; असंगठित = छोटा, अनियमित, सुरक्षा नहीं।
- सार्वजनिक = सरकार की (कल्याण); निजी = व्यक्ति/कंपनी की (मुनाफ़ा)।
हल किए गए उदाहरण
1. किसान ₹10 में गेहूँ चक्की वाले को बेचता है, चक्की वाला ₹14 में आटा बेकरी को, बेकरी ₹20 में ब्रेड बेचती है। GDP में कितना जुड़ेगा?
सिर्फ़ अंतिम वस्तु: ₹20। 10 + 14 + 20 = ₹44 जोड़ना दोहरी गिनती होगी।
2. एक खेत पर 2 मज़दूर चाहिए, पर परिवार के 5 लोग काम करते हैं। कितने छिपे बेरोज़गार हैं?
5 − 2 = 3 लोग। वे हट जाएँ तो भी उत्पादन वही रहेगा।
3. वर्गीकरण कीजिए: टोकरी बुनकर, कूरियर, कोयला खनिक।
टोकरी बुनकर: द्वितीयक (वस्तु बनाता)। कूरियर: तृतीयक (सेवा)। कोयला खनिक: प्राथमिक (प्रकृति से लेता)।
4. एक छोटी दुकान के कर्मचारी को छुट्टी नहीं मिलती और कभी भी निकाला जा सकता है। कौन-सा क्षेत्रक?
असंगठित क्षेत्रक: नौकरी की सुरक्षा या सुविधाएँ नहीं।
5. मुनाफ़ा कम होने पर भी सरकार रेलवे क्यों चलाती है?
रेलवे सबको उचित दाम पर चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्रक का लक्ष्य कल्याण है, सिर्फ़ मुनाफ़ा नहीं।
6. अंतिम वस्तुएँ: 100 ब्रेड ₹20 की और 50 कमीज़ ₹300 की। GDP निकालिए।
100 × 20 = ₹2,000; 50 × 300 = ₹15,000। GDP = ₹17,000।
आम गलतियाँ
- GDP में मध्यवर्ती वस्तुएँ जोड़ना। सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ गिनी जाती हैं।
- यह मानना कि भारत में सबसे ज़्यादा रोज़गार तृतीयक में है। GDP में वह आगे है; रोज़गार में प्राथमिक।
- छिपी बेरोज़गारी को 'कोई काम नहीं' कहना। लोग काम करते हैं, पर उनका काम कुछ अतिरिक्त नहीं जोड़ता।
- दोनों बँटवारे मिला देना। संगठित/असंगठित काम की शर्तों पर; सार्वजनिक/निजी मालिकाने पर।