मरुस्थलीकरण क्या है?
मरुस्थलीकरण का मतलब है सूखे इलाकों की ज़मीन का धीरे-धीरे पौधे और उपजाऊ मिट्टी खोकर मरुस्थल जैसी बन जाना।
- यह शुष्क भूमि में होता है: जहाँ बारिश कम होती है और वाष्पीकरण ज़्यादा। शुष्क भूमि धरती के लगभग 40 % भू-भाग पर है और करीब 2 अरब लोग यहाँ रहते हैं।
- यह रेत के टीलों का मरुस्थल से बाहर "चल पड़ना" नहीं है। यह अच्छी ज़मीन का टुकड़ा-टुकड़ा खराब होना है, अक्सर मरुस्थल से बहुत दूर।
- भूमि निम्नीकरण यानी ज़मीन की गुणवत्ता घटना। सूखे इलाकों में भूमि निम्नीकरण ही मरुस्थलीकरण है।
कारण: इंसान और प्रकृति
मानवीय कारण
- अतिचारण: घास के उगने से ज़्यादा तेज़ पशु चर जाते हैं।
- वनोन्मूलन: लकड़ी, खेत या निर्माण के लिए पेड़-झाड़ियाँ काटना।
- अति-कृषि: हर साल बिना आराम उसी मिट्टी पर खेती, पोषक तत्व खत्म।
- गलत सिंचाई: बिना निकासी के ज़्यादा पानी से नमक ऊपर आ जाता है (लवणीकरण)। ज़्यादा भूजल खींचने से ज़मीन सूखती है।
- जनसंख्या का दबाव और गरीबी: जिनके पास दूसरा रास्ता नहीं, वे ज़मीन का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं।
प्राकृतिक कारण
- सूखा: बहुत कम बारिश वाले साल।
- जलवायु परिवर्तन: ज़्यादा तापमान मिट्टी को जल्दी सुखाता है, बारिश अनिश्चित होती है।
- हवा और पानी से अपरदन: पौधे हटते ही हवा मिट्टी उड़ाती है और तेज़ बारिश उसे बहा देती है।
कारण एक-दूसरे को बढ़ाते हैं: कम पौधे → ज़्यादा नंगी मिट्टी → कम पानी जमा → और कम पौधे। इसे दुष्चक्र कहते हैं।
मरुस्थलीकरण के प्रभाव
- कम भोजन: फसलें और चारागाह खत्म, भुखमरी।
- धूल भरी आँधियाँ: सूखी मिट्टी शहरों तक उड़ती है, सेहत बिगड़ती है।
- पानी की कमी: नदियाँ और कुएँ सूखते हैं।
- जीवों का नुकसान: पेड़-पौधे और जानवर अपना घर खोते हैं।
- पलायन और गरीबी: परिवार काम के लिए शहर चले जाते हैं।
- जलवायु: नंगी ज़मीन कम कार्बन रखती है, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है।
उदाहरण: साहेल
साहेल अफ्रीका में सहारा के ठीक दक्षिण में फैली सूखी घास की लंबी पट्टी है। 1970 और 1980 के दशकों के लंबे सूखे, तेज़ी से बढ़ती आबादी, अतिचारण और लकड़ी कटाई से बड़ा इलाका खराब हुआ। चरवाहों और किसानों ने अकाल झेला। तब से किसानों द्वारा पेड़ों को फिर उगाने और वर्षा जल रोकने से कई इलाके फिर हरे हुए हैं।
पथरीला मरुस्थलीकरण
कुछ पहाड़ियाँ चूना-पत्थर (कार्स्ट भूमि) की बनी होती हैं। इन पर मिट्टी बहुत पतली होती है और बहुत धीरे बनती है। जंगल कटें और ढलानों पर खेती हो, तो भारी बारिश मिट्टी बहा देती है। नंगी धूसर चट्टान बच जाती है। यही पथरीला मरुस्थलीकरण है।
यह दक्षिण-पश्चिम चीन की नम कार्स्ट पहाड़ियों में आम है। यानी यह भारी बारिश वाली जगह पर भी हो सकता है: समस्या मिट्टी का बहना है, बारिश की कमी नहीं।
उपाय: खड़ी ढलानों पर खेती रोकना, पेड़-घास लगाना, सीढ़ीदार खेत और छोटे पानी के टैंक बनाना, किसानों को फलदार पेड़ या पर्यटन जैसी दूसरी आमदनी देना।
उपाय और प्रबंधन
- पेड़ और घास लगाओ: जड़ें मिट्टी पकड़ती हैं, पत्ते छाया देते हैं। पेड़ों की पट्टियाँ (शेल्टरबेल्ट) हवा धीमी करती हैं।
- भूसे की चौकोर जालियाँ: रेत में गाड़े भूसे के चौकोर टीलों को रोकते हैं ताकि पौधे उग सकें।
- बेहतर चराई: कम पशु, बारी-बारी से अलग जगह चराना।
- पानी बचाओ: ड्रिप सिंचाई, छोटे बाँध, पत्थर की मेड़ें और बारिश रोकने वाले गड्ढे।
- बेहतर खेती: फसल-चक्र, ठूँठ खेत में छोड़ना, सूखा सहने वाली फसलें।
- बड़ी योजनाएँ: साहेल में "ग्रेट ग्रीन वॉल" और चीन में "थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट" लाखों हेक्टेयर ज़मीन सुधारना चाहती हैं।
- विश्व स्तर पर: संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD); 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस।
करके देखो: मिट्टी और जड़ों की जाँच
- दो ट्रे में मिट्टी भरो। एक में घास के बीज बोओ और दो हफ्ते रुको। दूसरी खाली छोड़ो।
- दोनों ट्रे तिरछी करो। हर एक पर धीरे-धीरे एक कप पानी डालो।
- बहकर आया पानी इकट्ठा करो। कौन-सा ज़्यादा मटमैला है? खाली ट्रे बहुत ज़्यादा मिट्टी खोती है, बिल्कुल 3D के चरण 3 की तरह।
- अब सूखी ट्रे पर धीरे से फूँको। "हवा" से कौन मिट्टी खोती है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मरुस्थलीकरण: सूखे इलाके की ज़मीन का पौधे और मिट्टी खोकर मरुस्थल जैसा होना
- शुष्क भूमि: जहाँ वाष्पीकरण बारिश से बहुत ज़्यादा हो
- अतिचारण: घास से ज़्यादा पशु
- लवणीकरण: गलत सिंचाई से मिट्टी में नमक जमना
- पथरीला मरुस्थलीकरण: चूना-पत्थर की पहाड़ियों से मिट्टी बहकर नंगी चट्टान बचना
- शेल्टरबेल्ट: हवा रोकने के लिए पेड़ों की कतार
- दुष्चक्र: कम पौधे → ज़्यादा अपरदन → कम पानी → और कम पौधे
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव उस ज़मीन पर 200 बकरियाँ रखता है जो 120 को ही पाल सकती है। पाँच सूखे सालों में क्या होगा?
घास उगने से तेज़ खाई जाएगी, जड़ें मरेंगी, मिट्टी नंगी होकर उड़ेगी। फिर ज़मीन और भी कम बकरियाँ पाल पाएगी: अतिचारण का दुष्चक्र।
2. बारिश वाले इलाके में पथरीला मरुस्थलीकरण क्यों हो सकता है?
चूना-पत्थर की पहाड़ियों पर मिट्टी पतली होती है। पेड़ कटते ही भारी बारिश मिट्टी बहा देती है। समस्या मिट्टी का बहना है, बारिश की कमी नहीं।
3. एक किसान के खेत के पास रेत का टीला खिसक रहा है। तीन कदम सुझाओ।
रेत में भूसे की चौकोर जालियाँ गाड़ो, उनके अंदर सख़्त घास-झाड़ियाँ लगाओ, और हवा की तरफ पेड़ों की पट्टी लगाओ।
आम गलतियाँ
- सोचना कि मरुस्थलीकरण मतलब मरुस्थल का बाहर फैलना। असल में अच्छी ज़मीन अपनी जगह पर खराब होती है।
- सिर्फ सूखे को दोष देना। मुख्य कारण अक्सर इंसानी इस्तेमाल है; सूखा इसे तेज़ करता है।
- सोचना कि सिर्फ रेतीली जगहें प्रभावित होती हैं। पथरीला मरुस्थलीकरण बारिश वाली चूना-पत्थर की पहाड़ियों में होता है।
- सोचना कि यह ठीक नहीं हो सकता। पेड़ लगाने, चराई रोकने और पानी बचाने से कई इलाके फिर हरे हुए हैं।