China 高一 Geography
अध्याय: 11
1. Comp.1 Ch.1 Earth in the universe
Cosmic environment · Sun's influence · Earth history · Earth's spheres
- सौरमंडल – सौरमंडल = सूर्य और वह सब कुछ जिसे उसका गुरुत्व थामे रखता है: 8 ग्रह, उनके चंद्रमा, बौने ग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और धूल। भीतरी चार ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) छोटे और चट्टानी हैं। क्षुद्रग्रह पट्टी के बाद विशाल ग्रह: गैस दानव बृहस्पति और शनि, हिम दानव यूरेनस और नेपच्यून। गुरुत्व ग्रहों को सूर्य की ओर खींचता है जबकि वे बगल में चलते हैं, इसलिए वे कक्षा में घूमते हैं; पास वाले तेज़ चलते हैं और उनका वर्ष छोटा होता है। यह सब लगभग 4.6 अरब साल पहले गैस और धूल के घूमते बादल से बना।
- सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान – पृथ्वी को सूर्य से छोटी तरंगों के रूप में ऊर्जा मिलती है; इसे सूर्यातप कहते हैं। जहाँ किरणें सीधी पड़ती हैं (विषुवत के पास) वहाँ यह सबसे ज़्यादा और तिरछी किरणों वाले ध्रुवों पर सबसे कम है। हवा नीचे से गरम होती है: पहले ज़मीन गरम होती है, फिर चालन, संवहन, अभिवहन और पार्थिव विकिरण (लंबी तरंगें) से हवा गरम होती है। 100 इकाई धूप में 35 लौट जाती हैं (एल्बिडो), 14 हवा और 51 ज़मीन सोखती है; सोखी हुई सारी 65 इकाई फिर अंतरिक्ष में लौटती हैं — यही ऊष्मा बजट है। तापमान विषुवत से ध्रुवों की ओर और ऊँचाई के साथ घटता है; स्थल-जल और समुद्री धाराएँ इसे बदलती हैं। कभी ठंडी हवा नीचे और गरम ऊपर होती है — यह तापमान व्युत्क्रमण है।
- पृथ्वी की आंतरिक संरचना: भूकंपीय तरंगें, परतें और ज्वालामुखी – कोई पृथ्वी के केंद्र तक खोद नहीं सकता, इसलिए हम अंदर की जानकारी प्रत्यक्ष स्रोतों (खानों की चट्टान, गहरी खुदाई, लावा) और अप्रत्यक्ष स्रोतों (गहराई के साथ ताप और दबाव, उल्कापिंड, गुरुत्व, चुंबकत्व और सबसे बढ़कर भूकंपीय तरंगें) से लेते हैं। P-तरंगें ठोस और तरल दोनों से गुज़रती हैं; S-तरंगें सिर्फ़ ठोस से। जहाँ तरंगें नहीं पहुँचतीं, वहाँ छाया क्षेत्र बनता है, जो बताता है कि बाहरी क्रोड तरल है। भूकंप परिमाण (रिक्टर) और तीव्रता (मरकैली) से मापा जाता है। पृथ्वी में पतली भूपर्पटी, नरम दुर्बलतामंडल वाला मोटा मैंटल, तरल बाहरी क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड है। सतह तक पहुँचा मैग्मा ज्वालामुखी बनाता है; अंदर ठंडा हुआ मैग्मा बैथोलिथ, सिल, डाइक जैसी अंतर्वेधी आकृतियाँ बनाता है।
2. Comp.1 Ch.2 Atmosphere
Composition and layers · Heating; thermal circulation; wind
- वायुमंडल का संघटन तथा संरचना – वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर हवा की मोटी चादर है, जिसे गुरुत्व पकड़े रखता है। इसमें ज़्यादातर नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) है; थोड़ी आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओज़ोन, जलवाष्प और धूल भी है। इसकी पाँच परतें हैं: क्षोभमंडल (मौसम यहीं), समतापमंडल (ओज़ोन परत), मध्यमंडल (सबसे ठंडा), तापमंडल (आयनमंडल) और बहिर्मंडल। मौसम थोड़े समय की हालत है, जलवायु लगभग 30 साल का औसत। दोनों के तत्व एक ही हैं: तापमान, दाब, पवन, आर्द्रता, बादल और वर्षण।
- वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ – हवा का वज़न होता है, इसलिए वह नीचे दबाव डालती है: यही वायुदाब है (समुद्र तल पर लगभग 1013 mb)। पवन उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है; दाब प्रवणता बल इसे धकेलता है, कोरिऑलिस बल मोड़ता है (उत्तर में दाएँ, दक्षिण में बाएँ) और घर्षण ज़मीन के पास धीमा करता है। असमान गर्मी से दाब पेटियाँ बनती हैं (विषुवतीय निम्न, उपोष्ण उच्च, उपध्रुवीय निम्न, ध्रुवीय उच्च) और तीन कोष्ठ, जिनसे भूमंडलीय पवनें चलती हैं: व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें, ध्रुवीय पूर्वी पवनें। ऋतु के साथ पेटियाँ खिसकती हैं और मानसून जैसी मौसमी पवनें बनती हैं; स्थानीय पवनों में स्थल-समुद्र समीर और पर्वत-घाटी समीर हैं। एक जैसी गर्मी और नमी वाली विशाल हवा वायुराशि है; दो वायुराशियों की सीमा वाताग्र है। चक्रवात निम्न दाब वाले तूफ़ान हैं: उष्णकटिबंधीय गरम समुद्र पर, शीतोष्ण वाताग्रों पर बनते हैं। तड़ितझंझा और टॉरनेडो छोटे पर बहुत तेज़ तूफ़ान हैं।
3. Comp.1 Ch.3 Water
Water cycle · Properties of seawater · Movement of seawater
- जल चक्र: एक तंत्र (System) के रूप में – पृथ्वी का पानी भंडारों (महासागर, बर्फ़, भूजल, नदी, झील, मिट्टी, हवा, जीव) के बीच प्रवाहों से घूमता है — वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण, अंतःस्यंदन, अपवाह। पूरी पृथ्वी के लिए यह बंद तंत्र है: कुल पानी उतना ही रहता है। नदी बेसिन खुला तंत्र है: वर्षा अंदर आती है, पानी जमा होता है, और नदी-बहाव व वाष्पोत्सर्जन से बाहर जाता है। जल संतुलन P = Q + E ± ΔS इसका हिसाब रखता है। बाढ़ हाइड्रोग्राफ़ दिखाता है कि नदी वर्षा पर कितनी जल्दी बढ़ती है; इसकी चोटी और लैग टाइम चट्टान, मिट्टी, ढाल, पेड़-पौधों और भूमि उपयोग पर निर्भर हैं। मौसम, तूफ़ान, वनों की कटाई, खेती, शहर और भूजल दोहन — सब चक्र को बदलते हैं।
- जल (महासागर): जलीय चक्र, महासागरीय तल, तापमान और लवणता – धरती का पानी महासागर, हवा, स्थल और जीवों के बीच लगातार घूमता है — यह जलीय चक्र है; लगभग 97% पानी महासागरों में है। महासागरीय तल के मुख्य भाग हैं — महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, गहरे समुद्री मैदान और महासागरीय गर्त (खाइयाँ) — और छोटे रूप जैसे मध्य-महासागरीय कटक, समुद्री टीला, निमग्न द्वीप (गुयॉट), अंतःसागरीय कैनियन, एटॉल और बैंक। सतह का पानी विषुवत के पास सबसे गरम और ध्रुवों की ओर ठंडा होता है; गहराई में ताप प्रवणता परत (थर्मोक्लाइन) में तेज़ी से ठंडा होता है और नीचे 0–4 °C के पास रहता है। लवणता समुद्री पानी में नमक है, लगभग 35 ग्राम प्रति 1,000 ग्राम (35‰)। वाष्पीकरण से बढ़ती और बारिश, नदियों व पिघलती बर्फ़ से घटती है, इसलिए उपोष्ण क्षेत्रों और बंद गरम समुद्रों में ज़्यादा और विषुवत, ध्रुवों व नदी मुहानों के पास कम है।
- महासागरीय जल संचलन: तरंगें, ज्वार-भाटा और धाराएँ – महासागर का पानी तीन तरह से चलता है। तरंगें (लहरें) ज़्यादातर पवन से बनती हैं: ऊर्जा आगे जाती है जबकि पानी का हर कण छोटे वृत्त में घूमता है; उथले पानी में लहरें धीमी होकर टूटती हैं। ज्वार-भाटा समुद्र का नियमित चढ़ना-उतरना है, आमतौर पर दिन में दो बार, जो चंद्रमा (और सूर्य) के खिंचाव और पृथ्वी-चंद्रमा के घूमने से होता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में हों (अमावस्या, पूर्णिमा) तो बहुत ऊँचे दीर्घ ज्वार; समकोण पर हों (अष्टमी) तो कमज़ोर लघु ज्वार। महासागरीय धाराएँ तय दिशा में बहती पानी की विशाल नदियाँ हैं, जिन्हें पवनें, गर्मी, गुरुत्व, लवणता और घनत्व का अंतर चलाते हैं और कोरिऑलिस बल मोड़ता है। गरम धाराएँ विषुवत से ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ ध्रुवों से विषुवत की ओर बहती हैं। धाराएँ तटों की जलवायु, मछली, कोहरा और जहाज़रानी बदलती हैं।
4. Comp.1 Ch.4 Landforms
Common landform types · Observing landforms
- भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास: बहते जल और पवन का काम – बहता जल और पवन भू-आकृतियाँ काटने और बनाने वाले दो बड़े कारक हैं। नदी अपने खड़े ऊपरी भाग में गहरी V-आकार घाटियाँ, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात और जलगर्तिकाएँ काटती है, और धीमी होने पर जलोढ़ पंख, डेल्टा, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध और बिंदु बार बनाती है। उसके मोड़ (विसर्प) बढ़कर कट जाते हैं और गोखुर झील बनती है। मरुस्थल में पवन ढीली रेत उड़ाती है (अपवाहन), रेत से चट्टान रगड़ती है (अपघर्षण) और छत्रक शिला बनाती है, और परत बाढ़ के साथ ज़मीन को पेडीमेंट, पेडीप्लेन और इंसेलबर्ग में बदलती है; रेत को बरखान, परवलयिक, सीफ़, अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ टिब्बों के रूप में जमा करती है। भू-आकृतियाँ जीवों की तरह युवा, प्रौढ़ और वृद्ध अवस्था से गुज़रती हैं।
- भौगोलिक जाँच और क्षेत्र कार्य – भौगोलिक जाँच (enquiry) किसी असली जगह के बारे में एक छोटा शोध प्रोजेक्ट है। इसके साफ़ कदम हैं: सवाल पूछो और परिकल्पना लिखो; सही नमूना विधि से प्राथमिक आँकड़े (अपने माप और सर्वे) और द्वितीयक आँकड़े (जनगणना, नक्शे, वेबसाइट) जुटाओ; आँकड़ों को सही ग्राफ़ और नक्शों में दिखाओ; ढाँचा समझो और निष्कर्ष निकालो; फिर जाँचो कि नतीजे कितने भरोसेमंद हैं। यही कौशल फ़ैसले लेने में काम आते हैं: सबूतों से विकल्प तौलो और सबसे अच्छे को कारण सहित चुनो। बड़ी कक्षाओं में छात्र अपने सवाल, प्राथमिक-द्वितीयक आँकड़ों, विश्लेषण और निष्कर्ष के साथ एक लंबी स्वतंत्र जाँच लिखते हैं।
5. Comp.1 Ch.5 Vegetation and soil
Vegetation · Soil
- भारत की प्राकृतिक वनस्पति: वन, वन्यजीव और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र – प्राकृतिक वनस्पति वे पौधे हैं जो बिना इंसान के लगाए अपने-आप उगते हैं। भारत में वर्षा और तापमान तय करते हैं कि कहाँ कौन-सा वन होगा। बहुत गीली जगहों पर ऊँचे उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन हैं। मध्यम वर्षा वाली जगहों पर पर्णपाती वन हैं, जो सूखे मौसम में पत्ते गिराते हैं; ये सबसे ज़्यादा हैं। सूखी जगहों पर कँटीली झाड़ियाँ हैं। पहाड़ों पर ऊँचाई के साथ वन बदलते हैं और नदियों के मुहानों पर मैंग्रोव हैं। वन लकड़ी, भोजन, दवा और साफ़ हवा देते हैं और वन्यजीवों का घर हैं। भारत इन्हें क़ानून, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, परियोजनाओं और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों से बचाता है, जिनमें सुरक्षित कोर, बफ़र और बाहरी संक्रमण क्षेत्र होते हैं।
- मृदा: कैसे बनती है, उसकी परतें और उसे कैसे बचाएँ – मृदा (मिट्टी) ज़मीन की ऊपरी, ढीली और पतली परत है जिसमें पौधे उगते हैं। इसमें लगभग 45% चट्टान के कण, 5% जैविक पदार्थ (ह्यूमस), 25% पानी और 25% हवा होती है। जब अपक्षय जनक चट्टान को तोड़ता है और जीव ह्यूमस जोड़ते हैं, तब बहुत धीरे-धीरे मृदा बनती है। इसके पाँच कारक हैं: जनक चट्टान, जलवायु, जीव, उच्चावच (ढाल) और समय। ज़मीन को काटकर देखें तो परतें दिखती हैं, जिन्हें संस्तर कहते हैं: O (पत्तियाँ और ह्यूमस), A (ऊपरी मृदा), B (अवमृदा), C (टूटी चट्टान) और R (आधार शैल)। मृदा का गठन रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के हिस्से पर निर्भर है। मृदा भोजन उगाती है, पानी जमा और साफ़ करती है, कार्बन रखती है और अनगिनत जीवों का घर है, पर अपरदन, लवण और प्रदूषण इसे बनने से कहीं तेज़ी से नष्ट कर सकते हैं।
6. Comp.1 Ch.6 Natural hazards
Meteorological hazards · Geological hazards · Disaster prevention · GIS/RS/GNSS in disaster reduction
- प्राकृतिक संकट (Natural Hazards) – प्राकृतिक संकट (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों और चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, बाढ़, सूखा या चक्रवात। जब यह ऐसे लोगों पर पड़ती है जो तैयार नहीं हैं, तब यह आपदा (disaster) बन जाती है। भूगर्भीय संकट धरती के अंदर से आते हैं, मौसमी संकट हवा और पानी से। जोखिम = संकट × सुभेद्यता ÷ क्षमता, इसलिए चेतावनी, मज़बूत मकान और प्रशिक्षित लोग नुकसान घटाते हैं।
- आपदा प्रबंधन: तैयारी, चेतावनी, निकासी, पुनर्वास – खतरा (बाढ़, भूकंप, आग, तूफ़ान) आपदा तब बनता है जब वह बिना तैयारी वाले लोगों पर आता है। आपदा प्रबंधन एक चक्र है: शमन (पहले से खतरा घटाना), तैयारी (योजना, किट, अभ्यास), प्रतिक्रिया (चेतावनी, निकासी, बचाव) और पुनर्वास (बेहतर दोबारा बनाना)। हर खतरे का सही कदम जानना जान बचाता है।
- सुदूर संवेदन का परिचय – सुदूर संवेदन पृथ्वी की सतह के बारे में बिना छुए जानकारी जुटाना है, वस्तुओं द्वारा परावर्तित या उत्सर्जित ऊर्जा दर्ज करके। यह ऊर्जा स्रोत से उपयोगकर्ता तक चरणों में होता है। संवेदक मंचों (भूमि, वायुयान, उपग्रह) पर रहते हैं और फ़ोटोग्राफ़िक या अंकीय उत्पाद देते हैं। अलग वस्तुओं के अलग स्पेक्ट्रमी चिह्नक होते हैं, जिनसे हम पानी, पौधे और मिट्टी पहचानते हैं।
7. Comp.2 Ch.1 Population
Distribution · Migration · Population capacity
- विश्व जनसंख्या: वितरण, घनत्व और वृद्धि – धरती पर लोग बराबर नहीं फैले। ज़्यादातर लोग पानी के पास उपजाऊ मैदानों में रहते हैं; मरुस्थल, ऊँचे पर्वत और बर्फ़ीले इलाक़ों में बहुत कम। घनत्व बताता है कि हर वर्ग किमी पर कितने लोग हैं। भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक कारक यह पैटर्न समझाते हैं। हज़ारों साल जनसंख्या धीरे बढ़ी, फिर 1800 के बाद बहुत तेज़ी से। जनसंख्या जन्म, मृत्यु और प्रवास से बदलती है। जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत बताता है कि गाँव की खेती से शहरी उद्योग की ओर बढ़ते समाज में जन्म और मृत्यु दर कैसे गिरती हैं। देश परिवार नियोजन और स्वास्थ्य सेवा से वृद्धि नियंत्रित करते हैं।
- प्रवास (Migration) – प्रवास लोगों का एक जगह से दूसरी जगह कुछ समय या हमेशा के लिए रहने जाना है। छोड़ी गई जगह उद्गम है; पहुँचने की जगह गंतव्य। लोग प्रतिकर्ष कारकों (घर की समस्याएँ) और अपकर्ष कारकों (दूसरी जगह का आकर्षण) से जाते हैं, पर खर्च, दूरी और कानून जैसी बाधाएँ कुछ को रोकती हैं। प्रवास आंतरिक या अंतरराष्ट्रीय, अस्थायी या स्थायी, स्वैच्छिक या बलात हो सकता है, और यह उद्गम व गंतव्य दोनों को बदलता है।
- जनसंख्या धारण क्षमता: वहन क्षमता और उचित जनसंख्या – हर क्षेत्र की एक हद होती है कि वह कितने लोगों को लंबे समय तक पाल सकता है। यह हद वहन क्षमता कहलाती है। उचित जनसंख्या उससे कुछ कम होती है: उसमें सब अच्छे से रहते हैं और बचत भी रहती है। तकनीक, व्यापार और प्रति व्यक्ति उपयोग से ये हदें बदलती हैं।
8. Comp.2 Ch.2 Rural and urban
Spatial structure · Urbanisation · Regional culture and landscapes
- स्थानिक संरचना: गाँव और शहर अपनी ज़मीन कैसे बाँटते हैं – स्थानिक संरचना का मतलब है किसी जगह में अलग-अलग भूमि उपयोगों की व्यवस्था। गाँव में घर, खेत और चरागाह छल्लों में बसे होते हैं। शहर कार्यात्मक क्षेत्रों में बँटता है: व्यस्त केंद्र, दुकानें, आवास, उद्योग और हरियाली। दूरी, ज़मीन का भाव और पहुँच इस पैटर्न को समझाते हैं।
- नगरीकरण: शहर क्यों बढ़ते हैं और उन्हें बेहतर कैसे बनाएँ – नगरीकरण किसी देश या दुनिया के उन लोगों के हिस्से का बढ़ना है जो कस्बों और शहरों में रहते हैं। 1950 में दुनिया के लगभग 30% लोग नगरीय थे; 2007 से आधे से ज़्यादा हैं, और 2050 तक लगभग 68% होने का अनुमान है। शहर ग्रामीण-नगरीय प्रवास (गाँव से धक्का देने वाले और शहर की ओर खींचने वाले कारक) और प्राकृतिक वृद्धि से बढ़ते हैं। आज सबसे तेज़ बढ़त एशिया और अफ़्रीका के कम आय वाले और उभरते देशों में है, जहाँ 1 करोड़ से ज़्यादा के महानगर बन रहे हैं; कई अमीर देशों में बढ़त धीमी है और लोग उपनगरों या गाँवों की ओर भी जाते हैं (उपनगरीकरण और प्रति-नगरीकरण)। तेज़ बढ़त से अवसर (रोज़गार, सेवाएँ) और समस्याएँ (अनौपचारिक बस्तियाँ, ट्रैफ़िक, प्रदूषण, कचरा, बाढ़, नगरीय ऊष्मा द्वीप) आती हैं। टिकाऊ नगरीय विकास इन्हें सार्वजनिक परिवहन, हरी जगहों, साफ़ पानी, पुनर्चक्रण, सस्ते घरों और नवीकरणीय ऊर्जा से सुधारता है।
- सांस्कृतिक भूगोल: जगह संस्कृति को और संस्कृति जगह को कैसे गढ़ती है – सांस्कृतिक भूगोल यह पढ़ता है कि अलग-अलग जगहों पर संस्कृति कैसे अलग है और कैसे फैलती है. संस्कृति किसी समूह के जीने का साझा तरीका है: भाषा, धर्म, भोजन, पहनावा, भवन, कला और त्योहार. लोग अपनी संस्कृति के हिसाब से ज़मीन बदलते हैं, जिससे सांस्कृतिक भूदृश्य बनता है. प्राकृतिक पर्यावरण, ख़ासकर जलवायु और समुद्र की नज़दीकी, घर, भोजन और कपड़ों पर असर डालते हैं, पर लोग तकनीक और अपनी पसंद से भी चुनते हैं. मिलते-जुलते गुणों वाले इलाक़े सांस्कृतिक प्रदेश बनाते हैं. संस्कृति किसी केंद्र (हर्थ) से शुरू होकर प्रसार से फैलती है: स्थानांतरण (लोग जाते हैं) या विस्तार (विचार जाता है), जो संक्रामक, पदानुक्रमिक या उद्दीपन प्रकार का होता है. प्रसार से संस्कृति-ग्रहण, आत्मसात्करण, समन्वय और आज वैश्वीकरण होता है.
9. Comp.2 Ch.3 Industry location
Agriculture location · Industry location · Service location
- कृषि के स्थान संबंधी कारक: प्राकृतिक और सामाजिक कारण, और उनका बदलना – कोई खेत किसी जगह कोई ख़ास फ़सल इसलिए उगाता है कि दो तरह के कारक काम करते हैं। प्राकृतिक कारक हैं गरमी, वर्षा, मिट्टी और ज़मीन की बनावट। सामाजिक कारक हैं बाज़ार, परिवहन, मज़दूर, पूँजी, तकनीक और सरकारी नियम। दोनों समय के साथ बदलते हैं, इसलिए खेती के क्षेत्र भी बदलते हैं।
- विनिर्माण उद्योग – विनिर्माण कच्चे माल को ज़्यादा क़ीमती चीज़ों में बदलता है। यह रोज़गार देता है, खेती पर निर्भरता घटाता है और निर्यात से पैसा कमाता है। उद्योगों को कच्चे माल, भूमिका, पूँजी, स्वामित्व और भार के आधार पर बाँटा जाता है। उनकी जगह कच्चे माल, बिजली, श्रम, पूँजी, परिवहन और बाज़ार पर निर्भर है। उद्योग हवा, पानी, ज़मीन को प्रदूषित करते और शोर करते हैं, पर इसे रोका जा सकता है।
- सेवाओं की अवस्थिति: दुकान और गोदाम कहाँ बनें – दुकान, क्लिनिक, बैंक या गोदाम जैसी सेवा के लिए सही जगह चाहिए। सही जगह वह है जहाँ पहुँच की दूरी (रेंज) के अंदर काफ़ी ग्राहक हों, किराया ठीक हो, सड़क या रेल से पहुँचना आसान हो और प्रतिस्पर्धा बहुत ज़्यादा न हो। गोदाम और लॉजिस्टिक केंद्र हाईवे, बंदरगाह और रेल के पास सस्ती ज़मीन चुनते हैं। सड़कें, शहर और ऑनलाइन खरीदारी बदलती हैं, तो सही जगहें भी बदलती हैं।
10. Comp.2 Ch.4 Transport and development
Development affects transport; transport affects development
- राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ – परिवहन, संचार और व्यापार उत्पादकों को उपभोक्ताओं से जोड़ते हैं और देश को एक करते हैं, जैसे शरीर में नसें। भारत में सड़कें, रेल, पाइपलाइन, जलमार्ग, पत्तन और वायुमार्ग हैं। संचार संदेश पहुँचाता है; व्यापार देश के अंदर और देशों के बीच सामान का लेन-देन है। पर्यटन भी एक व्यापार है जो पैसा और रोज़गार देता है।
11. Comp.2 Ch.5 Environment and development
Main environmental problems · Sustainable development · National development strategies
- पर्यावरणीय समस्याएँ: कारण, प्रभाव और समाधान – पर्यावरणीय समस्याएँ हवा, पानी, ज़मीन, जलवायु और जीवों में होने वाले हानिकारक बदलाव हैं, जो ज़्यादातर इंसानों के कामों से होते हैं। मुख्य समस्याएँ हैं: वायु, जल और भूमि प्रदूषण, कचरा, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जैव विविधता की हानि और संसाधनों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल। ये लोगों की संख्या और हर व्यक्ति की खपत (पारिस्थितिक पदचिह्न) के साथ बढ़ती हैं। साफ़ ऊर्जा, बचत, रीसाइक्लिंग, गंदे पानी की सफ़ाई, जंगलों की रक्षा और अच्छे कानूनों से हम इन्हें घटा सकते हैं।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- राष्ट्रीय विकास रणनीतियाँ: देश विकास की योजना कैसे बनाते हैं – राष्ट्रीय विकास रणनीति किसी देश की लंबी योजना है, ताकि वह ज़्यादा अमीर, ज़्यादा न्यायपूर्ण और ज़्यादा साफ़ बने। सरकार लक्ष्य चुनती है, जैसे पिछड़े इलाकों को ऊपर उठाना और प्रदूषण घटाना, और सीमित पैसा सड़क-रेल, स्कूल-हुनर, उद्योग और हरित ऊर्जा जैसे साधनों पर लगाती है। असली उदाहरण: चीन का पश्चिमी विकास और ग्रामीण पुनर्जीवन, भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ और मेक इन इंडिया, दक्षिण कोरिया की निर्यात-आधारित योजनाएँ। हर योजना में समझौते होते हैं, इसलिए देश नतीजे जाँचकर योजना बदलते रहते हैं।