जलवायु परिवर्तन के लिए नीति क्यों चाहिए
कोयला, तेल और गैस जलाने, जंगल काटने और कुछ खेती से ग्रीनहाउस गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और मीथेन निकलती हैं। ये गर्मी रोकती हैं; 1800 के दशक से धरती लगभग 1.1–1.2 °C गर्म हो चुकी है। गर्मी कुल जमा CO₂ पर निर्भर है, इसलिए वैज्ञानिक कार्बन बजट की बात करते हैं: तापमान-सीमा पार करने से पहले हम कितना और छोड़ सकते हैं।
वायुमंडल साझा संसाधन है। किसी कारख़ाने का धुआँ दूर के लोगों को नुकसान पहुँचाता है जिन्होंने यह नहीं चुना; अर्थशास्त्री इसे बाह्यता (externality) कहते हैं। इस नुकसान की कोई कीमत नहीं चुकाता, इसलिए बाज़ार अकेले ज़्यादा प्रदूषण करता है। इसीलिए सरकारें जलवायु नीति बनाती हैं।
- शमन (mitigation): उत्सर्जन घटाना या CO₂ हटाना (स्वच्छ ऊर्जा, कुशलता, जंगल)।
- अनुकूलन (adaptation): आने वाले बदलावों की तैयारी (समुद्री दीवार, सूखा सहने वाली फ़सलें, लू की चेतावनी)।
विकास और उत्सर्जन जुड़े हैं: औद्योगीकरण के साथ उत्सर्जन आमतौर पर बढ़ता है। चुनौती है आय बढ़ाते हुए उत्सर्जन घटाना, जिसे विलगाव (decoupling) कहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग: UNFCCC, क्योटो और पेरिस
- 1992 UNFCCC (रियो पृथ्वी सम्मेलन): लगभग सभी देश जलवायु में "ख़तरनाक" दख़ल रोकने के ढाँचे में शामिल हुए। हर साल COP (पक्षकारों का सम्मेलन) होता है। IPCC विज्ञान की जानकारी देता है।
- 1997 क्योटो प्रोटोकॉल: कानूनी रूप से बाध्य लक्ष्य, पर सिर्फ़ विकसित देशों के लिए। कार्बन बाज़ार बने, पर कुछ बड़े उत्सर्जक बाहर रहे।
- 2015 पेरिस समझौता: हर देश शामिल। लक्ष्य: गर्मी 2 °C से काफ़ी नीचे, कोशिश 1.5 °C की, और सदी के दूसरे हिस्से में नेट ज़ीरो। हर देश अपना राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDC) लिखता है और हर पाँच साल में उसे ज़्यादा महत्वाकांक्षी बनाता है। वैश्विक आकलन (global stocktake) प्रगति जाँचता है।
अन्य सहयोग: जलवायु वित्त (जैसे ग्रीन क्लाइमेट फ़ंड), तकनीक हस्तांतरण, देशों के बीच कार्बन क्रेडिट व्यापार, क्षेत्रीय ऊर्जा और परिवहन संपर्क, और ख़ास गैसों पर समझौते (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन)। सीमा-पार परिवहन और ऊर्जा गलियारे जैसे बड़े क्षेत्रीय ढाँचा कार्यक्रम, कोयला संयंत्र बनाएँ तो उत्सर्जन बढ़ाते हैं, और सौर व रेल बनाएँ तो स्वच्छ ऊर्जा को तेज़ करते हैं।
देश के नीति-औज़ार
- कार्बन टैक्स: हर टन CO₂ पर तय कीमत। प्रदूषक भरता है, तो स्वच्छ विकल्प तुलना में सस्ते हो जाते हैं। कीमत पक्की, कटौती की मात्रा नहीं।
- कैप-एंड-ट्रेड (उत्सर्जन व्यापार): सरकार कुल उत्सर्जन की सीमा (कैप) तय करती है और परमिट देती या बेचती है। जो कंपनी सस्ते में घटा सके, वह बचे परमिट बेच सकती है। मात्रा पक्की, कीमत नहीं।
- नियम और मानक: गाड़ियों के ईंधन मानक, भवन संहिता, कोयला संयंत्र धीरे-धीरे बंद करना, कुछ गैसों पर रोक।
- सहायता और निवेश: सौर-पवन के लिए सब्सिडी या नीलामी, सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहन, शोध, वनरोपण।
- जानकारी: ऊर्जा लेबल (स्टार रेटिंग), जागरूकता अभियान।
कई देश तारीख़ के साथ लक्ष्य घोषित करते हैं: जैसे 2030 तक कुछ प्रतिशत कटौती और 2050, 2060 या 2070 तक नेट ज़ीरो। अच्छे लक्ष्यों के पीछे कानून, हर क्षेत्र (बिजली, उद्योग, परिवहन, भवन, खेती) की योजना और सालाना रिपोर्टिंग होती है।
नेट ज़ीरो और कार्बन तटस्थता
नेट ज़ीरो (CO₂ के लिए कार्बन तटस्थता) का मतलब: जितनी गैस अब भी निकलती है, उतनी ही हवा से हटा ली जाए, ताकि हर साल कुल जोड़ शून्य हो।
शुद्ध उत्सर्जन = उत्सर्जन − हटाना।
रास्ता: पहले जितना हो सके उत्सर्जन घटाओ (स्वच्छ बिजली, इलेक्ट्रिक परिवहन, कुशल भवन, साफ़ उद्योग, कम खाद्य बर्बादी)। फिर बचे हुए को हटाने से बराबर करो: जंगल उगाना, आर्द्रभूमि और मिट्टी सुधारना, और कार्बन कैप्चर और भंडारण जैसी तकनीक। हटाना सीमित और धीमा है, इसलिए यह कटौती की जगह नहीं ले सकता।
सरकारों के घोषित लक्ष्य, उदाहरण के लिए: यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कोरिया और जापान 2050, चीन 2060, भारत 2070। गर्मी कुल जमा CO₂ पर निर्भर है, इसलिए जितनी जल्दी नेट ज़ीरो, उतनी कम गर्मी।
जलवायु कार्रवाई में न्याय और समता
पहले कौन घटाए और ज़्यादा कौन भरे? देश अलग-अलग सोचते हैं।
- ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी: औद्योगिक देशों ने 1850 से अब तक कुल CO₂ का सबसे बड़ा हिस्सा छोड़ा।
- प्रति व्यक्ति उत्सर्जन: उच्च आय वाले देश का औसत व्यक्ति निम्न आय वाले देश के व्यक्ति से कई गुना ज़्यादा उत्सर्जन करता है।
- विकास का अधिकार: ग़रीब देशों को ग़रीबी मिटाने के लिए ऊर्जा चाहिए।
- संवेदनशीलता: जिन्होंने सबसे कम उत्सर्जन किया, जैसे छोटे द्वीप और ग़रीब खेतिहर इलाके, अक्सर बाढ़, सूखा और लू से सबसे ज़्यादा झेलते हैं।
UNFCCC का सिद्धांत साझा परंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC): हर देश कदम उठाए, पर अमीर देश आगे रहें और जलवायु वित्त (अमीर देशों ने हर साल 100 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का वादा किया, बाद में बड़ा लक्ष्य माना), तकनीक हस्तांतरण और हानि और क्षति (loss and damage) कोष से मदद करें। न्यायपूर्ण संक्रमण (just transition) कोयले या तेल पर निर्भर मज़दूरों और समुदायों की रक्षा करता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
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हल किए गए उदाहरण
1. एक देश हर साल 400 मिलियन टन CO₂ छोड़ता है और उसके जंगल 60 मिलियन टन सोखते हैं। शुद्ध उत्सर्जन कितना है और नेट ज़ीरो से कितना दूर?
शुद्ध = 400 − 60 = 340 मिलियन टन। नेट ज़ीरो के लिए उत्सर्जन घटाना और/या हटाना मिलाकर 340 मिलियन टन करना होगा।
2. $40 प्रति टन कार्बन टैक्स, कारख़ाना साल में 25,000 टन छोड़ता है। बिल कितना? 10,000 टन घटाए तो?
25,000 × 40 = $10,00,000 (10 लाख डॉलर)। घटाने के बाद 15,000 × 40 = $6,00,000, यानी $4,00,000 की बचत; इसलिए जहाँ भी कटौती $40 प्रति टन से सस्ती हो, कंपनी घटाएगी।
3. पेरिस समझौते में लगभग सभी देश क्यों जुड़ पाए, जबकि क्योटो में नहीं?
क्योटो ने बाध्य लक्ष्य सिर्फ़ विकसित देशों पर रखे, इसलिए कुछ बाहर रहे। पेरिस में हर देश अपना NDC खुद चुनता है, इसलिए सब जुड़ सके; फिर हर पाँच साल के अपडेट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग से महत्वाकांक्षा बढ़ाई जाती है।
4. देश A: 15 t प्रति व्यक्ति, 5 करोड़ लोग। देश B: 2 t प्रति व्यक्ति, 50 करोड़ लोग। कुल उत्सर्जन किसका ज़्यादा और न्याय के बारे में क्या पता चलता है?
A: 15 × 5 करोड़ = 75 करोड़ t। B: 2 × 50 करोड़ = 100 करोड़ t। कुल B का ज़्यादा, पर A का हर व्यक्ति 7.5 गुना ज़्यादा छोड़ता है। कुल और प्रति व्यक्ति आँकड़े न्याय की अलग-अलग कहानी बताते हैं।
आम गलतियाँ
- नेट ज़ीरो को शून्य उत्सर्जन समझना। इसका मतलब है बचा उत्सर्जन हटाने से बराबर हो।
- शमन और अनुकूलन को मिलाना। शमन कारण घटाता है; अनुकूलन असर से निपटता है।
- कहना कि पेरिस समझौता हर देश का लक्ष्य तय करता है। हर देश अपना NDC खुद चुनता है; समझौता साझा लक्ष्य और नियम तय करता है।
- देशों की तुलना सिर्फ़ कुल उत्सर्जन से करना। प्रति व्यक्ति और ऐतिहासिक उत्सर्जन भी न्याय के लिए ज़रूरी हैं।