गर्म मरुस्थल क्या है और कहाँ हैं?
मरुस्थल वह जगह है जहाँ बहुत कम वर्षा होती है: साल में लगभग 250 mm से कम। गर्म मरुस्थल में साल के ज़्यादातर समय गर्मी भी रहती है।
ज़्यादातर गर्म मरुस्थल भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण लगभग 15° से 30° की दो पट्टियों में, कर्क और मकर रेखा के पास हैं। बड़े उदाहरण: सहारा और अरब मरुस्थल, भारत-पाकिस्तान का थार, दक्षिणी अफ़्रीका के कालाहारी और नामिब, दक्षिण अमेरिका का अटाकामा और मध्य ऑस्ट्रेलिया के मरुस्थल।
मरुस्थल को एक तंत्र (system) मान सकते हैं। ऊर्जा अंदर आती है (तेज़ धूप, हवा, तूफ़ान के बाद कभी-कभार बहता पानी)। अवसाद (रेत, बजरी, धूल) इसमें घूमता है। रेत के टीले, चट्टानी पठार और सूखी नदी-घाटियाँ (वादी) इसका परिणाम हैं।
गर्म मरुस्थल इतने सूखे क्यों हैं?
- नीचे उतरती हवा: गर्म नम हवा भूमध्य रेखा पर उठकर वहीं बरस जाती है। अब सूखी हवा 30° के पास नीचे उतरती है। नीचे आती हवा गर्म होती है और बादल नहीं बनने देती। यह उच्च दाब पट्टी ज़्यादातर मरुस्थल बनाती है।
- ठंडी महासागरीय धाराएँ: कुछ तटों (जैसे अटाकामा, नामिब) पर ठंडा पानी ऊपर की हवा को ठंडा कर देता है, जो ऊपर उठकर बरस नहीं पाती। कोहरा होता है, बारिश लगभग नहीं।
- वृष्टि-छाया: नम हवाएँ पहाड़ की एक ओर बरस जाती हैं; दूसरी ओर सूखा रहता है।
- महाद्वीपीयता: समुद्र से बहुत दूर की जगहों तक हवा की नमी पहुँचती ही नहीं।
मरुस्थल की जलवायु, मिट्टी, वनस्पति और शुष्कता सूचकांक
जलवायु
गर्मियों में दिन अक्सर 40 °C से ऊपर। साफ़ आसमान से रात में गर्मी निकल जाती है, तापमान 0–5 °C तक गिर सकता है। दैनिक तापांतर (दिन और रात के तापमान का अंतर) 30 °C या ज़्यादा हो सकता है। वर्षा दुर्लभ और अनिश्चित, अक्सर छोटे तेज़ तूफ़ानों में।
शुष्कता सूचकांक
शुष्कता सूचकांक (AI) आने वाले और जा सकने वाले पानी की तुलना है: AI = P ÷ PET। P = साल की वर्षा, PET = संभावित वाष्पोत्सर्जन (अगर पानी हमेशा मौजूद हो तो कितना पानी भाप बनकर और पौधों से उड़ सकता है)। 0.05 से कम अति-शुष्क, 0.05–0.20 शुष्क, 0.20–0.50 अर्ध-शुष्क।
मिट्टी
पतली, रेतीली या पथरीली और सूखी। पौधे कम हैं तो ह्यूमस (सड़ी वनस्पति) भी कम। ऊपर खिंचकर भाप बना पानी सतह पर नमक की परत छोड़ सकता है।
वनस्पति
पौधे दूर-दूर, बीच में नंगी ज़मीन: कैक्टस, काँटेदार झाड़ियाँ, सख़्त घास, मरूद्यान (oasis) के पास खजूर। मरूद्यान वह जगह है जहाँ भूजल सतह तक आ जाता है।
पौधे और जानवर कैसे अनुकूलित होते हैं
- पानी जमा करना: कैक्टस और बाओबाब के मोटे, गूदेदार तने।
- कम पानी खोना: पत्तियों की जगह काँटे या छोटी पत्तियाँ, मोटी मोमी त्वचा, छिद्र जो केवल रात में खुलते हैं।
- जड़ें: बहुत गहरी मूसला जड़ भूजल तक (कुछ बबूल 30 m से गहरी); या फैली उथली जड़ें जो बारिश की हर बूँद पकड़ें।
- इंतज़ार: कई फूलों के बीज सालों पड़े रहते हैं और बारिश होते ही जल्दी उग जाते हैं।
- ऊँट: कूबड़ में चर्बी, पानी नहीं; शरीर का बहुत पानी खोकर भी ठीक रहता है; चौड़े पैर रेत में नहीं धँसते; लंबी पलकें और बंद होने वाले नथुने रेत रोकते हैं।
- छोटे जीव: फ़ेनेक लोमड़ी, जर्बिल और कई कीट दिन में ठंडे बिलों में रहते और रात में निकलते हैं (निशाचर)। फ़ेनेक के बड़े कान गर्मी बाहर निकालते हैं।
विकास के अवसर और चुनौतियाँ
अवसर
- ऊर्जा: साल भर तेज़ धूप से सौर बिजली (राजस्थान का भड़ला, मोरक्को का नूर); कुछ मरुस्थलों में तेल और गैस।
- खनिज: ताँबा, सोना, फ़ॉस्फ़ेट, नमक।
- खेती: नहर, कुएँ या नदी से सिंचाई (नील घाटी, इंदिरा गांधी नहर)।
- पर्यटन: ऊँट सफ़ारी, टीले, किले और उत्सव (जैसलमेर)।
चुनौतियाँ
- भीषण गर्मी: बाहर काम कठिन, मशीनें ख़राब।
- पानी: कम वर्षा, ज़्यादा वाष्पन, गिरता भूजल।
- दूरी: लंबे रास्ते, कम सड़कें, निर्माण और सामान लाना महँगा।
- अचानक बाढ़: सख़्त ज़मीन पर दुर्लभ तूफ़ान से वादियों में अचानक बाढ़।
केस स्टडी कैसे लिखें
एक मरुस्थल (जैसे थार या सहारा) चुनें और लिखें: स्थान, जलवायु के आँकड़े, एक अवसर, एक चुनौती और लोग क्या करते हैं।
मरुस्थलीकरण: कारण, प्रभाव और उपाय
मरुस्थलीकरण यानी मरुस्थल के किनारे की ज़मीन का धीरे-धीरे पौधे और उपजाऊ मिट्टी खोकर मरुस्थल जैसा बन जाना। यह टीलों का आगे बढ़ना नहीं, ज़मीन का थक जाना है।
समय के साथ मरुस्थल बदलते हैं
लगभग 10,000–5,000 साल पहले सहारा बहुत हरा-भरा था ("हरा सहारा"), झीलें, घास और जानवर थे। पृथ्वी की कक्षा में बदलाव से मानसूनी वर्षा बदली और यह सूख गया। यानी मरुस्थल प्राकृतिक रूप से भी बढ़ते-घटते हैं।
कारण
- जलवायु: जलवायु परिवर्तन से लंबे सूखे और ज़्यादा गर्मी।
- मनुष्य: अति-चराई, ईंधन के लिए पेड़ कटाई, अति-खेती, ग़लत सिंचाई से नमक जमना, तेज़ी से बढ़ती आबादी।
जोखिम वाले क्षेत्र और प्रभाव
साहेल (सहारा के दक्षिण), पश्चिमी भारत के हिस्से, मध्य एशिया और उत्तरी चीन। प्रभाव: कम फ़सल, भूख, धूल भरी आँधियाँ, लोगों का शहरों की ओर पलायन।
उपाय
पेड़ों की पट्टियाँ और "हरी दीवार", बारिश रोकने के लिए पत्थरों की कतारें, बारी-बारी चराई, ड्रिप सिंचाई, लकड़ी बचाने को सौर चूल्हे, और स्थानीय लोगों को अपना भविष्य ख़ुद चुनने देना।
स्थानीय उदाहरण
साहेल के कुछ हिस्सों में किसान पेड़ों के ठूँठ बचाते हैं ताकि वे फिर उगें (किसान-प्रबंधित प्राकृतिक पुनर्जनन)। इससे लाखों हेक्टेयर पर पेड़ लौटे हैं।
कौशल: मरुस्थल के आँकड़े मापना और समझना
- जलवायु ग्राफ़ बनाएँ: महीने की वर्षा के लिए स्तंभ, तापमान के लिए रेखा।
- शुष्कता सूचकांक और दैनिक तापांतर निकालें।
- सालों की उपग्रह तस्वीरों से वनस्पति या टीलों की चाल का नक्शा बनाएँ।
- किसी भू-आकृति का चित्र बनाकर नाम लिखें; टीले की ऊँचाई या ढाल मापें।
- आँकड़े जाँचें: माध्य, परास, रुझान देखें; क्या नमूना काफ़ी बड़ा है?
घर पर करके देखें
एक जैसी गीली मिट्टी के दो कप धूप में रखें: एक खुला, एक सूखी पत्तियों से ढका। 3 घंटे बाद छूकर या तौलकर देखें। खुली मिट्टी बहुत जल्दी सूखती है। इसीलिए पौधों का आवरण ज़मीन को मरुस्थल बनने से बचाता है। फिर 3D के आख़िरी चरण में स्लाइडर से यही बात देखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मरुस्थल: वर्षा < 250 mm प्रति वर्ष
- शुष्कता सूचकांक AI = P ÷ PET
- अति-शुष्क < 0.05; शुष्क 0.05–0.20; अर्ध-शुष्क 0.20–0.50
- दैनिक तापांतर = दिन का अधिकतम − न्यूनतम तापमान
- गर्म मरुस्थल पट्टियाँ ≈ 15°–30° उ. और द.
- मरुस्थलीकरण = शुष्क भूमि का क्षरण
हल किए गए उदाहरण
1. एक मरुस्थली कस्बे में दिन का अधिकतम 44 °C और रात का न्यूनतम 9 °C है। दैनिक तापांतर कितना?
तापांतर = 44 − 9 = 35 °C। साफ़ आसमान से रात में गर्मी निकल जाती है, इसलिए इतना बड़ा अंतर।
2. किसी जगह साल में 150 mm वर्षा होती है और PET 1,500 mm है। शुष्कता सूचकांक और क्षेत्र बताइए।
AI = 150 ÷ 1,500 = 0.10। यह 0.05 और 0.20 के बीच है, इसलिए जगह शुष्क है।
3. समुद्र के ठीक पास होकर भी अटाकामा तट दुनिया की सबसे सूखी जगहों में क्यों है?
तट के साथ ठंडी महासागरीय धारा बहती है। वह ऊपर की हवा को ठंडा कर देती है, हवा स्थिर रहती है और ऊपर उठकर बादल नहीं बनाती। साथ ही यह नीचे उतरती हवा की पट्टी में और एंडीज़ की वृष्टि-छाया में है। इसलिए कोहरा है, बारिश लगभग नहीं।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि सारे मरुस्थल गर्म और रेतीले हैं। कई पथरीले हैं, और कुछ ठंडे (जैसे लद्दाख)। मरुस्थल की पहचान कम वर्षा से होती है।
- यह कहना कि ऊँट का कूबड़ पानी जमा करता है। उसमें चर्बी होती है, जो ऊर्जा देती है।
- शुष्कता सूचकांक PET ÷ P से निकालना। सही है P ÷ PET; छोटी संख्या मतलब ज़्यादा सूखा।
- मरुस्थलीकरण को केवल टीलों का खिसकना समझना। यह जलवायु और मानव उपयोग से उपजाऊ ज़मीन का थक जाना है।