तरंगें (लहरें)
तरंग पानी की सतह पर चलती ऊर्जा है। ज़्यादातर तरंगें पवन से बनती हैं। पानी खुद तरंग के साथ नहीं जाता: हर कण छोटे वृत्त में घूमकर लगभग वहीं लौटता है। इसलिए तैरती बोतल ऊपर-नीचे होती है पर लगभग वहीं रहती है।
तरंग के भाग
- शिखर: सबसे ऊँचा बिंदु। गर्त: सबसे नीचा बिंदु।
- तरंग की ऊँचाई: गर्त से शिखर तक की ऊर्ध्वाधर दूरी।
- तरंग आयाम: ऊँचाई का आधा।
- तरंगदैर्ध्य: एक शिखर से अगले शिखर की दूरी।
- तरंग काल: किसी बिंदु से दो शिखरों के गुज़रने का समय। आवृत्ति: एक सेकंड में गुज़रती तरंगों की संख्या।
- तरंग गति: तरंग कितनी तेज़ चलती है।
तेज़ पवन, लंबे समय तक और बड़े समुद्री फैलाव पर चले तो बड़ी तरंगें बनती हैं। उथले पानी में तरंग धीमी, खड़ी होकर टूटती है और पानी तट पर फेंकती है। तरंगें अपरदन और निक्षेपण से तट को आकार देती हैं। समुद्र के नीचे भूकंप से बहुत लंबी, तेज़ तरंगें बनती हैं: सुनामी।
ज्वार-भाटा
ज्वार-भाटा समुद्र तल का दिन में एक या दो बार नियमित चढ़ना-उतरना है। मुख्य कारण चंद्रमा का गुरुत्व, साथ में सूर्य का, और पृथ्वी-चंद्रमा तंत्र के साझे केंद्र के चारों ओर घूमने से बना अपकेंद्री बल।
- चंद्रमा की ओर वाले भाग पर गुरुत्व पानी को खींचकर उभार बनाता है।
- उलटी ओर अपकेंद्री प्रभाव चंद्रमा के कमज़ोर खिंचाव से ज़्यादा होता है, इसलिए दूसरा उभार बनता है।
- धरती दोनों उभारों के नीचे घूमती है, इसलिए किसी जगह लगभग 24 घंटे 50 मिनट में दो ज्वार और दो भाटा (चंद्रमा रोज़ थोड़ा आगे बढ़ता है)।
आवृत्ति के आधार पर
- अर्ध-दैनिक: दिन में दो ज्वार, दो भाटा, लगभग बराबर ऊँचाई (सबसे आम)।
- दैनिक: दिन में एक ज्वार, एक भाटा।
- मिश्रित: अलग-अलग ऊँचाई के ज्वार।
सूर्य-चंद्रमा-पृथ्वी की स्थिति के आधार पर
- दीर्घ ज्वार: सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी एक सीध में (अमावस्या, पूर्णिमा) → सबसे ऊँचे ज्वार, सबसे नीचे भाटा।
- लघु ज्वार: सूर्य और चंद्रमा समकोण पर (शुक्ल व कृष्ण अष्टमी) → कम ज्वारीय अंतर। दोनों महीने में दो-दो बार, लगभग सात दिन के अंतर पर।
- चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास (उपभू) हो तो ज्वार बड़े; अपभू पर छोटे। पृथ्वी सूर्य के सबसे पास (उपसौर, ~3 जनवरी) हो तो ज्वार अपसौर (~4 जुलाई) से थोड़े बड़े।
कीप के आकार की खाड़ियों में ज्वारीय अंतर बड़ा होता है; कनाडा की फंडी खाड़ी में लगभग 15–16 m, दुनिया में सबसे ऊँचे में से।
ज्वार-भाटा का महत्त्व
- नौसंचालन: ज्वार पानी गहरा करता है, बड़े जहाज़ बंदरगाह और नदी मुहानों में आ पाते हैं।
- मछली पकड़ना: मछुआरे ज्वार देखकर जाते हैं।
- ज्वार बंदरगाहों और मुहानों से गाद और गंदा पानी साफ़ करता है।
- ज्वारीय ऊर्जा से बिजली बन सकती है।
महासागरीय धाराएँ
महासागरीय धाराएँ एक तय दिशा में बहता समुद्री पानी का बड़ा प्रवाह हैं, जैसे महासागर में नदियाँ। धारा का सबसे तेज़ भाग सतह के पास होता है।
धाराएँ क्यों बहती हैं
- प्राथमिक बल: सूर्य की गर्मी (विषुवत के पास गरम पानी फैलकर थोड़ा ऊँचा रहता है और ढलान पर बहता है), समुद्र पर चलती पवनें, नीचे खींचता गुरुत्व, और धाराओं को उत्तर में दाएँ, दक्षिण में बाएँ मोड़ने वाला कोरिऑलिस बल, जिससे बड़े वृत्ताकार घेरे बनते हैं: गायर।
- द्वितीयक बल: लवणता और तापमान के अंतर से घनत्व बदलता है; घना (ठंडा, खारा) पानी नीचे बैठता है और हल्का पानी ऊपर बहता है।
प्रकार
- गहराई से: सतही धाराएँ (ऊपर का ~10% पानी, ज़्यादातर पवन से) और गहरी धाराएँ (बाकी 90%, घनत्व से; ध्रुवों के पास ठंडा घना पानी नीचे बैठकर तल पर धीरे चलता है)।
- तापमान से: गरम धाराएँ निम्न अक्षांशों से ध्रुवों की ओर, आमतौर पर निम्न-मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के पूर्वी तटों के साथ; ठंडी धाराएँ उच्च अक्षांशों से विषुवत की ओर, आमतौर पर पश्चिमी तटों के साथ।
मुख्य धाराएँ (उदाहरण)
- गरम: गल्फ़ स्ट्रीम और उत्तर अटलांटिक प्रवाह, क्यूरोशियो, ब्राज़ील, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, अगुलहास।
- ठंडी: लैब्राडोर, कैलिफ़ोर्निया, हम्बोल्ट (पेरू), बेंगुएला, कनारी, ओयाशियो, पश्चिमी पवन प्रवाह।
- उत्तरी हिंद महासागर में धाराएँ मानसून के साथ दिशा बदलती हैं।
धाराओं के प्रभाव
- जलवायु: गरम धाराएँ तटों को गरम और नम बनाती हैं (उत्तर अटलांटिक प्रवाह उत्तर-पश्चिम यूरोप के बंदरगाहों को सर्दी में बर्फ़ से मुक्त रखता है); ठंडी धाराएँ तटों को ठंडा और सूखा — कई गरम मरुस्थल (अटाकामा, नामीब) ठंडी धाराओं के पास हैं।
- मछली: जहाँ गरम और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, प्लवक बढ़ते हैं और मछलियाँ जमा होती हैं: न्यूफ़ाउंडलैंड के पास ग्रैंड बैंक और जापान के पास के समुद्र।
- कोहरा: गरम-ठंडी धाराओं के मिलने पर घना कोहरा, जहाज़ों के लिए ख़तरा।
- जहाज़रानी: धारा के साथ चलकर जहाज़ ईंधन बचाते हैं।
घर पर करके देखें
लंबी ट्रे में पानी भरकर एक छोटा बोतल का ढक्कन तैराइए। सतह पर फूँक मारिए: लहरें आगे जाती हैं, पर ढक्कन बस ऊपर-नीचे होता है। अब पास के बंदरगाह (या मुंबई) की एक महीने की ज्वार तालिका देखकर सबसे ऊँचे ज्वार की तारीखें लिखिए। उन तारीखों पर चंद्रमा की कला देखिए: वे अमावस्या और पूर्णिमा के पास होंगी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- तरंग ऊँचाई = शिखर से गर्त; आयाम = ऊँचाई ÷ 2; तरंगदैर्ध्य = शिखर से शिखर
- आवृत्ति = प्रति सेकंड तरंगें = 1 ÷ तरंग काल
- ज्वार: ~24 घंटे 50 मिनट में 2 ज्वार + 2 भाटा
- दीर्घ ज्वार: सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी एक सीध (अमावस्या/पूर्णिमा); लघु ज्वार: 90° (अष्टमी)
- गरम धाराएँ: विषुवत → ध्रुव (पूर्वी तट); ठंडी धाराएँ: ध्रुव → विषुवत (पश्चिमी तट)
- कोरिऑलिस: धाराएँ उत्तर में दाएँ, दक्षिण में बाएँ → गायर
हल किए गए उदाहरण
1. तरंग की ऊँचाई 3 m है। आयाम कितना?
आयाम = ऊँचाई ÷ 2 = 1.5 m।
2. एक मिनट में बारह शिखर एक बॉय से गुज़रते हैं। तरंग काल और आवृत्ति निकालिए।
तरंग काल = 60 ÷ 12 = 5 s। आवृत्ति = 1 ÷ 5 = 0.2 तरंग प्रति सेकंड।
3. आज सुबह 6:00 बजे बंदरगाह पर ज्वार है। अगले ज्वार लगभग कब होंगे?
24 घंटे 50 मिनट में दो ज्वार, यानी लगभग 12 घंटे 25 मिनट के अंतर पर: शाम ~6:25, फिर कल सुबह ~6:50।
4. आज पूर्णिमा है। कैसा ज्वार होगा, और 7 दिन बाद?
पूर्णिमा: सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा एक सीध → दीर्घ ज्वार। लगभग 7 दिन बाद कृष्ण अष्टमी (समकोण) → लघु ज्वार।
5. पेरू का तट समुद्र के पास होकर भी बहुत सूखा क्यों है?
ठंडी हम्बोल्ट धारा ऊपर की हवा को ठंडा करती है। समुद्र के पास ठंडी हवा स्थिर रहती है, उठकर बादल नहीं बनाती; केवल कोहरा बनता है। इसलिए अटाकामा मरुस्थल बना।
आम गलतियाँ
- सोचना कि लहरें पानी को महासागर पार ले जाती हैं। ऊर्जा चलती है; पानी ज़्यादातर वृत्त में घूमता है।
- कहना कि दीर्घ ज्वार (स्प्रिंग टाइड) केवल वसंत में होता है। यह हर महीने दो बार, अमावस्या और पूर्णिमा पर होता है।
- सोचना कि ज्वार का केवल एक उभार (चंद्रमा की ओर) है। दोनों ओर एक-एक उभार होता है।
- तट मिलाना: निम्न-मध्य अक्षांशों में गरम धाराएँ आमतौर पर पूर्वी तट और ठंडी धाराएँ पश्चिमी तट के साथ बहती हैं।