Ukraine 9 клас Geography
अध्याय: 6
1. Introduction: economic geography
Subject of economic geography
- आर्थिक भूगोल: चीज़ें कहाँ बनती हैं और कैसे चलती हैं – आर्थिक भूगोल यह पढ़ता है कि लोग कहाँ उत्पादन, व्यापार और उपभोग करते हैं, और वहीं क्यों। काम को क्षेत्रकों में बाँटा जाता है: प्राथमिक (खेती, मछली पकड़ना, खनन), द्वितीयक (कारख़ाने, निर्माण) और तृतीयक (दुकान, परिवहन, बैंक, सॉफ़्टवेयर, पर्यटन); शोध और सूचना वाले काम को कभी-कभी चतुर्थक कहते हैं। कंपनियाँ ऐसी जगह चुनती हैं जहाँ ख़र्च कम हो और ख़रीदार पास हों: कच्चा माल, ऊर्जा, परिवहन, मज़दूर, बाज़ार, सरकारी मदद और प्रकृति, सब मायने रखते हैं। आज ज़्यादातर चीज़ें वैश्विक मूल्य शृंखला में बनती हैं, यानी कदम अलग-अलग जगह होते हैं; सबसे ज़्यादा मूल्य डिज़ाइन, ब्रांड और बिक्री में जुड़ता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और सरकारें इन स्थानों को आकार देती हैं। सामान कंटेनर और ट्रक में चलता है, जबकि पैसा, डेटा और विचार केबल से बहते हैं। उत्पादन महानगरों और तटों पर इकट्ठा होता है और जगहें कंपनियों को बुलाने की होड़ करती हैं। पुराने औद्योगिक क्षेत्र बदलते हैं (पुनर्गठन), कुछ सिकुड़ते हैं, कुछ नए उद्योग और सेवाएँ अपनाते हैं।
2. National and world economies
National economy · World economy
- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक – आर्थिक गतिविधियाँ तीन क्षेत्रकों में बँटती हैं: प्राथमिक (प्रकृति का उपयोग), द्वितीयक (वस्तुएँ बनाना) और तृतीयक (सेवाएँ)। GDP अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य गिनता है। भारत में सबसे ज़्यादा उत्पादन तृतीयक क्षेत्रक का है, पर सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राथमिक में, जहाँ छिपी बेरोज़गारी बहुत है। गतिविधियाँ संगठित-असंगठित और सार्वजनिक-निजी में भी बँटती हैं।
- वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था – वैश्वीकरण यानी व्यापार, निवेश, तकनीक और लोगों की आवाजाही से देशों की अर्थव्यवस्थाओं का तेज़ी से जुड़ना। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कई देशों में उत्पादन फैलाती हैं। नई तकनीक और उदारीकरण (व्यापार अवरोध हटाना, भारत में 1991 से) ने इसे संभव बनाया। WTO व्यापार के नियम बनाता है। वैश्वीकरण से कुछ को फ़ायदा, कुछ को नुकसान हुआ, इसलिए न्यायसंगत वैश्वीकरण चाहिए।
3. Primary sector
Agriculture · Forestry · Mining industry
- कृषि – कृषि यानी फ़सलें उगाना और पशु पालना। भारत में छोटे पारिवारिक खेतों से लेकर बड़े वाणिज्यिक खेत और बाग़ान तक हैं। फ़सलें तीन ऋतुओं में उगती हैं: ख़रीफ़, रबी और ज़ायद। हर मुख्य फ़सल को अपनी बारिश, तापमान और मिट्टी चाहिए। सरकार ने किसानों की मदद के लिए सुधार किए हैं।
- वन संसाधन – वन पृथ्वी की लगभग 31% भूमि पर हैं। ये लकड़ी, जलावन, काग़ज़ की लुगदी, भोजन, दवाएँ और रेशे देते हैं, और हवा साफ़ करते हैं, कार्बन जमा रखते हैं, मिट्टी थामते हैं, बाढ़ रोकते हैं और ज़्यादातर थलीय जीवों का घर हैं। वानिकी (forestry), यानी वनों का प्रबंधन और कटाई, प्राथमिक क्षेत्र का हिस्सा है। जब पेड़ उगने से तेज़ कटते हैं, तो वनोन्मूलन से मिट्टी का कटाव, बाढ़, जीवों का नुकसान और हवा में ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड होता है। टिकाऊ वानिकी हर साल उतना ही काटती है जितना जंगल बढ़ता है और दोबारा पेड़ लगाती है; संरक्षित क्षेत्र, सामुदायिक वन और कृषि-वानिकी भी वन बचाते हैं।
- खनिज तथा ऊर्जा संसाधन – खनिज चट्टानों में मिलने वाले प्राकृतिक पदार्थ हैं। ये धात्विक (लौह या अलौह), अधात्विक या ऊर्जा खनिज होते हैं। ऊर्जा पारंपरिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली) और गैर-पारंपरिक स्रोतों (सूर्य, पवन, परमाणु, बायोगैस, ज्वार, भूतापीय) से मिलती है। दोनों का संरक्षण ज़रूरी है।
4. Secondary sector
Electricity generation and supply · Metallurgy · Chemical, wood and paper production · Machinery and equipment · Textiles, clothing and footwear · Food and drinks production
- खनिज तथा ऊर्जा संसाधन – खनिज चट्टानों में मिलने वाले प्राकृतिक पदार्थ हैं। ये धात्विक (लौह या अलौह), अधात्विक या ऊर्जा खनिज होते हैं। ऊर्जा पारंपरिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली) और गैर-पारंपरिक स्रोतों (सूर्य, पवन, परमाणु, बायोगैस, ज्वार, भूतापीय) से मिलती है। दोनों का संरक्षण ज़रूरी है।
- विनिर्माण उद्योग – विनिर्माण कच्चे माल को ज़्यादा क़ीमती चीज़ों में बदलता है। यह रोज़गार देता है, खेती पर निर्भरता घटाता है और निर्यात से पैसा कमाता है। उद्योगों को कच्चे माल, भूमिका, पूँजी, स्वामित्व और भार के आधार पर बाँटा जाता है। उनकी जगह कच्चे माल, बिजली, श्रम, पूँजी, परिवहन और बाज़ार पर निर्भर है। उद्योग हवा, पानी, ज़मीन को प्रदूषित करते और शोर करते हैं, पर इसे रोका जा सकता है।
5. Tertiary sector
Transport · Trade · Tourism · Finance, education, science, IT and health care
- राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ – परिवहन, संचार और व्यापार उत्पादकों को उपभोक्ताओं से जोड़ते हैं और देश को एक करते हैं, जैसे शरीर में नसें। भारत में सड़कें, रेल, पाइपलाइन, जलमार्ग, पत्तन और वायुमार्ग हैं। संचार संदेश पहुँचाता है; व्यापार देश के अंदर और देशों के बीच सामान का लेन-देन है। पर्यटन भी एक व्यापार है जो पैसा और रोज़गार देता है।
- विश्व में परिवहन एवं संचार – परिवहन लोगों और सामान को ले जाता है; संचार संदेश ले जाता है। सड़कें कम दूरी और घर-घर तक के लिए सबसे अच्छी हैं, और राजमार्ग दूर के शहरों को जोड़ते हैं। पार-महाद्वीपीय रेलमार्ग, जैसे ट्रांस-साइबेरियन, पूरे महाद्वीप को पार करते हैं। ज़्यादातर विश्व व्यापार समुद्री मार्गों से होता है, और स्वेज़ व पनामा जैसी नहरें लंबे चक्कर बचाती हैं। राइन और सेंट लॉरेंस समुद्री मार्ग जैसे आंतरिक जलमार्ग भारी माल को ज़मीन के अंदर तक ले जाते हैं। वायु परिवहन सबसे तेज़ पर महँगा है, पाइपलाइन तेल और गैस लगातार ले जाती है, और उपग्रह व इंटरनेट सूचना को सेकंडों में दुनिया भर पहुँचाते हैं।
- पर्यटन भूगोल: संसाधन, प्रकार, प्रभाव और नियोजन – पर्यटन का अर्थ है घर से दूर कम से कम एक रात के लिए घूमने, व्यापार, इलाज या रिश्तेदारों से मिलने जाना। पर्यटन भूगोल पूछता है कि लोग कहाँ जाते हैं, क्यों, और पर्यटन जगहों पर क्या असर डालता है। जगहें प्राकृतिक संसाधनों (पर्वत, तट, वन्यजीव) और सांस्कृतिक संसाधनों (धरोहर, उत्सव, भोजन) से लोगों को खींचती हैं। लोग घर से धकेले और गंतव्य की ओर खींचे जाते हैं। पर्यटन घरेलू या अंतरराष्ट्रीय होता है, और इसके कई प्रकार हैं: इको, साहसिक, सांस्कृतिक, चिकित्सा और समुद्री। रिसॉर्ट अक्सर खोज से ठहराव और फिर पतन या पुनर्जीवन तक एक जीवन-चक्र से गुज़रते हैं। पर्यटन रोज़गार और पैसा लाता है, पर वहन क्षमता से ज़्यादा पर्यटक प्रकृति और संस्कृति को नुक़सान पहुँचाते हैं, इसलिए अच्छा नियोजन टिकाऊ पर्यटन चाहता है।
- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक – आर्थिक गतिविधियाँ तीन क्षेत्रकों में बँटती हैं: प्राथमिक (प्रकृति का उपयोग), द्वितीयक (वस्तुएँ बनाना) और तृतीयक (सेवाएँ)। GDP अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य गिनता है। भारत में सबसे ज़्यादा उत्पादन तृतीयक क्षेत्रक का है, पर सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राथमिक में, जहाँ छिपी बेरोज़गारी बहुत है। गतिविधियाँ संगठित-असंगठित और सार्वजनिक-निजी में भी बँटती हैं।
6. Global problems of humanity
Global problems and sustainable development
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- पर्यावरण और धारणीय विकास – पर्यावरण हमें संसाधन देता है, हमारा कचरा सोखता है, जीवन चलाता है और सुंदरता देता है। जब हम संसाधन प्रकृति के नवीकरण से तेज़ लेते हैं, या कचरा उसकी सोखने की क्षमता से ज़्यादा फेंकते हैं, तो धारण क्षमता पार होती है और पर्यावरण संकट आता है। भारत में भूमि अपक्षय, वायु-जल प्रदूषण, वन और जैव-विविधता की हानि है। जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्मी फँसती है और वैश्विक उष्णता होती है; CFC ओज़ोन परत पतली करते हैं। धारणीय विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए।