China 高二 Geography
अध्याय: 9
1. Sel.1 Ch.1 Earth's motion
Rotation and revolution · Geographic significance (day length, seasons, time)
- पृथ्वी का घूर्णन और परिक्रमण – पृथ्वी की दो मुख्य गतियाँ हैं। घूर्णन: यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व लगभग 24 घंटे में एक बार घूमती है — इससे दिन-रात, सूरज का रोज़ का रास्ता, स्थानीय समय (हर घंटे 15° देशांतर) और हवाओं-धाराओं का मुड़ना (कोरिओलिस प्रभाव) होता है। परिक्रमण: यह दीर्घवृत्त कक्षा में सूर्य का लगभग 365¼ दिन में एक चक्कर लगाती है। अक्ष कक्षा-तल (क्रांतिवृत्त) के लंब से 23.5° झुका है और हमेशा एक दिशा में रहता है, इसलिए सिर के ऊपर का सूरज कर्क और मकर रेखा के बीच खिसकता है, दिन की लंबाई बदलती है, और ऋतुएँ, अयनांत व विषुव होते हैं।
2. Sel.1 Ch.2 Shaping the surface
Internal and external forces; rock cycle · Tectonic landforms · River landforms
- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ: बल धरातल को कैसे बनाते और घिसते हैं – पृथ्वी की सतह को दो तरह के बल आकार देते हैं। अंतर्जनित बल अंदर से आते हैं, पृथ्वी की भीतरी गर्मी से: पटल विरूपण (वलन, भ्रंशन, उत्थान, धँसाव) और ज्वालामुखीयता ज़मीन ऊपर बनाते हैं। बहिर्जनिक बल बाहर से आते हैं, सूर्य और गुरुत्व से: अपक्षय चट्टान को उसी जगह तोड़ता है, बृहत् संचलन उसे ढलान से नीचे ले जाता है, और बहता पानी, हवा, हिमनद और लहरें अपरदन और निक्षेपण करके ऊँची ज़मीन को धीरे-धीरे नीचा करते हैं। टूटी चट्टान में पौधे और सूक्ष्म जीव लंबे समय में मिट्टी बनाते हैं। मूल चट्टान, जलवायु, उच्चावच, जीव और समय तय करते हैं कि कैसी मिट्टी बनेगी।
- महासागरों और महाद्वीपों का वितरण: विस्थापन, विस्तार और प्लेटें – 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि सारे महाद्वीप कभी एक भूखंड पैंजिया थे, जो एक महासागर पैंथालासा से घिरा था, और वे धीरे-धीरे अलग हुए। मिलते तट, चट्टानें, जीवाश्म, हिमनद जमाव और प्लेसर सोना उनके पक्ष में थे, पर वे बल नहीं समझा सके। समुद्र तल के मानचित्रण से कटक, मैदान और खाइयाँ मिलीं; फिर हैरी हेस ने सागरीय अधस्तल विस्तार दिया: मध्य-महासागरीय कटक पर नई भूपर्पटी बनती है और खाइयों में पुरानी डूबती है। इससे प्लेट विवर्तनिकी बनी: स्थलमंडल कठोर प्लेटों में टूटा है जो नरम दुर्बलतामंडल पर चलती हैं और अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं पर मिलती हैं। भारतीय प्लेट दक्षिण से अलग होकर उत्तर बढ़ी और एशिया से टकराकर हिमालय उठाया।
- भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास: बहते जल और पवन का काम – बहता जल और पवन भू-आकृतियाँ काटने और बनाने वाले दो बड़े कारक हैं। नदी अपने खड़े ऊपरी भाग में गहरी V-आकार घाटियाँ, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात और जलगर्तिकाएँ काटती है, और धीमी होने पर जलोढ़ पंख, डेल्टा, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध और बिंदु बार बनाती है। उसके मोड़ (विसर्प) बढ़कर कट जाते हैं और गोखुर झील बनती है। मरुस्थल में पवन ढीली रेत उड़ाती है (अपवाहन), रेत से चट्टान रगड़ती है (अपघर्षण) और छत्रक शिला बनाती है, और परत बाढ़ के साथ ज़मीन को पेडीमेंट, पेडीप्लेन और इंसेलबर्ग में बदलती है; रेत को बरखान, परवलयिक, सीफ़, अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ टिब्बों के रूप में जमा करती है। भू-आकृतियाँ जीवों की तरह युवा, प्रौढ़ और वृद्ध अवस्था से गुज़रती हैं।
3. Sel.1 Ch.3 Atmospheric motion
Weather systems (fronts, cyclones) · Pressure belts and wind belts · Effects on climate
- वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ – हवा का वज़न होता है, इसलिए वह नीचे दबाव डालती है: यही वायुदाब है (समुद्र तल पर लगभग 1013 mb)। पवन उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है; दाब प्रवणता बल इसे धकेलता है, कोरिऑलिस बल मोड़ता है (उत्तर में दाएँ, दक्षिण में बाएँ) और घर्षण ज़मीन के पास धीमा करता है। असमान गर्मी से दाब पेटियाँ बनती हैं (विषुवतीय निम्न, उपोष्ण उच्च, उपध्रुवीय निम्न, ध्रुवीय उच्च) और तीन कोष्ठ, जिनसे भूमंडलीय पवनें चलती हैं: व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें, ध्रुवीय पूर्वी पवनें। ऋतु के साथ पेटियाँ खिसकती हैं और मानसून जैसी मौसमी पवनें बनती हैं; स्थानीय पवनों में स्थल-समुद्र समीर और पर्वत-घाटी समीर हैं। एक जैसी गर्मी और नमी वाली विशाल हवा वायुराशि है; दो वायुराशियों की सीमा वाताग्र है। चक्रवात निम्न दाब वाले तूफ़ान हैं: उष्णकटिबंधीय गरम समुद्र पर, शीतोष्ण वाताग्रों पर बनते हैं। तड़ितझंझा और टॉरनेडो छोटे पर बहुत तेज़ तूफ़ान हैं।
- विश्व के जलवायु प्रदेश – किसी जगह के लगभग 30 साल के मौसम का औसत उसकी जलवायु है। यह मुख्य रूप से अक्षांश (सूरज कितना ऊँचा चढ़ता है), ऊँचाई (हर 1 km पर लगभग 6.5 °C ठंडा), समुद्र से दूरी, पवनों और महासागरीय धाराओं पर निर्भर करती है। कोपेन ने दुनिया को पाँच समूहों में बाँटा: A उष्णकटिबंधीय, B शुष्क, C शीतोष्ण, D महाद्वीपीय और E ध्रुवीय, साथ में ऊँचे पहाड़ों पर पर्वतीय (H) जलवायु। मानसून जलवायु में पवनें मौसम के साथ दिशा बदलती हैं।
4. Sel.1 Ch.4 Water motion
Land water bodies · Ocean currents · Ocean–atmosphere interaction (El Niño)
- स्थलीय जल निकाय: नदी, झील और भूजल – नदी, झील और भूजल ज़मीन पर मीठे पानी के आपस में जुड़े भंडार हैं। वर्षा, बर्फ़ और ग्लेशियर का पिघला पानी इन्हें भरता है। बरसात में नदी का स्तर जल-स्तर से ऊँचा होता है, इसलिए नदी भूजल को भरती है। सूखे में जल-स्तर ऊँचा रहता है और भूजल (आधार प्रवाह) नदी को पानी देता है। झील पानी जमा करके धीरे-धीरे लौटाती है।
- महासागरीय जल संचलन: तरंगें, ज्वार-भाटा और धाराएँ – महासागर का पानी तीन तरह से चलता है। तरंगें (लहरें) ज़्यादातर पवन से बनती हैं: ऊर्जा आगे जाती है जबकि पानी का हर कण छोटे वृत्त में घूमता है; उथले पानी में लहरें धीमी होकर टूटती हैं। ज्वार-भाटा समुद्र का नियमित चढ़ना-उतरना है, आमतौर पर दिन में दो बार, जो चंद्रमा (और सूर्य) के खिंचाव और पृथ्वी-चंद्रमा के घूमने से होता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में हों (अमावस्या, पूर्णिमा) तो बहुत ऊँचे दीर्घ ज्वार; समकोण पर हों (अष्टमी) तो कमज़ोर लघु ज्वार। महासागरीय धाराएँ तय दिशा में बहती पानी की विशाल नदियाँ हैं, जिन्हें पवनें, गर्मी, गुरुत्व, लवणता और घनत्व का अंतर चलाते हैं और कोरिऑलिस बल मोड़ता है। गरम धाराएँ विषुवत से ध्रुवों की ओर, ठंडी धाराएँ ध्रुवों से विषुवत की ओर बहती हैं। धाराएँ तटों की जलवायु, मछली, कोहरा और जहाज़रानी बदलती हैं।
- समुद्र–वायुमंडल अंतःक्रिया: अल नीनो और ला नीना – समुद्र और हवा हर समय गर्मी और पानी का लेन-देन करते हैं। सामान्य साल में व्यापारिक पवन गर्म सतही पानी को प्रशांत के पश्चिम में धकेलती है, वहाँ वर्षा होती है और पूर्व में ठंडा पानी ऊपर उठता है। अल नीनो में हवा कमज़ोर होती है और गर्म पानी पूर्व की ओर खिसकता है; ला नीना में हवा तेज़ होती है।
- पृथ्वी का भूगोल और जलवायु: वृष्टि छाया, एल नीनो और ला नीना – जलवायु भूगोल पर निर्भर है। अक्षांश तय करता है कितनी धूप पहुँचे; भूमध्य रेखा पर उठती और लगभग 30° पर उतरती हवा वर्षावन और रेगिस्तान बनाती है (हैडली कोष्ठ)। ऊँचाई पर हवा हर km पर लगभग 6.5 °C ठंडी होती है। महासागर धीरे गर्म-ठंडे होते हैं, इसलिए तटों की जलवायु नरम है, और धाराएँ गर्मी ढोती हैं। पहाड़ नम हवा को ऊपर उठाते हैं: हवा की ओर बारिश, पीछे सूखी वृष्टि छाया। एल नीनो में प्रशांत की व्यापारिक पवनें कमज़ोर होती हैं और गर्म पानी पूर्व की ओर फैलता है, जिससे दुनिया भर में बारिश खिसकती है; ला नीना उल्टा है — तेज़ पवनें और ठंडा पूर्वी प्रशांत।
5. Sel.1 Ch.5 Integrity and difference
Integrity · Zonal differences
- भौगोलिक क्षेत्रीकरण: अक्षांशीय और ऊर्ध्वाधर पट्टियाँ – क्षेत्रीकरण का अर्थ है कि प्रकृति पट्टियों में बदलती है। सूर्य पृथ्वी को असमान गर्म करता है, इसलिए तापमान, जलवायु, मिट्टी और पौधे भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक पट्टियों में बदलते हैं (अक्षांशीय क्षेत्रीकरण)। हर 1 किमी ऊँचाई पर तापमान लगभग 6.5 °C घटता है, इसलिए ऊँचे पर्वत पर भी तल से शिखर तक वैसी ही पट्टियाँ मिलती हैं (ऊर्ध्वाधर क्षेत्रीकरण)।
6. Sel.2 Ch.1 Regions
Types of regions; integrity and linkage
- प्रादेशिक भूगोल: हम दुनिया को प्रदेशों में कैसे बाँटते हैं – प्रदेश (region) वह क्षेत्र है जिसमें एक या अधिक लक्षण साझा हों, जो उसे आसपास के क्षेत्रों से अलग बनाएँ। औपचारिक (एकरूप) प्रदेश अंदर से एक जैसे होते हैं, जैसे कोई मैदान या धान पट्टी। क्रियात्मक (नोडल) प्रदेश किसी केंद्र से जुड़ाव से बनते हैं, जैसे शहर और वहाँ आने-जाने वाले गाँव। बोधगम्य प्रदेश लोगों के मन में होते हैं। प्रदेशों के किनारे आम तौर पर संक्रमण क्षेत्र होते हैं, और प्रदेश लोगों, सामान, पानी और विचारों के प्रवाह से एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
7. Sel.2 Ch.2 Resources, environment and regions
Natural base of development · Fragile-ecology area management · Transition of resource-depleted cities
- क्षेत्रीय विकास का प्राकृतिक आधार – हर क्षेत्र के पास एक प्राकृतिक आधार होता है: भूमि का आकार (उच्चावच), जलवायु, जल, मिट्टी, खनिज और जीव-जंतु। यही आधार तय करता है कि खेती, शहर, खान या बंदरगाह बनाना आसान होगा या कठिन। यह भविष्य तय नहीं करता, क्योंकि लोग तकनीक, व्यापार और योजना जोड़ते हैं, पर सबसे कमज़ोर प्राकृतिक दशा अक्सर क्षेत्र को सबसे ज़्यादा रोकती है।
- मरुस्थलीकरण (Desertification) – मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सूखे इलाकों की अच्छी ज़मीन धीरे-धीरे अपने पौधे और मिट्टी खो देती है और मरुस्थल जैसी हो जाती है। इसके कारण इंसानी (अतिचारण, पेड़ काटना, ज़्यादा खेती, गलत सिंचाई) और प्राकृतिक (सूखा, बढ़ती गर्मी) दोनों हैं। इसका मतलब मरुस्थल का "खिसकना" नहीं है। इससे भूख, धूल भरी आँधियाँ और पलायन होता है। पेड़-घास लगाकर, कम पशु चराकर, पानी बचाकर और भूसे की जालियों से रेत रोककर इसे धीमा किया जा सकता है।
- संसाधन-क्षय वाले शहरों का रूपांतरण – संसाधन-क्षय वाला शहर किसी खान या तेल क्षेत्र के आसपास बसा होता है। संसाधन ख़त्म होने पर रोज़गार जाते हैं, लोग चले जाते हैं और ज़मीन बिगड़ जाती है। रास्ता है: ज़मीन सुधारना, नए उद्योग और सेवाएँ बनाना, कामगारों को नया प्रशिक्षण देना और पुराने स्थलों का नया उपयोग करना, जैसे रूर और पिट्सबर्ग ने किया।
8. Sel.2 Ch.3 Cities, industry and regions
Urban radiation function · Changes in industrial structure
- नगर का विकिरण कार्य और नगर समूह – शहर अपनी सीमा पर रुकता नहीं। उसकी वस्तुएँ, सेवाएँ, रोज़गार, पैसा और विचार लहरों की तरह आसपास के गाँवों और कस्बों तक फैलते हैं। इसे शहर का विकिरण कार्य कहते हैं। दूरी बढ़ने पर असर घटता है, और शहर बड़ा या परिवहन बेहतर हो तो असर बढ़ता है। कई बड़े शहर पास हों और अच्छी तरह जुड़े हों तो नगर समूह बनता है।
- औद्योगिक संरचना में बदलाव और औद्योगिक उन्नयन – हर क्षेत्र तीन तरह के काम से कमाता है: खेती और खनन (प्राथमिक), कारख़ाने (द्वितीयक) और सेवाएँ (तृतीयक)। क्षेत्र जैसे-जैसे अमीर होता है, इनका हिस्सा बदलता है। खेती का हिस्सा घटता है, कारख़ानों का बढ़ता है, और बाद में सेवाएँ आगे निकलती हैं। औद्योगिक उन्नयन का मतलब है उद्योग को ही ज़्यादा साफ़, स्मार्ट और कीमती बनाना।
9. Sel.2 Ch.4 Regional links and coordination
River-basin coordination · Cross-regional resource transfer · Industrial transfer · International cooperation
- नदी द्रोणी विकास और समन्वय – नदी द्रोणी वह पूरा भू-भाग है जिसका पानी एक नदी में आता है। पानी सिर्फ़ ढलान के नीचे बहता है, इसलिए ऊपर जो होता है उसका असर नीचे सबको झेलना पड़ता है। द्रोणी विकास का मतलब है नदी को बिजली, सिंचाई, परिवहन, पीने के पानी और उद्योग के लिए इस्तेमाल करना। समन्वय का मतलब है नदी के सारे क्षेत्र मिलकर योजना बनाएँ और बाँटें, ताकि बाढ़, कमी और प्रदूषण को एक टीम की तरह सँभाला जा सके।
- क्षेत्रों के बीच संसाधन अंतरण: जल, गैस और बिजली – संसाधन बराबर नहीं फैले होते। एक क्षेत्र में पानी, गैस या बिजली भरपूर हो सकती है, जबकि बहुत लोगों और कारख़ानों वाले दूसरे क्षेत्र में कमी होती है। क्षेत्रों के बीच अंतरण नहर, पाइपलाइन और उच्च वोल्टता की लाइनों से ये संसाधन पहुँचाता है। इससे आपूर्ति और विकास मिलता है, पर लागत, हानि और प्रकृति को नुक़सान भी होता है, इसलिए परियोजनाओं की सावधान योजना चाहिए।
- औद्योगिक स्थानांतरण: कारख़ाने क्यों चलते हैं – औद्योगिक स्थानांतरण का अर्थ है उद्योगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना, आमतौर पर भीड़-भाड़ वाले महँगे विकसित इलाक़े से सस्ते कम विकसित इलाक़े में। इसके कारण हैं धक्का (पुश) कारक (महँगी ज़मीन-मज़दूरी, जगह की कमी, सख़्त नियम) और खिंचाव (पुल) कारक (सस्ती ज़मीन व श्रम, नई परिवहन सुविधा, सरकारी मदद)। इससे नए क्षेत्र को रोज़गार और विकास मिलता है, पुराना क्षेत्र सेवाओं की ओर बढ़ता है, पर प्रदूषण और असमान लाभ की समस्या भी आ सकती है।
- जलवायु नीति: दुनिया जलवायु परिवर्तन पर कैसे कदम उठाती है – जलवायु नीति वे समझौते, कानून और योजनाएँ हैं जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाती हैं (शमन, mitigation) और लोगों को बदलती जलवायु से निपटने में मदद करती हैं (अनुकूलन, adaptation)। वायुमंडल सबका साझा है, इसलिए कोई देश अकेले यह समस्या हल नहीं कर सकता। देश संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढाँचा सम्मेलन (UNFCCC, 1992), क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौते (2015) से मिलकर काम करते हैं। पेरिस में हर देश अपना लक्ष्य (NDC) तय करता है और हर पाँच साल में उसे बढ़ाता है, ताकि गर्मी 2 °C से काफ़ी नीचे रहे और 1.5 °C की कोशिश हो। देश के भीतर सरकारें कार्बन टैक्स, कैप-एंड-ट्रेड, नियम-मानक और स्वच्छ ऊर्जा को सहायता देती हैं। कई देशों ने नेट ज़ीरो (कार्बन तटस्थता) का लक्ष्य रखा है। न्याय ज़रूरी है: अमीर देशों ने इतिहास में ज़्यादा उत्सर्जन किया, इसलिए "साझा परंतु विभेदित उत्तरदायित्व", जलवायु वित्त और तकनीक साझा करना ज़रूरी है।