National Year 10 Geography
अध्याय: 3
1. 3.1.1 The challenge of natural hazards
Natural hazards · Tectonic hazards · Weather hazards · Climate change
- प्राकृतिक संकट (Natural Hazards) – प्राकृतिक संकट (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों और चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, बाढ़, सूखा या चक्रवात। जब यह ऐसे लोगों पर पड़ती है जो तैयार नहीं हैं, तब यह आपदा (disaster) बन जाती है। भूगर्भीय संकट धरती के अंदर से आते हैं, मौसमी संकट हवा और पानी से। जोखिम = संकट × सुभेद्यता ÷ क्षमता, इसलिए चेतावनी, मज़बूत मकान और प्रशिक्षित लोग नुकसान घटाते हैं।
- महासागरों और महाद्वीपों का वितरण: विस्थापन, विस्तार और प्लेटें – 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि सारे महाद्वीप कभी एक भूखंड पैंजिया थे, जो एक महासागर पैंथालासा से घिरा था, और वे धीरे-धीरे अलग हुए। मिलते तट, चट्टानें, जीवाश्म, हिमनद जमाव और प्लेसर सोना उनके पक्ष में थे, पर वे बल नहीं समझा सके। समुद्र तल के मानचित्रण से कटक, मैदान और खाइयाँ मिलीं; फिर हैरी हेस ने सागरीय अधस्तल विस्तार दिया: मध्य-महासागरीय कटक पर नई भूपर्पटी बनती है और खाइयों में पुरानी डूबती है। इससे प्लेट विवर्तनिकी बनी: स्थलमंडल कठोर प्लेटों में टूटा है जो नरम दुर्बलतामंडल पर चलती हैं और अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं पर मिलती हैं। भारतीय प्लेट दक्षिण से अलग होकर उत्तर बढ़ी और एशिया से टकराकर हिमालय उठाया।
- मौसम और जलवायु: वायुमंडल से मानसून तक – वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर हवा का कंबल है: 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन और 1% अन्य गैसें। इसकी पाँच परतें हैं; सारा मौसम सबसे नीचे क्षोभमंडल में बनता है। मौसम किसी एक दिन की हवा का हाल है: तापमान, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षा। जलवायु 30 या ज़्यादा सालों के मौसम का औसत है। भारत में चार ऋतुएँ हैं और ज़्यादातर वर्षा मानसूनी हवाएँ लाती हैं। ईंधन जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती है, जो धरती को गरम करती है और बाढ़ व लू बढ़ाती है। हमारी ज़िंदगी से कितनी यह गैस बनती है, वह हमारा कार्बन फ़ुटप्रिंट है।
- जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रभाव – जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल का औसत मौसम है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी हरितगृह गैसें पृथ्वी से निकलने वाली कुछ ऊष्मा रोक लेती हैं। मनुष्यों ने ईंधन जलाकर और जंगल काटकर ये गैसें बहुत बढ़ा दी हैं, इसलिए पृथ्वी गर्म हो रही है। इससे बर्फ़ पिघलती है, समुद्र तल बढ़ता है और मौसम उग्र होता है। हम गैसें घटा सकते हैं (शमन) और बदलाव के लिए तैयार हो सकते हैं (अनुकूलन)।
2. 3.1.2 The living world
Ecosystems · Tropical rainforests · Hot deserts (option: hot deserts OR cold environments) · Cold environments (option: hot deserts OR cold environments)
- उष्णकटिबंधीय वर्षावन: गर्म, नम जंगल का जीवन – उष्णकटिबंधीय वर्षावन भूमध्य रेखा के पास उगते हैं, जहाँ पूरे साल गर्मी (लगभग 27 °C) और भारी वर्षा (साल में 2,000 mm से ज़्यादा) होती है। जंगल में परतें हैं: उभरी परत, छत्र, निचली/झाड़ी परत और वन तल। पौधे आधार जड़ें, नुकीले सिरे वाली पत्तियाँ, लताएँ और अधिपादप जैसे अनुकूलन रखते हैं; जीव छिपावरण, चढ़ाई और ख़ास भोजन से अनुकूल हैं। पोषक तत्व तेज़ी से घूमते हैं, इसलिए मिट्टी पतली और कमज़ोर है। खेती, पशुपालन, लकड़ी कटाई, खनन और सड़कों के लिए वनोन्मूलन से मृदा अपरदन, जैव-विविधता का नाश, जलवायु परिवर्तन और स्थानीय लोगों को नुक़सान होता है। सतत प्रबंधन (चयनात्मक कटाई, पुनः रोपण, कृषि-वानिकी, इको-पर्यटन, संरक्षित क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय समझौते) जंगल को नष्ट किए बिना उपयोग करता है।
- गर्म मरुस्थल: जलवायु, जीवन, लोग और मरुस्थलीकरण – गर्म मरुस्थल वे जगहें हैं जहाँ साल में लगभग 250 mm से कम वर्षा होती है और ज़्यादातर समय गर्मी रहती है। ये ज़्यादातर भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण 15–30° की पट्टियों में हैं, जहाँ ऊपर से सूखी हवा नीचे उतरती है। सूखेपन के दूसरे कारण हैं ठंडी महासागरीय धाराएँ, पहाड़ों के पीछे वृष्टि-छाया और समुद्र से बहुत दूरी। बादल न होने से दिन बहुत गर्म (अक्सर 40 °C से ऊपर) और रातें ठंडी होती हैं, इसलिए दैनिक तापांतर बड़ा होता है। शुष्कता सूचकांक (P ÷ PET) बताता है कि जगह कितनी सूखी है: 0.2 से कम शुष्क। मिट्टी पतली, रेतीली या पथरीली और ह्यूमस में कम होती है। पौधे पानी जमा करके, काँटों और मोम से, गहरी या फैली जड़ों से बचते हैं; जानवर रात में सक्रिय होकर, बिल बनाकर और पानी बचाकर। मरुस्थल सौर ऊर्जा, खनिज, सिंचाई से खेती और पर्यटन देते हैं, पर गर्मी, पानी की कमी, दूरी और अचानक बाढ़ भी लाते हैं। मरुस्थलीकरण यानी अच्छी ज़मीन का मरुस्थल जैसा बन जाना, जिसके कारण सूखा, जलवायु परिवर्तन, अति-चराई, पेड़ कटाई, अति-खेती और बढ़ती आबादी हैं। पेड़ लगाकर, सोच-समझकर चराई, जल-संग्रह और नई तकनीक से इसे धीमा किया जा सकता है।
- ध्रुवीय प्रदेश: आर्कटिक और अंटार्कटिका – ध्रुवीय प्रदेश उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के आसपास, मोटे तौर पर आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त (66.5°) के भीतर हैं। आर्कटिक ज़मीन से घिरा जमा हुआ महासागर है; अंटार्कटिका एक महाद्वीप है जो लगभग 4 km तक मोटी बर्फ़ की चादर से ढका है। ये ठंडे हैं क्योंकि धूप तिरछी आकर फैल जाती है और सफ़ेद बर्फ़ ज़्यादातर धूप लौटा देती है। पृथ्वी की धुरी के 23.5° झुकाव से महीनों का दिन (आधी रात का सूरज) और महीनों की रात (ध्रुवीय रात) होती है। पौधे कम हैं; ध्रुवीय भालू (आर्कटिक) और पेंगुइन (अंटार्कटिका) जैसे जीव चर्बी, फ़र और पंखों से ठंड झेलते हैं। आर्कटिक में इनुइट और सामी जैसे मूल निवासी रहते हैं; अंटार्कटिका में केवल वैज्ञानिक। आइस कोर पुरानी जलवायु बताते हैं। ध्रुव तेज़ी से गर्म हो रहे हैं; समुद्री बर्फ़ पिघलने से गर्मी और बढ़ती है (एल्बिडो चक्र) और ज़मीनी बर्फ़ पिघलने से समुद्र तल ऊँचा होता है। अंटार्कटिक संधि महाद्वीप को शांति और विज्ञान के लिए रखती है, जबकि आर्कटिक के नए समुद्री रास्ते और संसाधन सहयोग के नए सवाल उठाते हैं।
3. 3.1.3 Physical landscapes in the UK (study two of coasts, rivers, glacial)
UK physical landscapes · Coastal landscapes in the UK (option) · River landscapes in the UK (option) · Glacial landscapes in the UK (option)
- ब्रिटेन के भौतिक भू-दृश्य: उच्च भूमि, निम्न भूमि और नदी तंत्र – ब्रिटेन का भौतिक भू-दृश्य एक झुके हुए द्वीप जैसा है: उत्तर और पश्चिम में ऊँची उच्च भूमि, दक्षिण और पूर्व में नीची निम्न भूमि। उच्च भूमि ज़्यादातर 600 m से ऊपर है: स्कॉटिश हाइलैंड्स (बेन नेविस 1,345 m, सबसे ऊँचा), सदर्न अपलैंड्स, लेक डिस्ट्रिक्ट, पेनाइन्स (इंग्लैंड की रीढ़), स्नोडोनिया और वेल्स के पहाड़, और मॉर्न पर्वत। निम्न भूमि ज़्यादातर 200 m से नीचे है: फ़ेन्स, ईस्ट एंग्लिया, लंदन बेसिन और चॉक डाउन्स। कारण भूविज्ञान है: उत्तर-पश्चिम पुरानी, कठोर आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से बना है जो अपरदन झेलती हैं; दक्षिण-पूर्व नई, नरम अवसादी चट्टानों (चिकनी मिट्टी, रेत, चॉक) से। पुरानी प्लेट हलचलों और ज्वालामुखियों ने उत्तर-पश्चिम को उठाया, और हिमयुगों ने उच्च भूमि में घाटियाँ काटीं और निम्न भूमि पर मिट्टी छोड़ी। ज़्यादातर नदियाँ गीली पश्चिमी उच्च भूमि से निकलकर निम्न भूमि से समुद्र तक जाती हैं: सेवर्न (सबसे लंबी), टेम्स, ट्रेंट, टे, टाइन आदि। उच्चावच जलवायु (गीली, ठंडी उच्च भूमि) और भूमि उपयोग तय करता है: उच्च भूमि में भेड़, वानिकी, जलाशय और राष्ट्रीय उद्यान; निम्न भूमि में फ़सली खेती और बड़े शहर।
- तटीय भू-दृश्य: समुद्र ज़मीन को कैसे गढ़ता है – तट वह जगह है जहाँ ज़मीन और समुद्र मिलते हैं। यह एक तंत्र है: लहरों, ज्वार, धाराओं और हवा की ऊर्जा अवसाद को चट्टानों, तटों और समुद्र तल जैसे भंडारों के बीच घुमाती है, और तट का हर हिस्सा एक अवसाद कोष्ठ (sediment cell) है। लहरें समुद्र पर बहती हवा से बनती हैं; फ़ेच उनका आकार तय करता है। रचनात्मक लहरें तट बनाती हैं, विनाशकारी लहरें हटाती हैं। उच्च-ऊर्जा तटों पर बड़ी लहरें और खड़ी चट्टानें; निम्न-ऊर्जा तटों पर छोटी लहरें, रेतीले तट और दलदल। अपक्षय (हिमीकरण-द्रवण, नमक, रासायनिक) और वृहद संचलन (शैलपात, भूस्खलन, स्लंपिंग) चट्टानों को कमज़ोर करते हैं। समुद्र जलीय क्रिया, अपघर्षण, सन्निघर्षण और घोलन से अपरदन करता है; कर्षण, उत्परिवर्तन, निलंबन, घोल और तटीय अपवाह से ढोता है; ऊर्जा घटने पर जमा करता है। अपरदन से अंतरीप और खाड़ियाँ, लहर-कटा खाँचा और मंच, गुफा, मेहराब, स्टैक और स्टंप बनते हैं। निक्षेपण से पुलिन, स्पिट, रोधिका, टोम्बोलो, रेत के टीले, पंक-मैदान और लवणीय दलदल बनते हैं। समुद्र-तल परिवर्तन (सुस्थैतिक, समस्थैतिक, विवर्तनिक) से निर्गत तट (उठे पुलिन) और निमग्न तट (रिया, फ़ियोर्ड) बनते हैं। जलवायु परिवर्तन समुद्र-तल और तूफ़ान बढ़ाता है। तटों का प्रबंधन कठोर व मृदु इंजीनियरिंग, नियंत्रित पीछे हटने, तटरेखा प्रबंधन योजनाओं और एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन से होता है।
- नदी: उद्गम से समुद्र तक – नदी मीठा पानी है जो एक नाली (चैनल) में ऊँची ज़मीन (उद्गम) से समुद्र, झील या बड़ी नदी (मुहाना) तक बहता है। रास्ते में वह चट्टान को काटती (अपरदन), ढोती (परिवहन) और जमा करती (निक्षेपण) है। ऊपरी भाग तेज़ ढलान वाला है: V घाटी और जलप्रपात। मध्य भाग में विसर्प (मोड़) बनते हैं। निचला भाग समतल है: बाढ़ का मैदान, तटबंध और डेल्टा। तेज़ बारिश से बाढ़ आती है; उसे कठोर (बाँध, तटबंध) और नरम (पेड़, ज़ोनिंग) उपायों से संभालते हैं।
- हिमनद स्थलरूप: बर्फ़ पहाड़ों और घाटियों को कैसे गढ़ती है – हिमनद (ग्लेशियर) बर्फ़ की धीमी नदी है। यह एक तंत्र की तरह काम करता है: ऊपर बर्फ़ जुड़ती है (संचयन) और नीचे पिघलती है (अपक्षरण)। दोनों का अंतर तय करता है कि मुहाना आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। बर्फ़ जमना-पिघलना, उत्पाटन और अपघर्षण से चट्टान काटती है। इससे सर्क, अरेत, पिरामिडी चोटी, U-आकार की घाटी, लटकती घाटी और रिबन झील बनती हैं। पिघलती बर्फ़ टिल गिराती है जिससे हिमोढ़, ड्रमलिन और अनियत शिलाएँ बनती हैं; पिघला पानी धौत मैदान, एस्कर और केम बनाता है। बर्फ़ के पास जमी ज़मीन पर परिहिमनद (पेरीग्लेशियल) रूप जैसे पिंगो बनते हैं। लोग इन पहाड़ों में खेती, पर्यटन और बिजली के लिए रहते हैं, इसलिए पर्यटन और जलवायु परिवर्तन का प्रबंधन ज़रूरी है।