विनिर्माण क्यों ज़रूरी है
- कच्चे माल को ज़्यादा क़ीमती सामान में बदलता है (मूल्यवर्धन)।
- रोज़गार देता है और लोगों को सिर्फ़ खेती पर निर्भर रहने से निकालता है।
- खेती की मदद करता है: ट्रैक्टर, खाद, पंप उद्योग से आते हैं।
- ग़रीबी और बेरोज़गारी घटाता है, क्षेत्रीय असमानता कम करता है।
- बने सामान के निर्यात से विदेशी मुद्रा मिलती है।
कृषि और उद्योग साथ-साथ चलते हैं: कृषि-उद्योग खेत की उपज ख़रीदते हैं और खेत कारखानों का सामान। भारत GDP में विनिर्माण का हिस्सा लगभग 25% करना चाहता है (यह लगभग 17% पर रहा है)।
उद्योगों का वर्गीकरण
- कच्चे माल से: कृषि आधारित (सूती, जूट, रेशम, चीनी, खाद्य तेल) और खनिज आधारित (लोहा-इस्पात, सीमेंट, एल्युमिनियम, पेट्रो-रसायन)।
- मुख्य भूमिका से: आधारभूत उद्योग दूसरे उद्योगों को माल देते हैं (लोहा-इस्पात, ताँबा प्रगलन); उपभोक्ता उद्योग लोगों के लिए सामान बनाते हैं (चीनी, टूथपेस्ट, पंखे)।
- पूँजी से: लघु उद्योग (कम पूँजी) और बृहत् उद्योग।
- स्वामित्व से: सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार: BHEL, SAIL), निजी क्षेत्र (TISCO, डाबर), संयुक्त क्षेत्र (ऑयल इंडिया लिमिटेड), सहकारी क्षेत्र (महाराष्ट्र की चीनी मिलें, केरल का नारियल रेशा)।
- भार से: भारी (लोहा-इस्पात) और हल्के (बिजली का सामान)।
उद्योग कहाँ लगते हैं
उद्योग वहाँ बढ़ता है जहाँ ख़र्च सबसे कम हो: कच्चे माल, सस्ती बिजली, श्रम, पूँजी, अच्छे परिवहन और बाज़ार के पास। उद्योग लगने पर उसके आसपास शहर बढ़ते हैं (नगरीकरण), और कई उद्योग सेवाएँ बाँटने के लिए एक साथ जुटते हैं; इसे समूहन बचत कहते हैं।
भारत के मुख्य उद्योग
- सूती वस्त्र: पहली सफल मिल मुंबई (1854); महाराष्ट्र-गुजरात के कपास क्षेत्र के पास; कताई मज़बूत, बुनाई कम; हथकरघा बहुत रोज़गार देता है।
- जूट: पश्चिम बंगाल में हुगली नदी किनारे; सस्ता जल परिवहन और श्रम।
- चीनी: मौसमी; मिलें दक्षिण (महाराष्ट्र, कर्नाटक) जा रही हैं क्योंकि पेराई का मौसम लंबा है।
- लोहा-इस्पात: आधारभूत उद्योग; लौह अयस्क, कोकिंग कोयला और चूना पत्थर लगभग 4:2:1; ज़्यादातर संयंत्र छोटा नागपुर पठार पर।
- एल्युमिनियम: बॉक्साइट और बहुत सस्ती बिजली; ओडिशा, छत्तीसगढ़।
- रसायन और उर्वरक: कार्बनिक-अकार्बनिक रसायन; नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ेट खाद।
- सीमेंट: चूना पत्थर, सिलिका, जिप्सम; कच्चे माल के पास; पहला कारखाना चेन्नई (1904)।
- मोटर गाड़ी, IT और इलेक्ट्रॉनिक्स: बेंगलुरु इलेक्ट्रॉनिक राजधानी; IT को भारी कच्चे माल से ज़्यादा कुशल लोग चाहिए।
औद्योगिक प्रदूषण और नियंत्रण
- वायु: कारखानों और बिजलीघरों से धुआँ, सल्फ़र डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड।
- जल: रंग, रसायन, डिटर्जेंट और गर्म पानी नदियों में।
- तापीय: बिजलीघरों का गर्म पानी जलीय जीवों को नुकसान करता है।
- भूमि: कचरा, धातुमल और काँच फेंकने से मिट्टी ज़हरीली।
- शोर: मशीनें, जनरेटर, आरी — सुनने में कमी और तनाव।
नियंत्रण: चिमनियों पर फ़िल्टर, स्थिर-विद्युत अवक्षेपक और स्क्रबर; गंदे पानी का तीन चरणों (भौतिक, जैविक, रासायनिक) में उपचार; पानी का पुनः उपयोग; वर्षा जल संग्रहण; साफ़ ईंधन; कारखाने के चारों ओर पेड़; साइलेंसर और कान की सुरक्षा। NTPC के संयंत्र दिखाते हैं कि पर्यावरण का ध्यान रखकर बिजली बन सकती है।
करके देखें
3D के आख़िरी चरण में अनुमान लगाइए: कौन-सा उपाय नदी को नीला करेगा? स्लाइडर एक-एक कदम बढ़ाकर जाँचिए। घर पर: अपने कमरे की पाँच चीज़ें देखिए और पता कीजिए वे कृषि आधारित या खनिज आधारित उद्योग से आईं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विनिर्माण: कच्चा माल → ज़्यादा क़ीमती उत्पाद (मूल्यवर्धन)
- कृषि आधारित बनाम खनिज आधारित
- सार्वजनिक · निजी · संयुक्त · सहकारी क्षेत्र
- स्थान: कच्चा माल, बिजली, श्रम, पूँजी, परिवहन, बाज़ार
- लोहा-इस्पात: लौह अयस्क : कोकिंग कोयला : चूना पत्थर ≈ 4 : 2 : 1
हल किए गए उदाहरण
1. अमूल को स्वामित्व और कच्चे माल के आधार पर बाँटिए।
स्वामित्व: सहकारी क्षेत्र। कच्चा माल: कृषि आधारित (खेतों का दूध)।
2. ज़्यादातर लोहा-इस्पात संयंत्र छोटा नागपुर पठार पर क्यों हैं?
पास में लौह अयस्क, कोयला और चूना पत्थर मिलते हैं; सस्ता श्रम और रेल भी है।
3. इस्पात संयंत्र को हर 1 टन चूना पत्थर पर 4 टन लौह अयस्क चाहिए। 25 टन चूना पत्थर के लिए कितना अयस्क?
4 × 25 = 100 टन लौह अयस्क।
आम गलतियाँ
- सोचना कि आधारभूत उद्योग घरों के लिए सामान बनाते हैं। वे दूसरे उद्योगों के लिए बनाते हैं।
- TISCO को सार्वजनिक क्षेत्र कहना। यह निजी है; SAIL सार्वजनिक है।
- कहना कि IT को भारी कच्चा माल चाहिए। उसे कुशल लोग और अच्छा संचार चाहिए।
- प्रदूषण गिनाते समय तापीय प्रदूषण भूल जाना।