भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ और बल
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ वे प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हैं जो पृथ्वी की सतह का आकार बदलती हैं। इनके पीछे के बल:
| अंतर्जनित (अंदर) | बहिर्जनिक (बाहर) |
|---|---|
| ऊर्जा: पृथ्वी की भीतरी गर्मी (रेडियोधर्मिता, घूर्णन, ज्वारीय घर्षण, जन्म के समय की गर्मी) | ऊर्जा: सूर्य की गर्मी और गुरुत्व, हवा और पानी के ज़रिए |
| ज़मीन उठाते हैं: निर्माणकारी बल | ज़मीन घिसते हैं: विनाशकारी बल |
| पटल विरूपण, ज्वालामुखीयता, भूकंप | अपक्षय, बृहत् संचलन, अपरदन, निक्षेपण |
| सतह ऊबड़-खाबड़ बनाते हैं (उच्चावच) | सतह समतल करने की कोशिश (तल संतुलन) |
दोनों एक साथ काम करते हैं। इसीलिए पृथ्वी की सतह कभी पूरी समतल नहीं होती।
तल संतुलन = ऊँची ज़मीन का घिसना (निम्नीकरण) + नीची ज़मीन का भरना (अधिवृद्धि)।
अंतर्जनित प्रक्रियाएँ: पटल विरूपण और ज्वालामुखीयता
पटल विरूपण
वे सारी प्रक्रियाएँ जो भूपर्पटी के भागों को हिलाती, उठाती या बनाती हैं। ये धीमी होती हैं।
- पर्वतनी (पर्वत निर्माण): भूपर्पटी का तेज़ वलन, लंबी पर्वत शृंखलाएँ।
- महाद्वीप निर्माण (एपिरोजेनी): बड़े भागों का बिना ज़्यादा मुड़े उठना या धँसना।
- भूकंप: अचानक स्थानीय हलचल।
- प्लेट विवर्तनिकी: प्लेटों की क्षैतिज गति।
पटल विरूपण से वलन (मुड़ना), भ्रंशन (टूटना और खिसकना) होता है, और दबाव व ताप बदलने से चट्टानें कायांतरित हो सकती हैं।
ज्वालामुखीयता
पिघली चट्टान (मैग्मा) का सतह की ओर या सतह पर आना और उससे बनी आकृतियाँ, अंदर (अंतर्वेधी: बैथोलिथ, सिल, डाइक) और बाहर (बहिर्वेधी: ज्वालामुखी, लावा पठार)।
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ और अपक्षय
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ वायुमंडल और गुरुत्व से पैदा प्रतिबल (तनाव) के कारण होती हैं। जहाँ चट्टान पर गर्मी, पाला, पानी का तनाव हो, वह टूटती है। मुख्य प्रक्रियाएँ: अपक्षय, बृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण। कारक: बहता पानी, भूजल, हिमनद, हवा, लहरें और धाराएँ।
अपक्षय: चट्टान का उसी जगह टूटना
अपक्षय चट्टान का अपनी जगह पर टूटना और सड़ना है, बिना या बहुत कम खिसके। जलवायु तय करती है कि कौन सा प्रकार ज़्यादा होगा।
| प्रकार | कैसे | उदाहरण |
|---|---|---|
| रासायनिक | पानी और हवा खनिज बदलते हैं: विलयन (घुलना), कार्बोनेशन (CO₂ वाला वर्षा जल चूना पत्थर घोले), जलयोजन (खनिज पानी सोखकर फूलें), ऑक्सीकरण (लोहे में जंग), अपचयन | चूना पत्थर की गुफाएँ; लाल जंग लगी चट्टानें |
| भौतिक (यांत्रिक) | भार हटने से दबाव कम होना, गर्म-ठंडा होकर फैलना-सिकुड़ना, दरारों में पानी जमना-पिघलना (तुषार), नमक के क्रिस्टल बढ़ना | अपशल्कन: गरम मरुस्थल में बाहरी परतें प्याज़ के छिलके जैसी उतरती हैं |
| जैविक | दरारों में जड़ें बढ़ना, बिल बनाने वाले जीव, मनुष्य की खुदाई; पौधों के अम्ल और सड़ते पदार्थ रासायनिक अपक्षय बढ़ाते हैं | पेड़ की जड़ों से फटी चट्टान |
अपक्षय क्यों ज़रूरी: यह मिट्टी बनाता है, अपरदन और बृहत् संचलन में मदद करता है, और काम के अयस्कों (जैसे एल्युमिनियम का बॉक्साइट) को इकट्ठा करता है जिससे खनन लाभदायक बनता है।
घर पर करें: चॉक का टुकड़ा सिरके (हल्का अम्ल) में डालिए। बुलबुले उठेंगे और चॉक घुलेगा: यही चूना पत्थर का रासायनिक अपक्षय है।
बृहत् संचलन और भूस्खलन
बृहत् संचलन में चट्टान, मिट्टी और मलबा गुरुत्व से ढलान पर नीचे खिसकते हैं। इसके लिए नदी, हवा या बर्फ़ की ज़रूरत नहीं। अपक्षय सामग्री तैयार करता है; खड़ी ढलान, भारी वर्षा, भूकंप, सड़क कटाई और वनस्पति हटाना इसे शुरू करते हैं।
धीमे संचलन
- मृदा सर्पण: मिट्टी का बहुत धीरे खिसकना; बाड़ के खंभे और पेड़ नीचे की ओर झुकते हैं।
- मृदा प्रवाह (सोलिफ़्लक्शन): पानी से भरी मिट्टी का धीमा बहाव, ठंडे क्षेत्रों में जमी ज़मीन पर।
तेज़ संचलन
- भू-प्रवाह: पानी से भरी चिकनी मिट्टी ढलान पर खिसकती है।
- पंक प्रवाह: बहुत गीला गाढ़ा कीचड़ घाटियों में तेज़ बहता है, भारी वर्षा या ज्वालामुखी के बाद।
- मलबा अवधाव: नम क्षेत्रों की संकरी खड़ी घाटियों में बहुत तेज़।
भूस्खलन (तेज़, अपेक्षाकृत सूखे)
- अवसर्पण: खंड नीचे फिसलकर पीछे की ओर घूमता है।
- मलबा स्खलन: मलबा तेज़ी से लुढ़कता या फिसलता है।
- शैल स्खलन: चट्टानी खंड ढलान वाली सतह पर फिसलते हैं।
- शैल पतन: खड़ी चट्टान से पत्थर सीधे गिरते हैं।
भारत में हिमालय और पश्चिमी घाट में भूस्खलन बहुत होते हैं। बचाव: पेड़ और घास लगाना, सीढ़ीदार खेत और सहारा दीवारें, खड़ी ढलान न काटना, पानी की सुरक्षित निकासी।
अपरदन और निक्षेपण
अपरदन में बहता पानी, हवा, हिमनद, लहरें और भूजल जैसे चलते कारक चट्टान के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। अपक्षय अपरदन की मदद करता है, पर असल में भू-आकृतियाँ अपरदन बदलता है। जब कारक धीमा होता है तो बोझ गिरा देता है: यह निक्षेपण है। नीचे के भाग भरते हैं।
अपक्षय बनाम अपरदन: अपक्षय = उसी जगह टूटना; अपरदन = उठाकर ले जाना।
मृदा निर्माण
मृदा सतह की पतली, जीवित परत है, जिसमें खनिज कण, ह्यूमस (सड़े पौधे-जीव), पानी और हवा होते हैं।
प्रक्रिया
- अपक्षय चट्टान को ढीले पदार्थ में तोड़ता है।
- जीवाणु, काई और लाइकेन बसते हैं; वे जैविक पदार्थ जोड़ते हैं।
- पौधे उगते हैं; जड़ें और जीव पदार्थ मिलाते हैं; सड़ती पत्तियाँ ह्यूमस जोड़ती हैं।
- सैकड़ों से हज़ारों वर्षों में परतें (संस्तर) बनती हैं: A (ह्यूमस वाली ऊपरी मिट्टी), B (अवमृदा, जहाँ खनिज जमा होते हैं), C (टूटी मूल चट्टान), नीचे आधार शैल।
मृदा निर्माण के कारक
- मूल पदार्थ: जिस चट्टान से मिट्टी बनी, वही बनावट और खनिज तय करती है।
- जलवायु (सक्रिय): वर्षा और तापमान अपक्षय और निक्षालन (खनिजों का नीचे बह जाना) तय करते हैं।
- उच्चावच (निष्क्रिय): खड़ी ढलान पर पतली मिट्टी; समतल नीचे भागों में मोटी।
- जैविक क्रियाएँ (सक्रिय): पौधे, जीव और सूक्ष्मजीव ह्यूमस जोड़ते और मिट्टी मिलाते हैं।
- समय (निष्क्रिय): जितना ज़्यादा समय, उतनी परिपक्व मिट्टी।
जलवायु और जीव सक्रिय कारक हैं; मूल चट्टान, उच्चावच और समय निष्क्रिय कारक।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अंतर्जनित = अंदर से, ज़मीन उठाए (पटल विरूपण + ज्वालामुखीयता); बहिर्जनिक = बाहर से, घिसाए
- पटल विरूपण = पर्वतनी + महाद्वीप निर्माण + भूकंप + प्लेट विवर्तनिकी
- तल संतुलन = निम्नीकरण (घिसना) + अधिवृद्धि (भरना)
- अपक्षय के प्रकार: रासायनिक, भौतिक, जैविक; अपशल्कन = चट्टान की परतें उतरना
- बृहत् संचलन = गुरुत्व से ढलान पर खिसकना: धीमा (सर्पण, सोलिफ़्लक्शन) / तेज़ (भू-प्रवाह, पंक प्रवाह, मलबा अवधाव) / भूस्खलन (अवसर्पण, मलबा स्खलन, शैल स्खलन, शैल पतन)
- मृदा संस्तर: A (ऊपरी मिट्टी) → B (अवमृदा) → C (टूटी मूल चट्टान) → आधार शैल
- मृदा कारक: मूल पदार्थ, जलवायु, उच्चावच, जैविक क्रियाएँ, समय
हल किए गए उदाहरण
1. कई वर्षों की वर्षा से चूना पत्थर की पहाड़ी में गुफाएँ बनती हैं। कौन सी प्रक्रिया?
कार्बोनेशन और विलयन से रासायनिक अपक्षय: CO₂ वाला वर्षा जल हल्का अम्ल बनकर चूना पत्थर घोलता है।
2. गरम मरुस्थल में चट्टानें घुमावदार परतों में उतरती हैं। क्यों?
अपशल्कन, एक भौतिक अपक्षय: दिन में तेज़ गर्मी और रात की ठंड से बाहरी परतें अंदर से ज़्यादा फैलती-सिकुड़ती हैं, इसलिए उतर जाती हैं।
3. पहाड़ी पर बाड़ के खंभे सालों में धीरे-धीरे नीचे झुकते हैं। प्रक्रिया बताइए।
मृदा सर्पण, गुरुत्व से बहुत धीमा बृहत् संचलन।
4. अंतर्जनित या बहिर्जनिक: वलन, भूस्खलन, ज्वालामुखी उद्गार, नदी अपरदन।
वलन और ज्वालामुखी उद्गार अंतर्जनित; भूस्खलन और नदी अपरदन बहिर्जनिक।
5. खड़ी ढलान पर मिट्टी पतली और घाटी में मोटी क्यों?
खड़ी ढलान पर मिट्टी जमने से पहले ही गुरुत्व और बहता पानी उसे नीचे ले जाते हैं। वह घाटियों और मैदानों में जमा होती है।
आम गलतियाँ
- अपक्षय और अपरदन को एक मानना। अपक्षय उसी जगह तोड़ता है; अपरदन ले जाता है।
- मानना कि बृहत् संचलन के लिए नदी या हवा चाहिए। सिर्फ़ गुरुत्व काफ़ी है।
- मानना कि अंतर्जनित बल हमेशा अचानक होते हैं। ज़्यादातर पटल विरूपण बहुत धीमा है; भूकंप और उद्गार अचानक होते हैं।
- मिट्टी को सिर्फ़ टूटी चट्टान समझना। उसमें ह्यूमस, हवा, पानी और जीव भी चाहिए, और बनने में बहुत समय लगता है।