CBSE कक्षा 11 भूगोल
अध्याय: 14
1. भूगोल एक विषय के रूप में
भूगोल एक विषय के रूप में
- भूगोल एक विषय के रूप में: भूगोल क्या और कैसे पढ़ता है – भूगोल पृथ्वी की जगहों को पढ़ता है: वहाँ क्या है, कहाँ है, वहीं क्यों है और कैसे बदल रहा है। यह भौतिकी, जीव विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र जैसे कई विषयों से विचार लेकर एक जगह के लिए जोड़ता है, इसलिए यह समाकलन (जोड़ने वाला) विषय है। यह स्थान (कहाँ) और समय (कब) दोनों साथ देखता है। इसे एक विषय पूरी दुनिया में (क्रमबद्ध उपागम) या एक प्रदेश के सारे पहलू (प्रादेशिक उपागम) के रूप में पढ़ा जाता है। मुख्य शाखाएँ हैं: भौतिक भूगोल, मानव भूगोल और जैव भूगोल।
2. पृथ्वी
पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास · पृथ्वी की आंतरिक संरचना · महासागरों और महाद्वीपों का वितरण
- पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास: धूल के बादल से जीवित ग्रह तक – पुराने विचारकों ने कहा कि ग्रह युवा सूर्य के चारों ओर घूमते गैस के बादल से बने (निहारिका परिकल्पना) या पास से गुज़रते तारे ने सूर्य से पदार्थ खींचा। आज वैज्ञानिक ब्रह्मांड को बिग बैंग से समझाते हैं: लगभग 13.7 अरब वर्ष पहले सब कुछ एक छोटे बिंदु से शुरू हुआ और आज भी फैल रहा है। गैस के गुच्छों से तारे बने; सूर्य के चारों ओर की धूल से ग्रह बने। लगभग 4.6 अरब वर्ष पुरानी पृथ्वी गरम और पिघली थी; भारी लोहा डूबकर क्रोड बना और हल्की चट्टान से भूपर्पटी बनी। ज्वालामुखियों की गैसों से शुरुआती हवा बनी, जलवाष्प बरसकर महासागर बनी, और लगभग 3.8 अरब वर्ष पहले महासागरों में जीवन शुरू हुआ।
- पृथ्वी की आंतरिक संरचना: भूकंपीय तरंगें, परतें और ज्वालामुखी – कोई पृथ्वी के केंद्र तक खोद नहीं सकता, इसलिए हम अंदर की जानकारी प्रत्यक्ष स्रोतों (खानों की चट्टान, गहरी खुदाई, लावा) और अप्रत्यक्ष स्रोतों (गहराई के साथ ताप और दबाव, उल्कापिंड, गुरुत्व, चुंबकत्व और सबसे बढ़कर भूकंपीय तरंगें) से लेते हैं। P-तरंगें ठोस और तरल दोनों से गुज़रती हैं; S-तरंगें सिर्फ़ ठोस से। जहाँ तरंगें नहीं पहुँचतीं, वहाँ छाया क्षेत्र बनता है, जो बताता है कि बाहरी क्रोड तरल है। भूकंप परिमाण (रिक्टर) और तीव्रता (मरकैली) से मापा जाता है। पृथ्वी में पतली भूपर्पटी, नरम दुर्बलतामंडल वाला मोटा मैंटल, तरल बाहरी क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड है। सतह तक पहुँचा मैग्मा ज्वालामुखी बनाता है; अंदर ठंडा हुआ मैग्मा बैथोलिथ, सिल, डाइक जैसी अंतर्वेधी आकृतियाँ बनाता है।
- महासागरों और महाद्वीपों का वितरण: विस्थापन, विस्तार और प्लेटें – 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि सारे महाद्वीप कभी एक भूखंड पैंजिया थे, जो एक महासागर पैंथालासा से घिरा था, और वे धीरे-धीरे अलग हुए। मिलते तट, चट्टानें, जीवाश्म, हिमनद जमाव और प्लेसर सोना उनके पक्ष में थे, पर वे बल नहीं समझा सके। समुद्र तल के मानचित्रण से कटक, मैदान और खाइयाँ मिलीं; फिर हैरी हेस ने सागरीय अधस्तल विस्तार दिया: मध्य-महासागरीय कटक पर नई भूपर्पटी बनती है और खाइयों में पुरानी डूबती है। इससे प्लेट विवर्तनिकी बनी: स्थलमंडल कठोर प्लेटों में टूटा है जो नरम दुर्बलतामंडल पर चलती हैं और अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं पर मिलती हैं। भारतीय प्लेट दक्षिण से अलग होकर उत्तर बढ़ी और एशिया से टकराकर हिमालय उठाया।
3. भू-आकृतियाँ
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ · भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास
- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ: बल धरातल को कैसे बनाते और घिसते हैं – पृथ्वी की सतह को दो तरह के बल आकार देते हैं। अंतर्जनित बल अंदर से आते हैं, पृथ्वी की भीतरी गर्मी से: पटल विरूपण (वलन, भ्रंशन, उत्थान, धँसाव) और ज्वालामुखीयता ज़मीन ऊपर बनाते हैं। बहिर्जनिक बल बाहर से आते हैं, सूर्य और गुरुत्व से: अपक्षय चट्टान को उसी जगह तोड़ता है, बृहत् संचलन उसे ढलान से नीचे ले जाता है, और बहता पानी, हवा, हिमनद और लहरें अपरदन और निक्षेपण करके ऊँची ज़मीन को धीरे-धीरे नीचा करते हैं। टूटी चट्टान में पौधे और सूक्ष्म जीव लंबे समय में मिट्टी बनाते हैं। मूल चट्टान, जलवायु, उच्चावच, जीव और समय तय करते हैं कि कैसी मिट्टी बनेगी।
- भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास: बहते जल और पवन का काम – बहता जल और पवन भू-आकृतियाँ काटने और बनाने वाले दो बड़े कारक हैं। नदी अपने खड़े ऊपरी भाग में गहरी V-आकार घाटियाँ, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात और जलगर्तिकाएँ काटती है, और धीमी होने पर जलोढ़ पंख, डेल्टा, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध और बिंदु बार बनाती है। उसके मोड़ (विसर्प) बढ़कर कट जाते हैं और गोखुर झील बनती है। मरुस्थल में पवन ढीली रेत उड़ाती है (अपवाहन), रेत से चट्टान रगड़ती है (अपघर्षण) और छत्रक शिला बनाती है, और परत बाढ़ के साथ ज़मीन को पेडीमेंट, पेडीप्लेन और इंसेलबर्ग में बदलती है; रेत को बरखान, परवलयिक, सीफ़, अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ टिब्बों के रूप में जमा करती है। भू-आकृतियाँ जीवों की तरह युवा, प्रौढ़ और वृद्ध अवस्था से गुज़रती हैं।
4. जलवायु
वायुमंडल का संघटन तथा संरचना · सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान · वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ · वायुमंडल में जल · विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन
- वायुमंडल का संघटन तथा संरचना – वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर हवा की मोटी चादर है, जिसे गुरुत्व पकड़े रखता है। इसमें ज़्यादातर नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) है; थोड़ी आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओज़ोन, जलवाष्प और धूल भी है। इसकी पाँच परतें हैं: क्षोभमंडल (मौसम यहीं), समतापमंडल (ओज़ोन परत), मध्यमंडल (सबसे ठंडा), तापमंडल (आयनमंडल) और बहिर्मंडल। मौसम थोड़े समय की हालत है, जलवायु लगभग 30 साल का औसत। दोनों के तत्व एक ही हैं: तापमान, दाब, पवन, आर्द्रता, बादल और वर्षण।
- भारत की जलवायु: मानसून हमारा साल कैसे तय करता है – भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी है। यह अक्षांश, हिमालय, समुद्र से दूरी, ऊँचाई और हवाओं पर निर्भर है। मानसून वह हवा है जो मौसम के साथ दिशा बदलती है। गर्मी में ज़मीन समुद्र से ज़्यादा गर्म होती है, इसलिए नम हवा समुद्र से ज़मीन की ओर आती है और बारिश लाती है। सर्दी में सूखी हवा ज़मीन से समुद्र की ओर जाती है। भारत में चार ऋतुएँ हैं: शीत, ग्रीष्म, दक्षिण-पश्चिम मानसून और लौटता मानसून। वर्षा असमान है: पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व में 400 सेमी से ज़्यादा, थार और लद्दाख में 60 सेमी से कम। खेती, भोजन के दाम और रोज़गार मानसून पर टिके हैं। वैश्विक तापन से लू तेज़ और वर्षा अनियमित हो रही है।
- सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान – पृथ्वी को सूर्य से छोटी तरंगों के रूप में ऊर्जा मिलती है; इसे सूर्यातप कहते हैं। जहाँ किरणें सीधी पड़ती हैं (विषुवत के पास) वहाँ यह सबसे ज़्यादा और तिरछी किरणों वाले ध्रुवों पर सबसे कम है। हवा नीचे से गरम होती है: पहले ज़मीन गरम होती है, फिर चालन, संवहन, अभिवहन और पार्थिव विकिरण (लंबी तरंगें) से हवा गरम होती है। 100 इकाई धूप में 35 लौट जाती हैं (एल्बिडो), 14 हवा और 51 ज़मीन सोखती है; सोखी हुई सारी 65 इकाई फिर अंतरिक्ष में लौटती हैं — यही ऊष्मा बजट है। तापमान विषुवत से ध्रुवों की ओर और ऊँचाई के साथ घटता है; स्थल-जल और समुद्री धाराएँ इसे बदलती हैं। कभी ठंडी हवा नीचे और गरम ऊपर होती है — यह तापमान व्युत्क्रमण है।
- वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ – हवा का वज़न होता है, इसलिए वह नीचे दबाव डालती है: यही वायुदाब है (समुद्र तल पर लगभग 1013 mb)। पवन उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है; दाब प्रवणता बल इसे धकेलता है, कोरिऑलिस बल मोड़ता है (उत्तर में दाएँ, दक्षिण में बाएँ) और घर्षण ज़मीन के पास धीमा करता है। असमान गर्मी से दाब पेटियाँ बनती हैं (विषुवतीय निम्न, उपोष्ण उच्च, उपध्रुवीय निम्न, ध्रुवीय उच्च) और तीन कोष्ठ, जिनसे भूमंडलीय पवनें चलती हैं: व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें, ध्रुवीय पूर्वी पवनें। ऋतु के साथ पेटियाँ खिसकती हैं और मानसून जैसी मौसमी पवनें बनती हैं; स्थानीय पवनों में स्थल-समुद्र समीर और पर्वत-घाटी समीर हैं। एक जैसी गर्मी और नमी वाली विशाल हवा वायुराशि है; दो वायुराशियों की सीमा वाताग्र है। चक्रवात निम्न दाब वाले तूफ़ान हैं: उष्णकटिबंधीय गरम समुद्र पर, शीतोष्ण वाताग्रों पर बनते हैं। तड़ितझंझा और टॉरनेडो छोटे पर बहुत तेज़ तूफ़ान हैं।
- वायुमंडल में जल – हवा में हमेशा कुछ पानी अदृश्य वाष्प के रूप में होता है; इसकी मात्रा आर्द्रता है। निरपेक्ष आर्द्रता हवा के आयतन में वाष्प का असली वज़न है; सापेक्ष आर्द्रता बताती है कि उस तापमान पर जितनी वाष्प रख सकती है उसकी तुलना में हवा कितनी भरी है। पानी वाष्पीकरण से वाष्प बनता है (गर्मी लेता है) और हवा ओसांक तक ठंडी होने पर संघनन से फिर पानी (गर्मी देता है)। ज़मीन के पास संघनन से ओस, तुषार, कुहासा और कोहरा; ऊपर बादल बनते हैं: पक्षाभ, कपासी, स्तरी और वर्षा मेघ। बूँदें भारी होकर वर्षण बनकर गिरती हैं: बारिश, हिम, सहिम वृष्टि या ओले। वर्षा तीन तरह से होती है: संवहनीय, पर्वतीय और चक्रवाती (वाताग्री)। वर्षा विषुवत और पवनमुखी तटों पर सबसे ज़्यादा, और उपोष्ण मरुस्थलों, महाद्वीपों के भीतर और ध्रुवों पर सबसे कम है।
- जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रभाव – जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल का औसत मौसम है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी हरितगृह गैसें पृथ्वी से निकलने वाली कुछ ऊष्मा रोक लेती हैं। मनुष्यों ने ईंधन जलाकर और जंगल काटकर ये गैसें बहुत बढ़ा दी हैं, इसलिए पृथ्वी गर्म हो रही है। इससे बर्फ़ पिघलती है, समुद्र तल बढ़ता है और मौसम उग्र होता है। हम गैसें घटा सकते हैं (शमन) और बदलाव के लिए तैयार हो सकते हैं (अनुकूलन)।
5. जल (महासागर)
जल (महासागर) · महासागरीय जल संचलन
- जल (महासागर): जलीय चक्र, महासागरीय तल, तापमान और लवणता – धरती का पानी महासागर, हवा, स्थल और जीवों के बीच लगातार घूमता है — यह जलीय चक्र है; लगभग 97% पानी महासागरों में है। महासागरीय तल के मुख्य भाग हैं — महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, गहरे समुद्री मैदान और महासागरीय गर्त (खाइयाँ) — और छोटे रूप जैसे मध्य-महासागरीय कटक, समुद्री टीला, निमग्न द्वीप (गुयॉट), अंतःसागरीय कैनियन, एटॉल और बैंक। सतह का पानी विषुवत के पास सबसे गरम और ध्रुवों की ओर ठंडा होता है; गहराई में ताप प्रवणता परत (थर्मोक्लाइन) में तेज़ी से ठंडा होता है और नीचे 0–4 °C के पास रहता है। लवणता समुद्री पानी में नमक है, लगभग 35 ग्राम प्रति 1,000 ग्राम (35‰)। वाष्पीकरण से बढ़ती और बारिश, नदियों व पिघलती बर्फ़ से घटती है, इसलिए उपोष्ण क्षेत्रों और बंद गरम समुद्रों में ज़्यादा और विषुवत, ध्रुवों व नदी मुहानों के पास कम है।
- महासागरीय जल संचलन: तरंगें, ज्वार-भाटा और धाराएँ – महासागर का पानी तीन तरह से चलता है। तरंगें (लहरें) ज़्यादातर पवन से बनती हैं: ऊर्जा आगे जाती है जबकि पानी का हर कण छोटे वृत्त में घूमता है; उथले पानी में लहरें धीमी होकर टूटती हैं। ज्वार-भाटा समुद्र का नियमित चढ़ना-उतरना है, आमतौर पर दिन में दो बार, जो चंद्रमा (और सूर्य) के खिंचाव और पृथ्वी-चंद्रमा के घूमने से होता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में हों (अमावस्या, पूर्णिमा) तो बहुत ऊँचे दीर्घ ज्वार; समकोण पर हों (अष्टमी) तो कमज़ोर लघु ज्वार। महासागरीय धाराएँ तय दिशा में बहती पानी की विशाल नदियाँ हैं, जिन्हें पवनें, गर्मी, गुरुत्व, लवणता और घनत्व का अंतर चलाते हैं और कोरिऑलिस बल मोड़ता है। गरम धाराएँ विषुवत से ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ ध्रुवों से विषुवत की ओर बहती हैं। धाराएँ तटों की जलवायु, मछली, कोहरा और जहाज़रानी बदलती हैं।
6. पृथ्वी पर जीवन
जैव विविधता एवं संरक्षण
जल्द आ रहा है
7. मानचित्र कार्य: भौतिक भूगोल
विश्व मानचित्र कार्य
- मानचित्र का परिचय – मानचित्र पूरी पृथ्वी या उसके किसी भाग का ऊपर से देखा गया, मापनी के अनुसार बनाया गया छोटा, समतल चित्र है। हर मानचित्र में शीर्षक, मापनी, दिशा (उत्तर तीर), संकेत-सूची व चिह्न और प्रक्षेप पर बना ग्रिड होना चाहिए। मानचित्र मापनी (बृहत् या लघु) और कार्य (भौतिक या सांस्कृतिक) के आधार पर बाँटे जाते हैं।
- विश्व मानचित्र कार्य (भौतिक भूगोल): महासागर, प्लेटें, मरुस्थल, सागर, धाराएँ और हॉटस्पॉट – मानचित्र कार्य में विश्व के रेखा-मानचित्र पर भौतिक लक्षण ढूँढकर अंकित करते हैं। पाँच महासागर मिलकर एक विश्व महासागर बनाते हैं। भूपर्पटी सात बड़ी और कई छोटी प्लेटों में बँटी है; अग्नि वलय प्रशांत को घेरता है और मध्य-अटलांटिक कटक अटलांटिक के बीच से गुज़रता है। गरम मरुस्थल 15°–30° पर महाद्वीपों के पश्चिम में हैं। सागर महासागर के छोटे, कुछ घिरे भाग हैं। गरम धाराएँ ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं। हॉटस्पॉट समृद्ध पर संकटग्रस्त क्षेत्र हैं; चार भारत से जुड़े हैं।
8. भारत: स्थिति
भारत: स्थिति
- भारत: स्थिति, आकार, अक्षांशीय-देशांतरीय विस्तार और मानक समय – भारत का क्षेत्रफल लगभग 32.8 लाख वर्ग किमी है, जो दुनिया की ज़मीन का लगभग 2.4% है; भारत 7वाँ सबसे बड़ा देश है। मुख्य भूमि 8°4′उ से 37°6′उ और 68°7′पू से 97°25′पू तक फैली है, दोनों ओर लगभग 29°। कर्क रेखा (23°30′उ) इसे उष्ण दक्षिण और उपोष्ण उत्तर में बाँटती है। पूर्व-पश्चिम में लगभग 2 घंटे के सूर्य-समय अंतर के कारण भारत एक मानक याम्योत्तर 82°30′पू (मिर्ज़ापुर के पास) अपनाता है: IST = GMT + 5 घंटे 30 मिनट।
9. भू-आकृति विज्ञान
संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान · अपवाह तंत्र
- भारत की संरचना तथा भू-आकृति: पर्वत, मैदान, पठार, मरुस्थल, तट और द्वीप – संरचना के हिसाब से भारत के तीन भाग हैं: पुराना कठोर प्रायद्वीपीय खंड, हिमालय के नवीन वलित पर्वत, और इनके बीच सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान। इसी आधार पर छह भू-आकृतिक विभाग हैं: उत्तरी और उत्तर-पूर्वी पर्वत (हिमाद्रि, हिमाचल, शिवालिक, पूर्वांचल), उत्तरी मैदान (भाबर, तराई, बांगर, खादर), प्रायद्वीपीय पठार (दक्कन, पश्चिमी व पूर्वी घाट), भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान (पश्चिम सँकरा, पूर्व चौड़ा) और द्वीप समूह (अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप)।
- भारत का अपवाह तंत्र: प्रतिरूप, द्रोणी, हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियाँ, नदी जोड़ो और प्रदूषण – निश्चित वाहिकाओं से पानी के बहाव को अपवाह कहते हैं, और ऐसी वाहिकाओं का जाल अपवाह तंत्र है। नदियाँ चट्टान और ढलान के अनुसार प्रतिरूप बनाती हैं (वृक्षाकार, अरीय, जालीनुमा, अभिकेंद्री)। जो भूमि एक नदी में पानी भेजती है वह उसका जलग्रहण क्षेत्र या द्रोणी है, और दो द्रोणियों के बीच की ऊँची रेखा जल-विभाजक है। हिमालयी नदियाँ बारहमासी हैं, बर्फ़ और वर्षा से भरती हैं और गहरे महाखड्ड काटती हैं; प्रायद्वीपीय नदियाँ पुरानी, वर्षा पर निर्भर और मौसमी हैं, ज़्यादातर पूर्व में डेल्टा बनाती हैं जबकि नर्मदा और तापी भ्रंश घाटियों से पश्चिम में बहती हैं। नदी जोड़ना, पानी का सही उपयोग और नदियों की सफ़ाई बड़ी चुनौतियाँ हैं।
10. जलवायु, वनस्पति और मृदा
जलवायु · प्राकृतिक वनस्पति
- भारत की जलवायु: मानसून हमारा साल कैसे तय करता है – भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी है। यह अक्षांश, हिमालय, समुद्र से दूरी, ऊँचाई और हवाओं पर निर्भर है। मानसून वह हवा है जो मौसम के साथ दिशा बदलती है। गर्मी में ज़मीन समुद्र से ज़्यादा गर्म होती है, इसलिए नम हवा समुद्र से ज़मीन की ओर आती है और बारिश लाती है। सर्दी में सूखी हवा ज़मीन से समुद्र की ओर जाती है। भारत में चार ऋतुएँ हैं: शीत, ग्रीष्म, दक्षिण-पश्चिम मानसून और लौटता मानसून। वर्षा असमान है: पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व में 400 सेमी से ज़्यादा, थार और लद्दाख में 60 सेमी से कम। खेती, भोजन के दाम और रोज़गार मानसून पर टिके हैं। वैश्विक तापन से लू तेज़ और वर्षा अनियमित हो रही है।
- भारत की प्राकृतिक वनस्पति: वन, वन्यजीव और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र – प्राकृतिक वनस्पति वे पौधे हैं जो बिना इंसान के लगाए अपने-आप उगते हैं। भारत में वर्षा और तापमान तय करते हैं कि कहाँ कौन-सा वन होगा। बहुत गीली जगहों पर ऊँचे उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन हैं। मध्यम वर्षा वाली जगहों पर पर्णपाती वन हैं, जो सूखे मौसम में पत्ते गिराते हैं; ये सबसे ज़्यादा हैं। सूखी जगहों पर कँटीली झाड़ियाँ हैं। पहाड़ों पर ऊँचाई के साथ वन बदलते हैं और नदियों के मुहानों पर मैंग्रोव हैं। वन लकड़ी, भोजन, दवा और साफ़ हवा देते हैं और वन्यजीवों का घर हैं। भारत इन्हें क़ानून, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, परियोजनाओं और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों से बचाता है, जिनमें सुरक्षित कोर, बफ़र और बाहरी संक्रमण क्षेत्र होते हैं।
11. प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ
प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ
- प्राकृतिक संकट (Natural Hazards) – प्राकृतिक संकट (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों और चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, बाढ़, सूखा या चक्रवात। जब यह ऐसे लोगों पर पड़ती है जो तैयार नहीं हैं, तब यह आपदा (disaster) बन जाती है। भूगर्भीय संकट धरती के अंदर से आते हैं, मौसमी संकट हवा और पानी से। जोखिम = संकट × सुभेद्यता ÷ क्षमता, इसलिए चेतावनी, मज़बूत मकान और प्रशिक्षित लोग नुकसान घटाते हैं।
12. मानचित्र कार्य: भारत
भारत मानचित्र कार्य
- भारत मानचित्र कार्य: अक्षांश-देशांतर से भौतिक स्थलाकृतियाँ खोजना – मानचित्र कार्य में भारत के रेखा मानचित्र पर भौतिक स्थलाकृतियाँ खोजकर अंकित करनी होती हैं। इसकी कुंजी है अक्षांश और देशांतर रेखाओं को पते की तरह इस्तेमाल करना। भारत की मुख्य भूमि 8°4′ उ. से 37°6′ उ. और 68°7′ पू. से 97°25′ पू. के बीच है। मिर्ज़ापुर के पास से गुज़रने वाली मानक याम्योत्तर 82°30′ पू. भारतीय मानक समय तय करती है। मानचित्र पर पर्वत श्रेणियाँ, ऊँची चोटियाँ, दर्रे, पठार, तटीय मैदान, द्वीप समूह, नदियाँ, झीलें, खाड़ियाँ, सबसे गर्म-ठंडे-गीले-सूखे स्थान, वनों के प्रकार और राष्ट्रीय उद्यान आने चाहिए। हर एक को उसके ग्रिड पते और पास के संकेत (नदी, तट) के साथ याद कीजिए।
- मानचित्र का परिचय – मानचित्र पूरी पृथ्वी या उसके किसी भाग का ऊपर से देखा गया, मापनी के अनुसार बनाया गया छोटा, समतल चित्र है। हर मानचित्र में शीर्षक, मापनी, दिशा (उत्तर तीर), संकेत-सूची व चिह्न और प्रक्षेप पर बना ग्रिड होना चाहिए। मानचित्र मापनी (बृहत् या लघु) और कार्य (भौतिक या सांस्कृतिक) के आधार पर बाँटे जाते हैं।
- विश्व मानचित्र कार्य (भौतिक भूगोल): महासागर, प्लेटें, मरुस्थल, सागर, धाराएँ और हॉटस्पॉट – मानचित्र कार्य में विश्व के रेखा-मानचित्र पर भौतिक लक्षण ढूँढकर अंकित करते हैं। पाँच महासागर मिलकर एक विश्व महासागर बनाते हैं। भूपर्पटी सात बड़ी और कई छोटी प्लेटों में बँटी है; अग्नि वलय प्रशांत को घेरता है और मध्य-अटलांटिक कटक अटलांटिक के बीच से गुज़रता है। गरम मरुस्थल 15°–30° पर महाद्वीपों के पश्चिम में हैं। सागर महासागर के छोटे, कुछ घिरे भाग हैं। गरम धाराएँ ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं। हॉटस्पॉट समृद्ध पर संकटग्रस्त क्षेत्र हैं; चार भारत से जुड़े हैं।
13. भूगोल में प्रायोगिक कार्य भाग-1
मानचित्र का परिचय · मानचित्र मापनी · अक्षांश, देशांतर और समय · मानचित्र प्रक्षेप · स्थलाकृतिक मानचित्र · सुदूर संवेदन का परिचय
- मानचित्र का परिचय – मानचित्र पूरी पृथ्वी या उसके किसी भाग का ऊपर से देखा गया, मापनी के अनुसार बनाया गया छोटा, समतल चित्र है। हर मानचित्र में शीर्षक, मापनी, दिशा (उत्तर तीर), संकेत-सूची व चिह्न और प्रक्षेप पर बना ग्रिड होना चाहिए। मानचित्र मापनी (बृहत् या लघु) और कार्य (भौतिक या सांस्कृतिक) के आधार पर बाँटे जाते हैं।
- विश्व मानचित्र कार्य (भौतिक भूगोल): महासागर, प्लेटें, मरुस्थल, सागर, धाराएँ और हॉटस्पॉट – मानचित्र कार्य में विश्व के रेखा-मानचित्र पर भौतिक लक्षण ढूँढकर अंकित करते हैं। पाँच महासागर मिलकर एक विश्व महासागर बनाते हैं। भूपर्पटी सात बड़ी और कई छोटी प्लेटों में बँटी है; अग्नि वलय प्रशांत को घेरता है और मध्य-अटलांटिक कटक अटलांटिक के बीच से गुज़रता है। गरम मरुस्थल 15°–30° पर महाद्वीपों के पश्चिम में हैं। सागर महासागर के छोटे, कुछ घिरे भाग हैं। गरम धाराएँ ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं। हॉटस्पॉट समृद्ध पर संकटग्रस्त क्षेत्र हैं; चार भारत से जुड़े हैं।
- मानचित्र मापनी – मापनी मानचित्र की दूरी और ज़मीन की उसी दूरी का अनुपात है। इसे तीन तरह से दिखाते हैं: कथन ("1 cm = 5 km"), प्रदर्शक भिन्न (1 : 5,00,000) और आलेखी (रेखीय) मापनी। किसी भी RF के लिए रेखीय मापनी बनाई जा सकती है और कथन ↔ RF को मीट्रिक व अंग्रेज़ी इकाइयों में बदला जा सकता है।
- अक्षांश, देशांतर और समय – अक्षांश रेखाएँ (समांतर) पूर्व–पश्चिम वृत्त हैं, जिन्हें विषुवत् वृत्त से उत्तर या दक्षिण (0° से 90°) नापा जाता है। देशांतर रेखाएँ (याम्योत्तर) ध्रुव से ध्रुव तक अर्धवृत्त हैं, जिन्हें प्रधान याम्योत्तर से पूर्व या पश्चिम (0° से 180°) नापा जाता है। पृथ्वी हर घंटे 15° घूमती है, तो 1° देशांतर = 4 मिनट। देश एक मानक याम्योत्तर चुनते हैं (भारत: 82°30′ पू., GMT से 5 घंटे 30 मिनट आगे), और तारीख अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (180°) पर बदलती है।
- मानचित्र प्रक्षेप – मानचित्र प्रक्षेप ग्लोब के अक्षांश-देशांतर जाल (रेखाजाल) को समतल सतह पर बनाने की विधि है। कोई भी प्रक्षेप क्षेत्रफल, आकृति, दिशा और दूरी चारों सही नहीं रख सकता। प्रक्षेप सतह (बेलनाकार, शंक्वाकार, खमध्य), विधि और सही रखे गए गुण के आधार पर बाँटे जाते हैं। एक मानक अक्षांश वाला शंक्वाकार प्रक्षेप मध्य अक्षांश के संकरे क्षेत्रों के लिए ठीक है; मर्केटर बेलनाकार प्रक्षेप आकृति और दिशा सही रखता है और नौवहन में काम आता है।
- स्थलाकृतिक मानचित्र – स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत् मापनी के मानचित्र हैं जो छोटे क्षेत्र की प्राकृतिक और मानवीय चीज़ें तय चिह्नों और रंगों से विस्तार में दिखाते हैं। भारत में इन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग शीटों की एक श्रृंखला में बनाता है (1:10,00,000 → 1:2,50,000 → 1:50,000 → 1:25,000)। उच्चावच समोच्च रेखाओं से दिखता है; उनकी दूरी और आकार ढाल और भू-आकृति बताते हैं, और परिच्छेदिका उन्हें पार्श्व दृश्य में बदलती है।
- सुदूर संवेदन का परिचय – सुदूर संवेदन पृथ्वी की सतह के बारे में बिना छुए जानकारी जुटाना है, वस्तुओं द्वारा परावर्तित या उत्सर्जित ऊर्जा दर्ज करके। यह ऊर्जा स्रोत से उपयोगकर्ता तक चरणों में होता है। संवेदक मंचों (भूमि, वायुयान, उपग्रह) पर रहते हैं और फ़ोटोग्राफ़िक या अंकीय उत्पाद देते हैं। अलग वस्तुओं के अलग स्पेक्ट्रमी चिह्नक होते हैं, जिनसे हम पानी, पौधे और मिट्टी पहचानते हैं।
14. केवल रचनात्मक आकलन हेतु विषय
खनिज एवं शैलें
- चट्टानें और खनिज – खनिज एक प्राकृतिक, निर्जीव ठोस है जिसकी रासायनिक बनावट तय होती है और क्रिस्टल आकार नियमित होता है, जैसे क्वार्ट्ज़ या हेलाइट (नमक)। चट्टान एक या अधिक खनिजों का मिश्रण है। चट्टानें तीन तरह की हैं: आग्नेय (ठंडे मैग्मा या लावा से), अवसादी (दबे हुए कणों की परतों से) और कायांतरित (गरमी और दबाव से बदली)। शैल चक्र लाखों वर्षों में हर प्रकार को दूसरे में बदलता रहता है।