National Year 12 Geography
अध्याय: 6
1. 3.1.1 Water and carbon cycles (compulsory)
Water and carbon cycles as natural systems · The water cycle · The carbon cycle · Water, carbon, climate and life on Earth · Quantitative and qualitative skills · Case studies
- कार्बन चक्र: कार्बन कहाँ रहता है और कैसे घूमता है – कार्बन हवा, जीवों, मिट्टी, महासागर और चट्टानों के बीच घूमता रहता है। इन जगहों को भंडार कहते हैं और कार्बन के आने-जाने को प्रवाह। प्रकाश संश्लेषण हवा से कार्बन डाइऑक्साइड निकालता है; श्वसन, अपघटन और दहन उसे वापस देते हैं। महासागर बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन लेता और छोड़ता है। लाखों सालों में कार्बन चट्टानों और जीवाश्म ईंधन में बंद हो जाता है, और ज्वालामुखी व अपक्षय उसे धीरे-धीरे लौटाते हैं। आज मनुष्य ईंधन जलाकर और जंगल काटकर इतना कार्बन जोड़ रहे हैं कि प्राकृतिक भंडार उसे सोख नहीं पाते, इसलिए हवा में CO₂ बढ़ रही है और पृथ्वी गरम हो रही है।
- जल चक्र: एक तंत्र (System) के रूप में – पृथ्वी का पानी भंडारों (महासागर, बर्फ़, भूजल, नदी, झील, मिट्टी, हवा, जीव) के बीच प्रवाहों से घूमता है — वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण, अंतःस्यंदन, अपवाह। पूरी पृथ्वी के लिए यह बंद तंत्र है: कुल पानी उतना ही रहता है। नदी बेसिन खुला तंत्र है: वर्षा अंदर आती है, पानी जमा होता है, और नदी-बहाव व वाष्पोत्सर्जन से बाहर जाता है। जल संतुलन P = Q + E ± ΔS इसका हिसाब रखता है। बाढ़ हाइड्रोग्राफ़ दिखाता है कि नदी वर्षा पर कितनी जल्दी बढ़ती है; इसकी चोटी और लैग टाइम चट्टान, मिट्टी, ढाल, पेड़-पौधों और भूमि उपयोग पर निर्भर हैं। मौसम, तूफ़ान, वनों की कटाई, खेती, शहर और भूजल दोहन — सब चक्र को बदलते हैं।
2. 3.1.2 Hot desert systems and landscapes (Section B option: choose one of deserts, coasts, glacial)
Deserts as natural systems · Systems and processes · Arid landscape development in contrasting settings · Desertification · Quantitative and qualitative skills · Case studies
- गर्म मरुस्थल: जलवायु, जीवन, लोग और मरुस्थलीकरण – गर्म मरुस्थल वे जगहें हैं जहाँ साल में लगभग 250 mm से कम वर्षा होती है और ज़्यादातर समय गर्मी रहती है। ये ज़्यादातर भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण 15–30° की पट्टियों में हैं, जहाँ ऊपर से सूखी हवा नीचे उतरती है। सूखेपन के दूसरे कारण हैं ठंडी महासागरीय धाराएँ, पहाड़ों के पीछे वृष्टि-छाया और समुद्र से बहुत दूरी। बादल न होने से दिन बहुत गर्म (अक्सर 40 °C से ऊपर) और रातें ठंडी होती हैं, इसलिए दैनिक तापांतर बड़ा होता है। शुष्कता सूचकांक (P ÷ PET) बताता है कि जगह कितनी सूखी है: 0.2 से कम शुष्क। मिट्टी पतली, रेतीली या पथरीली और ह्यूमस में कम होती है। पौधे पानी जमा करके, काँटों और मोम से, गहरी या फैली जड़ों से बचते हैं; जानवर रात में सक्रिय होकर, बिल बनाकर और पानी बचाकर। मरुस्थल सौर ऊर्जा, खनिज, सिंचाई से खेती और पर्यटन देते हैं, पर गर्मी, पानी की कमी, दूरी और अचानक बाढ़ भी लाते हैं। मरुस्थलीकरण यानी अच्छी ज़मीन का मरुस्थल जैसा बन जाना, जिसके कारण सूखा, जलवायु परिवर्तन, अति-चराई, पेड़ कटाई, अति-खेती और बढ़ती आबादी हैं। पेड़ लगाकर, सोच-समझकर चराई, जल-संग्रह और नई तकनीक से इसे धीमा किया जा सकता है।
- भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास: बहते जल और पवन का काम – बहता जल और पवन भू-आकृतियाँ काटने और बनाने वाले दो बड़े कारक हैं। नदी अपने खड़े ऊपरी भाग में गहरी V-आकार घाटियाँ, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात और जलगर्तिकाएँ काटती है, और धीमी होने पर जलोढ़ पंख, डेल्टा, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध और बिंदु बार बनाती है। उसके मोड़ (विसर्प) बढ़कर कट जाते हैं और गोखुर झील बनती है। मरुस्थल में पवन ढीली रेत उड़ाती है (अपवाहन), रेत से चट्टान रगड़ती है (अपघर्षण) और छत्रक शिला बनाती है, और परत बाढ़ के साथ ज़मीन को पेडीमेंट, पेडीप्लेन और इंसेलबर्ग में बदलती है; रेत को बरखान, परवलयिक, सीफ़, अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ टिब्बों के रूप में जमा करती है। भू-आकृतियाँ जीवों की तरह युवा, प्रौढ़ और वृद्ध अवस्था से गुज़रती हैं।
3. 3.1.3 Coastal systems and landscapes (Section B option)
Coasts as natural systems · Systems and processes · Coastal landscape development · Coastal management · Quantitative and qualitative skills · Case studies
- तटीय भू-दृश्य: समुद्र ज़मीन को कैसे गढ़ता है – तट वह जगह है जहाँ ज़मीन और समुद्र मिलते हैं। यह एक तंत्र है: लहरों, ज्वार, धाराओं और हवा की ऊर्जा अवसाद को चट्टानों, तटों और समुद्र तल जैसे भंडारों के बीच घुमाती है, और तट का हर हिस्सा एक अवसाद कोष्ठ (sediment cell) है। लहरें समुद्र पर बहती हवा से बनती हैं; फ़ेच उनका आकार तय करता है। रचनात्मक लहरें तट बनाती हैं, विनाशकारी लहरें हटाती हैं। उच्च-ऊर्जा तटों पर बड़ी लहरें और खड़ी चट्टानें; निम्न-ऊर्जा तटों पर छोटी लहरें, रेतीले तट और दलदल। अपक्षय (हिमीकरण-द्रवण, नमक, रासायनिक) और वृहद संचलन (शैलपात, भूस्खलन, स्लंपिंग) चट्टानों को कमज़ोर करते हैं। समुद्र जलीय क्रिया, अपघर्षण, सन्निघर्षण और घोलन से अपरदन करता है; कर्षण, उत्परिवर्तन, निलंबन, घोल और तटीय अपवाह से ढोता है; ऊर्जा घटने पर जमा करता है। अपरदन से अंतरीप और खाड़ियाँ, लहर-कटा खाँचा और मंच, गुफा, मेहराब, स्टैक और स्टंप बनते हैं। निक्षेपण से पुलिन, स्पिट, रोधिका, टोम्बोलो, रेत के टीले, पंक-मैदान और लवणीय दलदल बनते हैं। समुद्र-तल परिवर्तन (सुस्थैतिक, समस्थैतिक, विवर्तनिक) से निर्गत तट (उठे पुलिन) और निमग्न तट (रिया, फ़ियोर्ड) बनते हैं। जलवायु परिवर्तन समुद्र-तल और तूफ़ान बढ़ाता है। तटों का प्रबंधन कठोर व मृदु इंजीनियरिंग, नियंत्रित पीछे हटने, तटरेखा प्रबंधन योजनाओं और एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन से होता है।
- महासागरीय जल संचलन: तरंगें, ज्वार-भाटा और धाराएँ – महासागर का पानी तीन तरह से चलता है। तरंगें (लहरें) ज़्यादातर पवन से बनती हैं: ऊर्जा आगे जाती है जबकि पानी का हर कण छोटे वृत्त में घूमता है; उथले पानी में लहरें धीमी होकर टूटती हैं। ज्वार-भाटा समुद्र का नियमित चढ़ना-उतरना है, आमतौर पर दिन में दो बार, जो चंद्रमा (और सूर्य) के खिंचाव और पृथ्वी-चंद्रमा के घूमने से होता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में हों (अमावस्या, पूर्णिमा) तो बहुत ऊँचे दीर्घ ज्वार; समकोण पर हों (अष्टमी) तो कमज़ोर लघु ज्वार। महासागरीय धाराएँ तय दिशा में बहती पानी की विशाल नदियाँ हैं, जिन्हें पवनें, गर्मी, गुरुत्व, लवणता और घनत्व का अंतर चलाते हैं और कोरिऑलिस बल मोड़ता है। गरम धाराएँ विषुवत से ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ ध्रुवों से विषुवत की ओर बहती हैं। धाराएँ तटों की जलवायु, मछली, कोहरा और जहाज़रानी बदलती हैं।
4. 3.1.4 Glacial systems and landscapes (Section B option)
Glaciers as natural systems · The nature and distribution of cold environments · Systems and processes · Glaciated landscape development · Human impacts on cold environments · Quantitative and qualitative skills · Case studies
- हिमनद स्थलरूप: बर्फ़ पहाड़ों और घाटियों को कैसे गढ़ती है – हिमनद (ग्लेशियर) बर्फ़ की धीमी नदी है। यह एक तंत्र की तरह काम करता है: ऊपर बर्फ़ जुड़ती है (संचयन) और नीचे पिघलती है (अपक्षरण)। दोनों का अंतर तय करता है कि मुहाना आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। बर्फ़ जमना-पिघलना, उत्पाटन और अपघर्षण से चट्टान काटती है। इससे सर्क, अरेत, पिरामिडी चोटी, U-आकार की घाटी, लटकती घाटी और रिबन झील बनती हैं। पिघलती बर्फ़ टिल गिराती है जिससे हिमोढ़, ड्रमलिन और अनियत शिलाएँ बनती हैं; पिघला पानी धौत मैदान, एस्कर और केम बनाता है। बर्फ़ के पास जमी ज़मीन पर परिहिमनद (पेरीग्लेशियल) रूप जैसे पिंगो बनते हैं। लोग इन पहाड़ों में खेती, पर्यटन और बिजली के लिए रहते हैं, इसलिए पर्यटन और जलवायु परिवर्तन का प्रबंधन ज़रूरी है।
5. 3.1.5 Hazards (Section C option: choose one of hazards, ecosystems under stress)
The concept of hazard in a geographical context · Plate tectonics · Volcanic hazards · Seismic hazards · Storm hazards · Fires in nature · Case studies
- प्राकृतिक संकट (Natural Hazards) – प्राकृतिक संकट (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों और चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, बाढ़, सूखा या चक्रवात। जब यह ऐसे लोगों पर पड़ती है जो तैयार नहीं हैं, तब यह आपदा (disaster) बन जाती है। भूगर्भीय संकट धरती के अंदर से आते हैं, मौसमी संकट हवा और पानी से। जोखिम = संकट × सुभेद्यता ÷ क्षमता, इसलिए चेतावनी, मज़बूत मकान और प्रशिक्षित लोग नुकसान घटाते हैं।
- महासागरों और महाद्वीपों का वितरण: विस्थापन, विस्तार और प्लेटें – 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि सारे महाद्वीप कभी एक भूखंड पैंजिया थे, जो एक महासागर पैंथालासा से घिरा था, और वे धीरे-धीरे अलग हुए। मिलते तट, चट्टानें, जीवाश्म, हिमनद जमाव और प्लेसर सोना उनके पक्ष में थे, पर वे बल नहीं समझा सके। समुद्र तल के मानचित्रण से कटक, मैदान और खाइयाँ मिलीं; फिर हैरी हेस ने सागरीय अधस्तल विस्तार दिया: मध्य-महासागरीय कटक पर नई भूपर्पटी बनती है और खाइयों में पुरानी डूबती है। इससे प्लेट विवर्तनिकी बनी: स्थलमंडल कठोर प्लेटों में टूटा है जो नरम दुर्बलतामंडल पर चलती हैं और अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं पर मिलती हैं। भारतीय प्लेट दक्षिण से अलग होकर उत्तर बढ़ी और एशिया से टकराकर हिमालय उठाया।
6. 3.1.6 Ecosystems under stress (Section C option)
Ecosystems and sustainability · Ecosystems and processes · Biomes · Ecosystems in the British Isles over time · Marine ecosystems · Local ecosystems · Case studies
- जैव विविधता एवं संरक्षण – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता, तीन स्तरों पर: आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिक। यह भूमध्य रेखा के पास सबसे ज़्यादा है और क्षेत्र के साथ बढ़ती है (log S = log C + Z log A)। हर जाति ज़रूरी है, जैसे हवाई जहाज़ की कीलें। 'दुष्ट चौकड़ी' के कारण जातियाँ तेज़ी से खो रही हैं: आवास हानि और विखंडन, अति-दोहन, विदेशी जातियों का आक्रमण और सह-विलुप्ति। IUCN रेड लिस्ट (रेड डेटा बुक) जातियों को 'कम चिंता' से 'विलुप्त' तक बाँटती है। संरक्षण स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन, रामसर आर्द्रभूमि) और बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक) होता है।
- पारितंत्र: संरचना, उत्पादकता, ऊर्जा प्रवाह और पिरामिड – पारितंत्र प्रकृति की एक कार्यशील इकाई है जहाँ जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटक आपस में मिलकर काम करते हैं। पौधे जिस दर से भोजन बनाते हैं वह उत्पादकता है: सकल (GPP) में से श्वसन घटाओ तो शुद्ध (NPP = GPP − R)। मृत पदार्थ पाँच चरणों में टूटता है: खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीकरण और खनिजीकरण। ऊर्जा धूप से आती है, पोषी स्तरों में एक ही दिशा में बहती है और हर बार लगभग 10% ही आगे जाती है। संख्या और जीवभार के पिरामिड उल्टे हो सकते हैं, पर ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
- पारितंत्र गहराई से: बायोम, पोषक चक्र और गड़बड़ी – बायोम बड़े क्षेत्र हैं जिनकी जलवायु और जीवन मिलते-जुलते हैं। ज़मीन पर तापमान और वर्षा बायोम तय करते हैं; पानी में खारापन, गहराई, रोशनी और बहाव क्षेत्र तय करते हैं। पदार्थ पारितंत्र में घूमता है: नाइट्रोजन स्थिरीकरण, नाइट्रीकरण, स्वांगीकरण, अमोनीकरण और विनाइट्रीकरण से हवा, मिट्टी, जीवों के बीच घूमकर लौटती है; फ़ॉस्फ़ोरस चट्टान, मिट्टी, पानी, जीव और तलछट के बीच धीरे घूमता है, बिना गैस चरण के। अपघटक ऑक्सीजन के साथ (वायवीय) या बिना (अवायवीय) पदार्थ लौटाते हैं। उर्वरक बहाव, आवास-नाश, आक्रामक प्रजातियाँ और जलवायु परिवर्तन इन तंत्रों को बिगाड़ते हैं; पारितंत्र प्रतिरोध और लचीलेपन से जवाब देते हैं।