सूर्यातप: धरती को मिलने वाली धूप
सूर्यातप (आने वाला सौर विकिरण) सूर्य की वह ऊर्जा है जो पृथ्वी तक पहुँचती है। यह छोटी तरंगों में आती है। धरती को सूर्य की ऊर्जा का बहुत छोटा भाग मिलता है, फिर भी सारा मौसम और जीवन इसी से चलता है।
सूर्यातप की मात्रा किन बातों से बदलती है?
- किरणों का कोण: सीधी किरणें छोटे क्षेत्र को तेज़ गरम करती हैं; तिरछी किरणें फैलती हैं और ज़्यादा हवा पार करती हैं।
- दिन की लंबाई: लंबा दिन = ज़्यादा गर्मी।
- झुके अक्ष पर घूर्णन: अक्ष कक्षा तल से 66½° झुका है, इसलिए ऋतुओं में अलग-अलग जगहों को अलग मात्रा मिलती है।
- वायुमंडल की पारदर्शिता: बादल, धूल, जलवाष्प कुछ धूप रोकते और बिखेरते हैं।
- स्थल और जल का फैलाव: स्थल जल्दी गरम, पानी धीरे।
पृथ्वी लगभग 3 जनवरी को सूर्य के सबसे पास (उपसौर) और 4 जुलाई को सबसे दूर (अपसौर) होती है, पर इससे बहुत कम फ़र्क पड़ता है। सूर्यातप उपोष्ण मरुस्थलों पर सबसे ज़्यादा (कम बादल) और ध्रुवों पर सबसे कम है।
वायुमंडल से गुज़रते हुए
हवा छोटी तरंगों के लिए लगभग पारदर्शी है। छोटे कण नीली रोशनी ज़्यादा बिखेरते हैं, इसलिए आसमान नीला दिखता है। सूर्योदय-सूर्यास्त पर रोशनी ज़्यादा हवा पार करती है, आसमान लाल हो जाता है।
वायुमंडल का तापन और शीतलन
- चालन: गरम ज़मीन अपने से छूती हवा को गरम करती है।
- संवहन: गरम हवा ऊपर उठती है, ठंडी नीचे आती है; गर्मी ऊपर जाती है। यह केवल क्षोभमंडल में होता है।
- अभिवहन: हवा के साथ गर्मी का बगल (क्षैतिज) में जाना। उत्तर भारत की गरम हवा लू अभिवहन है।
रात को ज़मीन गर्मी खोकर पास की हवा को ठंडा करती है। इसलिए रातें ठंडी होती हैं, और साफ़ रातें बादल वाली रातों से ज़्यादा ठंडी।
पार्थिव विकिरण
गरम पृथ्वी लंबी तरंगों में गर्मी छोड़ती है। इसे पार्थिव विकिरण कहते हैं। हवा छोटी तरंगों को जाने देती है पर लंबी तरंगें सोख लेती है, खासकर कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प (ग्रीनहाउस गैसें)। इसलिए हवा अप्रत्यक्ष रूप से, नीचे से, धरती द्वारा गरम होती है — सूर्य से सीधे नहीं। इसी कारण ऊपर ठंड होती है।
पृथ्वी का ऊष्मा बजट
मान लीजिए वायुमंडल के ऊपर 100 इकाई धूप पहुँची:
- 35 इकाई बिना गरम किए वापस अंतरिक्ष में लौट जाती हैं (27 बादलों से, 6 बिखराव से, 2 बर्फ़ से)। यह लौटा हिस्सा पृथ्वी का एल्बिडो है।
- 14 इकाई वायुमंडल सोखता है।
- 51 इकाई पृथ्वी की सतह सोखती है।
सतह अपनी 51 इकाई पार्थिव विकिरण से लौटाती है: 17 सीधे अंतरिक्ष में, 34 हवा सोखती है (6 सीधे, 9 संवहन से, 19 संघनन की गुप्त ऊष्मा से)। अब हवा के पास 14 + 34 = 48 इकाई हैं, जो वह अंतरिक्ष में भेज देती है। बाहर: 17 + 48 = 65 = अंदर (65)। इसलिए औसत तापमान वही रहता है।
कुछ जगहों पर अतिरिक्त गर्मी क्यों?
लगभग 40° उ. और 40° द. के बीच धरती जितनी गर्मी खोती है उससे ज़्यादा पाती है (अधिशेष)। ध्रुवों के पास ज़्यादा खोती है (कमी)। पवनें और समुद्री धाराएँ अतिरिक्त गर्मी ध्रुवों की ओर ले जाती हैं।
तापमान का वितरण
किसी जगह का तापमान इन बातों से तय होता है:
- अक्षांश: विषुवत से ध्रुवों की ओर तापमान घटता है।
- ऊँचाई: हर 1,000 m पर लगभग 6.5 °C घटता है (सामान्य ह्रास दर)।
- समुद्र से दूरी: समुद्र तटों को सम रखता है; अंदरूनी जगहों पर गर्मी बहुत तेज़ और सर्दी बहुत ठंडी (महाद्वीपीयता)।
- वायुराशियाँ और समुद्री धाराएँ: गरम धारा तट को गरम, ठंडी धारा ठंडा करती है।
- स्थानीय बातें जैसे ढलान और छाया।
समताप रेखाएँ बराबर तापमान वाली जगहों को मिलाती हैं। ये मोटे तौर पर पूरब-पश्चिम चलती हैं, पर स्थल और जल पर मुड़ती हैं। जनवरी में उत्तरी महाद्वीपों पर विषुवत की ओर (स्थल ठंडा) और महासागरों पर ध्रुव की ओर मुड़ती हैं; जुलाई में उलटा। वार्षिक तापांतर विषुवत के पास कम और बड़े महाद्वीपों के भीतर बहुत ज़्यादा होता है।
तापमान का व्युत्क्रमण
सामान्यतः ऊपर जाने पर हवा ठंडी होती है। व्युत्क्रमण में उलटा होता है: ज़मीन के पास ठंडी हवा और उसके ऊपर गरम हवा।
अनुकूल दशाएँ: सर्दी की लंबी रातें, साफ़ आसमान, शांत और सूखी हवा, बर्फ़ से ढकी ज़मीन। ज़मीन जल्दी ठंडी होकर पास की हवा को ठंडा करती है।
वायु अपवाह: पहाड़ों में रात को ठंडी भारी हवा ढलानों से नीचे खिसककर घाटी में जमा होती है। घाटी के तल में पाला पड़ता है जबकि ढलान गरम रहते हैं। प्रभाव: कोहरा, नीचे फँसा धुआँ (स्मॉग), फ़सलों को पाला, उड़ानों के लिए कम दृश्यता।
घर पर करके देखें
दो एक जैसे पानी के कप धूप में रखिए: एक सफ़ेद कागज़ पर, एक काले कागज़ पर। 30 मिनट बाद छूकर देखिए। काला ज़्यादा सोखता है (कम एल्बिडो), सफ़ेद ज़्यादा लौटाता है (ज़्यादा एल्बिडो)। अब टॉर्च को कागज़ पर सीधा, फिर तिरछा चमकाइए: तिरछा धब्बा बड़ा और मद्धम है — ठीक ध्रुवों के सूर्यातप जैसा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सूर्यातप = आने वाला सौर विकिरण (छोटी तरंगें); पार्थिव विकिरण = जाने वाली लंबी तरंगें
- ऊष्मा बजट: 100 = 35 लौटी (एल्बिडो) + 14 हवा में + 51 ज़मीन में
- ज़मीन लौटाती 51 = 17 अंतरिक्ष + 34 हवा; हवा भेजती 48 (14 + 34); 35 + 17 + 48 = 100
- सामान्य ह्रास दर: हर 1,000 m पर −6.5 °C
- ऊष्मा के रास्ते: चालन, संवहन (ऊर्ध्वाधर), अभिवहन (क्षैतिज), विकिरण
- व्युत्क्रमण: ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ना (नीचे ठंडी, ऊपर गरम हवा)
हल किए गए उदाहरण
1. दोपहर की धूप शाम की धूप से ज़्यादा गरम क्यों लगती है?
दोपहर को किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं: वही ऊर्जा छोटे क्षेत्र पर और कम हवा पार करके आती है। शाम को तिरछी किरणें बड़े क्षेत्र पर फैलती हैं और मोटी हवा में ज़्यादा ऊर्जा खोती हैं।
2. 100 इकाई में से 35 लौटीं और 14 हवा ने सोखीं। ज़मीन को कितनी मिलीं?
100 − 35 − 14 = 51 इकाई।
3. ज़मीन 51 इकाई छोड़ती है; 17 अंतरिक्ष में चली जाती हैं। हवा कितनी सोखती है? हवा कुल कितनी अंतरिक्ष में भेजती है?
सोखी = 51 − 17 = 34। हवा का कुल = 14 + 34 = 48 इकाई, सब अंतरिक्ष में।
4. समुद्र तल पर एक कस्बा 28 °C है। 2,200 m ऊँचे हिल स्टेशन पर उसी दिन 12 °C है। क्या यह सामान्य ह्रास दर से मेल खाता है?
अपेक्षित कमी = 6.5 × 2.2 = 14.3 °C, यानी ≈ 13.7 °C। असली 12 °C पास ही है; ढलान, हवा और छाया से थोड़ा अंतर आता है।
5. उपोष्ण मरुस्थल विषुवत से ज़्यादा गरम क्यों होते हैं?
विषुवत पर घने बादल और भारी बारिश धूप रोकते हैं। मरुस्थलों में आसमान साफ़ रहता है, इसलिए ज़्यादा सूर्यातप ज़मीन तक पहुँचता है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सूर्य हवा को सीधे गरम करता है। हवा ज़्यादातर ज़मीन से (पार्थिव विकिरण) गरम होती है।
- सोचना कि जुलाई में धरती सूर्य के पास होने से गरम है। जुलाई में धरती सबसे दूर होती है; ऋतुएँ झुकाव से हैं।
- ऊष्मा बजट का गलत जोड़: ज़मीन की 51 इकाई खोती नहीं, वे 17 + 34 बनकर लौटती हैं।
- हर ठंडी सुबह को व्युत्क्रमण कहना। व्युत्क्रमण में ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता है।