पृथ्वी की आंतरिक संरचना
हम केंद्र तक खुदाई नहीं कर सकते। वैज्ञानिक भूकंपीय तरंगों से अंदर का पता लगाते हैं, जो हर परत में अलग गति से चलती हैं।
| परत | कैसी है | मोटाई (लगभग) |
|---|---|---|
| भूपर्पटी | ठोस चट्टान जिस पर हम रहते हैं। समुद्र के नीचे पतली, महाद्वीपों के नीचे मोटी। | 5–70 km |
| मैंटल | बहुत गरम, कुछ नरम चट्टान जो बहुत धीरे बहती है। | ~2,900 km |
| बाहरी कोर | तरल लोहा और निकल। | ~2,200 km |
| आंतरिक कोर | ठोस लोहा और निकल, सबसे गरम भाग। | ~1,200 km त्रिज्या |
भूपर्पटी और मैंटल का ऊपरी कठोर भाग मिलकर स्थलमंडल कहलाता है।
प्लेट विवर्तनिकी
स्थलमंडल लगभग 7 बड़ी और कई छोटी प्लेटों में टूटा है। मैंटल की गर्मी से ये हर साल कुछ सेंटीमीटर खिसकती हैं (लगभग नाख़ून बढ़ने जितनी तेज़)।
- आपस में धकेलना (अभिसारी): ज़मीन मुड़कर पर्वत बनती है, जैसे हिमालय, या एक प्लेट दूसरी के नीचे जाती है।
- दूर खिंचना (अपसारी): मैग्मा ऊपर आकर नई भूपर्पटी बनाता है, जैसे मध्य-महासागरीय कटक।
- बग़ल से सरकना (रूपांतर): प्लेटें रगड़कर अटकती हैं, फिर अचानक खिसकती हैं। इससे भूकंप आता है।
ज़्यादातर भूकंप और ज्वालामुखी प्लेटों के किनारों के पास होते हैं।
अपक्षय, अपरदन और क्रमण के कारक
अपक्षय = चट्टान का उसी जगह टूटना। गर्मी-सर्दी से चट्टान फैलती-सिकुड़ती है; दरारों में पानी जमता है; जड़ें चट्टान में घुसती हैं; बारिश का पानी कुछ चट्टानों को धीरे-धीरे घोल देता है।
अपरदन = टूटे टुकड़ों को दूर ले जाना। निक्षेपण = उन्हें कहीं और छोड़ देना।
क्रमण पूरा समतल करने का काम है: ऊँची ज़मीन घिसती है और नीची भरती है। क्रमण के कारक हैं:
| कारक | घिसाई (अपरदन) | जमाव (निक्षेपण) |
|---|---|---|
| बहता पानी (नदी) | V-आकार की घाटी, जलप्रपात | बाढ़ का मैदान, डेल्टा |
| हवा | मरुस्थल में छत्रक शिला | रेत के टीले, लोएस |
| हिमनद (चलती बर्फ़) | U-आकार की घाटी | हिमोढ़ (चट्टानों के ढेर) |
| समुद्री लहरें | तटीय चट्टान, समुद्री गुफ़ा, मेहराब | पुलिन (बीच) |
भूकंप और भूस्खलन
भूकंप ज़मीन का अचानक हिलना है, जब प्लेट के किनारे की चट्टानें खिसकती हैं। पृथ्वी के अंदर जहाँ से यह शुरू होता है वह उद्गम केंद्र है; उसके ठीक ऊपर सतह का बिंदु अधिकेंद्र है। इसकी तीव्रता सीस्मोग्राफ़ से रिक्टर स्केल पर मापी जाती है।
भूस्खलन ढलान से चट्टान और मिट्टी का खिसकना है। भारी बारिश, सड़क के लिए ढलान काटना और पेड़ हटाना इसे बढ़ाते हैं।
सुरक्षा: भूकंप में झुको, ढको और पकड़ो (मज़बूत मेज़ के नीचे); काँच से दूर रहो। पहाड़ों में भारी बारिश के समय दरार वाली खड़ी ढलान से बचो।
हिमस्खलन, GLOF और धूल भरी आँधी
- हिमस्खलन: बर्फ़ का बड़ा ढेर तेज़ी से पहाड़ से नीचे खिसकता है, अक्सर ताज़ी भारी बर्फ़ या गर्मी के बाद।
- GLOF (हिमनद झील विस्फोट बाढ़): पिघलते हिमनद के आगे झीलें बनती हैं, जिन्हें ढीली चट्टानें रोकती हैं। यह दीवार टूटे (भारी बारिश, बर्फ़ गिरने या भूकंप से) तो झील अचानक ख़ाली होकर नीचे की घाटियों में बाढ़ लाती है। गर्मी बढ़ने से ऐसी झीलें बढ़ रही हैं।
- धूल भरी आँधी: तेज़ सूखी हवाएँ ढीली धूल और रेत उठाकर घनी चलती दीवार बना देती हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून से पहले आम है।
हम इन आपदाओं को रोक नहीं सकते, पर पहले की चेतावनी, सुरक्षित निर्माण और पेड़ लगाने से नुक़सान घटता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- परतें (बाहर → अंदर): भूपर्पटी → मैंटल → बाहरी कोर (तरल) → आंतरिक कोर (ठोस)
- स्थलमंडल = भूपर्पटी + मैंटल का ऊपरी ठोस भाग, जो प्लेटों में टूटा है
- अपक्षय (उसी जगह टूटना) → अपरदन (ले जाना) → निक्षेपण (छोड़ना) = क्रमण
- क्रमण के कारक: बहता पानी, हवा, हिमनद, समुद्री लहरें
- उद्गम केंद्र = अंदर शुरुआत का बिंदु; अधिकेंद्र = उसके ऊपर सतह का बिंदु
- GLOF = हिमनद झील विस्फोट बाढ़
हल किए गए उदाहरण
1. पहाड़ी पर एक चट्टान कई गरम दिनों और ठंडी रातों के बाद फट जाती है। यह अपक्षय है या अपरदन?
अपक्षय, क्योंकि चट्टान उसी जगह टूटी, खिसकी नहीं।
2. नदी रेत को समुद्र तक ले जाती है और डेल्टा बनता है। दोनों प्रक्रियाओं के नाम बताइए।
अपरदन (रेत ले जाना) और निक्षेपण (उसे छोड़कर डेल्टा बनाना)।
3. हिमालय को नवीन वलित पर्वत क्यों कहते हैं?
ये पृथ्वी के इतिहास में हाल ही में बने, जब भारतीय प्लेट ने यूरेशियाई प्लेट को धकेलकर ज़मीन मोड़ी। ये अब भी ऊँचे हो रहे हैं।
4. एक प्लेट साल में 5 cm खिसकती है। 1 लाख (1,00,000) साल में कितनी खिसकेगी?
5 × 1,00,000 = 5,00,000 cm = 5,000 m = 5 km।
5. पहाड़ों में एक हिमनद झील हर गर्मी में बड़ी होती जा रही है। यह ख़तरा क्यों है?
झील को ढीली चट्टानें रोकती हैं। ज़्यादा पानी = ज़्यादा दबाव; दीवार टूटी तो GLOF नीचे के गाँवों में बाढ़ ला सकती है।
आम गलतियाँ
- अपक्षय और अपरदन को एक समझना। अपक्षय उसी जगह तोड़ता है; अपरदन दूर ले जाता है।
- मैंटल को पानी जैसा तरल मानना। यह ज़्यादातर ठोस चट्टान है जो बहुत धीरे बहती है; तरल परत बाहरी कोर है।
- अधिकेंद्र को पृथ्वी के अंदर गहरा बताना। अंदर उद्गम केंद्र है; अधिकेंद्र सतह पर है।
- सोचना कि प्लेटें तेज़ चलती हैं। ये साल में कुछ सेंटीमीटर ही चलती हैं, पर लाखों सालों में पर्वत बना देती हैं।