तीन जुड़े हुए जल निकाय
ज़मीन पर मीठा पानी तीन मुख्य जगह रखा रहता है। हर एक को भंडार (store) कहते हैं।
- नदी: ऊँची ज़मीन से नीची ज़मीन की ओर धारा में बहता पानी। यह तेज़ भंडार है।
- झील: ज़मीन के गड्ढे में ठहरा हुआ पानी। यह धीमा भंडार है।
- भूजल (groundwater): मिट्टी और चट्टान के नीचे रिसकर गया पानी। यह सबसे धीमा पर सबसे बड़ा भंडार है। भीगी परत की ऊपरी सतह को जल-स्तर (water table) कहते हैं।
ठंडी जगहों पर चौथा भंडार है: बर्फ़ और ग्लेशियर। ये पानी को बर्फ़ के रूप में रखते हैं और पिघलने पर छोड़ते हैं।
स्रोत सरल हैं: वर्षा, बर्फ़ का पिघलना और ग्लेशियर का पिघलना पानी जोड़ते हैं। वाष्पन और समुद्र की ओर बहाव पानी घटाते हैं।
पुनर्भरण: कौन किसे भरता है?
पुनर्भरण (recharge) का मतलब है एक जल निकाय का दूसरे को पानी देना। नियम सीधा है: पानी ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर जाता है।
बरसात: नदी ज़मीन को भरती है
भारी वर्षा के बाद नदी का स्तर तेज़ी से चढ़ता है। वह पास के जल-स्तर से ऊँचा हो जाता है। नदी का पानी तली और किनारों से मिट्टी में रिसता है। जल-स्तर ऊपर उठता है। इसे नदी द्वारा भूजल का पुनर्भरण कहते हैं। नदी के पास के कुएँ भर जाते हैं।
सूखा मौसम: ज़मीन नदी को भरती है
वर्षा रुकने पर नदी जल्दी उतर जाती है, पर जल-स्तर धीरे उतरता है। इसलिए वह नदी से ऊँचा रहता है। भूजल नदी की तली में रिसकर आता है। इस धीमी आपूर्ति को आधार प्रवाह (baseflow) कहते हैं। इसी कारण कई नदियाँ हफ़्तों बिना बारिश के बहती रहती हैं।
झील
झील एक बड़ी टंकी की तरह है। बाढ़ में वह भर जाती है और नदी की चोटी (peak) छोटी हो जाती है। सूखे महीनों में वह नदी और नीचे की ज़मीन को पानी लौटाती है। जब जल-स्तर झील से ऊँचा होता है तो झील को भी ज़मीन से पानी मिलता है।
बर्फ़ और ग्लेशियर का पानी
ऊँचे पहाड़ों और शुष्क इलाकों में गर्मी में पिघली बर्फ़ ही नदियों का मुख्य पानी होती है। यही नदी आगे मैदान के भूजल को भरती है। तीनों एक जुड़ा हुआ तंत्र हैं, इसलिए एक में बदलाव दूसरों को बदलता है।
जब इंसान दखल देता है
भंडार आपस में जुड़े हैं, इसलिए हमारे काम का असर पूरे तंत्र पर पड़ता है।
- बहुत ज़्यादा कुएँ और नलकूप जल-स्तर को नीचे खींच लेते हैं। जो नदी ज़मीन से पानी पाती थी, वह अब सिर्फ़ ज़मीन को पानी देने वाली बन जाती है और सूख सकती है।
- बाँध बाढ़ रोककर बहाव स्थिर करते हैं, पर नीचे की नदी ज़मीन को कम भर पाती है।
- जंगल काटने और ज़मीन पर कंक्रीट बिछाने से बारिश का पानी तुरंत बह जाता है। कम पानी रिसता है, इसलिए भूजल नहीं भरता।
- प्रदूषण नदी या झील से रिसकर भूजल और कुओं को बिगाड़ सकता है।
अच्छा प्रबंधन यह है: ज़मीन से उतना ही लें जितना वर्षा और नदियाँ लौटा सकें; आर्द्रभूमि और जंगल बचाएँ; और पूरे नदी बेसिन के लिए पानी की योजना एक साथ बनाएँ।
करके देखिए
- एक पारदर्शी डिब्बे में रेत भरिए। उसमें लंबी नाली खोदकर पानी डालिए। यही "नदी" है। देखिए, पास की रेत काली होती जाती है यानी जल-स्तर चढ़ता है।
- अब नाली का पानी हटा दीजिए। क्या पास की गीली रेत कुछ देर पानी देती रहती है? यही भूजल का नदी को पानी देना है।
- 3D के आख़िरी चरण में स्लाइडर "बरसात" पर ले जाइए। तीर किधर हैं? "सूखा" पर ले जाकर फिर देखिए। किस जगह तीर गायब हो जाते हैं?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य नियम: पानी ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर जाता है
- नदी जल-स्तर से ऊँची: नदी भूजल को भरती है (जल खोने वाली नदी)
- जल-स्तर नदी से ऊँचा: भूजल नदी को भरता है (आधार प्रवाह)
- बेसिन का जल संतुलन: वर्षा = नदी का बहाव + वाष्पन ± भंडार में बदलाव
- ठहराव समय = भंडार में पानी की मात्रा ÷ बाहर जाने की दर
हल किए गए उदाहरण
1. नदी के पास एक कुएँ में पानी मई में 8 मीटर नीचे और सितंबर में 3 मीटर नीचे है। जल-स्तर का क्या हुआ और क्यों?
जल-स्तर 8 − 3 = 5 मीटर ऊपर उठा। मानसून की बारिश से नदी भरी और नदी का पानी ज़मीन में भी रिसा, यानी नदी ने भूजल को भरा।
2. 40 दिन से बारिश नहीं हुई, फिर भी नदी बह रही है। उसका पानी कहाँ से आ रहा है?
भूजल से। जल-स्तर नदी के स्तर से ऊँचा है, इसलिए पानी तली में रिसकर आता है। यही आधार प्रवाह है।
3. 4 वर्ग किमी क्षेत्रफल की झील बिना बारिश के 2 मीटर नीचे उतर गई। कितना पानी घटा? (1 वर्ग किमी = 10,00,000 वर्ग मीटर)
आयतन = क्षेत्रफल × उतार = 40,00,000 वर्ग मी × 2 मी = 80,00,000 घन मी। यानी 80 लाख घन मीटर, या 8,000 मिलियन लीटर।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि नदी हमेशा ज़मीन को पानी देती है। सूखे में अक्सर ज़मीन नदी को पानी देती है।
- भूजल को ज़मीन के नीचे की नदी समझना। यह मिट्टी और चट्टान की बारीक जगहों में भरा पानी है और बहुत धीरे चलता है।
- भूलना कि जल-स्तर मौसम के साथ ऊपर-नीचे होता है।
- नदी, झील और भूजल को अलग-अलग पढ़ना। ये हर समय पानी का लेन-देन करते हैं।